श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १२] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६१
सर्गः १२] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४६१
अथ रामो ददौ ताभ्यो वरान्स्वास्तोषयन् प्रभुः । पूर्वं भृगुश्रवं भो नार्यः पुरा व्यासाग्रतो मया ॥७१॥
बहुस्त्रीहेतुना रूपमूर्त्तयः षोडशांगिनाः ।
तासां दानेन संतुष्टास्ते विप्रा मां सदाऽब्रुवन् ॥७२॥
फलं सहस्रगुणितं तवास्तु रघुनन्दन । अनन्तरूनतश्चाहं द्वापरे कृष्णरूपधृक् ॥७३॥
करोमि पाणिग्रहण युष्माकं द्वारकापुरि ।
यूयं नानान्नृपाणां च भविष्यथ् बालिकास्तदा ॥७४॥
भौमासुरस्तदाऽयं वै दुन्दुभिस्तु भविष्यति । भौमासुरश्च युष्माकं पूर्ववन्म हरिष्यति ।७५॥
तदा सर्वा मोचयिष्ये हत्वा तं जगतीसुतम् ।
ततो मया सुखेनैव क्रीडध्वं हि यथारुचि ॥७६॥
एवं ता रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा प्रमुदिताननाः ।
आनन्दोत्फुल्लनयनाः सुखमापुर्वरांगनाः ॥७७॥
एतस्मिन्नंतरे रामं पश्यन्तो लक्ष्मणादयः । शनैर्मात्राप्युस्तत्र पदांकितपथा प्रभुम् ।७८॥
षोडशस्त्रीसहस्राणां मध्ये दृष्ट्वा रघूत्तमम् । परं विस्मयमापुस्ते प्रणेमुर्जगदीश्वरम् ॥७९॥
श्रुत्वा राममुखात्सर्वं यथावृत्तं सांत्वनंगम् । सर्वं मन्तुष्टमनसस्तस्थुः धाराद्यग्रतः ।८०॥
ततो रामाज्ञया दूताः शतशोऽथ सहस्रशः ।
वाहनान्यामयामासुः सेशास्तत्स्थलन्मुदा ॥८१॥
तेषु ताः स्वाः सुमध्योप्य वाहनेषु रघूत्तमः ।
शनैः सेनानिवासे स ययौ सीतांतिके प्रभुः ॥८२॥
ततस्ता जानकीं नेमुः सीतां वृत्तं रघूत्तमः । यथा वृत्तं तथा सर्वं कथयामास कौतुकात् ॥८३॥
ततस्ताः पूजयामास वस्त्रराभरणैरसौ । ततो रामः स कासारं सेनावासस्थलांतिके ॥८४।
के श्लोकोंका पाठ किया करें ॥७० ॥ १२ । इसके अनन्तर उनको वरदान देते हुए रामचन्द्रजी कहने लगे—हे स्त्रियों ! बहुत दिनोंकी बात है कि मैंने एक समय बहुत-सी स्त्रियोंको पानका इच्छासे व्यासजीके सम्मुख सुवर्णको सोलह स्त्रियां बनवाकर ब्राह्मणोंको दान दिया था । इससे प्रसन्न होकर उन विप्रोंने हमसे कहा—हे रघुनन्दन ! तुम्हें इस दानका सहस्रगुणा फल प्राप्त होगा अर्थात् सोलहके बदले सोलह हजार स्त्रियां प्राप्त होंगी । अतएव उनके आशीर्वादनानुसार द्वापरमें कृष्णका रूप धारण करके ॥ ७१-७३ ॥ मैं तुम सबोंका द्वारकापुरीम पाणिग्रहण करूँगा उस जन्ममें तुम अनेक राजाओंकी कन्याएं होओगी । दुन्दुभी राक्षस जिसको कि बालिने मार डाला है, उस जन्ममें भौमासुर होगा और इस जन्मके समान ही तुम्हारा हरण करेगा ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ उस समय में भौमासुरको मारकर तुम सबोंको छुड़ाऊँगा और तबसे तुम सब आनन्द हमारे साथ बिहार करोगी ॥ ७६ । इस प्रकार रामके वाक्य सुनकर उनका चेहरा खिल उठा और वे अत्यन्त आनन्दित हुईं ॥ ७७ ॥ इसी समय रामको खोजते हुए उनके पैरोंके निशान देखत-देखते लक्ष्मणादि साथी भी वहीं आ पहुंचे । जब उन्होंने सोलह हजार स्त्रियोंके बीचमें रामको देखा तो बड़े विस्मित हुए और जगदीश्वर रामको उन लोगोंने प्रणाम किया । ७८ ॥ ७९ ॥ जब रामने उन स्त्रियोंका वास्तविक वृत्तान्त बतलाया तो वे बहुत प्रसन्न हुए और रामके आगे बैठ गये ॥ ८० ॥ इसके अनन्तर रामकी आज्ञासे हजारों वाहन आये । जिनपर उन स्त्रियोंको बिठाकर रामचन्द्रजी शिविरकी ओर चले, जहाँ कि सीताजी बैठी थीं ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ वहाँ पहुँचकर उन सब स्त्रियोंने सीताको प्रणाम किया और रामने उनका जो सच्चा-सच्चा हाल था, सो कह सुनाया । ८३ । इसके बाद सीताने अनेक वस्त्रों वाभरणादिसे उनका सत्कार किया । थोड़ा देर बाद रामने अपने शिविरके पास ही एक उत्तम सरोवर देखा, जो कमलों
