श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] विलासकाण्डम् २६१
सर्गः १ ] विलासकाण्डम् २६१
ज्ञातं त्वया वा न ज्ञातं वेत्तुमिच्छामि तन्मुखात् ।
यदि किंचिद्वया नाशां ज्ञानं तद्बोधयाम्यहम् ॥ ३० ।
इति रामवचः श्रुत्वा निमग्नानन्दसागरे । मंचारूढ्या रामचन्द्रं जानकी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१ ।
श्रीसीतोवाच
राम रावणदर्पघ्न त्वद्दत्ता ज्ञानपेटिका। मयाऽवलोकिता बुद्ध्या लब्धं ज्ञानं तत्र प्रभो । ३२।
निर्गुणो निर्विकारस्त्वं क्रीडेयं सकला त्वया । मत्सङ्गेनैव भूम्यां कृत्वा लोकहिताय हि ॥३३॥
पेटिकायां यथा ज्ञानं मया तत्प्रवदामि ते त्वया पञ्चदशश्लोकैर्युक्तं गुह्यमनुत्तमम् ॥३४।
प्रकटं तन्करोम्यद्य तवाग्रे रघुनन्दन। सर्वेषां मन्दबुद्धीनां हिताय ज्ञानमिद्धये ॥३५।
जनानां सम्बोधयितुं चरित्रं भवताऽत्र यत् । कृतं तस्य विचारेण ह्यात्मज्ञानं लभेश्वरः ॥३६॥
सच्चिदानन्दरूपी यो विष्णुर्ज्ञेयः स सागरः। भूभारहरणादीच्छा विष्णोर्या जायते शुभा ॥३७॥
स वै श्रेयस्तरङ्गोऽत्र तथाऽऽत्मांशुलवः शुभः । बहिःकृतः सागरात्तं प्रान्तात्म्यः कथ्यते भुवि ॥३८॥
बुद्धिस्तु जननी चैव कौसल्या साऽत्र कथ्यते। शुद्धसत्त्वांतःकरणं पिता तस्यात्मनः स्मृतः ॥३९॥
राजा दशरथो ज्ञेयः श्रीमानन्त्यपरः क्रमः । तस्यात्मनश्च चत्वारो भेदास्ते बान्धवाः स्मृताः । ४०॥
रामसौमित्रिभरतशत्रुघ्ना एव चात्र हि । तुर्यावस्थस्तनु वाः स त्वं दशरथान्मजः ॥४१॥
ततो जाग्रदवस्थश्च लक्ष्मणः सोऽत्र कथ्यते । स्वप्नावस्थस्तृतीयश्च भरतोऽपि निगद्यते ॥४२॥
अपरः सुषुप्त्यवस्थस्तु ज्ञेयः शत्रुघ्न एव सः । हृदयाकाशं सन्धानमयोध्याऽत्र स्मृता तु सा ॥४३॥
मनोवेगो बहिर्यात्रा विश्वामित्राध्वरे गमः मनोवृत्तिनिघातश्च ताडिकाया वधोऽत्र सः ॥४४॥
मनोवेगस्य यो भङ्गः स धनुर्भङ्ग उच्यते । मायायोगस्तनस्तस्य मम्पाणिग्रहणं स्मृतम् । ४५॥
पूर्वसंस्कारनिग्रहो जामदग्न्येनिग्रहः । ततः सुषुद्दिरेवेहि कैकेय्या वरदानतः ॥४६॥
हुआ ? अन्या, अब बताओ कि मैं कौन हूँ मुत्र तूमन जगत मन्म क्या समझा है ? मैं तुम्हारे मुखसे यह सुनना चाहता हूँ । तुमने मुझे जाना या नही ? यदि तुम्हे हमको जाननेम अब भी कुछ कसर होगी तो मैं समझाऊँगा ॥ २६ । ३० ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके बचनं सुनकर माताजी मौर भी आनन्दित हो गयीं और रामचन्द्रसे कहने लगीं ॥ ३१ ॥ माताजी बोली-हे रघुनन्दन ! हे रावणके गर्वको नष्ट करनेवाले राम ! आपने मुझ जो यह ज्ञानकी पिटारी दी है, उसे मैंने अपनी आत्मदृष्टिम खूब गौर करके देखा और मुझे आपका ज्ञान-प्राप्त हो गया । ३२॥ आप निर्गुण और निर्गकार है । फिर भी मेरे साथ संसारम आपन जा जा लीलाएं की हैं, उनका उद्देश्य एकमात्र लोकहित है। मैंने इस पिटारीमें जा जो देखा है, वह बतलाती हूँ। आपने पन्द्रह श्लोकोंमें मुझे जो उत्तम ज्ञान दिया है उसे मै आपके सम्मुख प्रकट करती हूँ ॥ ३३ ॥ ३४॥ उससे संसारके समस्त अज्ञानियोंका उपकार होग अर्थात् उन्ह का ज्ञानकी प्राप्ति हो जायगी । ३५ ॥ मंदबुद्धाको समझानेके लिए आपन इस जगतीतलमे जा जो चरित्र किये है उनपर अच्छी तरह विचार करनेसे नि सन्देह आत्मज्ञानकी प्राप्ति हो सकती है ॥३६॥ सच्चिदानन्दस्वरूप विष्णु भगवान् ही सागर हैं । भगवान् भीपृथ्वीका भार उतारनेकी इच्छा करते हैं, वही उस सागरकी तरंग है। उसमेंसे एक बिन्दु आत्माशरूप होकर बाहर आ जाता है । वही आत्मा कहलाता है। उसकी बुद्धिरूपा जननी कौशल्या है। शुद्ध और सत्वगुणमय अन्तःकरण उस आत्माका पिता होता है, सो साक्षात् श्रीदशरथजी हैं । उस आत्माके चार भेद आपने बतलाये हैं। वे चार भाई राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नस्रप होकर विद्यमान हैं। उनम् तुरीयावस्थाका अंश कहा है। सो इन चारों भाइयोंम बड आप हीं हैं ॥ ३७-४१ ॥ ज पदवस्थास्वरूप लक्ष्मणजी हैं, जाग्रतावस्थास्वरूप भरतजी तथा सुषुप्तिअवस्थास्वरूप शत्रुघ्नजी हैं। हृदयाकाश स्थान जो आपने बतलाया है, वह यही अयोध्या है ॥४२-४३॥ मनोवेगका दूर होना जो आपने कहा, वही मानो विश्वामित्रके यज्ञमें आपकी यात्रा है। मनकी दुर्वृत्तियोंका घात ही ताड़का-वध है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ मनोवेगका भंजन ही जनकपुरमे धनुष टूटना है। वही मेरा पाणिग्रहण होना ही मायाका
२६४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
भवारण्येऽटनं प्रोक्तमटनं दंडकेऽत्र ते । दंभस्य निग्रहश्चात्र विराधस्यात्र निग्रहः ॥ ४७ ॥
आत्मनः पर्णकुटिका पंचभूतात्मकश्च सः । देहोऽयं पञ्चवटिका विश्रान्त्यर्थं तवात्र मा ॥ ४८ ॥
कामस्य निग्रहः प्रोक्तः खरस्यात्र विनिग्रहः । क्रोधस्य निग्रहश्चापि दूषणस्यात्र निग्रहः ॥ ४९ ॥
लोभस्य मर्दनं तत्र त्रिशिरोनिग्रहोऽथ हि । तत्राशाकृन्तनं प्रोक्तं घ्राणेनात्र विरूपणम् ५०।
तस्याः शूर्पणखायाश्च मोहस्य निग्रहः स्मृतः । मृगमार्गीचघातोऽत्र शुद्धमायाश्रयन्मनः । ५१।
ममाश्रयस्ते वामांगे मात्स्थिता दंडके वने । उत्सृष्टान्नु या माया जठराग्नौ स्मृता शुभा । ५२।
मम रजःस्वरूपायाः प्रवेशश्चानलेऽत्र मः । तामस्याश्चैव मायाया नियोगश्च तदा स्मृतः । ५३।
मम तमःस्वरूपाया हरणं रावणेन हि । सुखालाभो महान्क्लेशतत्त्वतो मद्धियोगस्ततः । ५४।
शोकवेगस्ततः प्रोक्तः कबन्धस्य वधोऽत्र सः । विवेकस्याश्रयस्त्वत्र सुग्रीवस्याश्रयोऽत्र मः ॥ ५५।
मन्युद्रेकलाभश्च तव लाभो हनूमतः । अविवेकवधः प्रोक्तश्चात्र बालिवधस्तथः । ५६।
उत्साहेन यतः संगः सा विभीषणमैत्रिकी । अज्ञानतरणोपायः सेतुबंधो महोदधौ ॥ ५७॥
त्रिगुणाश्रयगेहे वै लिंगदेहाह्वये शुभे । त्रिकूटाचलगम्यायां लङ्कायां रघुनन्दन । ५८।
मदस्य निग्रहश्चात्र कुभकर्णवधस्त्वया । निग्रहो मत्सरस्यापि मेघनादवधोऽत्र मः ५९॥
तत्राहंकारघातश्च रावणस्य वधस्त्वया । मायानामैक्यतान्यपि त्रिविधा या मयैक्यता ६०॥
वियोगो लिंगदेहस्य लङ्कात्यागस्त्वयाऽत्र मः । हृदयाकाशगमनमयोध्यागमनं पुनः ॥ ६१ ॥
आनन्दैकसुखं तत्र राज्यभोगस्त्वया सौऽत्र हि । मायात्यागस्त्वनन्तरैर् वाल्मीकेराश्रमे मम । ६२ ।
त्यागोऽथ भावि श्रीराम त्वया सोऽत्रप्रकाशितः । सात्त्विक्या ग्रहणं यच्च पुनर्मे ग्रहणं स्मृतम् । ६३॥
