सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५९

सर्गः १७ ] मनोहरकाण्डम् ७५९

सप्तद्वीपेषु सर्वत्र धर्मशिक्षा मया कृता ।
इति राज्यकाण्डमुत्तरार्धम् ॥ ७ ॥
नारदोक्तं शतश्लोकैश्चरितं मम पावनम् ॥७८॥
पौराणामुपदेशश्च मन्मातृणां पराकृतः । मनःपूजा बहिःपूजा नरस्याश्वत्थसंभवम् ॥७९॥
रामलिंगतोभद्रार्णां नानाभेदा विचित्रिताः । मामनसख्या विस्तारः कथा स्वाराज्यसंभवा ॥८०॥
मम नामलेखनस्योद्यापनं दानविस्तरः । विप्रजीविवृत्तिविस्तारो वेदादीनां श्रुतेः फलम् ॥८१॥
सार्द्धमासद्वयं नाम ते व्रतं विधिविस्तरः । गौरीव्रतस्य विस्तारो दोलके मम पूजनम् ॥८२॥
नवम्यां मूर्तिदानं च मदनोत्सवविस्तरः । काम्यदेवतविभागे रकाद्यवर्णगे गुणः ॥८३॥
मम नाम्नश्च महिमा मन्नामार्थ उदाहृतः । चैत्रव्रतस्य विस्तारो रासभादिसतिः स्मृता ॥८४॥
अद्वैतं दर्शितं लोकान्नारीणां च समर्पणम् । मन्दुद्रावद्यमाहात्म्यं कवचं मे हनूमतः ॥८५॥
सीताया लक्ष्मणादीनां कवचानि पृथक् पृथक् । शीतलाव्रतमाहात्म्यं तस्य चोद्यापनं तथा ॥८६॥
रामनामतौभद्रं च मंत्राश्च कीर्तनाय च । पताकारोपणं नाम व्रतं मारुतिनोपदम् ॥८७॥
पयोपेड़िएमंतत्त्वे साररामायणं त्वयि । हनूमता शरसेतोर्ज्जुनस्यात्र खण्डनम् ॥८८॥
इति मनोहरकाण्डम् ॥ ८ ॥
वाल्मीकिना सोमवंशवृत्तान्तनिवेदनम् । पुत्रयोरभिषेकश्च प्रस्थानं हस्तिनापुरम् ॥८९॥
ततो महासंग्रामः पुत्रयोश्च जयो मम । ब्रह्मणा प्रार्थना मेऽत्र वाल्मीकेश्च कुशस्य च ॥९०॥
रिपुस्त्रीणां प्रार्थनया सीता पुत्र न्यवारयत् । ततो दिवेश्च वाक्येन वैकुण्ठ गन्तुमुद्यमः ॥९१॥
सोमवंशोद्भवापाय दत्तं वै हस्तिनापुरम् । आजमीढाऽभिषेकश्च भवतश्च विसर्जनम् ॥९२॥
कुशस्य गमनं स्वकीयपुरि राज्य क्षणाम मः, भपेरत्सुः कुमुदत्या राज्यगमनमुद्भवः ॥९३॥

