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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १ ] | मनोहरकाण्डम् | ५७५

सर्गः १ ]मनोहरकाण्डम्५७५

सीतागुहो विना पूजा रामस्यैकस्य नाचरेत् , कृता चेद्विघ्नकर्त्री सा भवदत्र न संशयः ॥ १४८ ॥
नवायतनपूजा सा श्रेष्ठा ज्ञेया शुभप्रदा । या पञ्चायतनी पूजा ज्ञेया सा मध्यमाऽत्र हि ॥ १४९ ॥
त्रिदेवत्या तु या पूजा कनिष्ठा सा निगद्यते । अतिकनिष्ठा पूजा सा द्विदैवत्या स्मृता हि सा ॥ १५० ॥
कोदण्डं वामहस्ते च तूणीरं वामपार्श्वके । निजनामाङ्कितं बाणं दधानं दक्षिणे करे ॥ १५१ ॥
एवं श्रीरामचन्द्रं स्थाप्य ततः पूजां समारभेत् । आत्मनो वामभागे च जलकुम्भं निधाय हि ॥ १५२ ॥
आत्मनो दक्षिणे भागे पूजापात्रं निवेदयेत् । आत्मनः पुरतः पात्रं स्थापयेद्विस्तृतं वरम् ॥ १५३ ॥
प्राङ्मुखः सुखमासीनो धृतपद्मासनः शुचिः मौनी धृताक्षतुलसीमालो निश्चलमानसः ॥ १५४ ॥
बद्धग्रंथिशिखः शुद्धवस्त्रो धृतपवित्रकः । मृद्गङ्गाद्यतीर्थमृत्तिलको मुद्रिकाङ्कितः ॥ १५५ ॥
नमस्त्वादौ गणराजं च निधिवार्गादि कीर्तयेत् ।
भूमिशुद्धिं भूतशुद्धिं न्यासौ कृत्वा यथाक्रमम् । प्रोक्षणीपात्रमेकं तु जलपूर्णं प्रकारयेत् ॥ १५६ ॥
दूर्वागन्धाक्षतपुष्पैरन्यत्पात्रं परिपूरयेत् । प्रोक्षयेत्तेन नीरेण पूजाद्रव्यं महामनाः ॥ १५७ ॥
पाद्यार्घ्याचमनार्थं तु त्रीणिपात्राणि विन्यसेत् । गणराजं पूजयित्वा सम्पूज्य रुरुजं ततः ॥ १५८ ॥
पाञ्चजन्यं पूजयित्वा प्रोक्षयेत्तज्जलैरपि पूजाद्रव्यं पूर्वोक्तं स्वात्मानं च गुरुं तथा ॥ १५९ ॥
धेनुशङ्खचक्रधनुराजमुद्राः प्रदर्शयेत् शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती ॥ १६० ॥
मनोमयी मणिमयी प्रतिमाऽष्टविधा स्मृता । अथ ध्यायेद्रामचन्द्रं ससीतं पुरतः स्थितम् ॥ १६१ ॥
द्विभुजं धृततूणीरं चापबाणधृतायुधम् । दिव्यलङ्कृतसंयुक्तं पीतकौशेयवाससम् ॥ १६२ ॥
सलक्ष्मणं सशत्रुघ्नं भरतेन समन्वितम् । हनुमत्सेवितपदं सिंहासनविराजितम् ॥ १६३ ॥
सितछत्रसमायुक्तं दिव्यचामरवीजितम् । विभीषणनमत्पुक्तं सुग्रीवपरिवेष्टितम् ॥ १६४ ॥

