श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २ ] विलासकाण्डम् २५५
सर्गः २ ] विलासकाण्डम् २५५
एवं शिवेन यः प्रोक्तः स्तवराजः शुभावहः स एवाद्य त्वया पृष्टस्तवाग्रे कथितो मया ॥७९॥
अयं श्रीरघुनाथस्य स्तवराजो ह्यनुत्तमः। सर्वसौभाग्यसंपत्तिदायको मुक्तिदः स्मृतः ॥८०॥
कथितो गिरिशेनेशा नेत्रादौ सारसंग्रहः गुह्याद्गुह्यतरो नित्यस्त्वत्र स्नेहान्प्रकीर्तितः ॥८१॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः। ब्रह्महत्यादिपापानि तन्ममानि बहूनि च ॥८२॥
हेमस्तेयसुरापानगुरुतल्पयुतानि च। गोवधाद्युपपापानि चित्तान्यसंमथानि च ॥८३॥
सर्वैः प्रमुच्यते पापैः कल्पापुत्रशतोद्भवैः। मानसं वाचिकं पापं कर्मणा समुपार्जितम् । ८४॥
श्रीरामस्मरणेनैव व्यपोहति न संशयः इदं सत्यमिदं सत्यं सत्यं नैवान्यदुच्यते ॥८५॥
रामः सत्यं परं ब्रह्म रामात्किंचिन्न विद्यते । तस्माद्रामस्वरूपं हि रामः सर्वमिदं जगत् ॥८६॥
श्रीरामचन्द्र रघुपूङ्गव राजवर्य राजेन्द्र राम रघुनायक राघवेश ।
राजाधिराज रघुनायक रामचंद्र दामोऽहमद्य भवतः शरणागतोऽस्मि ॥८७॥
उत्फुल्लामलकोमलोत्पलदलश्यामाय रामाय चाकामाय प्रशमाय निर्मलगुणग्रामाय रामान्मज ।
ध्याना रूढमुनींद्रमानमगरो हंसाय संसारविध्वंसाय स्फुरदोजसे रघुकुलोत्तमाय पुंसे नमः ।८८ ।
एवं शिष्य मया प्रोक्तो यथा पृष्टस्त्वया मम । स्तवराजो राघवस्य श्रवणात्पापनाशनः ॥८९॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे वाल्मीकीये
शंकरकृतरामस्तवराजो नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीयः सर्गः
( राम द्वारा सीताके सौन्दर्यका वर्णन )
विष्णुदास उवाच
गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं मां वक्तुमर्हसि । अयोध्यायां राघवेण सीतयाऽतिसुरूपया ॥ १ ॥
॥ ७७ ॥ श्रीरामदासने कहा—इस प्रकार स्तुति करनेपर रामचन्द्रजी ने शिवजीके इच्छानुसार वर दिया और अपने मनसे भी उनको बहुतसे ऐसे वर दिये, जिनको शिवजीने माँगा ही नहीं था ॥ ७८ ॥ इस प्रकार शङ्करजी-का कहा हुआ शुभावहक 'रामस्तवराज' मैंने तुम्हारे पूछनेपर कह सुनाया ॥ ७९ ॥ यह रामचन्द्रजीका स्तवराज सब स्तोत्रोंमें श्रेष्ठ है यह सब प्रकारके सौभाग्य, सम्पत्ति और मुक्तिको देनेवाला है ॥ ८० ॥ शिवजीने वेदोंका सारांश निकालकर इसमें रख दिया है और यह अत्यन्त अलभ्य वस्तु है, किन्तु तुम्हारे सच्चे प्रेमके वशीभूत होकर मैंने तुमको बतलाया है ॥ ८१ । जो प्राणी सुबह शाम या तीनों कालमें इसका पाठ करता है, उसके ब्रह्महत्या जैसे महान् पातक तथा सुवर्णका चुराना मद्यपान गुरुके बिछौनेपर लेटना, गोवध, किसी प्रकारके मानसिक पाप आदि जो संकड़ों कल्पसे एकत्रित हो गये हों, वे सब श्रीरामस्तवराजके स्मरणमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। यह बात बिल्कुल सच है। इसमें किसी प्रकारका धोखा न समझना चाहिए ॥ ८२-८५ ॥ रामचन्द्र सत्य परब्रह्म हैं। उनसे बढ़कर और कोई है ही नहीं। अतएव यह समस्त संसार रामका ही स्वरूप है ॥ ८६ ॥ हे रामचन्द्रजी ! हे रघुपूङ्गव ! हे राजाओंमें श्रेष्ठ ! हे रघुनायक ! हे राघवेश ! हे राजाधिराज ! हे रामचन्द्र ! मैं एक अकिञ्चन दास आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८७ ॥ नवविकसित निर्मल नील-कमल-दल सरीखे जिनका श्याम स्वरूप है, जिनको किसी प्रकारकी कामना नहीं है, जो पूर्ण शान्तमूर्ति हैं, जो निर्मल गुणोंके राशिखरूप हैं जो ध्यानास्कूढ मुनियोंके मनमानसरूं हंस हैं, जो अपने भ्रूभङ्गमात्रसे संसारको विध्वंस करनेम समर्थ हैं, ऐसे रघुवंशभूषण तथा परम पुरुष रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८८ ॥ हे शिष्य ! इस तरह मैन तुम्हारे प्रश्नानुसार यह पापराशिनारक स्तवराज तुम्हे सुना दिया ॥ ८९ ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि अयोध्या म परम रूपवती सीताके
२५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
कथं भुक्ता वरा भोगाः किं क्रियाचरितं शुभम् । चरित्रं तस्य सकलं वद मंगलदायकम् ॥ १ ॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । सर्वान्तां वाजिमेधांश्च च रघुनन्दनः ॥ २ ॥
निर्वर्त्य सीतया सार्धमयोध्यायां बन्धुभिः सुखम् । जानकीं रञ्जयामास नानाभोगैर्मनोहरैः ॥ ४ ॥
यत्किञ्चित् शृणु मांत्सर्यं विलासचन्द्रितं शुभम् । शृण्वतां कर्णपेयञ्च श्रवणाद्मङ्गलप्रदम् ॥ ५ ॥
कः कृत्स्नं चरितं वक्तुं तयोः क्रीडान्वितं क्षमः । अतः संक्षेपतः किञ्चिद्वक्ष्यामि तव सन्निधौ ॥ ६ ॥
अथ सौतयुतो रामः पार्वत्या शङ्करो यथा । क्रीडां चकार कन्दर्पलीला यावत्समाऽकरोत् ॥ ७ ॥
हेमरत्नमये दिव्यगेहे वैकुण्ठसन्निभे । विद्याधरान् गन्धर्वस्य मनोज्ञं शशिमन्निभम् ॥ ८ ॥
भित्तौ रत्नोपला यत्र हेम्नः पंकीकृता यत्र हि यत्र स्तंभाः स्फाटिकाश्च यत्र मारकतोद्गमाः ९ ॥
प्रतोल्यः शतशो रम्याः हेमनीलादिनिर्मिताम् । मुक्तागुञ्ज्यवला यत्र भित्तयश्चित्रविचित्रिताः । १० ।
यत्र हेममयी भूमियंत्र मुक्तामयं शुभम् । वितानं पुष्पहारैश्च मुक्तागुच्छैर्विराजितम् । ११ ॥
हेमतंतुमयास्तत्र भित्तिवस्त्राण्यनेकशः । यथायूनमनुष्यैश्च समदो नैव जायते ॥ १२ ॥
