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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १२ ] उत्तरकाण्डम् १४१

सर्गः १२ ] उत्तरकाण्डम् १४१

गद्यैः गीतैः वचनातीतं श्रीरामचन्द्रं मनुतं नमामि ॥१२३॥
श्रीमच्चन्द्रस्य दशाष्टकं मया प्रयोक्तं देवि मनोहरं ये ।
पठन्ति शृण्वन्ति गृणन्ति भक्त्या ते सर्वकामान्प्रलभन्ति नित्यम् ॥१२४॥
इति स्तुत्वा रामचन्द्रं समाधौ परिनिष्ठितोऽहम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र राजा दशरथो महान् ॥१२५॥
दृष्ट्वा रामं समांत च विमानस्थोऽर्कसन्निभः । स्तुत्वा रामं परात्मानं राज्यस्थं बन्धुवेष्टितम् ॥१२६॥
उवाच रामं संतुष्टः सुगभीराक्षराजितः ।
दशरथ उवाच
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं धन्यौ तौ पितरौ मम ॥१२७॥
धन्यो देशः कुलं धन्यं यस्त्वां राज्याभिषेचितम्। पश्याम्पद्य महाबाहो धन्या सा जननी तव ॥१२८॥
या कौसल्या समुत्साहं नेत्राभ्यां तेऽद्य पश्यति । इत्युक्तवन्तं राजानं ननाम स रघूत्तमः ॥१२९॥
कौसल्याद्या राजदाराः सर्वे ते पौरवासिनः । लक्ष्मणो भरतश्चैव शत्रुघ्नस्तेऽथ मन्त्रिणः ॥१३०॥
नमस्कारानुरूपं चक्रुर्विमानस्थं मुदान्विताः । तान् गजाऽपि पृथक् पृष्ट्वा सर्वैर्देवगणैर्युतः ॥१३१॥
पूजितो रामचन्द्रेण मया सह न्यवर्त्तत । ययुः स्वं स्वं पदं सर्वे मया राज्ञा सुरास्तदा ॥१३२॥
रामेऽभिषिक्ते राजेन्द्र सर्वलोकसुखावहे। वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तो महीरुहाः ॥१३३॥
गन्धीनानि पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे । मद्दन्न शतमध्यानां धेनूनां रघुनन्दनः ॥१३४॥
ददौ शत वृषाणां च द्विजेभ्यो वसु कोटिशः । सूर्यकान्तिसमप्रख्यां सर्वरत्नमयीं स्रजम् ॥१३५॥
सुग्रीवाय ददौ प्रीत्या राघवो हर्षसंयुतः । अङ्गतं ददौ श्रेष्ठं राक्षसेन्द्राय राघवः ॥१३६॥
अङ्गदाय ददौ दिव्ये राघवो बाहुभूषणे । चन्द्रकोटिप्रतीकाशं मणिरत्नविभूषितम् ॥१३७॥
मातायै प्रददौ हारं प्राप्या रघुकुलोत्तमः । सा तं हारं ददौ वायुपुत्राय सा मनस्विनी ॥१३८॥

