श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ४ ]
सर्गः ४ ]
सारकाण्डम्
४१
निर्मर्त्स्य क्रोधसम्पृक्ता वृन्दा वचनमब्रवीत् ।
वृन्दोवाच
तव ज्ञानं हरे शीलं परदाराभिगामिनः ॥१०५॥
त्वं ज्ञातोऽसि मयाऽप्यद्य मायावी प्रच्छन्नतामसः । यौ त्वया मायया द्वौ तौ स्वकीयौ दर्शितौ मम ॥१०६॥
तावेव राक्षसौ भूत्वा तव भार्यां विनेष्यतः । जयविजयनामानौ ज्ञातौ कृत्रिमरूपिणौ ॥१०७॥
त्वं चापि भार्यादुःखार्तो वने करिष्यह्यवशान् । अत्र सर्वेश्वरोऽपि त्वं यत्ते शिष्यौ ममागता ॥१०८॥
पुण्यशीलसुशीलौ तौ कपिरूपधरावुभौ । अतस्ते वानरैग्मस्तु संगतिर्दण्डके वने ॥१०९॥
तद्रूपधरः शिष्यो यस्तार्योऽत्रेति वोधयन् । इत्युक्त्वा सा तदा वृन्दा प्रविवेश हुताशनम् ॥११०॥
ततो जालंधरो दैत्यो निहतो युधि शंभुना । तस्माद्राजंस्तदानीं तौ कुम्भकर्णदशाननौ ॥१११॥
जातौ सागरमध्ये तौ लङ्कायामधुना स्थितौ । नीत्वा जनकजां बत्लां पंचवर्षांस्तु मातृवत् ॥११२॥
पालयित्वाऽथ षण्मासात् रामबाणान्मरिष्यति । रामोऽपि वालिनं हत्वा सुग्रीवेण समन्वितः ॥११३॥
शिलाभिः सागरं बद्ध्वा सीतामादाय यास्यति । यानापत्यविलासांश्च सप्तद्वीपप्ररक्षणम् ॥११४॥
करिष्यति दयितया बंधुभिश्च यथामुखम् । इदं गोप्यं त्वया राजन् कथनीयं न कुत्रचित् ॥११५॥
श्रीशिव उवाच
इत्युक्त्वा मुद्गलः सर्वं भावि रामस्य कौतुकात् । चरित्रं दर्शयामास यदा यद्यत्कारिष्यति ॥११६॥
तच्छ्रुत्वा नृपतिः श्रुत्वा तुष्टः पप्रच्छ तं पुनः । पूर्वजन्मनि कश्चाहं किं मया सुकृतं कृतम् ॥११७॥
तन्मे वद मां ब्रह्मन् यस्माज्जातो हरिः सुतः । मम साक्षाद्रामचंद्रो लक्ष्मीः सीता म्भूत्स्नुषा ॥११८॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा नृपमाह पुनर्मुनिः ।
मुद्गल उवाच
आसीन्मन्थाद्रिविषये करवीरपुरे पुरा ॥११९॥
ब्राह्मणो धर्मवित्कश्चिद्धर्मदत्त इति श्रुतः । विष्णुव्रतकरः सम्यग्विष्णुसूपूजारतः सदा ॥१२०॥
दशा ता क्रुद्ध होकर धिक्कारती हुई वृन्दा बोली-हे हर ! तुम्हारे इस परस्त्रीगमनरूपी व्यवहारको धिक्कार है ॥१०५॥ मैंने अब जाना कि तुम मायावी तथा बनावटी तपस्वी हो। तुमने अपने निजी दो दूतोंको वानर-रूपमें मुझे दिखलाया था, वे ही दोनों राक्षस होकर तुम्हारी स्त्रीका हरण करेंगे। वे दोनों कृत्रिमरूपधारी जय विजय तुम्हारे पाखंड थे ॥१०२-१०७॥ सर्वेश्वर होनेपर भी तुम स्त्रीके वियोगसे दुःखी होकर वानरोंके साथ वनमें चक्कर लगाओगे। तुम्हारे वे दोनों पुण्यशील-सुशील शिष्य जो वानर बनेंगे। उनमेंसे तार्य नामका शिष्य बहुरूप धारण करेगा। और भी बहुतसे वानर दण्डकवनमें तुमको मिलेंगे। इतना कहकर वृन्दा अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥१०८-११०॥ इस प्रकार वृन्दाका पातिव्रत खण्डित होनेके बाद जलन्धर वास्तविकरूपमें शंभुके द्वारा मारा गया। हे महाराज दशरथ ! इस शापके कारण इस समय रावण कुम्भकर्ण जन्म लेकर समुद्रके बीच लङ्कामें निवास करते हैं। वे जबरदस्तीसे जनककी पुत्री सीताको ले जाकर छः मास तक माताकी तरह रक्षण करनेके पश्चात् रामके बाणोंसे मारे जायेंगे। राम भी वालीको मारकर सुग्रीवके साथ पत्थरोंसे समुद्रको बाँध तथा उस पार जाकर सीताको ले आयेंगे। पश्चात् प्राणप्रिया सीता तथा बन्धुओंके साथ राम सौख्यान्तःकरणका विलास करते हुए सप्तद्वीपोंकी रक्षा करेंगे। हे राजन् ! यह गोप्य बात किसीको न बतलाइएगा ॥१११-११५॥ श्रीशिवजी बोले-हे पार्वती ! इस प्रकार मुद्गलने रामका समस्त भावी चरित्र बता दिया ॥११६॥ इन सब बातोंको सुन तथा प्रसन्न होकर राजा दशरथने फिर पूछा कि मैं कौन था और मैंने कौनसे सुकृत किये थे कि जिससे साक्षात् भगवान् रामचंद्रजी मेरे पुत्र बने तथा साक्षात् लक्ष्मी सीता होकर मेरी पुत्रवधू हुईं। हे ब्रह्मन् ! यह सब हाल मुझे कह सुनाइये ॥११७॥११८॥ यह सुनकर मुद्गल मुनि राजासे फिर कहने लगे। मुनि बोले-हे राजन् ! सह्याद्रिपर करवीरपुरमें परम धर्मज्ञ धर्मदत्त नामसे विख्यात एक ब्राह्मण
| ४२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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द्वादशाक्षरविद्यायां जपनिष्ठोऽनिशंक्रियः। कदाचित्कार्तिके मासि हरिजागरणाय सः ॥ १२१॥
रात्र्यां तुर्यावशेषायां जगाम हरिमन्दिरम् । हरिपूजोपकरणान् प्रगृह्य व्रजता तदा ॥ १२२॥
तेन दृष्टा समायाता राक्षसी भीमनिःस्वना। वक्रदंष्ट्रा ललज्जिह्वा विनग्ना रक्तलोचना ॥ १२३॥
दिगंबरा शुष्कमांसा लंबोष्ठी घर्घरस्वना । तां दृष्ट्वा भयसंत्रस्तः कंपितावयवस्तदा ॥ १२४॥
पूजोपकरणं सर्वः पयोमिश्राह्नदलात् । संस्मृत्य यद्धरेर्नाम तुलसीयुक्तवारिणा ॥१२५॥
मोहमद्वाग्णि तस्मात्तत्पापं लयमागतम् । अथ संस्मृत्य सा पूर्वजन्मकर्मविपाकजम् ॥ १२६॥
स्वां दशामब्रवीत्तीव्रं दंडवच्च प्रणम्य सा ।
कलहोवाच
पूर्वकर्मविपाकेन दशामेतां गताऽस्म्यहम् ॥१२७॥
मन्कथं तु पुनर्विप्र याम्यहं गतिमुत्तमाम् ।
मुद्गल उवाच
तां दृष्ट्वा प्रणतामार्ता वदमानां स्वकर्म सा ॥१२८॥
अतीव विस्मितो विप्रस्तदा वचनमब्रवीत् ।
धर्मदत्त उवाच
केन कर्मविपाकेन त्वं दशामीदृशीं गता ॥ १२९॥
कुतः प्राप्ता च किंशीला तत्सर्वं विस्तराद्वद ।
कलहोवाच
सौराष्ट्रनगरे ब्रह्मन् भिक्षुनामाऽभवद्द्विजः ॥१३०॥