करे ॥ १४६ ॥ १४७ ॥ सीता और लक्ष्मण बिना अकेले रामकी पूजा कभी न करे यदि ऐसा पूजा का जाता है तो वह प्रायः विघ्न करनेवाली ही हुआ करती है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १४८ ॥ नवायतनपूजा सर्वश्रेष्ठ और पञ्चायतन पूजा मध्यम होती है ॥ १४९ ॥ त्रिदेवकी पूजा कनिष्ठ कहा गया है। वह पूजा तो अत्यन्त कनिष्ठ होती है जिसमें केवल दो देवताओंकी पूजा की जाती है ॥ १५० ॥ जिनके बायें हाथमें धनुष और बायें बगल तरकश है, अपने नामसे अङ्कित बाण दाहिने हाथमें है ॥ १५१ ॥ इस तरहके रामचन्द्रकी स्थापना करके पूजा प्रारम्भ करे। पूजा करते समय वामभागमें एक कलश भी अवश्य रख लेना चाहिए ॥ १५२ ॥ अपने दाहिने बगल पूजापात्र रखना चाहिए और आगे भी विस्तृत पात्र रखना उचित है। १५३ ॥ उपासकको चाहिए कि ज्ञानपूर्वक पूर्वकी ओर मुख करके पद्मासनसे बैठे और निश्चल मन करके तुलसीकी माला लिये, शिखामें ग्रन्थि दिये, हाथोमे पवित्री तथा शरीरमें पवित्र वस्त्र धारण किये, द्वारकाकी शुद्ध मृत्तिकाका तिलक लगाकर ॥ १५४ ॥ १५५ ॥ पहले गणेशजीको प्रणाम करे; फिर क्रमशः निधि-वार आदिका उच्चारण करके भूमिशुद्धि, भूतशुद्धि तथा अङ्गन्यास करन्यास करके प्रोक्षणपात्रमे जल भरे। दूर्वा, गन्धाक्षत, पुष्प आदि उसमें डाले और प्रोक्षणीपात्रके जलसे पास रक्खी हुई पूजनसामग्रीका प्रोक्षण करे। पाद्य, अर्घ्य एवं आचमनके लिये सामने तीन पात्र रक्खे। फिर गणेशजी, शङ्ख तथा पाञ्चजन्य शंखका पूजन करके उसके जलसे अपना, पूजन-सामग्री तथा गुरुजीका प्रोक्षण करे ॥ १५६-१५९ ॥ इसके अनन्तर सुरभी, शंख, चक्र, गरुड़ एवं राममुद्राका प्रदर्शन करे। पत्थरकी, काष्ठकी, चूना-ईंटकी रङ्गके बनी, चित्रकारी की हुई, बालूकामयी, मानसी और मणिमयी ये आठ प्रकारकी प्रतिमाएँ होती हैं। ऊपर बतलायी क्रियायें कर लेनेके बाद उपासकको चाहिए कि सीताके साथ बैठे हुए इस प्रकारके रामका ध्यान करे जिनके दो भुजाएँ हैं, जो तूणीर तथा धनुष-बाण आदि विविध प्रकारके शस्त्र धारण किये हैं, उनके शरीरमें दिव्य अलङ्कार पड़े हैं और वे पीला कौशेय वस्त्र धारण किये हैं ॥ १६०-१६२ ॥ लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न उनके साथ हैं, हनुमान्जी उनके चरणकी सेवा कर रहे हैं और रत्न जड़ान सिंहासनपर बैठे हैं ॥१६३॥ ऊपर सफेद छत्र लगा है, दिव्य चामर ढल रहे हैं, विभीषण और सुग्रीव

५८० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


जाम्बवता समायुकमङ्गदेन परिष्टुतम् । अयोध्यावासिनं राममेवं हृदि विचिन्तयेत् ॥१६५॥
सीताराम समागच्छ मदग्रे त्वं स्थिरो भव । गृहाण पूजां महतां कृतमावाहनं तव ॥१६६॥
हिरण्मयं रत्नयुक्तं नानारत्नविचित्रितम् । सिंहासनं सुवस्त्रं च कामनाथे ददामि ते ॥१६७।
चन्दनागुरुसंयुक्तैर्जलैस्तीर्थसमुद्भवैः । पाद्यं गृहाण श्रीराम मया दत्तं प्रमोद मे ॥१६८।
पुष्करादिषु तीर्थेषु गङ्गादिषु सरित्सु च । यत्तोयं तन्मयाऽऽनीतं दत्तमर्घ्यं गृहाण भोः ॥१६९।
सुगन्धवामितं तोयं बहुतीर्थसमुद्भवम् । आचमनार्थमानीतं गृहाण त्वं सुरेश्वर ॥१७०।
हरिद्राकुङ्कुमैर्युक्तं सुगन्धद्रव्यमिश्रितम् । सुगन्धस्नेहसम्मिश्रमुद्वत्तनमथास्तु ते ॥१७१।
कामधेनूद्भवं क्षीरं नन्दिन्या दधि सुन्दरम् । कपिलाया घृतं श्रेष्ठं मधु विन्ध्याद्रिसम्भवम् ॥१७२।
सितोपलसमानाभं सितायुक्तं मनोहरम् । पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं त्वं गृहाण भोः ॥१७३॥
गङ्गा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती । नर्मदा सिन्धुकावेरी सरयू गण्डकी तथा ॥१७४॥
ताम्रपर्णी भीमरथी कृष्णा वेणी महानदी । गोमती सागराः सप्त पयोष्णी मत्रनाशिनी ॥१७५।
पूर्णा तापी तुङ्गभद्रा क्षिप्रा वेगवती तथा । पिनाकी प्रवरा सिन्धुरेशा सार्द्धत्रयो नदाः ।१७६॥
घृतमाला कृतमाला मही निक्षेपिका तथा । पयोष्णी प्रेमगङ्गा च चित्रगङ्गा करानदी ॥१७७।
नीरा चर्मण्वती वृद्धा वज्रा च पुनः पुनः । सिन्धुशीरा च वैकुण्ठाऽलकनन्दा च वारणा ॥१७८।
इत्यादिसर्वतीर्थेषु यत्तोयं वर्तते शुभम् । तन्मयाऽऽनीतमद्यात्र स्नानं कुरु रघूत्तम ॥१७९॥
पुनराचमनं रम्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम् । गृहाण रघुनाथ त्वं दीयते यन्मया तव ॥१८०॥
सुवर्णतन्तुमिश्रितं पीतकौशेयसम्भवम् । वस्त्रयुग्मं प्रदास्यामि गृहाण रघुनायक ॥१८१॥
शुद्धं हेममयं रम्यं नवतन्तुसमुद्भवम् । ब्रह्मग्रन्थिसमायुक्तं यज्ञसूत्रं प्रगृह्यताम् ॥१८२॥