विभ्रमभाववाले सामवेद जिनका गुणगान करता है, मनमात्रके विषय, प्रेमसे गान करन योग्य तथा वचनोंसे ग्रहण करन लायक श्रीरामचन्द्रका मैं सदास नमस्कार करता हूँ ॥१२३॥ हे देवि ! तुम्हारे प्रति कहे हुए श्रीरामके इस सुन्दर अष्टकको जो मनुष्य भक्तिसे पढ़ेगा अथवा सुने-सुनायेगा, वह अपनी अभिलषित कामनाओंको नित्य प्राप्त करेगा । १२४ । रामचन्द्रकी इतनी स्तुति करके ज्यों ही मैं उस समाधि बैठा, त्यों ही सूर्यके समान तेजस्वी राजा दशरथ विमानपर सवार होकर सुवत्सयुगके साथ वहाँ आकर सबीक सहित बन्धुओंसे वेष्टित तथा राजसिंहासनपर स्थित मुझस्वरूप राम परमात्माको देखकर स्तुति करन लगे ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ देवनाओंके समूहसे परिवेष्टित राजा दशरथ प्रसन्न होकर बोले। उन्होंने कहा-मैं धन्य हूँ, मैं कृतकृत्य हूँ मेरे माता-पिता धन्य हैं । १२७ ॥ मेरा देश तथा कुल भी धन्य है कि जो मैं आज तुम्हें राजासनपर अभिषिक्तित देख रहा हूँ । हे महाबाहो ! तुम्हारी माता कौसल्या भी धन्य हैं, जो तुम्हें उत्साहपूर्वक अपने नेत्रांसे देख रही हैं। तदनन्तर रामने उन राजा दशरथको प्रणाम किया । १२८ । १२९ ॥ तब कौमल्या आदि राजाकी स्त्रियांने पुरवासियोने, भरत शत्रुघ्नने तथा मन्त्रियोने प्रमुदित होकर विमानमें स्थित राजा दशरथको प्रणाम किया । राजाने भी एक-एक करके उन सबसे कुशल पूछा। फिर देवताओ तथा मुझे साथ ले और रामचन्द्रसे पूजित होकर उन्होंने वहाँसे प्रस्थान कर दिया। भर तथा राजाके सहित के सब देवता अपने अपने धाम सिधारे । १३०-१३२ ॥ सब लोगोंको सुख देनेवाले राजाओंमें श्रेष्ठ राजा रामका अभिषेक हो जानेपर पृथ्वा धन-धान्यपूर्ण हो गयी और नहीं फलनेवाले भी वृक्ष फलने लगे ॥ १३३ ॥ सुगन्धरहित पुष्प भी सुगन्धित होकर सुगन्धित हान लगे। रघुनन्दन रामने सैकड़ों बैल, हजारों पांडे तथा करोड़ों रत्न ब्राह्मणाको दान दिये । उन रामने प्रसन्न होकर सूर्यके समान चमकनेवाली तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे निर्मित एक माला प्रीतिपूर्वक सुग्रीवको दी और एक सिरपेंच राक्षसेन्द्र विभीषणको दिया । १३४-१३६ ॥ उन्होंने अंगदको दिव्य बाजूबन्द दिये । रघुकुलमणि रामने सीताको करोड़ों चन्द्रमाके समान चमकने वाले मणियों तथा

१४२आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

नेन हारेण शुशुभे मारुतिर्गौरवेण च । तदा दृष्ट्वा हनूमन्तं रामो वचनमब्रवीत् ॥ १३९ ॥
मारुते त्वां प्रसन्नोऽस्मि वरं वृणु कांक्षितम् । हनुमानपि तं प्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः ॥ १४० ॥
त्वन्नाम स्मरतो राम मनस्तृप्यति नो मम । अतस्त्वन्नाम सततं स्मरिष्यामि भूतले ॥ १४१ ॥
यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम् । मम तिष्ठतु राजेंद्र वरोऽयं मेऽभिकांक्षितः ॥ १४२ ॥
यत्र यत्र कथा लोके प्रचरिष्यति ते शुभा । तत्र तत्र गतिर्मेऽस्तु श्रवणार्थं सदैव हि ॥ १४३ ॥
देवालयान्नदीतीरात्तीर्थाद्वापि जलाशयात् । विनाऽन्यत्र स्थले नेस्तु कथा षड्घटिकोर्ध्वतः ॥ १४४ ॥
रामस्तथेति तं प्राह मुक्तस्तिष्ठ यथासुखम् । कल्पान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे नात्र संशयः ॥ १४५ ॥
तमाह जानकी प्रीता यत्र कुत्रापि मारुते । स्थितं त्वामनुयास्यन्ति भोगाः सर्व ममाज्ञया ॥ १४६ ॥
ग्रामागमपनेषु व्रजखेटकपादसु । वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च ॥ १४७ ॥
नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयपुरेषु च । वाटिकोपवनाश्वत्थवटवृंदावनादिषु ॥ १४८ ॥
त्वन्मूर्तिं पूजयिष्यन्ति मानवा विघ्नशांतये । भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यंति स्मरणात्तव ॥ १४९ ॥
ये चान्ये वानराश्चाश्च ह्ययोध्यां समुपागताः । अमूल्याभरणैर्वस्त्रैः पूजिता राघवेण ते ॥ १५० ॥
सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे वानराः सविभीषणाः ।
मकरध्वजसंपातिगुहकाः पृथ्विवादयः । यथार्हं पूजितास्तेन रामेण गमनादिभिः ॥ १५१ ॥
ततः सर्वैर्भोजनार्थं राघवः संस्थितोऽभवत् । रामेण प्राणाहुतयो गृहीताश्चेति मरुत्सुतः ॥ १५२ ॥
निर्गत्योड्डीय वेगेन रामाग्रे भोजनस्य च । त्रिपदायां स्थितं पात्रं हेमं पक्वान्नपूरितम् ॥ १५३ ॥
निनाय वामहस्तेन धृत्वा च विहसन्मुदा । स्वयं भुक्त्वा रामशेषं प्राक्षिपद्वानरानपि ॥ १५४ ॥