तस्याहं गृहिणी भद्रात् कलहाख्याऽतिनिष्ठुरा । न कदाचिन्मया भर्तुर्वचसाऽपि शुभं कृतम् ॥ १३१॥
नार्पितं तस्य मिष्टान्नं भर्तुर्वचनभंगया । पाककाले यथा नित्यं यद्यच्चान्नं मनोरमम् ॥ १३२॥
तत्तत्पूर्वं स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्भर्त्रे निवेदितम् । एकदा स पतिर्मित्रं मम वृत्तं न्यवेदयत् ॥ १३३॥
नैव शृणोति मे पत्नी मद्वाक्यं किं करोम्यहम् । तेन श्रुत्वा तु सकलं शृण संचित्य वै हृदि ॥१३४॥
उवाच मन्पतिं किंचिद्युक्तिं नां ते रटाम्यहम् । निषेधोक्त्या यद्वस्त्वं गृहिणी सा करिष्यति ॥ १३५॥
रहता था वह विष्णुके व्रतोंको करनेवाला, भली भाँति विष्णुपूजामें रत, सदा बारह अक्षरके मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) के जपमे निष्ठा रखनेवाला तथा अभ्यागतोंका प्रेमी था । एक बार वह कार्तिक-में रात्रिजागरण करके चौथे प्रहर पूजाकी सामग्री लेकर हरिमन्दिरमें जा रहा था कि रास्तेमें सहसा उसने एक भयानक थरथर शब्द करती हुई, टेढे दाँतोवाली, जीभको हिलाती, नितान्त नग्न लाल नेत्रोंवाली, जिसके शरीरका सर्व माँस सूख गया था— ऐसी लम्बे होठों और नग्न शरीरवाली एक राक्षसीको आते देखा । उसको देखकर ब्राह्मण भयसे काँप उठा । तब वह समस्त पूजाकी सामग्री तथा जल आदि फेंक-फेंककर उसको मारने लगा । वह नारायणका नाम लेता हुआ उसके ऊपर तुलसीपत्र तथा जल फेंकता जाता था । बस, इसीसे अनायास उस राक्षसीके सब पाप घुल गये और उसको पूर्वजन्मके कर्मोंका स्मरण हो आया ॥ ११८-१२६ ॥
तब वह ब्राह्मणको दंडवत् प्रणाम करके कहने लगी । कलहा बोली— हे विप्र ! मैं पूर्वजन्मके कर्मोंके फलस्वरूप इस दशाको प्राप्त हुई हूँ । हे ब्रह्मन् ! सौराष्ट्रनगरमें भिक्षुनामका एक ब्राह्मण रहता था । मैं उसकी कलहा नामकी बड़ी निष्ठुर स्त्री थी । मैने कभी वचनसे भी पतिकी भलाई नहीं की ॥ १२७-१३१ ॥ रसोईमें कभी मैं मिष्टान्न बनाती तो पतिसे झूठा बहाना करके तथा उसकी बात टालकर मिठाई नहीं देती थी। भोजनके समय प्रतिदिन जो जो अच्छी चीज बनाती पहिले उसको मैं खा लेती थी तब पतिको देती थी। एक दिन मेरे पतिने जाकर अपने एक मित्रसे कहा कि मेरी स्त्री मेरी बात नहीं मानती । मैं क्या करूँ ? उसके
[ अ० ४ ] उत्तरखण्डम् ४१
तद्वाक्येन कृतार्थोऽहं यन्मुनिश्रेष्ठ दर्शितम् । तथैव मित्रवाक्येन गृहमेत्य पतिर्मम ॥१३६॥
मामाह ह्यटने प्राप्ते भोजनार्थं समाह्वय । मम मित्रं महद् रूपं तच्छ्रुत्वा स्वपतेर्वचः ॥१३७॥
तदा मन्दधियोक्तः स मित्रं ते साधुसम्मतम् । ममाह्वयाम्यद्यभोज्यार्थमथैनं ब्राह्मणोत्तमम् ॥१३८॥
