श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ३ ] विलासकाण्डम् २६१
सर्गः ३ ] विलासकाण्डम् २६१
तृतीयः सर्गः
(सीताकृत आध्यात्मिक प्रश्नके उत्तरमें रामका देहरामायण-वर्णन)
श्रीरामदास उवाच
अथ सा जानकी रामं विनयाल्लज्जिताऽब्रवीत् । राम राजीवपत्राक्ष किञ्चित्प्रष्टुं मम प्रभो ॥ १ ।
वांछाऽस्ति चेत्कृपोपन्नाऽज्ञां तर्हि पृच्छाम्यहं नवं । तन्माताऽचनं श्रुत्वा राघवः प्राह जानकीम् ॥ २ ।
पृच्छस्व सीते यत्तेऽस्ति प्रष्टव्यं मां सुखेन ननु । मा शङ्कां मन रम्भोरो गुह्यं चापि वदामि ते ॥ ३ ।
तद्रामवचनं श्रुत्वा नव्या न प्राह जानकी । राम राम महाबाहो किञ्चिदुपदिशस्व माम् ॥ ४ ।
येन मां नव महान् भवेदर्थश्च महोज्ज्वलम् । तन्सीतावचनं श्रुत्वा रामचन्द्रोऽब्रवीद्वचः ॥ ५ ॥
सम्यक् पृष्टं त्वया गीते शृणुष्वैकाग्रमानसा । मम ज्ञानाथ ते वच्मि परं कौतूहलं शुभम् ॥ ६ ।
श्रीरामचन्द्र उवाच
सच्चिदानन्दरूपाब्धेरात्मसागरस्य तदिच्छया । जगद्रूपस्याऽऽभांशबिंदुः शुद्धो विनिर्गतः ॥ ७ ॥
आत्मनामा मातृभूतबुद्धेर्नारायणात्परः । शुद्धसत्त्वान्तःकरणं पिता चान्यन्न इंगितः ॥ ८ ॥
तस्यात्मनश्च चत्वारो भेदास्ते प्रथयः स्मृताः । तुर्यावस्थस्तत्र वरस्तो जाग्रदवस्थकः । ९ ॥
स्वप्नावस्थस्तृतीयश्चावरः सुषुप्त्यवस्थकः । हृदयाकाशस्तस्थानं मनोवेगो बहिर्गमः ॥१०॥
मनोदुर्वृत्तिपातश्च मनोवेगस्य खंडनम् । मायायोगस्ततस्तस्य पूर्वसंस्कारनिग्रहः । ११॥
ततः कुबुद्धिहेतोर्हि भवारण्यऽटनं चिरम् । दम्भस्य निग्रहस्तत्र पंचभूतात्मिका स्थिरा ॥१२॥
आत्मनः पर्णकुटिका विश्रान्तिस्थानमीरिता । कामक्रोधलोभप्रमत्तशत्रूणाकृन्तनं स्मृतम् ॥१३॥
मोहस्य निग्रहस्तत्र शुद्धमायाश्रयन्वतः । रजोरूपा तु या माया जठराग्नी तदा स्मृता ।१४।
श्रीरामदास कहने लगे-कुछ देर बाद लज्जा और विनयसे सकुचाती हुई सीताजी रामचन्द्रसे बोलीं- हे प्रभो ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ ॥ १ ॥ यदि आप आज्ञा दें तो पूछूं । सीताकी वाणी सुनकर राम-चन्द्रजीने कहा-॥ २ । हे प्रिये ! जो कुछ भी तुम्हारी इच्छा हो, आनन्दपूर्वक पूछो । किसी प्रकारकी शङ्का मत करो । यदि कोई गुप्त बात होगी, वह भी मैं तुमसे बतलाऊंगा । ३ ॥ इस तरहकी बात सुनकर सीताजी कहा- हे महाबाहो राम ! मुझे आप कोई ऐसा उपदेश दें, जिससे मैं आपको अच्छी तरह समझ लूँ । इस बातको सुनकर रामने सीतासे कहा ॥ ४ । ५ ॥ हे देवि सीते ! तुमने बहुत ही अच्छी बात पूछी है मैं अपने वास्तविक तत्त्वको तुम्हें अच्छी तरह समझाता हूँ मन एकाग्र करके सुनो । आत्मज्ञान-प्राप्तिके लिए मैं तुम्हें कौतूहलजनक बात बता रहा हूँ । ६ । रामचन्द्रजी कहने लगे- सत्, चित् और आनन्दरूपी एक महान् सागर है। उसकी इच्छारूपी तरङ्गसे एक परम पवित्र आत्मारूपस्वरूप बिन्दु निकला । उसका नाम पड़ा 'आत्मा' उसकी माता हुई शुद्ध, बुद्ध और सत्त्वमय अन्तःकरण उसका पिता हुआ ॥ ७ ॥ ८ ॥ उस आत्माके चार भेद हुए वे ही आत्माके चार भाई कहलाये । उनमें सबसे श्रेष्ठ हुई तुरीयावस्था, उससे कुछ न्यून जाग्रदवस्था, फिर स्वप्नावस्था और सबसे निम्न श्रेणीकी सुषुप्ति अवस्था हुई इन सबका हृदयाकाश स्थान है और मनकीगति ये अवस्थायें कभी कभी बाहर भी हो जाती हैं ॥ ९ ॥ १० ॥ मनकी दुष्ट वृत्तियोंका खण्डन, मनके आवेगपर आघात और मायाके प्राबल्यसे पूर्वसंस्कारोंका दमन करना होता है ॥ ११ ॥ यदि बुद्धि किसी तरह दूषित हुई तो इस संसाररूपी घोर जङ्गलमें बहुत दिनों तक आत्माको भटकना पड़ता है । उस समय पञ्चभूतात्मक आत्माको स्थिर करके दम्भका निग्रह करनेकी आवश्यकता होती है । १२ ।। केवल आत्मा-रूपिणी ही एक ऐसी पर्णकुटी है जहाँ कि शान्ति मिलती है । अन्यत्र सब जगह क्लेश ही है। उस पर्णकुटीमें काम, क्रोध, लोभ माह्लादि शत्रु नहीं जाने पाते । मायाकी भी वहाँ गति नहीं है। वहाँ मोहका भी निग्रह हो जाता है वहाँ ही शुद्ध-सात्त्विकी मायाका आश्रय प्राप्त होता है उस समय जब कि रजोगुणमयी
२६२ अलिन्दरामायणे [ सर्ग ३
नामव्याप्तिश्च मायाया वियोगश्च ततः स्मृतः । सुखाभावो महाक्लेशः शोकभग्नस्ततः परम् ।।१५।।
विवेकस्याश्रयस्तत्र मत्स्मृतेश्च समागमः । अविवेकवधश्चापि सुन्मुखेन समागमः ।।१६।।
अज्ञानतन्मोहश्च त्रिगुणाश्रयवर्त्तनम् । लिङ्गत्रयनिग्रहस्तत्र मदस्य स्मृतिकीर्त्तनम् ।।१७।।
निग्रहो मन्मथस्यापि तमोऽहंकारनिग्रहः । वियोगो लिङ्गदेहस्य मायाशर्मव्यहा हतः ।।१८।।
हृदयाकाशगमनमानन्दैकसुखं ततः । मायान्यामलसत्त्वैश्च सान्निध्यस्य ग्रणं स्मृतम् ।।१९।।
शान्त्विक्या मायया सार्ध हृदयाकाशमुत्तमम् । महाकाशे प्रगयनं सच्चिदानन्दसंग्रहे ।।२०।।
प्रवेशनं सागर हि मुक्तिर्ब्रह्माण्डमनः शुभा । सायुज्या सा परित्रेया मुक्तिर्मुक्तेश्वतुष्टये ।।२१।।
एवं मयेय मे प्रोक्ता सीते सञ्ज्ञानपेटिका । वेदरत्नैर्गूढार्थैश्चामलमविनाशकैः ।।२२।।
मन्वानन्दैः पंचदशश्लोकरत्नैः प्रपूरिता । मयार्पिता गृहाण त्वमस्यां बुद्ध्याऽवलोकय ।।२३।।
भविष्यति मम ज्ञानमस्याः सम्यग्विचारतः । तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता संज्ञानपेटिकाम् ।।२४।।
निजहृन्मन्दिरे स्थाप्य बुद्धिवृष्ट्या मुहुर्मुहुः । मय्यनुद्धातय तूष्णीं मा मुहुर्त्तमवलोकयत् ।।२५।।
तदा ज्ञात्वऽथ सकलां निजक्रीडां विदेहजा । विहस्य रघुशिष्यं मा ननाम्रांघ्रिपकंजे ।।२६।।
आनंदनिमग्ना जाता सानराघवसन्विता । आनशेन्दुर्मुखीमाद्धा तूष्णीमासीत्तदा क्षणम् ।।२७।।
आनन्दनिव्भैरीं सीतां दृष्टा तां राघवोऽब्रवीत् । पेटिकाया त्वया सीते किं दृष्टं तोषकारकम् ।।२८।।
