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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् ९५

सर्गः ३ ] सारकाण्डम् ९५

दशास्यपत्नी तानाह कार्या भूमिगता त्वियम् । स्थापनीया बहिर्नेयं दर्शनाद्वंशकारिणी ॥ २४०॥
गृहस्थाश्रमयुक्तो यस्तथा च विजितेंद्रियः । वृद्धिमेष्यति तद्गेहे कुमारीयं शुभानना ॥ २४१॥
चराचरेषु सर्वत्र आत्मरूपेण यः स्थितः । तस्य गेहे चिरं कालं स्थास्यतीयं न संशयः ॥ २४२॥
इति मंदोदरीवाक्यं श्रुत्वा दूताः सविस्तराम् यात्रार्थे गंतुमुद्युक्तास्तावत्कन्या वचोऽब्रवीत् ॥ २४३॥
यास्याम्यहं पुनर्लङ्कां राक्षसानां वधाय च निधनाय दशास्यस्य सपुत्रस्य समंत्रिणः ॥ २४४॥
अथ तृतीयवेलायामागमिष्याहं पुनस्त्विह निकुम्भजं पौंड्रकं तं शतशीर्षं च रावणम् ॥ २४५
हनिष्यामि पुनर्गत्वा पुनर्यास्याम्यहं त्वत्पुर्याम् अह चतुर्थवेलायामद्भुतं मूलकासुरम् । २४६ ।
कुम्भकर्णसुतं शूरं संहनिष्याम्यहं पुनः सत्यस्या वचनं श्रुत्वा हृदि विद्धो दशाननः ॥ २४७॥
जातास्ते राक्षसाः सर्वे भयभीताः शवोपमाः। रावणश्चिन्तयामास हन्तव्याऽयं बालिका ॥ २४८॥
तीक्ष्णं खड्गं करे धृत्वा पपां दुद्राव रावणः। हन्तुकामं पतिं दृष्ट्वा मयकन्या न्यवारयत् ॥ २४९॥
साहसं कुरु माऽद्यैव सत्यायुषि दशानन । भविष्यति वधस्त्वद्य तत्र नास्या वचो मृषा ॥ २५०॥
यद्भविव्यति भवतु तदग्रे त्यज कानने । कालान्तरेण यो मृत्युस्तन्मद्य त्वं किमिच्छसि ॥ २५१॥
इति भार्यावचः श्रुत्वा तूष्णीमास दशाननः। ततः सा पेटिका दूतैर्नीता यानेन वै जवात् ॥ २५२॥
पश्यन्द्भर्वानि सर्वाणि परिपार्थे मैथिलस्य च कृता भूमिगता दूतैस्तदा सर्वैः करण्डिका ॥ २५३॥
तता ययुः पुनर्लङ्कां दूतास्ते रावणस्य च । न्यवेदयन् रावणाय सर्वं वृत्तं यथाश्रुतम् ॥ २५४॥
सा भूमिः सूर्यग्रहणे विदेहेन समर्पिता। ब्राह्मणाय द्विजश्चापि तां कर्षयितुमुद्यतः ॥ २५५ ।
पश्यन्मुहूर्त्तं प्रियः स प्रत्यब्दं वै पुनः पुनः। चिरकालेन दृष्टाऽथ बृहतीं परमोदयम् ॥ २५६ ।