की सन्धि, रामायणश्रवणका फल, मुसषक लिए जीवनदान, यमराअक साथ संग्राम, सप्तद्वीपमे सर्वत्र मेरी धर्मशिक्षाका प्रसार किया जाना, ॥ ७६॥ ७८ में इतना कथाये राज्यकाण्डके उत्तरार्धम वर्णित है ॥ ७ ॥ नारद द्वारा सौ श्लोकोंम मेर पावन चरितका वर्णन, पुरवासियोक लिए उपदेश दूसरों द्वारा अपनी माताओंके लिए उपदेश, मनःपूजा, बहिःपूजा, रामलिङ्गताभद्रक अनेक भेद, मामनसख्याका विस्तार, स्वाराज्यकी उत्पत्ति-की कथा, मेरे नामलेखनका उद्यापन, दाना विस्तार विज्जीजीविका विस्तार वेदके श्रवणका फल ॥७६-८१॥ ढाई महीनेके लिए व्रत, तिथिका विस्तार, गौरव्रतका विस्तार, दोलके मे मेरी पूजा, नवमीका मूर्तिदानकी विधि, मदनोत्सवका विस्तार, काम्य देवताओकर विस्तार, रकारादि अक्षरोंके गुणवर्णन मेर नामोकी महिमा, मेरे नामके लिए उदाहृत चत्रव्रतका विस्तार, राक्षसादि गतिगोका वर्णन, लागोंको अद्वैत स्वरूपका दर्शन, स्त्रियोंके लिए समर्पण, मेरो मुद्रा, मेरे नामस अद्भुत बन्धकी महिमा, हनुमत्कवचका वर्णन ॥८२-८५॥ राम, सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नकवच, शीतला व्रतका माहात्म्य, शीतला व्रतका उद्यापन, रामनामतौभद्र मंत्रका कार्तन, पताकारोहण और हनुमान्‌जीको प्रसन्न करनेवाले व्रतका वर्णन ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ इस तरह मैने तुम्हें साररामायण सुना दिया । इसो रामायणके अन्तर्गत हनुमान्‌क द्वारा अर्जुनके शरसेतुके खण्डनकी की कथा वर्णित है॥ ८८ ॥ इतनी कथायें मनाहरकाण्डमें बतलायी गयी है॥ ८॥ वाल्मीकिवर्णित सोमवंशको राजाओंका वृत्तान्त, दोनों पुत्रांका अभिषेक, हस्तिनापुरक प्रस्थानका वर्णन, दोनों पुत्रोंके साथ मेरा महासंग्राम, मेरी विजय, ब्रह्माजीके द्वारा मेरी, वाल्मीकिकी तथा लवकुशकी स्तुति, रिपु-स्त्रियोंकी प्रार्थनासे सीताका अपन पुत्रोंको युद्ध करनेक रोकना, ब्रह्माके वाक्यसे मेरो वैकुण्ठगमनकी तैयारी, सोमवंशियोंके लिए हस्तिनापुरका राज्यदान, आजमीढ़का राज्याभिषेक, सब लागोंकी विदाई, ८९-६२ ॥ लवकुशका अपनी राजधानीमे पहुँचना और वहीं शासन करना, कुमुद्वतासे सन्तानोत्पत्ति, लक्ष्मण एवं सुग्रीव आदि वानरोंतथा

७९०आनन्दरामायणे[ सर्ग १७

वरदानं लक्ष्मणाय वानरेभ्यस्तथा मया। अयोध्यासंस्थितानां च ततो देहविसर्जनम् ॥९४॥
वानरास्ते सुरा जाताः सीता जाता रमा मम। लक्ष्मणः पन्नगो जातः शंखोऽभूद्भरतस्तदा ॥९५॥
सुदर्शनं च शत्रुघ्नो विष्णुरूपधरस्त्वहम्। तदोर्मिलादिकानां च प्रयाणं सर्वयोषिताम् ॥९६॥
नीराजनं सुरास्त्रीभिस्तेषां सौतानिकं पदम्। शम्भुना संस्तुतश्चाहं गरुडारोहणं मम ॥९७॥
पुष्पवृष्टिर्मयि तदा वैकुण्ठे गमनं मम। वैकुण्ठे रमया स्थित्वा देवानां च विसर्जनम् ॥९८॥
सूर्यवंशानुक्रमश्चानन्दरामायणस्य च। कांडसंख्या सर्गसंख्या ग्रंथसंख्या फलश्रुतिः ॥९९॥
रामायणश्रवणस्योद्यापनं च महत्तमम्। ग्रथदानसमुत्थानं प्रकाराः पञ्च वै ततः ॥१००॥
अनुष्ठानोद्यापनं च शकुनस्य च विस्तरः। संवादस्य पूर्णतापि युवयोर्गुरुशिष्ययोः ॥१०१॥
आशंकाछेदनं देव्याः कलाऽस्य पठनस्य च। रामायणस्य महिमा चैकश्लोकेन वै त्विदम् ॥१०२॥
मम ध्यानं शंभुदेव्याः संवादस्यापि पूर्णता।
इति पूर्णकाण्डम् ॥ ९ ॥