सात्त्विक्या मायया सार्द्धं तवोद्योगो मया सह । ततश्च हृदयाकाशे महाकाशे विलापनम् ६४।
भाग है ॥ ४५ ॥ परशुरामका दर्पभञ्जन ही अहंकारका निग्रह है। इसके अनन्तर कार्यरूपिणी कैकेयीके वरदानसे आपका दण्डकारण्यमे घूमना ही भवरूपमे भटकना है। दम्भका रुक जाना ही विराधवध है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ पञ्चभूतात्मक आत्मरूपीका पर्णकुटी जो आपने बतलायी, वह यह शरीर ही है। जो आपके विश्राम करनेके लिए एक उपयुक्त स्थान है। ४८ । कामका निग्रह करना ही खर राक्षसका वध है और क्रोधका निग्रह दूषणका वध है ॥ ४९॥ लोभका निग्रह त्रिशिराका वध कहा गया है। आशाका विच्छेद जो आपने बतलाया, वह ही शूर्पणखाका विरूप करना है मारीच मृगका वध करना ही मोहका निग्रह है। दण्डकवनम आपने जो सत्त्वगुणमयी मुख्य अपना वामभागमे रक्खा था वह ही शुद्ध माया का आश्रय है। रजोगुण-रूपसे मेरा अग्निमे प्रवेश करना ही तमयी मायाका वियोग है। तामस रूप रावणके द्वारा हरण होना ही सुखाभाव है तुम्हारा-हमारा वियोग होना ही महाक्लेश है॥ ५०-५४ । इसके बाद कबन्धका वध करना ही शोकभङ्ग है। सुग्रीवका मित्रता ही आश्रय है। ५५ ॥ भालूके कटकका लाभ आपकी उत्साहशक्ति मिलना है। बालिका वध करना ही अज्ञानका वध करना है । ५६ उसके बाद विभीषणके साथ मैत्री होना ही उत्साहका सङ्ग है । समुद्रमे सेतुबन्धन ही अज्ञानसे तरनका उपाय है ॥ ५७॥ आपका त्रिकूट पर्वतपर पग डालना ही लिङ्गशरीर रूपमे त्रिगुणका आश्रय करना है ॥ ५८ ॥ कुम्भकर्णका वध ही मदका निग्रह है। मेघनादका वध मत्सरका निग्रह है ॥ ५९ ॥ आपने जो रावणका वध किया है वह ही अहंकारका नाश है, मायाकी एकता जो आपने कही, वह हम दोनोंका एकत्र हो जाना है ॥ ६० । लङ्काका त्यागना ही लिङ्गदेहका वियोग है। फिर अयोध्याके लिए प्रयाण करना ही हृदयाकाशका भजन है ६१ । आपका राज्यभोग करना ही एकमात्र आनन्दका अनुभव करना है फिर मायाका त्याग जो आपने बतलाया सो भविष्यमे वाल्मीकिके आश्रममे मेरा त्याग देना ही होगा। सात्त्विकी मायाका ग्रहण जो श्रीपने बतलाया सो मेरा पुनर्ग्रहण कर लेना होगा । ६२ ॥ ६३ । सात्त्विकी मायाके साथ उद्योग जो आपने कहा, सो मेरे साथ आपका
सर्गः ३] विलासकाण्डम् २६५
अयोध्यानागरीमग्रे वैकुण्ठं प्रति नेष्यसि। प्रवेशत नगरे ऽस्मिन्सच्चिदानन्द्यंशके ॥६५॥
स्वरूपं परित्यज्य विष्णुरूपमभीप्सितम्। नृणां त्वया नैव मुक्तिर्व्यापुर्यामवनीदिना ॥६६॥
एवं यद्यत्त्वया राम कृतं कर्म शुभाशुभम्। तत्सर्वं ज्ञानबोधाय लोकानां च हिताय हि ॥६७॥
कर्तव्यमपरञ्चान्यत् कर्मातः परतः क्वचित्। निर्गुणस्याप्रमेयस्य सच्चिदानन्दरूपिणः ॥६८॥
इत्थं त्वयोपदिष्टा मे ह्यज्ञा मज्ञानभेदिका। अत्र लब्ध्वा विचारं तु जीवन्मुक्ता न संशयः ॥६९॥
देहे रामायणं सर्वं यत्त्वया मयि दर्शितम्। पञ्चदशाक्षराकारं कण्ठे तद्भास्करप्रदम् ॥७०॥
श्लोकरत्नमयं यो वै कण्ठे हारं बिभर्ति हि। जीवन्मुक्तः क्षणदेव भविष्यति नरोत्तमः ॥७१॥
देहरामायणं नाम राम यत्कथितं त्वया। नेदृशं कथितं केन न कोऽप्यग्रे वदिष्यति ॥७२॥