४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
ददर्श सुमहच्छ्रेष्ठं स्पटंयततपां पतिम्। घनपादपमध्यस्थं सुतीर्थसलिलं शुभम् ॥८५॥
विशालं विकचाम्भोजमधुमत्तध्रुवद्रुतम् पद्मनीरत्नसंयुक्तं छन्नं मरकतैरिव ॥८६॥
स्वच्छन्दपुच्छलन्मत्स्यं स्वच्छं मानुषमना यथा। चलज्जलचराद्भिन्नवीचिराजिविराजितम् ॥८७॥
अन्तर्ग्राहगणक्रूरं खलानाभिव मानमम् कचिच्छेवालदुद्गम्यं कृपणस्येव मर्ददम् ॥८८॥
नानाविहङ्गसङ्घार्ति शमयन्तं दिवाऽनिशम्। उदारमिव सर्वस्वैरापन्नार्तिहरं महत् ॥८९॥
तपयंतं हिमाम्भोभिः क्षापदन्स्यनितनिभ्रं । दृष्ट्वं सवमनाथं हिमांशुमिव चाह्निकम् ॥९०।
तं दृष्ट्वाऽभूत्सुसन्तुष्टः सीतया रघुनन्दनः ।
तत्र स्नात्वा सुखं रामः कृतपाध्याह्निकक्रियः ॥९१॥
भुक्त्वा बन्धुजनैः सर्वैराखेटाणसंवृतः। उवास सरसस्तीरे रम्या मकतपनकथाः ॥९२।
सतः शरासनं बाणं कृत्वा रात्रीं स्थितान्नरीं ।
व्याधाः संधानपास्थाय रुरुधुः ककुमो पयः ।९३॥
एवं स्थितेषु वीरेषु वने विस्तार्य वागुराः। निद्रार्थ निर्गतं यूथं शूकराणां सरस्तटे ॥९४॥
चरित्वा सागसीकंदान् पपात व्याधमण्डले गत्वा विद्धास्तदाऽक्रीडा व्याधैश्च बहवो हताः ॥९५॥
क्षणेनैव वराहास्ते विद्धाः पेतुर्महीतले।
तान्हत्वा तुमुलं नादं चक्रुर्वाधाः मुदान्विताः । ९६।
धावन्तोऽपि मुदा तत्र मिलिता यत्र भूपतिः। तान्प्रदाय महैर्भूपः सेनानाथं ययौ पुनः ॥९७॥
एवं सप्तादिनान्येव स्थित्वा रामो वने सुखम्।
भुक्त्वा नानाविधान् भोगान् सीतया सपुरा ययौ ।९८॥
गहराईसे समुद्रको मात कर रहा था, उसके आसपास घना वृक्षावली लगी हुई थी, स्थान-स्थानपर घाट बने हुए थे और पवित्र जल भरा था ॥८४॥ ८५॥ उसकी लम्बाई चौड़ाई का पार नहीं था खिले हुए कमलके फूलोंपर भौंर गुञ्जार रहे थे, फैले हुए पुरइनके बड़े बड़े पत्ते मरकतके समान सुन्दर लग रहे थे ॥८६॥ सज्जन प्राणीके मनकी तरह स्वच्छन्दतापूर्वक मछलियाँ खेल रही थीं। जलचर प्राणीगणके इधर-उधर चलनेके कारण बार-बार उसमें लहर उठ रही थी ॥८७॥ खल मनुष्यके हृदयके समान उसमें कितने ही घड़ियाल भरे थे। कहीं-कहीं कंजूस प्राणीके धनकी तरह सिवार भरा था, इससे उसमें प्रविष्ट होना दूभर लगता था ॥८८॥ दिनरात कितने ही पक्षी आकर अपनी थकावट दूर कर रहे थे। इससे वह सरोवर किसी ऐसे सज्जनके समान मालूम पड़ता था जो अपना सर्वस्व लुट कर गरीब तथा विपद्ग्रस्त जनोंका रक्षण तत्पर हो ॥८९॥ अपने ठंढे जलसे वह उसी तरह वनके जीवोंकी प्यास बुझा रहा था, जैसे चन्द्रमा दिन भरके परिश्रमसे दुःखी जनोंका समस्त पीड़ा रातमें हरण लिया करता है ॥९०॥ उस सरोवरको देखकर सीता तथा रामचन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। उसमें स्नान किया, मध्याह्न कालका नित्यनियम किया और भोजन किया। फिर सारे शिकारियोंके साथ लेकर उसी तड़ागके समीप डेरा डाल दिया और अनेक तरहकी कहानियाँ कहते-कहते समय काटने लगे ॥९१॥९२॥ जब रात्रिका समय हुआ तो बहेलियेगण अनेक सामान लेकर चारों ओरसे उस तड़ागको घेर लिया और रामचन्द्रजी अपना धनुष बाण ठीक करके एक वृक्षके ऊपर जा बैठे ॥९३॥ जब कि व्याध जाल बिछाकर तत्परताके साथ सरोवरके चारों तरफ बैठ गये और ठीक मध्या रातका समय हुआ, तब वनसे शूकरों-का एक यूथ आ पहुँचा ॥९४॥ तालाबमें उत्पन्न कन्द खाकर वह शूकरयूथ बहेलियोंके ऊपर टूट पड़ा। उस समय बहुतसे शूकरोंको रामचन्द्रजीने मार डाला और बहुतोंको बहेलियोंने समाप्त कर दिया ॥९५॥ क्षणभरमें वे सारे शूकर मार डाले गये। उनको मारनेके अनन्तर व्याधोंने प्रसन्नताका कोलाहल मचाया ॥९६॥ सब बहेलिये मारे शूकरोंको दौड़ते हुए उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रामचन्द्रजी बैठे थे। तब राम उन सबोंको तथा