एवं मया रामदास साररामायणं तव ॥ १०३ ॥
स्मरणार्थं चरित्राणां संक्षेपेण निवेदितम्। इदं गोप्यं त्वया कार्यं महत्पुण्यप्रदं स्मृतम् ॥१०४॥
शतकोटिमितग्रन्थान्मया सारं मयोदितम्। कः क्षमः सकलं वक्तुं विना वाल्मीकिना भुवि ॥१०५॥
स एव धन्यो वाल्मीकिर्येन मच्चरितं कृतम्। साररामायणमिदं ये पठन्त्यत्र मानवाः ॥१०६॥
तेभ्यो भुक्तिश्च मुक्तिश्च द्विज दास्याम्यहं मुदा। कृत्स्नं रामायणं श्रोतुं पठितुं वा नरोत्तमम् ॥१०७॥
अवकाशो यदा नास्ति तदेतत्संपठेन्नरः। अन्यच्चान्यन्मया कर्म कृतं पूर्वं शुभाशुभम् ॥१०८॥
तन्मच्छन्दान्मत्स्मृतेर्निर्गमिष्यति निश्चयम्। स्वदृष्टिगोचरं कृत्स्नं चरितं मे भविष्यति ॥१०९॥
विष्णुदासाय शिष्याय वद त्वमधुना सुखम्। ॥११०॥


अयोध्यावासियोंके लिए वरदान अपनी देहका त्याग, वानरोंका अपना शरीर छोड़कर फिर देवता बनना, सीताका लक्ष्मी बन जाना, लक्ष्मणका शेषरूप हो जाना, भरतका पाञ्चजन्य शङ्ख होना, शत्रुघ्नका सुदर्शन चक्र हो जाना और मेरा विष्णुरूप धारण करना, उर्मिला आदि स्त्रियोंका प्रयाण, देवाङ्गनाओं द्वारा सब लोगोंकी आरती, शिवजी द्वारा मेरी स्तुति मेरा गरुड़ारोहण मेरे ऊपर पुष्पवृष्टि, मेरा वैकुण्ठगमन, वैकुण्ठमें लक्ष्मीके साथ विराजमान होकर देवताओंका विसर्जन, ॥ ९३-९८ ॥ सूर्यवंशकी अनुक्रमणिका, आनन्दरामायणकी काण्डसंख्या, सर्गसंख्या, रामायणश्रवणका महाफल, ग्रन्थदानविधि, अनुष्ठानके पांच प्रकार, ॥ ९९ ॥ १०० ॥ अनुष्ठान, उद्यापन, शकुनका विस्तार, तुम दोनों गुरु शिष्यके संवादकी पूर्णता, देवीका आशङ्काछेदन, इसके पाठको कलाएं, रामायणके एक-एक श्लोकके पाठकी महिमा, मेरा ध्यान और शिव-पार्वतीके संवादकी समाप्ति, ये इतनी कथाएं पूर्णकाण्डमें कही गयी हैं ॥ ९ ॥ हे रामदास इस तरह मैंने तुम्हें संक्षेपमे साररामायण बतलायी। इससे तुमको मेरे चरित्रोंका स्मरण करनेमें बड़ा सहायता मिलेगी। यह बड़ी पुण्यदायक रामायण है। इसलिए इसे सदा गुप्त रखना। सौ करोड़ संख्यावाली रामायणका सार अंश लेकर ही इसे मैने तुमको बताया है वाल्मीकिके सिवाय भला और कौन है, जो पूरे तौरसे रामायणका वर्णन कर सके ॥ १०१-१०५ ॥ वे वाल्मीकिजी धन्य हैं, जिन्होंने अच्छी तरह मेरे चरित्रोंका वर्णन किया है। जो लोग इस साररामायणका पाठ करते हैं । उन्हें मैं भुक्ति और मुक्ति सब कुछ देता हूँ। यदि किसी सज्जनको पूरी रामायण पढ़ने या सुननेका अवकाश न मिले तो उन्हें इस साररामायणका ही पाठ कर लेना चाहिए। इनके अतिरिक्त भी मैंने जो शुभ अशुभ कर्म किये हैं, वे मेरी इच्छासे तुम्हें मेरे चरित्र वर्णन करते समय अपने-आप स्मरण होते जाएंगे। मेरे सारे चरित्र तुम्हारे दृष्टिगोचर होंगे । १०६-१०९ ॥ अब तुम इसे अपने शिष्य विष्णुदासको आनन्दके साथ सुनाओ ॥ ११० ॥