मम प्रीत्योपदिष्टं हि त्वयैतद्रघुनन्दन। इत्थं कोऽपि न जानाति ब्रह्मद्यानामगोचरम् ॥७३॥
गूढं रम्यं सुदुर्बोधं ज्ञानदं ज्ञानभास्करम्। देहरामायणं चैतच्छृण्वन्पातकनाशदम् ॥७४॥
इति सीताकृतः स्तुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः। विदेहतनये साध्वि धन्याऽसि गजगामिनी ॥७५॥
सम्यग्ज्ञानाग्निका बुद्ध्या मया यत्नेनरोधिता। विचिन्त्यूननयत्या नैव स्वरूपंयां यथास्थितम् ॥७६॥
बुद्ध्या ज्ञानं मयि ज्ञानं मोहनाशविदूताह। कथनीयमिदं देहरामायणं न कस्यचित् ॥७७॥
मदनुग्रहतमं प्रोक्तं त्वं प्रीत्या विद्धिते। दाम्भिकाय न दातव्यं नास्तिकाय शठाय च ॥७८॥
असत्काय द्विजद्वेषे परघाताय च। मलिनायातिक्रूराय निन्दकाय जडाय च ॥७९॥
कलौ नैतत्तु वै गुह्यं भविष्यति न संशयः। सहस्त्रेषु नरः कश्चित्प्राप्स्यतेऽत्र संशयः। ॥८०॥
सर्ववेदान्तसारं हि मया ते समुदीरितम्। देहरामायणं चैतद्भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥८१॥
बिहार करना है। उसके बाद आपने हृदयाकाशको महाकाशमें मिला देनेको जो कहा है, वह ही आपका देवलोक अपने धाम वैकुण्ठ में गमन न जाना होगा। इस स्वरूपका परित्याग करके फिर आपने विष्णुरूपस्वरूपको रूप धारण ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्मस्वरूप नगरमें वास होगा ॥ ६५ ॥ आपके द्वारा छोड़कर विष्णुका दिखाया है आत्माका सम्पूर्णता मुक्ति है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार हे रामचन्द्रजी आपने इस संसारमें जो जो कर्म किये हैं, वे सब जीवोंके हितके बानाय और उनका कल्याण करनेके लिये ही किये हैं ॥ ६७ ॥ इसके सिवाय आप जो कुछ भी कर्म करते वह ही ठीक है। प्रमेयत्व जो आपके लिए सम्भव ही है। क्योंकि आप सबसे अतीत हैं, निर्गुण हैं, व सच्चिदानन्दरूप हैं ॥ ६८ ॥ इस प्रकार आपके द्वारा उपदिष्ट यह ज्ञानकी पिटारी है। इसपर बार-बार विचार करनेसे मैं तो जीवन्मुक्त हो गयी, इसमें कोई भी संशय नहीं है ॥ ६९ ॥ इस शरीरमें आपने जो १५ अक्षरोंके रामायण दर्शन दिया, उस मैंने कण्ठ में प्रकाश करने गलेमें डाल दिया है ॥ ७० ॥ इस श्लोकरूपी रत्नोंकी मालाको जो प्राणी अपने गलेमें डालेगा, वह पुरुषश्रेष्ठ क्षणमात्रमें जीवन्मुक्त हो जायगा ॥ ७१ ॥ हे राम ! आपने यह जैसा देहरामायण कहा है, वैसा न अब तक किसीने कहा है और न भविष्यमें कोई कहेगा ॥ ७२ ॥ हे रघुनन्दन ! इसे आपने केवल मुझपर अनुग्रहम प्रकट किया है। इस देहुरामायणको कोई भी नहीं जानता। क्योंकि यह ब्रह्मादिक देवताओंका भी अलभ्य है ॥ ७३ ॥ यह गूढ़, रम्य और दुर्बोध ज्ञान था, उसे आपने ज्ञानामृत बतलाया है, इस देहरामायणके श्रवणसे सब पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ७४ ॥ इस तरह सीताकी बात सुनकर रामचन्द्रजी हंसकर बोले हे विदेहतनये तुम साध्वी हो, धन्य हो। तुमने मेरी ज्ञानकी पिटारीको देख लिया और इसका जो वास्तविक स्वरूप था, सो भी जान लिया। बुद्धिदृष्टिमं देखनेवालोंके लिये यह देहरामायण मोहका नाश करनेवाला है। यह रामायण जैसे तैसे मनुष्योमं कहनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ७५-७७ ॥ हे प्रिये सीते ! तुम्हारे अनुरागमं ही मैंने छात्र इसे तुम्हें बतलाया है। इसे पाखण्डी, नास्तिक तथा दुष्ट पुरुषास मत कहना ॥ ७८ । उस मनुष्य न बतलाना, जो ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं, दूसरोंके बहार-घटियोंको छिपी दृष्टिसे देखते हैं जो मलिन प्रकृतिके क्रूर, निन्दक एवं जड़ स्वभावके हैं ॥ ७९ ॥ कलियुगमें यह गुप्त रहेगा। हजारों प्राणियोंमें एक-आध मनुष्य ही इसे जान सकेंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ८० ॥ यह समस्त
| २७६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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इत्युक्त्वा राघवः सीतां पर्यङ्के रत्नमण्डिते । सुष्वाप सीतया रात्रीं दामीभिर्वीजितः सुखम् ॥८२॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे देहरामायणं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
चतुर्थः सर्गः
( सीताके विविध अलङ्कारोंका वर्णन )
श्रीरामदास उवाच
चतुर्थावशिष्टायां निशायां रघुपायकम् । उत्थोत्थानार्थं सन्नाहा रणित्राद्यबहिःस्थिताः ॥ १ ॥
वन्दिनो मागधाः सूता नर्त्तक्यश्च नटादयः । वादयामासुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ २ ॥
जगुरुच्चैर्गीतानि स्तोत्राणि विविधानि च । प्रभातिकीं स्तुतिं प्रोचुः कलकण्ठैर्मनोरमैः ॥ ३ ॥
विघ्नेश्वरः सकलविघ्नविनाशदक्षो दक्षस्त्वजा भगवती हि सरस्वती च
दृष्टाष्टभैरवगणा नव दिव्यदुर्गा देव्यः सुशम्भु नृपते तव सुप्रभातम् ४॥
भानुः शशी क्षितिसुतो बुधशुक्रमन्दा राहूः सकेतुरदितिर्दितिराजितेयाः
शक्रादयः कमलभूः पुरुषोत्तमेन्द्रो, रुद्रः करोतु सततं तव सुप्रभातम् ५॥
पृथ्वी जलं ज्वलनमारुतपुष्कराणि सप्ताद्रवोऽपि भुवनानि चतुर्दशैवं ।
शैला वनानि सरितः परितः पवित्रा गङ्गादयो विदधतां तव सुप्रभातम् । ६ ।।
दिक्संक्रमं तदखिलं दिग्गभा दिगीशा नागाः सुपर्णभुजगा नगरोश्चवृक्षा ।
पुण्यानि देवसदनानि बिलानि दिव्यान्यप्याहतं विदधतां तव सुप्रभातम् ॥ ७॥
वेदाः षडङ्गमहिताः स्मृतयः पुराणं काव्यं मदागमपथो मुनयोऽपि दिव्याः।
व्यासादयः परमलारुणिका ऋषीणां गात्राणि वै विदधतां तव सुप्रभातम् ॥ ८॥
चंडालका निचाड मैंने तुम्हें बतला दिया। यह देहरामायण मुक्ति तथा मुक्ति दोनों का फल देनेवाला है ॥ ८१ ॥ इतना कहकर रामचंद्रजी सीताके साथ रत्नजटित पलङ्गपर सो गए और दासियाँ पंखा झलने लगीं ॥ ८२ ॥
इति श्रीमत्कोविदानन्दघनजीवन श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पद गम्भीरस्वादविदितज्ञ'ज्योत्स्ना'-मराठीटीकासमन्विते विलासकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