ततो मया समाहूतः स्वयं गत्वा पतेः सखा । उत्सृज्य निषेधोक्त्या कार्यमप्याययन्मतिः ॥१३९॥
एकदा स पितुःश्राद्धा ह्ययाहू. स्वपतिर्मम । मामाह दयिते श्राद्धं न करिष्याम्यहं पितुः ॥१४०॥
तद्वाक्यं स्वपतेः श्रुत्वा मया विप्रा निमन्त्रिनाः श्या धिक् धिक् कृतो मर्ता कथं श्राद्धं करोषि न १४१॥
दोषमं न जानामि का गतिस्ते भविष्यति ततः पुनः स मामाह पक्वान्नश्च मा कुरु ।१४२॥
एवं निमंत्रयस्वैकं मा विस्तारं कुरु प्रिये । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मयाऽष्टादश भूसुराः ॥१४३॥
निमन्त्रितास्तु श्राद्धार्थं पक्वान्नानि कृतानि हि ततः पुनः स मामाह प्रिये शृणु वचो मम ॥१४४॥
अद्य माहार्हता मिष्टं पाक् भुक्त्वा ततः परम् । स्त्रीपोच्छिष्ट स्वयं विप्रान् परिवेषणमाचर ॥१४५॥
तन्मया कथितं श्रुत्वा स पतितिष्कृतः पुनः कथमादौ स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्विप्रान्समर्पयेत् ॥१४६॥
एवमेवं निषेधोक्त्या श्राद्धं सांगं चकार सः । पिण्डदानादिकं कृत्वा मामाह स पतिः पुनः ॥१४७॥
अहभोराषण व्यथ करिष्यामि न संशयः । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मिष्टान्नेन स भोजिनः ॥१४८॥
नतो दैववशाद्भूत्वा विस्मृत्य प्राह मां पुनः । नान्दी पिण्डान् क्षिपेदाप प्रशौचे परमादरात् ॥१४९॥
ततो मया शौचकूपे नीत्वा पिण्डा विसर्जिताः । ततः खिन्नमना विप्रो हाहेत्युक्त्वा स्थितोऽभवत् १५०
उत्तोलितेत्य मामाह पिण्डान्मा त्वं बहिः कुरु । उत्तोलार्य शौचकूपे मया पेडा बहिः कृताः ॥१५१॥
मनः पुनः स मामाह पिण्डान्तीर्थे क्षिपस्व मा । तदा तीर्थे मया क्षिप्तास्ते पिण्डाः परमादरात् ॥१५२॥
वचन यह सुनकर उसने विचार किया ॥ १३०--१३४ ॥ तदनन्तर उसके घर पतिरस का कुछ कहा था,
** मैं कहता हूँ । उधर कहा हे मित्र ! तुम अपना स्वास उल्टा बात कहा करो, तब वह तुम्हार मना किये
** कामक अवश्य करेगी और तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा । मित्रका बात सुन तथा 'बहुत अच्छा कह कर
मेरा पति घरपर आया ॥ १३५ ॥ १३६ । वह मुझसे कहन लगा-हे प्रिये ! इस मित्रको तुम कभी भोजनके लिये
न बुलाना ॥१३७॥ यह बड़ा दुष्ट है । पतिके इस वचनको सुनकर मैने कहा कि तुम्हारा मित्र ब्राह्मणों श्रेष्ठ
तथा बड़ा सज्जन है। उसको मैं आज हीभोजनके लिये बुलाता हूँ ॥ १३७॥ १३८ ॥ तब मैं स्वयं जाकर पतिके
मित्रको बुला लायी । इसप्रकार मेरा पति विपरीत कहनेपर ही काम बन आया ॥ १३६ ॥ एक दिन मेरा पति अपने
पिताकी श्रद्धतिथि जानकर कहने लगा हे दयित ! मै आज अपने पिताका श्राद्ध नहीं करूँगा ॥ १४० ॥