मन्दोदरी ने उनसे कहा कि दर्शनमात्रसे वंश करनेवाली इस यतिनीको बाहर खुली न रखना,
बल्कि अण्डामे गाड आना ॥ २४० ॥ गृहस्थाश्रममे होते हुए भी जो जितेन्द्रिय होगा, उसके घरमे यह
शुभानना कुमारी वृद्धिको प्राप्त होगी ॥ २४१ ॥ सब चराचरके साथ अपनी आत्माके समान बर्ताव करनेवाला
जो होगा, उसके घरमे यह चिरकाल स्थित रहेगी। इसमे सन्देह नहीं है (अर्थात् समदर्शी तथा जितेन्द्रियके
घरमे ही लक्ष्मी स्थिरकारक रहती है-दूसरेके यहाँ नही) ॥ २४२ ॥ इस प्रकार मन्दोदरीकी बात
सुनकर ज्यों ही दूत लोग चलनेको उद्यत हुए, त्यों ही कन्या कहने लगी- ॥ २४३ ॥ मै फिर राक्षसों तथा
मन्त्री और पुत्रसहित रावणका वध करनेके लिए लंकामे आऊँगी ॥ २४४ । पुनः तीसरी बार यहाँ
आकर निकुम्भपुत्र पौण्ड्रकको तथा सौ सिरवाले रावणको मारूँगी; फिर बादमे पुनः चौथी बार आकर
शूरवीर कुम्भकर्ण सुत मूलकासुरको मारूँगी इसके बचनको सुनकर दशाननका हृदय बिद्ध हो गया
॥ २४५-२४७॥ वे सब राक्षस भी भयभीत होकर मृतक सदृश हो गये। रावणने सोचा कि इस बालिकाको
अभी मार डालना चाहिये यह विचार तथा तीक्ष्ण तलवार हाथमे लेकर वह पपाकी तरफ दौड़ा। पतिको
इस प्रकार कन्याको मारनेके लिये उद्यत देखकर मयदानवकी कन्या मन्दोदरीने कहा- ॥ २४८ ॥ २४९ ॥
हे दशानन ! आयु शेष रहनेपर भी आज ही तुम यह साहस मत करो। इससे तुम्हारी मृत्यु हो जायगी।
इनका वचन झूठा न होगा ॥ २५० ॥ आगे जो होनेवाला होगा सो होगा। अभी तो तुम इसे वनमे छुटवा
दो । कालान्तरमे होनेवाली मृत्युको आज ही क्यो बुलाते हो ? ॥ २५१ ॥ भार्याके इस वचनको सुनकर
दशानन चुप हो गया। पश्चात् दूत उस सन्दूकचीको शीघ्र विमानमे रखकर ले गये ॥ २५२ ॥ सीताके
प्रिय मिथिला नगरके वनोंको देखते हुए उसीपर सब दूतोंने उस करण्डिकाको भूमिमे गाड दिया
॥ २५३ ॥ तदनन्तर वे लङ्का लौट गये और जो किया था, सो सब वृत्तान्त रावणसे निवेदन कर दिया
॥ २५४ ॥ राजा विदेहने वह जमीन सूर्यग्रहणके अवसरपर एक ब्राह्मणको दान दे दी थी। ब्राह्मणने उस
जमीनका जुतवानेका विचार किया ॥ २५५ ॥ प्रतिवर्ष शुभ मुहूर्त देखते-देखते बहुत वर्षों बाद

२६आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

शूद्रेण कर्षयामास भूमिं कृष्यर्थमादरात् । तदा हलमुखाग्रेण निर्गता सा करंडिका ॥२५७॥
तां गृहीत्वा स शूद्रोऽपि ययौ भूमिपतिं द्विजम् । स मत्वा तन्निधानं तु ह्युत्प्रेक्षाप्राप्तद्विजोत्तमम् ॥२५८॥
श्रेष्ठस्त्वं मुहूर्तोऽय महाभाग्यं तव द्विज । इमं हलाग्रसंभूतां गृहाण त्वं करंडिकाम् । २५९॥
निधानपूरितां गुर्वी मया यत्नेन बाहिताम् । ततः स द्विजवर्यस्तु तां जगाद करंडिकाम् । २६० ।
तामानीय विदेहाय सभामध्ये ददौ मुदा नृशंसं प्राह वृतं तद्विप्रः श्रुत्वा नृपोऽपि सः ॥२६१।
उवाच ब्राह्मण भक्त्या मया भूमिः समर्पिता तस्यां लब्धा त्वया चेयं त्वमेवास्तु करंडिका ।२६२।
विदेहवृपतेर्वाक्यं श्रुत्वोवाच द्विजः पुनः । मद्यं समर्पिता पूर्वं भूमिरंव मया नृप । २६३॥
नैषा करंडिका रम्या वसुपूर्णा समर्पिता । यद्भूभौ वर्तते वित्तं तन्नृपस्य न संशयः ॥२६४
मा मामधर्मः युङ्क्त गृहाणेषां करंडिकाम् एवं नृपस्य विप्रेण कलहोऽभूत्सुदारुणः ॥२६५ ।
तदा सभासदाः सर्वे नृपतिं वाक्यमब्रुवन् । मा काशः करंडो राजन् पश्यास्यां किं नु वर्तते । २६६॥
ता तदोद्घाटयामास दूतैर्नृपतिसत्तमः । तस्यां दृष्ट्वा बालिकां तु विस्मयं प्राप पार्थिवः । २६७॥
द्विजस्त्यक्त्वा ययौ गेह पालयामास तां नृपः । तदा खेचव्यचांगानि नेदुः कुसुमवृष्टिभि ॥२६८
ववृषुः सुरसंघाश्च तां कन्या जनकं नृपम् । गंधर्वा गायनं चक्रुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । २६९ ।
तदा मेने निजा कन्यां जनकोऽतोषमाप सः । जातकं कारयामास विप्रैस्तस्याः सविस्तरम् ॥ २७० ।
ददौ दानानि विप्रेभ्यो ननृतुर्वारयोषितः । मातुलुङ्गाभिर्गता या मातुलुङ्गीति सा स्मृता ॥२७१ ।
अग्निशालाद्विनिर्गतां तथा रत्नावलीति च । स्वर्नान्तर्गतत्वाच्च प्रोच्यते जगतीतले ॥२७२॥
धरण्या निर्गता यस्मान्नाम्नाद्धरणितीति च । जनकेनापिता यस्माज्जानकीति प्रकीर्त्यते । २७३॥