श्रीरामदासजी कहने लगे — जब चार घड़ी रात बाकी रह जाती थी, तभी भगवान्को जगानेके लिए बंदीजन, मागध, सूत, नाचनेवाली वेश्यायें और नट आदि लोग रनिवासके बाहर आकर बाजे बजाते थे और नर्तकियां नाचती थीं ॥ १ ॥ २ । अन्य लोग सामङ्ग-गायन विविध प्रकारके स्तोत्र व उनका अपने कोमल कण्ठसे प्रातःकालकी स्तुतियां किया करते थे। वे कहते थे ॥ ३ हे नृपते ! समस्त विघ्नसमुहको नष्ट करनेमें निपुण विघ्नेश्वर (गणेशजी), दक्षकन्या भगवती पार्वती, सरस्वती, अभिमानकी मूर्ति अष्टभैरव-गण, नौ दिव्य दुर्गायें तथा अगणित देवतागण ये सब आपका प्रभात मङ्गलमय करें ॥ ४ । सूर्य, चंद्रमा, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु, दिति तथा आदितिके पुत्र इंद्रादि देवता, ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये सब आपका प्रभात मङ्गलमय करें । ५ । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, तड़ाग, सप्त पर्वत, चतुर्दश भुवन, शैल, वन और भुवनविख्यात गङ्गा आदि नदियां आपका प्रभात मङ्गलप्रद करें ॥ ६ । समस्त दिक्चक्र (दसों दिशाएँ), दिग्गज, दिक्पाल, नाग, सुपर्ण, पर्वतके लतातें, पवित्र देवायतन और गिरिकन्दराएँ, ये सब सर्वदा आपका प्रभात मङ्गलमय करें ॥ ७ । षडङ्ग सहित चारों वेद, स्मृति, पुराण, काव्य, अच्छे अच्छे मताय, ब्राह्मण आदि ग्रन्थ, व्यास आदि दिव्य मुनिगण तथा ऋषियोंके गात्र आपका प्रभात मङ्गलमय करें । ८ ॥
सर्गः ४ ]
विलासकाण्डम्
२६७
इति बन्दिजनैः सूतैः स्तोत्रैश्च गाथकैः स्तुतः । नानापक्षिसमूहैश्च शुकैः पञ्जरस्थितैः ॥ ९ ॥
स्तुतो वादित्रनिनादैर्वाद्यमानैस्तथैव च । सुप्रबुद्धो बभूवाथ रामचन्द्रः ससीतया ॥ १० ॥
आदौ प्रबुद्धा सा सीता पश्चात्प्रबुद्धो रघूत्तमः । रामः सुरानृषींस्तातं मातरं मार्ग्यं गुरुम् ॥ ११ ॥
चिन्तामणिं कामधेनुं चिन्तयामास चेतसि । ततः सीताऽपि च दुर्गा गङ्गां च दीप्तमण्डलम् ॥ १२ ॥
चिन्तयामास कौसल्यां गुरुपत्नीं स्वमातरम् । ततो नत्वा रामचन्द्रं नियतानन सङ्गता ॥ १३ ॥
आवश्यकं तु संपाद्य कृत्वा शौचविधिं क्रमात् । दंतशुद्धिं चकाराथ रामचन्द्रः सविस्तरम् ॥ १४ ॥
आवश्यकं तु संपाद्य कृत्वा शौचविधिं क्रमात् । हुताशनेऽर्चयित्वा कृत्वा हवार्तेन गृहे ॥ १५ ॥
ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यो यथाक्रमम् । एतस्मिन्नन्तरे स्नात्वा सीता देवीं प्रपूज्य च ॥ १६ ॥
देवानग्नीन् द्विजांस्तन्त्राः श्वश्रूश्चैव यथाक्रमम् । ततो नत्वा रामचन्द्रं तत्पार्श्वे यत्नतः स्थिता ॥ १७ ॥
अथ रामो वसिष्ठस्य मुखात्पौराणिकीं कथाम् । शांतया मातृभियुक्तो बन्धुभिश्च सहह्रजैः ॥ १८ ॥
सम्यक श्रुत्वा कवितेन पूजयामास तं गुरुम् । ततो नत्वा गुरुं रामो गुरुपत्नीं च मातरम् ॥ १९ ॥
सर्वां मातश्च विप्रांश्च पंडितान वैदिकान् मुनीन् । योगनिष्ठान्स्तपोनिरूपाने विप्रान ज्योतिर्विदंस्तथा ॥ २० ॥
मीमांसकांस्तार्किकांश्च मन्त्रशास्त्रविशारदान् । धर्मशास्त्रविदंश्चैव तथान्यान्यान वयोधिकान् ॥ २१ ॥
पूजयामास श्रीरामः शांतया प्रमदास्तथा । अथ साता हेमपात्रे पूजोपकरणानि सा ॥ २२ ॥
गृहीत्वा स्वसखीभिश्च नत्वा मुनिमितैः सह । नवोदधिः सम्पूज्य पक्वान्नैर्नानानिर्मितैः ॥ २३ ॥
विचित्रैः पायसार्यैश्च माता धेनुमतोषयत् । ततः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रार्थयानन्द आनर्त्त ॥ २४ ॥
कामधेनो नमस्तुभ्यं पक्वान्नादीनि वेगतः । दियान्नानि भूसुरेभ्यो गवां दिव्यसमर्पय ॥ २५ ॥