यह सुनकर मैंने उसके कहनेके प्रतिकूल इष्टपुट ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे दिया और पतिसे कहा कि तुमको धिक्कार
है जो अपने पिताका श्राद्ध भी नहीं करते ॥ १४१॥ तुम पुण्य पापको नही जानते । इसलिय न जाने तुम्हारी
क्या गति होगी । तब उसने कहा कि यदि करना ही है तो केवल एक ब्राह्मणको निमन्त्रण देना अधिक
झगड़ा नही बढ़ाना । पकवान-मिठाई आदिमे व्यर्थ खर्च नहीं करना । यह सुनकर मैने एक साथ अठारह ब्राह्म-
णोंको निमन्त्रण दे दिया । श्राद्धके लिये अनेक प्रकारके पक्वान बनाये । फिर पतिने मुझसे कहा कि आज तुम
अपने कर साथ मिष्टान्न भोजन करके बादमे अपना जूठा भोजन ब्राह्मणोको परोसना ॥ १४२-१४५ ॥ यह सुन-
कर मैने पतिको धिक्कारा और कहा कि तुमको धिक्कार है। पहिले स्वयं खाकर पश्चात् ब्राह्मणोंका भोजन करानेके
योग्य कहते हो ? ॥ १४६ ॥ इस प्रकार विपरीत कथनसे पतिने मेर द्वारा विधिवत् श्राद्ध करवाया, पिण्डदान
आदि करके फिर उन्होंने मुझसे कहा-॥ १४७ ॥ मैं आज कुछ भी न खाकर उपवास करूँगा । यह सुनकर
मैंने उन्हे खूब मिष्ठान्न खिलाया ॥ १४८ ॥ बादमे दैववशात् भूलकर पतिने मुझसे कहा कि इन पिण्डोको
तुम अत्यंत प्रेमसे किसी पवित्र तीर्थके अन्दर फेंक आओ ॥ १४९ ॥ यह सुनकर मैने उन पिण्डोको ले जाकर पाखाने-
में डाल दिया । यह देखा तो वह विप्र हाय-हाय करने लगा ॥ १५० ॥ अनन्तर सोचकर मुझसे कहा कि
हाहा, पाखानेसे पिडोंको बाहर न निकालना । तब शौचकूपमे उतरकर मैने उन पिडांका निकाल लिया
४५ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
एवं मया कदा भर्तुर्वचनं न कृतं तदा । कलहप्रियया नित्यं मय्युद्विग्नमना यदा ॥१५३॥
परिणेतुं ततोऽन्यां वै मनश्चक्रे पतिर्मम । ततो विषं समादाय प्राणस्त्यक्तो मया द्विज ॥१५४॥
अथ बद्ध्वा वध्यमानां मां निन्युर्यमकिंकराः । यमश्च मां तदा दृष्ट्वा चित्रगुप्तमपृच्छत ॥१५५॥
यम उवाच
अनया किं कृतं कर्म फलं शुभमथाशुभम् । प्राप्नोत्येषा च तत्कर्म चित्रगुप्तावलोकय ॥१५६॥
कलहोवाच
चित्रगुप्तस्तदा वाक्यं मन्दंस्मयंस्तमुवाच ह ।
चित्रगुप्त उवाच
अनया तु शुभं कर्म कृतं किंचिन्न विद्यते ॥१५७॥
मिष्टान्नं भुज्यमानेयं न भर्त्रे तदर्पितम् । अथ बगुलीयोन्यां स्वनिष्ठायाञ्च तिष्ठतु ॥१५८॥
पतिं दृष्ट्वा सदा रुष्टा नित्यं कलहकारिणी । विष्ठाश शूकरीयोन्यां तस्मात्तिष्ठत्वियं यम ॥१५९॥
पाकभांडे सदा भुंक्ते गुप्तं चैका यतस्ततः । तस्माद्दोषाद्बिलाडाङ्गेष्ववजातान्यभक्षिणी ॥१६०॥
भर्त्तारमपि चोद्दिश्य ह्यात्मघातः कृतोऽनया । तस्मात्प्रेतशरीरेऽपि तिष्ठत्वेकाऽविनिंदिता ॥१६१॥