आगे खड़े वन्दना कर रहे हैं ॥ १६४ ॥ जाम्बवान्‌के साथ साथ अङ्गदभी खड़े स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार अयोध्यावासी रामका मनमें ध्यान करे । १६५ ॥ और कहे-हे सीताराम ! आप मेरे सामने आकर बैठिए । मैं आपका पूजन करूंगा। मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप आइए और मेरी पूजा स्वीकार करिए ॥ १६६ ॥ सुवर्णका बना हुआ तथा रत्नखचित होनेसे चित्र-विचित्र मालूम पड़नेवाला और सुन्दर वस्त्रस सहित सिंहासन मैं आपकी बैठनेके लिए देता हूँ ॥ १६७ ॥ चन्दन और पुष्पसे मिले हुए तीर्थोंके जलका पाद्य बनाकर आपको देता हूँ । इसे आप स्वीकार करें और मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ १६८ ॥ पुष्कर आदि तीर्थों तथा गङ्गा आदि नदियों-से लाये जलका अर्घ्य बनाकर मैं आपको देता हूँ, इसे स्वीकार करिए ॥ १६९ ॥ सुगन्धसे वासित एवं कितने ही तीर्थोंसे लाया हुआ जल मैं आपको आचमनके लिए देता हूँ । हे सुरेश्वर ! इसे आप ग्रहण कीजिए । १७० ॥ हल्दी कुमकुम और बहुतसे सुगन्धद्रव्योंसे मिश्रित तथा सुगन्धमय तेल आदिस मिला हुआ जल मैं आपको स्नान करानेके लिये देता हूँ ॥ १७१ । कामधेनुका दूध नन्दिनी गौका दही, कपिला गौका घृत विन्ध्य-पर्वतसे उत्पन्न उत्तम मधु, ॥ १७२ । सफेद पत्थरके समान चमकती हुई चीनीसे मिल्य पंचामृत मैं आपको स्नान करानेके लिए देता हूँ। इसे आप ग्रहण करिए ॥ १७३ ॥ गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, सरयू, गण्डकी, ताम्रपर्णी, भीमरथी, कृष्णा, वेणी, महानदी, गोमती, सातों सागर, मवनाशिनी, पयोष्णी, पूर्णा, तापी, तुङ्गभद्रा, क्षिप्रा, वेगवती, पिनाकी, प्रवरा, सिन्धुरेशा, स'ढे तीन नद, घृतमाला, कृतमाला, मही, निक्षेपिका पयोष्णी प्रेमगङ्गा, चित्रगङ्गा, करानदी, नीरा, चर्मण्वती, वृद्धा, वज्जरा, सिन्धुशीरा, वैकुण्ठा अलकनन्दा, वारणा इत्यादि ॥ १७४-१७८ ॥ नदियोंमें जो पवित्र जल विद्यमान है वह मैं आज यहाँ ले आया हूँ । हे रघूत्तम आप इससे स्नान कीजिए ॥ १७९ ॥ सब तीर्थोंका पवित्र जल मैं आपको पुनराचमनके लिये दे रहा हूँ । इसे आप ग्रहण कीजिए ॥ १८० ॥ सुवर्णके सूतोसे बना तथा चित्र-विचित्र दीखनेवाला पीत कौशेय वस्त्र मैं आपको दे रहा हूँ, इसे स्वीकार करिये । १८१ ॥ शुद्ध, सुवर्णमय,