श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २ ] उत्तरकाण्डम् ७६३
सर्गः २ ] उत्तरकाण्डम् ७६३
दत्त्वा कुशो नृपो विप्रान्धनं बहुतरं ददौ। प्रजाश्च पूजयामासुर्वस्त्राभरणसाधनैः ॥३०॥
ततः शत्रुघ्नपुत्राः प्रजाः स कुशभूपतिः। भोजयामास विप्रेभ्यः कोटिशः स कुशेश्वरः ॥३१॥
अथ राम्राज्ञया शीघ्रं सौमित्रिः सीतया सह। अन्तःपुराणि सर्वाणि निनाय नगरान्बहिः ॥३२॥
नानावाहनसंस्थानि नृत्यवाद्यादिमङ्गलैः। ययौ रामः स्वयं बन्धुपुत्रायैः सर्वतो वृतः ॥३३॥
द्विनिर्जयेत्युच्चैश्च स्तुतो मङ्गलनिःस्वनैः। ययोध्यास्रा बहिः पौरास्तं ययावग्रतः सुतः ॥३४॥
रथस्थश्चामराद्यैर्वीजितश्च पनेर्दश। विशेत् रामोऽग्रेसरनि तदा रामो जगौ गृह ॥३५॥
ननृतुश्चारणाश्चैव तदा शंस्यचापनः। ततः पौराः ब्राह्मणावांडालान् १ निर्ययुः ॥३६॥
विन्नुस्ते मार्गयेथानान् पूर्वाः पौरान्वनुस्पशन्। बालस्यासिकुलो वाबास्तत्पुर्या न बहिनिर्ययुः ॥३७॥
नासीन्कोऽपि तदा पुर्यां जनशून्या बभूव सा। अयोध्योन्मदना दृष्ण्या गजमुक्तकपिन्यवत् ॥३८॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वे दुर्भागांनिविरायिनः। जयद्रथातिरथ्याश्च ययुः सर्वेर्नृपांगजाः ॥३९॥
कोटिशो राघवं नेमुर्नतो नेमुः कुशेश्वरम्। उपहनानि रामाय कुशाय च पृथक् पृथक् ॥४०॥
दत्त्वा संपूजितास्तेषां तस्थुः सर्वे पृथग्जनाः। केचित्कनकवियंकेतुः कुशरथ्य एव च ॥४१॥
सुराष्ट्रपुर्यंकर्तुश्च ययुः सर्वे निजंगृहैः। साग्नींधाः मधुमत्थं सर्वारात्मे न्युपद्विनिः ॥४२॥
प्रयेयुः रामपादौश्च सीतावंशोऽपि सादरात्। समेत्यर्किगिराः सर्वे सोत्था भोजिता अपि ॥४३॥
तस्थुः सर्वे सभायां ते स्वस्वपौरजनैः सह। तदापश्यन् नृपान्संस्थान् रामो वृत्तं न्यवेदयत् ॥४४॥
बँके, उस समय सब प्रजाजनान उनको प्रनाम किया ॥२९॥ इस प्रकार कुशन ब्राह्मणोंको बहुत सा धन दिया और प्रजाजनने विविध प्रकारके वस्त्रा तथा आभूषणान कुशको पूजा का ॥३०॥ इसके बाद कुशने सब लोगोंको आदर-सत्कार किया और करोड़ों ब्राह्मणोंको भोजन कराया ॥३१॥ इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे लक्ष्मण सीता आदि अपनी सब रानियोंको विविध सवारियों पर बिठाकर नगरके बाहर ले गये ॥३२॥ उस समय नगर में नृत्य गान आदि मङ्गलमय कार्य हो रहे थे। इसके अनन्तर राम भी बन्धुओं, पुत्रादिकोंके साथ अनेक प्रकारके गाजे-बाजेके साथ नगरके बाहर निकलते हुए अयोध्याके बाहर आ गये। उस समय कितने ही ब्राह्मण कनकदान आदि और व राजगण आपकी विरुदावलियोंका गान कर रहे थे ॥३३॥ ३४॥ जाते समय राम एक रथपर बैठे थे, उनपर छत्र लगा हुआ था और चमर ढल रहे थे। इस तरह चलते-चलते राम अपने घर पर पहुँचे, जहाँ कुश पहलेसे ही जा चुका था ॥३५॥ राम वहीं रुककर आगे फिर बढ़े ॥१॥ बाजा बज रहा था और लोग नाच रहे थे। कुछ देर बाद उच्च जातिसे लेकर चण्डाल पर्यन्त सब लोग श्रीरामचन्द्रके साथ ही अयोध्यासे अपने बाल-बच्चोंका साथ लिये हुए विदा होकर निकल पड़े। वे लोग अपने-अपने कुलके लोगोंको देखते हुए आगे चले जा रहे थे। यहाँ तक कि बिल-के चूहा तक बाहर आ गये ॥३६॥ ३७॥ उस समय सारी अयोध्या सूनी हो गयी। कोई भी इस नगरीमें हीं रह गया। जैसे मुनीके नगरका कहा गया था उस तरह की, जो दशा हाथीके पेटसे निकले कैथकी होती है। अर्थात् यह कि हाथी जब कैथके फलको खा लेता है तो उसका छिलका वैसा ही बना हुआ रह जाता है और मध्यभाग उस समय सब कैथका सम्पूर्ण भाग निकाल देते हैं किन्तु वह छिलकामात्र बनकर रह जाता है, उसमें कुछ जान अथवा कुछ तत्त्व नहीं रह जाता। वही दशा अयोध्याकी हो गयी थी। जिसके कारण वह अयोध्या जैसी लग रही थी, किन्तु उसमें कोई रहनेवाला नहीं था ॥३८॥ उस समय जनक द्वारा एकत्रित किये हुए जो भी अपनी-अपनी सेनाके साथ आ पहुँचे ॥३९॥ उन्होंने यहाँ आकर पहले तो श्रीरामको फिर कुशको प्रणाम किया और दोनोंको अलग-अलग विविध प्रकारके उपहार दिये ॥४०॥ और कुशजीसे प्रसन्न हुए कि राजपुत्र भी अपने अन्तःपुरकी स्त्रियों और पुत्रोंको लेकर वहाँ आये। उन्होंने राम की माताओं तथा रामको प्रणाम किया। रामने उनका उठ कर कुशल पूछा और अपने पुत्रके द्वारा अपने भोजन करवाकर भोजन कराया ॥४१॥ ४२॥ इसके बाद वे सब लोग अपने नगरवासियोंके साथ आकर सभा-
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पुनः पप्रच्छ तान्सर्वान्संस्थितान् रघुनन्दनः । युष्माकं पूर्वजाः सर्वं समायाता गजाह्वये ॥४६॥
भवतां रोचते युद्धं यदि तैः पूर्वजैः सह । आगन्तव्यं तर्हि सर्वै मया सह गजाह्वयम् ॥४६॥
नोचेद्गद्गद्भिर्गन्तव्यमित एव निजञ्चलम् । निर्बन्धोऽत्र न मे ज्ञेयः सर्वैः पार्थिवपुङ्गवैः ॥४७॥
इति रामवचः श्रुत्वा नृपा राघवमब्रुवन् । राम राम महावीर्य वयं सर्वे तवानुगाः ॥४८॥
स्वयैव वन्दिताः सर्वे तवान्नेन पोषिता वयम् । वीराः क्षत्रियवंशीया रणे नानप्रहाणिणः ॥४९॥
तवाज्ञया वधानोऽद्य पितृपुत्रान् रणाजिरे । नाभ्मांस्त्वं विद्धि राजेन्द्र स्वामिकार्यपराङ्मुखान्॥५०॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा तानालिङ्ग्य स राघवः । संपूज्याभरणैर्वस्त्रैः सुखं सुष्वाप सीतया ॥५१॥
ततः प्रभाते श्रीरामः सीतया चो मगूनदीम् । स्नात्वा दानादि वं दन्त्वा सीतया विधिपूर्वकम् ॥५२॥
सभार्यो सरयू पुष्यां गन्तुं पप्रच्छ वै मुहुः । तद्रामवचनं श्रुत्वा सरयू राममब्रवीत् ॥५३॥
एतावत्कालपर्यन्तं स्थिता त्वद्दर्शनेच्छया । अद्यैवाद्य त्वया राम यास्यामि त्वत्पद न्वितः ॥५४॥
तदस्या वचनं श्रुत्वा तामाह राघव. पुनः । यावत्कथा मम शुभा स्थास्यत्यघाघनाशिनी ॥५५॥
तावत्त्वमश्वरूपाऽत्र वस लोकावनाशिनी । तथेति रामवचनादश्वरूप विधाय सा ॥५६॥