एवं तद्विस्तृतं रम्यं गन्धद्विपे रराजितम् । हेमकूटा विशाजन्ते प्रभायाश्त्रेषु चित्रिताः । १३ ॥
यत्र चित्राण्यनेकानि मोहयन्ति मृगीदृशाम् । यत्र हेममया रम्याः पर्यङ्काश्चतुर्विंशतः ॥ १४ ॥
हेमकौशेयसूक्ष्मतंतुपट्टैर्विगुम्फिताः । महाहंसमनैः पुष्पजालैर्गन्धान्विताः शुभाः ॥ १५ ॥
चतुष्कोणे लम्बमानमुक्ताजालैर्विराजिताः । येषु दिग्याः कशिपवस्तथोपकधेशानि च ॥ १६ ॥
केचिच्छयनान्येषु रामराणि महान्ति च । गोपुच्छाद्वलस्त नैर्हंसभवादीनि मन्ति हि १७
सत्य पूछते हुए रामचन्द्रजीने किस प्रकारके भोगोंको भोगा और कौन-कौनसे शुभ कार्य किये । उस प्रकारके समस्त मङ्गलदायक रामचरित्र आप मुझको सुनाइए ॥ १ ॥ २ ॥ श्री रामदासने कहा— हे वत्स ! तुमने बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है, सावधान होकर सुनो । रामचन्द्रजीने सब अश्वमेधादि की अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा देकर दीक्षा-दीक्षाका काम पूरा कर दिया। सब सीता तथा अपने सब भाइयोंके साथ राम सुखपूर्वक रहने लगे। उन्होंने विविध प्रकारके भोगोंसे माताको प्रसन्न किया । ३ ॥ ४ ॥ उनके विलासोंकी कथाओंका जो परम मङ्गलदायक है हे मुने सुनाता हूँ सो रामका यह चरित्र श्रवण करनेके कारण अमृत होता है ॥ ५ ॥ सीता तथा रामके समस्त चरित्र कहनेका शक्ति ना हममें अथवा किसीमें भी नहीं है । अतएव मैं संक्षेपस सहित चरित्र तुम्हें सुनाऊँगा ॥ ६ ॥ अश्वमेधयज्ञके अनन्तर रामचन्द्रजी, शङ्कर-पार्वतीके समान सीताजीके साथ कन्दर्पके सदृश अपनी-अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे ॥ ७ ॥ सुवर्ण तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे रचित एवं वैकुण्ठके समान दिव्य भवनमें चन्द्रमा सदृश स्वच्छ तथा सुन्दर रामचन्द्रजीका प्रमदगृह था ॥ ८ ॥ जिसकी दीवालमें रत्नोंके पन्नोंके जड़के दरस जड़े हुए थे । जिसमें चारों ओर स्फटिक और मरकत मणिके खम्भे लगे हुए थे ॥ ९ ॥ जिसमें वारय ज ड़ि तणियां प ङ्कि त बद्ध हुई थीं । जिसमें आने जाने वाले मार्गोंके दोनों ओरसे वह भवन विद्युत्के खंबेके समान दिखायी देता था । दीवारोंमें कितने ही चित्र लगे हुए थे ॥ १० ॥ उस भवनकी भूमि सोनेकी थी, जिसमें मोतियोंकी झालरसे ढके हुए चाँदनी लगी थी । ११ ॥ जिसमें सोनेके तारसे बने हुए कपड़ोंके चादरें जगह-जगह टॅगी हुई थीं । वह भवन इतना विशाल था कि उसमें दस हजार मनुष्योंको भी दुःसहधूप लग जाता था ॥ १२ ॥ उस प्रकार वह भवन बड़ा घमण्ड तथा मार-सुन्दर था और उसमें रत्नके दीपक जला करते थे । प्रासादके अग्रभागमें सामने कलश चित्रित किये हुए थे ॥ १३ ॥ अनेक हजारों चित्र स्त्रियोंका मुग्ध कर देते थे और उसे देखकर स्त्रियोंको अपने स्तन-वस्त्रोंतकी भी सुधि नहीं रह जाती थी । वहां सुवर्णके पच्चीसोंपच्चीस बिस्तरे बिछे हुए थे ॥ १४ ॥ जिनपर सुवर्णके तार और रेशमकी बनी हुई चादरें पड़ी थीं । जो भवन कीमती कपड़ा और फूलोंसे सजा हुआ था ॥ १५ ॥ जिसके चारों ओरके चारों कोनेमें मोतियोंके बड़े-बड़े झुम्के लटके हुए थे, जिसमें मखमलकी जड़ाऊ तकियाये लगी हुई थीं ॥ १६ ॥ रुई गौपोंके पश्चनोंके बड़े-बड़े
सर्गः २ ] विलासकाण्डम् ५६७
चतुष्कोणेषु सर्वेषां मंचकानां महोज्ज्वलाः । रत्नदीपाः प्रकाशंते सदैवाग्निशिखोपमाः ॥ १८॥
उशीरव्यजनादीनि चामरादीनि संति हि । यत्र ताम्बूलपात्राणि हेमरत्नोद्भवानि च ॥१९॥
तथा निष्ठीवनार्थं हि पात्राणि रजतानि च । यत्र रंभोपमा दास्यः शतशो रत्नभूषिताः ॥२०॥
चामरैर्वीजयंत्यद्य सीतारामावहर्निशम् । यत्र हेममयाश्चित्रा बद्धास्ते पंजराः शुभाः ॥२१॥
ये यागे नृपरत्नैर्भिः श्रीसीतायाः समर्पिताः । येषु वै केकिनो हंसाः सरसाः सारिकाः शुकाः ॥२२॥
लावकाः कोकिलाद्याश्च नाना येऽन्य पतत्रिणः । नाना शब्दान्प्रकुर्वन्तः शतशस्तेषु संस्थिताः ॥२३॥
तेषां शब्दस्य शिष्य त्वां कि प्राकट्यं वदाम्यहम् । ये रामस्मरणेनैव जीवन्मुक्ता न संशयः ॥२४॥
पक्षिण ऊचुः
जयतु राघवो जानकीयुतो जयत्वखिलराजराजेश्वरः ।
दशरथात्मजो लक्ष्मणायजो जयतु तापसस्ताटिकांतकः ॥२५॥
जयतु कौशिकस्याध्वरं गतो जयतु रक्षसां भग्नो महान् ।
जयतु गौतमस्याहल्या स्तुतो जयतु जानकीतातमानितः ॥२६॥
जयतु नः पतिश्चापमंडनो जनकजावरेन्मुक्तमालया
नृपमभागणे कौशिकानुगः परमशोभितश्चातिहर्षितः ।२७॥
जयतु भूमिजां प्रयोन्नदां मुदा निजकरोत्पले स्थाप्य राघवः
कमलहस्तकलशारूणां स रघुनन्दनः पातु नः सुखम् ॥२८॥
जयतु भूमिजालिंगितो महान् जनमनोहरश्चातिशोभनः
पाशुगमदं गृह्य वै धनुर्निजपितुस्तदाऽदर्शयद् बलम् ॥२९॥
जयतु सीतया भोगकृच्चिरं जयतु कैकयीप्रेरितो वनम्
जयतु पर्वते वासकृच्चिरं जयति योऽत्रिणा पूजितो वने ॥३०।
चमर रक्खे हुए हैं। कहीं सुरगायका चमर रक्खा है । कहीं तालके और कहीं खजूरके बहुतसे पंखे रक्खे हुए हैं ॥ १७ । पलंगके चारों ओर अच्छी रोशनी देनेवाले अग्निशिखा सदृश रत्नमय दीपक रक्खे हुए हैं ॥ १८ ॥ बहुतसे खस आदिके पंखे तथा चमर रक्खे हैं भगवान्के उस विलासभवनके पानदान सुवर्णके हैं उसमे जगह-जगह हीरा-पन्ना आदि रत्न जड़े हुए हैं ॥ १९ । जितने उगलदान हैं, सब चाँदीके हैं। वहाँ अनेक प्रकारके गहने पहिने रंभा जैसी सैकड़ों सुन्दरी नारियाँ राम और सीताको पंखा हाका करती हैं। उसमें सोनेके कितने ही पिंजरे बँधे हुए हैं ॥ २० ॥ उनको यज्ञमें आयी हुई रानियोंने सीताजीको उपहारमें दिये थे। जिनमें मयूर, हंस, सारस, मैना, बटेर, कोयल आदि सैकड़ों प्रकारके पक्षी कितनी ही तरहकी बोली बोलते रहे थे ॥ २१ ॥ २२ ॥ हे शिष्य ! वे पक्षी क्या बोलते थे वह मै तुम्हें स्पष्ट करके बतलाता हूँ। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे पक्षी बारम्बार रामका नाम लेनेसे जीवन्मुक्त ही गये थे ॥ २३ ॥ २४ ॥ पक्षी बोले - सीतापति रामचन्द्रजीकी जय हो, अखिलराजराजेश्वरकी जय हो दशरथात्मज रामचन्द्रजीकी जय हो, लक्ष्मणाग्रज रामकी जय हो। श्रीपति और ताड़काके नाशक रामचन्द्रजीकी जय हो।। २५॥ विश्वामित्रके यज्ञमे जानेवाले, राक्षसोंके विनाशकारी, गौतम-अहल्या तथा जनकजीसे सम्मानित रामचन्द्रकी जय हो ॥ २६ ॥ हमारे स्वामी, शंकरके धनुषको खण्डन करने तथा सीताजीके हाथकी जयमाला पहिननेवाले, परशुरामके दिये हुए धनुषको चढ़ाकर पिता दशरथको अपना पराक्रम दिखलानेवाले । २७-२९ ॥ सीताके साथ विलास करनेवाले, कैकेयीकी प्रेरणासे वनको जानेवाले, चिरकाल तक चित्रकूटपर निवास
| २६८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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जयतु स विराधस्य घातकृज्जयतु दूषणादित्रमर्द्दनः ।
जयतु यो मृगं मोचयद्द्रवाज्जयतु यः कबन्धं क्षणाज्जहौ ॥३१॥
जयतु वालिहा सेतुकारको जयतु रावणदिमर्दकः ।
जयतु स्व पदं प्राप सीतया मगलस्नानकृन्मुदा ॥३२॥
जयतु वाक्यतो भृगुम्प यः सकलभूतल पर्यटन् चिरम् ।
जयतु यात्रकृल्लोकशिक्षया जयतु जानकीं रंजयन् स्थितः ॥३३॥
श्रीरामदास उवाच
रघुवरस्य यन्महर्षिभिः कृतं नवकमुत्तमं यः पठिष्यति ।
तपर्नान्तर्गये भक्तितत्परो निजमनोऽर्थितं संगमिष्यते ॥३४॥
एतादृशे रम्यगेहे मयः शिष्य प्रवर्जिते । सीतया स सुखं रेमे चैकपत्नीव्रतस्थितः ॥३५॥
अथ सा जानकी देवी रंजयामास राघवम् । स्थित मंचकवर्ये तं चित्रक्रीडादिकौतुकैः ॥३६॥
मंचकस्थश्च श्रीरामस्त्वेकदा सुखनिर्भरः । सीतासौंदर्यमालोक्य वर्णयामास तां मुदा ॥३७॥
हे सीते कञ्जनयने ब्रह्मणा त्वं कथं क्षिता । जानाम्यहं वितर्केण तेन त्वं निर्मिताऽसि न ॥३८॥
त्वद्रूपमद्दशी नान्यां पश्यामि जगतीतले । प्रतिपच्चन्द्रकलया स्पर्धयंति नखानि ते ॥३९॥
नखसंख्या रक्तवर्णाः शुभा दाडिमबीजवत् । अगुल्यो वर्तुला रम्यो त्रियंगुष्ठोपमो तव ॥४०॥