उसका सब काम सदयको बतलाया प्रसन्न होकर ॥ २५६ ॥ उस ब्राह्मण आदरपूर्वक शूद्रस उस उपायमय मकार लिए हल चलवाया । उसी समय इसके फलसे यह सबब विचित्र आयो । २५७ ।। उसको देखकर वह शूद्र जमीनके मालिकके पास गया और उसको दृढ खजाना समझकर महर्षि ब्राह्मणके कहने लगा हे द्विज ! आप बड़े भाग्यशाली है आपने अच्छा मुहूर्तमें काम आरम्भ करवाया। यह हलके अग्रभागसे (अर्थात् फारका जिसका मन्त्रतन्त्र खींचा करते है) बहुत (प्रान्त) सन्तुष्टको लिये । मै लगनसे भरी हुई बड़ा भारी इस पिटारीको बड़ी कठिनता उठाके लाया हूँ। उस द्विजने उसको ले लिया । २५८-२६० । उसक ले जाकर ब्राह्मणने सभाके सामने राजा विदेहको दिया और सब समाचार कह सुनाया। राजा भी यह सुनकर ब्राह्मण कहने लगे कि मैने तो भक्तिस भूमि आपकी समर्पण कर दी है। तवं उसमन मिली हुई यह पिटारी भी आप ही की है ॥ २६१ ॥ २६२ ॥ राजा विदेहके वचनको सुनकर ब्राह्मण उनसे कहने लगा- हे नृप आपने मुझे भूमि ही दी है॥ २६३ यह धनपूर्ण सुन्दर संदूक नही दी थी। इसलिए जो भूमिमें धन है वह निर्विवाद राजाका ही होता है। २६४ ! मुझे अधर्ममें न डाल और इस पिटारीको आप ही बहण कर। इस प्रकार राज' तथा ब्राह्मणमे बडा झगड़ा होने लगा। तब सब सभासदोन राजासे कहा-हे राजन् ! बक्सूको छोड़ें और देख कि इसमे क्या है ? ॥ २६५ । २६६ । तव नृपतिश्रेष्ठ श्रेष्ठ नृपति विदेहने दूतोंप संदूक खुलवायी । उसमें बालिकाको देखकर राजा बडे विस्मित हुए। ब्राह्मण उसे देवी छोड़कर घर चला गया। तब राजाने हो उस कन्याको पाल लिया। तब देवताओंक बाजे बजे और उन्होने उस कन्या तथा राजाके ऊपर पुष्पवृष्टि की । गन्धर्व गाने लगे । अप्सराये नृत्य करन लगीं ॥ २६७-२६९ ॥ तब राजा जनकने प्रसन्न होकर उसको अपनी पुत्री माना। ब्राह्मणोके द्वारा विस्तारपूर्वक उसका जातकर्मसंस्कार ( सन्तानके उत्पन्न होनेपर करनेका संस्कार ) करवाया ॥ २७० ॥ विप्रोको बहुतसे दान दिये और वेश्याओंका गायन करवाया गया । बगीचेमें वह कन्या मातुलुङ्कफलसे निकलनेके कारण मातुलुङ्गी, अग्निमे वास करनेसे अग्निगर्भा तथा रत्नोंमें निवास करनेसे रत्नावली कही जाने लगी ॥ २७१ ॥ २७२, धरणीसे निकलने-