साकेतेऽथ पूर्णरूपं ययौ रामेण नत्पदम् । अथ रामः सरय्वाऽथो परिक्रम्य निजां पुरीम् ॥५७॥
साष्टांग तां नमस्कृत्य गन्तु पप्रच्छ पूज्य ताम् । अयोध्देऽम्ब नमस्तेऽस्तु त्वयाऽहं रक्षितान्वहम् ॥५८॥
आज्ञां ददस्व पृच्छामि परस्थल गन्तुमुद्यतः । क्षमश्च मदपराधांश्च पुनर्दर्शनमस्तु ते ॥५९॥
इति रामवचः श्रुत्वा पुरी राघवमब्रवीत् । एतावत्कालपर्यंतं स्थिता त्वद्दर्शनेच्छया ॥६०॥
यास्ये त्वया समथौं न सोढुं त्वद्विरहं त्वहम् । तनस्या वचनं श्रुत्वा पुरीमाह रघूत्तमः ।६१।
में बैठे। और-और रात को वर्षा समाप्त हुई तो रामने उनको अपना विचार सुनाया ॥४४॥ इसके अनन्तर रामने उन राजाओसे कहा कि आपके पूर्वज हस्तिनापुरीय युद्धके लिये आये हैं ॥४५॥ सो यदि आपलोगो-को भी युद्ध करना हो तो मेरे साथ हस्तिनापुर चलिये। ॥४६॥ यदि न इच्छा हो तो आप लोग अपनी-अपनी राजधानीको लौट जाइये, मैं आपलोगोसे किसी प्रकारका आग्रह नहीं करना चाहता ॥४७॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर उन राजाओने कहा-हे राम हे महाबली ! हम सब आपके अनुगामी हैं। आपने ही हम लोगोंका अभ्युदय किया है। आपके ही अन्नसे हम पले हैं, वीर क्षत्रियोंके वंशमं मेरा जन्म हुआ है। इस कारण आप यदि आज्ञा दें तो हम अपने पितृपातिकोंको संग्राममें अवश्य मारेंगे। हे राजेन्द्र ! आप कभी भी ऐसा न समझियेगा कि हम स्वामीके कार्य के करनेमें पराङ्मुख होंगे । ४८-५० । इस प्रकार उनके वचन सुनौ तो रामने उन सब राजाओंको हृदयसे लगाया, विविध प्रकारके वस्त्र-आभूषणोंसे उनकी पूजा की और जाकर आनन्दपूर्वक सीताके साथ शयन किया ॥५१॥ इसके अनन्तर सबेरे सीताके साथ रामचन्द्रजीने सरयूके तटपर जाकर स्नान दान किया। इसके बाद प्रणाम करके सरयूजीसे अपने नित्य परम धाम जानेकी आज्ञा मांगी। रामकी प्रार्थना सुनकर सरयून कहा-॥५२। ५३॥ अबतक आपके दर्शनोंकी इच्छासे मैं भी यहीं थी किन्तु हे राम जब आप जा रहे हैं तो मैं भी आपके श्रीचरणोंके साथ चलूँगी ॥५४॥ सरयूकी बात सुनकर रामने कहा-जबतक सब पापोंको नष्ट करने-वाली मेरी पुनीत कथा इस संसारमें विद्यमान है, तबतक भूमण्डलमें तुम भी यहीं रहते हुए सबोंके पाप दूर करती रहो । रामके कहनेपर सरयूने तत्क्षण अपना एक अंशमात्र बनाया, जिसमें वह अयोध्यामें रह गयी और पूर्णरूपसे रामके साथ चल पड़ी। साकेतोऽथ... कह...कर अपनी पावन पुरीकी परिक्रमा की और साष्टांग प्रणाम एवं पूजन करके परमधाम जानेकी आज्ञा मांगी और कहा-हे अम्ब प्रये ध्ये ! तुमने मेरी रक्षा की है। मैं अब अपने वैकुण्ठधाम जानेकी आज्ञा माँगता हूँ । मेरे अपराधोंकी क्षमा करो और मुझे आशीर्वाद दो कि फिर वर्षों में तुम्हारा दर्शन कर सकूँ ॥५५-५६ । इस प्रकार रामका बात सुनकर अयोध्यापुरीने कहा कि इतने दिनों तक मैं आपके दर्शन करनेके लिए यहाँ रही। आपके चले जानेपर दर्श-