कच्चिद्रत्नं ददृश्यारं कच्चिच्छुद्धं मम त्वया । सत्वानं वद मां सीते यथा ज्ञातं त्वया हृदि ।।२९।।
माया अलगभित्र रहती है ॥ १३ ॥ १४ ॥ तब तमोगुणयो मायाका वियोग हो जाता है। इसमें सुखका नाम नही रहता और चारो ओर केवल दुःखकी घटाएं घिरी दिखाई देती हैं। उसके आगे शोकभग्नका दर्जा आता है ॥ १५ ॥ उसी समय हृदयमें विवेक उपजता है। साथ ही भक्तिका भी उद्रेग होता है। अज्ञान मष्ट हो पड़ता है। उन्मादसे स्नेह हो जाता है। तीन गुणवाला इस शरीरिका सबसे प्रधान कर्त्तव्य यह है कि जिस तरह भी हो सके अज्ञानसे जबको दुःखसेवा चाककरे। जब प्राणी मदका निग्रह कर लेता है तब वह लिङ्गनिग्रह कहलाने लगता है ॥ १६ ॥ १७ ॥ मन्मथ निग्रह करके मत्सरका और मत्सरके बाद अहङ्कारका निग्रह करना चाहिए। जिस समय मन्मथ लिङ्गनिग्रही हो जाता है अर्थात् मदको वशमें कर लेता है। उसी समय मायाके पराभव होनेका समय आता है ॥ १८ ॥ शब्दमय माया और है ही क्या, इन्हीं काम-आदिकोंके संघसे मायाका निर्माण हुआ करता है। इनका परास्त हो जानेपर प्राणीका आनन्द ही आनन्द रहता है। जब मायाका त्याग हो जाता है, उस समय सात्विका मायाका प्रादुर्भाव होता है। उस सात्विकी मायाके साथ प्राणी उत्पन्न हृदयाकाशका मुख अनुभव करने लगता है। उससे भी उत्कर्ष होनेपर महाकाशका निर्माण होता है । सत्, चित और आनन्द ये तीनों वहाँ सदा विद्यमान रहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥ इसी महान् समुद्रम भूत कामका ज्ञानवाली कल्याणदायिनी मुक्ति कहते है । चार प्रकारकी कही हुई मुक्तियोंमेसे उसका सायुज्य युक्ति कहते हैं। हे सीते ! तुम्हारे संदेहवश मैंने यह ज्ञानका पिटारी खोलकर रख दी। इसमे गूढ अर्थवाले वेदके सात्वक परिपूर्ण तथा अज्ञानादिकोंको नष्ट करनेवाले पन्द्रह श्लोकरूपी रत्न भरे हुए हैं। इसीके द्वारा मेरा मुख्य सत्व जाना जा सकता है। यह पिटारी मैं तुम्हे अर्पण करता हूँ। इसे सम्हालो और ज्ञानदृष्टिसे देखो । बार-बार इन बातोंका मनन करो तो मुझे अच्छी तरह समझ लोगी ॥ २१-२४ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर सताने उस ज्ञानकी पिटारीको अपने हृदयमे रख लिया। फिर उसे खोलकर बुद्धिवृष्टिसे कुछ देर देखती रही ॥ २५ । तब सीता,ने अपनी सब क्रीडाओका मद जाना और हँसकर रामचन्द्रजीको प्रणाम किया ।। २६ ।। सीताको उस समय एक महान् आनन्दका अनुभव हुआ । उनकी आंखोंमें आँसू आ गये, शरीरके रोग्टे खडे हो गये और थोड़ी देरके लिए सीताजी अपने आपको भी भूलकर चुप हो गयीं ॥ २७ ॥ इस प्रकार सीताकी आनन्दित देखकर रामचन्द्रजान पूछे-हे सीते ! तुमने उस पेटीमे क्या क्या तुष्टिदायक बातें देखी ? जिससे तुम्हें ऐसी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ २८ ॥ क्यों, क्या ता तुम्हारा मज्ञान दूर