अतश्चैषा मरुद्देशे प्रापितव्या ह्यमेश्चरैः । तत्र प्रेतशरीरस्था चिरं तिष्ठत्वियं ततः ॥१६२॥
ऊर्ध्वं योनित्रयं चैषा भुङ्क्त्वशुभकारिणी ।
कलहोवाच
ततो दूतैः प्रापिताऽहं मरुद्देशे क्षणाद्द्विज ॥१६३॥
दत्त्वा प्रेतशरीरं मां गतास्ते स्वस्थलं प्रति । साऽहं पंचदशाब्दानि प्रेतदेहे स्थिता किल ॥१६४॥
क्षुत्तृड्भ्यां पीडिताऽत्यर्थं दुःखिता स्वेन कर्मणा । ततः क्षुत्पीडिता नित्यं शरीरं वणिजस्त्वहम् ॥१६५॥
प्रविश्य दक्षिणे प्राप्ता कृष्णावेण्यास्तु संगमे । तत्राऽहं मन्निता यात्रास्वावलस्य शरीरतः ॥१६६॥
उग्रविष्णुगणैर्दूरमपाकृष्टा बलादहम् । ततः क्षुत्क्षामया दृष्टो भ्रमन्त्या त्वं मया द्विज ॥१६७॥
॥ १५३ ॥ फिर पतित कहा—देखा, कहीं इनको किसा ताड़न न डालना । तब प्रेत ने जाकर उस पिंडोका बड़े आदरपूर्वक सायंकाल डाल दिया ॥ १५४ ॥ इस तरह मुझ कलहप्रियाने जब कभी भी पतिका सीधा तौरपर कहा हुआ काम नहीं किया, तब दुःखित होकर उसने अपना दूसरा ब्याह करना निश्चित किया । हे द्विज ! तब मैने जहर खाकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ १५३ ॥ १५४ ॥ तब यमदूत मुझे बाँधकर यमराजके पास लेगये । यमराज मुझे देखकर चित्रगुप्तसे कहने लगे ॥ १५५ ॥ यमराजने कहा—चित्रगुप्त देखो, इसने अच्छा कर्म किया है या बुरा, जिससे इसको वैसा ही फल दिया जाय ॥ १५६ ॥ कलहा कहन लगा—यह सुनकर चित्रगुप्त मुसकमुकात हुए कहने लगे कि इसने तो कोई अच्छा कर्म कभी किया नहीं। यह मिष्टान्न बनाकर खाती थी परन्तु अपने पतिको नहीं देती थी। इसलिये यह बगुलीकी योनिम जाकर अपना ही विष्ठा खानकाश्ये वणिंगा बने प्रतिदिन झगड़ा एव पातक द्वेष करनेके कारण यह विष्ठा भक्षण करनेवाली शूकरयोनिम पैदा हो। हे यम इधर-उधर छिपकर भोजन बनानेके पात्रमे अकेला ही खान्वाली यह बिल्ली बन ॥१५७ १६०॥ पातक उद्देश्य इसने आत्मघात किया है। इस कारण यह अविनिन्दित प्रेतयोनिमे अकेली रहे ॥ १६१ ॥ हे यम ! इसम दूतोंके द्वारा मरुद्देशमे भेज देना चाहिये, वहाँ जा नया प्रेत बनकर यह बहुत काल पर्य्यन्त निवास कर ॥ १६२ यह पापिनी उपर्युक्त सभी योनियोंको भोगे। कलहा बोली-हे द्विज ! तब यमदूतोन क्षण ही भरम मुझे मरुद्देश पहुंचा दिया ॥ १६३॥ यहाँ प्रेतयोनिमें डालकर वे अपने स्थानको चले गय। मै पन्द्रह वर्ष तक प्रेतयोनि रही ॥ १६४ ॥ अपने किये हुये कमोके अनुसार मै सदा भूख-प्याससे अत्यन्त दुःखिनी रहने लगी। इस प्रका नित्य भूखस पीडित हो एक बनियके देहम पैठकर मै दाक्षणम कृष्णा-वेणाक संगमपर आयी। वहाँ आत्म प्रिय तथा विष्णके गणान मुझे बरबस उस वणिक्के शरीरसे अलग करके दूर भगा दिया। तदनन्तर हे द्विज