मृदुले ते पादतले कञ्जपत्रततोपमे । समे रेखाप्रत्रजयुते स्वस्तिकादिसुचिह्निने ॥४१॥
सीते तेऽग्युर्ध्वभागौ तौ निर्लोमौ मांसलो शुभौ । अङ्घ्री मृद्लो पीतो नृपस्त्रीवदनोचितौ ॥४२॥
पादमूले दधिजेन स्पर्द्धेते रक्तवस्तुले । पादपृष्ठ मये पीने कोमले लोमवर्जिते ॥४३॥
करनेवाले, अत्रि आदि ऋषियोंसे पूजित रामचन्द्रजीकी जय हो ॥ ३० ॥ जिन्होंने विराधको मारा था और दूषणादि राक्षसोका संहार किया था। जिन्होंने मृगरूपधारी मारीचको मुक्ति दी थी और बाणमात्रसे कबन्धका विनाश कर दिया था, ऐस रामचन्द्रका जय हो ॥ ३१ ॥ वालिको मारनेवाले, समुद्रमें सेतु बाँधनेवाले, रावणादिके नाशक सीताको लंकासे वापस लाकर अपने राजसिंहासनपर सुशोभित और मगल-स्नान करके पवित्र रामचन्द्रकी जय हो । ३२ ॥ कुम्भोदर ब्राह्मणकी आज्ञासे चिरकालतक समस्त पृथ्वीका पर्यटन करनेवाले लोकशिक्षके निमित्त बहुप्रथ यज्ञ करनेवान और सीताजीको प्रसन्न करते हुए स्थित रामचन्द्रकी जय हो ॥ ३३ ॥ श्रीरामदासजी कहन लगे- यह ऋषियों द्वारा किय हुए नौ श्लोकोंका स्तोत्र वर्षान्तगेमे जो कोई पाठ करेगा, उसकी मनाभिलषित कामना पूर्ण होगी । जैसा मैं ऊपर कह आया हूँ, ऐसे सुन्दर भवनम् रामचन्द्रजी सीताके साथ सुखपूर्वक एकपत्नी व्रत धारण करके विहार करते थे । उसी प्रकार सीताजी भी नाना प्रकारके कौतुक कराकरके रामचन्द्रजीको प्रसन्न करती थी ॥ ३४-३६ ॥ एक दिन रामचन्द्रजी पर्यंगपर बैठे थे। सहसा वे सीताके सौन्दर्यको देखकर कहने लगे-हे कमलनयने सीते ! मैं अपने मनम बार-बार यही सोचता रहता हूँ कि तुम्हे ब्रह्माजीने कैसे बनाया होगा। मेरा तो जहाँतक ख्याल है कि तुम्हारी रचना ब्रह्माजाने नहीं की है ॥ ३७ ॥ ३८॥ बल्कि कोई दूसरा कारीगर तुम्हारी इस कायाको बनानके लिए नियुक्त किया गया होगा। क्योंकि तुम्हारे सदृश रूपवती नारी मैने संसारमें कहीं देखी ही नहीं। तुम्हारे पैरोंके नाखून अपनी अनुपम छता द्वारा चन्द्रकलासे बाजा मारनेके लिए उतावने हो रहे हैं ॥ ३९ ॥ नाखूनोंकी लाली अनारदानेकी तरह झलक रही है। तुम्हारे वर्तुलाकार और सुन्दर अंगूठे बच्चोंके अंगूठोका नाई कोमल दीखते है ॥ ४० ॥ तुम्हारे चरण कमलकी पंखुडियांक सदृश कोमल और सुन्दर हैं। उनम ध्वजादिकी शुभ रेखाएँ खिची हैं और मेहावर लगी हुई है पैरोंके ऊपरका भाग सुन्दर तथा सुडौल है। उनमे नर्से नहीं दिखाई देतीं। इसीसे तो वे चरण बड़ी-बड़ी रानियोंके पूज्य हो रहे हैं ॥ ४१॥ ४२ ॥ तुम्हारे पैरके नीचेका हिस्सा मक्खनकी तरह मुलायम है, दोनों गुल्फ लाल-लाल वर्तुलाकार और माँडे