इति सा प्रार्थनां कृत्वा कामधेनोस्तु जानकी । ददयो रत्नपात्राणि स्थापयामास कोटिशः ॥ २६ ॥
इस प्रकार बहुतसे बन्दीजन, मगध, भट आदि तथा पालतू पक्षिकुल मृदु वचनों द्वारा जगाये जानेपर सीताके साथ-साथ रामचन्द्रजी सादर उठ जाते थे ॥ ९, १०॥ परन्तु सीताजी उठतीं, फिर रामचन्द्रजी जागते थे। उठनेपर रामचन्द्रजी देवताओंका, मुनियोंका, पिताका, माताका, सूर्य, गुरु (वसिष्ठ), चिन्तामणि और कामधेनुको मन ही मन स्मरण करते थे। पश्चात् सीताजी भी दुर्गा, गङ्गा, सरस्वती, सूर्य ... अपनी माता गुरुपत्नी अरून्धती और अपना नाम कौसल्या आदिका सवेरे सो उठकर स्मरण किया करती थीं। इसके अनन्तर नम्रतापूर्वक रामचन्द्रजीको प्रणाम करके वे अपने नित्यकर्ममें लग जाती थीं ॥ ११-१३॥ उधर रामजी भी शौचादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर अच्छी तरह दातौन करते थे ॥ १४ ॥ तदनन्तर ... पर जाकर स्नानादि ... करके घरपर लौट आते और अग्निहोत्रविधिके साथ देवताओंका पूजन करते थे ॥ १५ ॥ तत्र बह्मादिके दान देते थे। इसी बीच माताजी भी स्नान करके देवीपूजनसे निवृत्त होकर देवता, अग्नि, ब्राह्मणी और कौसल्या आदि सासुओंको क्रमशः प्रणाम करके पश्चात् रामचन्द्रजीकी पदवन्दना करतीं और उनके पास जा बैठती थीं ॥ १६, १७॥ तदनन्तर रामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठके मुखसे पुराणोंकी कथाएँ सुनते थे; उस समय सब माताएँ, भाई तथा मित्रमण्डल रामचन्द्रजीके साथ ही रहता था ॥ १८ ॥ खूब सावधानीके साथ कथा सुनकर राम गुरुवसिष्ठकी पूजा करते थे। फिर गुरु, गुरुपत्नी तथा अपनी माताओंका प्रणाम करके माताओं, ब्राह्मणों, पण्डितों, वैदिकों, मुनियों, योगनिष्ठ तथा तप निष्ठ ब्राह्मणों, ज्योतिषी, मीमांसक, तार्किक, मन्त्रशास्त्रमें निपुण विद्वान् और वयोवृद्ध धर्माशास्त्रियोंका सीताके साथ-साथ रामचन्द्रजी विधिवत् पूजा करते थे। इसके पश्चात् सीताजी एक स्वर्णके पात्रमें पूजनकी सामग्रियाँ लेकर ॥ १९-२२॥ सखियोंके साथ सुरभी (कामधेनु) की पूजा करती थीं और उनके पकवान तथा विचित्र रीतिसे तैयार किये गये हविष्यान्नोंको खिलाकर उसे प्रसन्न करती थीं। फिर प्रदक्षिणा करके इस प्रकार कामधेनुकी स्तुति करती हुई कहती थीं—॥ २३॥ २४॥ हे कामधेनो ! आपको...
२६८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दिव्यान्नैः परिपूर्णानि चकार सुरभिस्त्विति ।
ततः शीघ्रं हेमपात्रैर्गृहीत्वान्नानि पृथग्विधान् ॥
परिवेषणार्थं सन्तुष्टा ययौ नूपुरगुञ्जिता ॥२७॥
एतस्मिन्नन्तरे रामश्चोपाहारार्थमादरात् । विप्रानिष्टान्मन्त्रिणश्च समाहूय सहस्रशः ॥२८॥
उपाविशद्भोजनस्य शालायां तैः समन्वितः । रुक्मपीठे सुवर्णे ने मणिरत्नैरूषमाः स्थिताः ॥२९॥
पीतक्षीरोल्लसत्समन्विता रुक्ममण्डनैः । पूजिता गन्धवेणापि गन्धसन्नन्तादिभिर्मुदा ॥३०॥
स्त्रीणां रुक्म-पदस्थु रुक्मपात्राणि च पृथक् रंगावलि विचित्राणि भूमौ न्यस्तानि तत्पुरः ॥३१॥
हेमोद्भवं नि पानीयपात्राण्यपि पृथक् पृथक् । सोपपत्राणि चित्राणि रत्नदीप्तियुतानि च ॥३२॥
स्थापयामासुः श्रीरामबन्धुवन्ध्वस्त्रगान्विताः । एतस्मिन्नन्तरे सर्वैः श्रुतो मञ्जुलनिस्वनः ॥३३॥
नूपुराणां किंकिणीनां कङ्कणानां मनोरमः । रत्नौघां कङ्कणानानां घर्षणादुत्थितो महान् ॥३४॥
स मञ्जुलस्वनं श्रुत्वा कथमेषं श्रूयते स्वनः । इति मतिश्चित्ताचन्ते व्यग्रनेत्रैरितस्ततः ॥३५॥
अपश्यन् ब्राह्मणाद्याश्च तावत्सीतां व्यलोकयन् । तडिद्गुणोपमां दिव्यां शतकोटिरविप्रभाम् ॥३६॥
यस्याङ्गुलिषु सर्वत्र पादयोर्विविधानि च । मत्स्यकच्छपनाकादिविहिताम्युज्ज्वलन्ति च ॥३७॥
ददृशु रत्नचित्राणि हेमाभ्याभरणानि ते । तत ऊर्ध्वं किंकिणीनां पादयोनूपुराणि च ॥३८॥
शृङ्खला विविधा रम्यास्तथा गुर्जरीयन्त्रताः । नानानुपुरभेदाय कङ्कणान्युज्ज्वलानि च ॥३९॥
रत्नकङ्कणसंघांश्च दिव्यवस्त्रकोत्रवानि च । मट्टशूम्ने हि सीताया म शिक्यचित्रितानि च ॥४०॥
तस्याः कट्यां ददृशुस्ते पीतकीशेयमुज्ज्वलम् । मुक्ताजालकघनतुपुष्परञ्जितिचितम् ।४१॥
नवीन गतिचांचल्यात्कृतमंजुलनिःस्वनम् । आदर्शादर्शसंयुक्तं सुगन्धा मोद मोदितम् ॥४२॥
वक्षोपरि ददृशुस्ते रशनां रुक्मतन्तुताम् । रत्नकङ्कणशोभाभिः किंकिणीभिर्विराजिताम् ॥४३॥
नमस्कार है कृपा करके आप साधु-ब्राह्मणोंके लिए अन्न-वस्त्र तथा दिव्य अन्नका प्रबन्ध कर दें जानकीजी इस प्रकार प्रार्थना करके कराहा मृदङ्गके पात्र कामधेनुके पास भिजवाकर रखवा देती थी और कामधेनु उन सबको विविध प्रकारके पकवानोंस भर दिया करती थी। उह्नो हेमपात्रेर्मंस सब पदार्थों ले लेकर युवतियां नूपुरके शब्दसे उस यज्ञमण्डपको शब्दायमान करती हुई अन्नदाताको परोसती थीं। २४-२७॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजी अपने साथ हजारों ब्राह्मणों तथा हित-मित्रोंको सादर बुलाकर पाकशालामें सुवर्णके पीढ़ापर बिठलाकर अनेक उपचारोंसे पूजन करते थे ॥२८-३०॥ वहाँ सुवर्णकी तिपाइयोपर घड़ोंमें जल भर भरकर रक्खा था। पास ही जल पीनेके लिए छोटे-छोटे बहुतसे सुवर्णके बर्तन रक्खे हुए थे। उनकी झटपट उठा उठाकर रामचन्द्रजीकी भ्रातृवधुओंस लाकर उनके सामने रख दिया। इतनेम सबको एक मनोहर ध्वनि सुनाई दी। जो नूपुर, किंकिणी और कंकणके संघर्षसे निकला हुआ शब्द मालूम पड़ता था ॥३१-३४॥ उस मञ्जुल शब्दको सुनकर यह कैसा शब्द सुनाई दे रहा है इस तरह सोचते हुए व्यग्र नेत्रांसे लोग इधर-उधर देखने लगे ॥ ३५ ॥ ३६ . कुछ देर बाद लावान सीताजीको आते देखा। जा अनेक विद्युत्तुल्य एवं सैकड़ो सूर्यकी भाँति प्रकाशमयी थी। जिनके पाँवोंको अंगुलियोंमें मछली-कछुए आदिके आकारवाले हेमामयमान आभूषण परे थे॥ ३७॥ रत्नोंके चमकसे विचित्रविचित्र सुवर्णके आभूषण सुशोभित हो रहे थे। किंकिणीके ऊपर दोनों पैरोंमें नूपुर थे। इसके ऊपर विविध प्रकारका सुन्दर मेखलाये पड़ी थीं। अनेक तरहके नूपुर और नाना प्रकारके उज्ज्वल कंकण हाथोंमें पड़े हुए थे। सीताजीकी कमरपर एक रेशमी वस्त्र था जिसमें मोतियाकी झालर लगी हुई थी और सुवर्णके तारों म फूल-पत्तीकी चित्रकारी बनी हुई थी ॥३८-४१॥ गतिको चंचलतावश उसमेंसे एक मधुर ध्वनि निकल रही थी। उनकी साड़ीमें जगह जगह मयूर, सिंह, धूप,