रत्नोंसे विभूषित हार सप्रेम समर्पण किया। उससमय सीताजीने श्री रामका दिया हुआ वह हार वायुपुत्र हनुमानको दे दिया ॥ १३७ ॥ १३८ ॥ उस हारके गौरवस हनुमान् बड़े ही प्रभासित होने लगे। यह देखकर रामने हनुमान्से कहा— ॥ १३९ ॥ हे मारुते ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो। तब प्रसन्न हनुमान्ने रामको नमस्कार करके कहा— ॥ १४० ॥ हे प्रभो ! आपके नामस्मरणसे मेरा मन अब भी तृप्त नहीं हुआ है। अतएव जबतक आपका नाम भूतलमे विद्यमान रहे तबतक मैं आपके नामका स्मरण करता हुआ इस लोकमें जीवित रहूँ हे राजेन्द्र ! यहो मेरा अभिलषित वर आप मुझे दे दें । १४१ ॥ १४२ ॥ लोकमे जहाँ कहीं भी आपकी पवित्र कथा होती हो, वहाँ वह कथा सुननेके लिये जानेमे मेरी अप्रतिहत गति हो ॥ १४३ ॥ देवालय, नदीतीर, तीर्थस्थान तथा बावली आदि जलाशयोंको छोड़कर अन्य स्थानोंम छः घडीके बाद नित्य आपकी कथा हुआ करे । १४४ । रामने कहा अच्छा, तुम मुक्त होकर सुखसे भूमण्डलपर निवास करो कल्पान्तके समय तुम मेरी सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होओगे, इसमें सन्देह नही है ॥ १४५ ॥ इसके पश्चात् जानकीजी प्रसन्न होकर बोली हे मारुत ! तुम जहाँ कही रहोगे, वहीपर मेरे आशीर्वादसे तुमको सब भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाया करेंगे ॥ १४६ ॥ ग्राम बाग, नगर, गोशाला, रास्ता, छोटा गाँव, घर, वन, जिला पर्वत, सर्व देवालय, नदी, तीर्थक्षेत्र, जलाशय, पुर, वाटिका, उपवन, पीपल, वट तथा वृन्दावन आदि स्थानोमे मनुष्य अपने विघ्नोंकी शान्ति करनेके लिये तुम्हारी मूर्तिकी पूजा करेंगे। तुम्हारे नाम स्मरण करनेसे ही भूत-प्रेत तथा पिशाच आदि दूर भाग जायेंगे ॥ १४७-१४९ । इसके बाद रामने अयोध्यामे जो अन्य वानर आये थे, उन सबका भी बहुमूल्य भूषण तथा वस्त्रोंसे सत्कार किया । १५० ॥ श्रीरामने वस्त्रादिसे सुग्रीव आदि वानरो विभीषण, मकरध्वज, संपाती तथा निषादराज आदि राजाओका भी यथायोग्य पूजा की ॥ १५१ ॥ उसके पश्चात् सबको साथ लेकर रामचन्द्रजी भोजन करने बैठे। रामके पाँच ग्रास ग्रहण करके तृप्त हो जानेके साथ ही हनुमान् झट उठकर रामके पास आ पहुँचे और उनके सामने पाडपर रक्खा हुआ पक्वान्नोंसे परिपूर्ण सुवर्णका थाल बाएँ हाथसे उठाकर आकाशमें चले गये और रामके उस भोजनशेषका स्वयं आनन्दसे

सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४३

तदा विभीषणाद्याश्च स्वकीयपात्राणि वेगतः । विसृज्य मर्कटे मूर्ध्नि न्युप्ता न्यथा सम्यक्कृतं त्विति ॥ १५५॥
तन्निशाम्यं रामशोच्छिष्टं बुभुजुः सप्रमान्विताः । महान् कोलाहलश्चासीद्रामोच्छिष्टार्थमादरात् ॥ १५६॥
सीतारामौ सन्निरीक्ष्य मुदा जहसतुस्तदा । एवं नानाकौतुकानि कुर्वन्तौ राघवांतिके । १५७॥
सुग्रीवाद्याः सुखं तस्थुस्तोपयन्तः कियदिनेम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र पुष्पकं च समाययौ पुनः ॥ १५८॥
प्राह देव कुवेरेण प्रेषितं त्वामह पुनः । मामाह यत्कुवेरस्तच्छृणुष्व त्वं रघूत्तम ॥ १५९॥
जितस्त्वं रावणेनादौ पश्चाद्रामेण निर्जितः । अतस्त्वं राघव नित्यं वह यावद्भवेद्भुवि ॥ १६०॥
यदा गच्छेद्रघुश्रेष्ठो वैकुण्ठं याहि मां तदा । तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह सुग्रीवादीन्स्वथास्थले ॥ १६१॥
स्थाप्य श्रीरामयोध्यायां राजद्वारबहिर्विम तथेति रामवचनाद्वानराद्यान्यथास्थले । १६२॥
स्थाप्य श्रीरामयोध्यायां राजद्वारबहिः स्थितम् । चकार राज्य धर्मेण लङ्कायां म विभीषणः ॥ १६३॥
शशास राज्यं पाताले धर्मेण मकरध्वजः । चकार तार्क्ष्यः मणिनियोगराजस्यदे निने । १६४॥
शशास राज्यं कपिभिः किष्किन्धायां कपीश्वरः । शृङ्गवेरपुरे राज्यं गुहश्चाकरोन्मुदा १६५॥
नत्वा रामं वायुपुत्रो ययौ तप्तुं हिमालयम् । सर्वे विभीषणाद्याश्च पंचमे सप्तमेऽहनि । १६६ ।
दर्शनार्थं राघवस्य साकेतं प्रययुः सदा । पञ्च सप्त दिनान्यत्र स्थित्वा भोगान्धवांतिकेम् १६७॥
यातायातं सदा चक्रुः स्वस्वराज्याद्रघूत्तमम् । रामोऽपि राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सलः । १६८॥
अनिच्छतं हि सौमित्रि यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । लक्ष्मणः परया भक्त्या रामसेवापरोऽभवत् । १६९॥
विश्वामित्रोऽध्वरे पूर्व रणयागस्य पूर्णता ।
न कृता या राघवेण सा कृता स्वपदे तदा । रणयागः सविस्ताराद्वर्ण्यते शृणु पार्वति ॥ १७०॥


स्ताने तथा नीचे वानरोंके आगे फेंकने लगे ॥ १५२-१५४ ॥ यह देखकर विभीषण आदि भक्त भी शीघ्र अपने-अपने थालोंको छोड़कर हनुमान्‌की प्रशंसा करके कहने लगे कि तुमने बहुत उत्तम काम किया ॥ १५५ ॥ यह कहकर वे स्वयं भी बड़े आदरसे मारुतिके केश हुआ रामका उच्छिष्ट प्रसाद पाने लगे । उस समय रामकी जूठनके लिये बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ १५६ ॥ राम और सीताने यह देखा तो प्रसन्न होकर हँसने लगे इस प्रकार विविध क्रीड़ायें करके सीता और रामको प्रसन्न करते हुए सुग्रीव आदि मित्र कुछ दिन वहाँ रहे । इतनेमें पुष्पक विमान पुनः वहाँ आया ॥ १५७, १५८ ॥ वह र म न कहने लगा - हे देव ! कुबेरने मुझको आपके पास वापस भेज दिया है । हे रघुनन्दन ! कुबेरने जो कुछ मुझसे कहा है, वह सुनिये ॥ १५९ । उन्होंने कहा है कि पहले तो रावणने तुमको मुझसे जीता था और बादमें रामने तुमको रावणसे जीता है । इस कारण तुम आकर तबतक राम ही की सवारी देनेका काम करो, जबतक कि भूमण्डलपर रहे ॥ १६० ॥ जब रघुश्रेष्ठ राम वैकुण्ठ धाम चले जावें, तब तुम मेरे पास चले आना । यह सुनकर रामने विमानको आज्ञा दी कि सुग्रीव आदि मेरे मित्रोंको उनके स्थानपर पहुँचाकर शीघ्र ही अयोध्या लौट आओ और राजमहलके दरवाजेके बाहर खड़े रहो । तदनन्तर विभीषण जाकर लङ्कामें धर्मपूर्वक राज्य करने लगे । १६१-१६३ ॥ मकरध्वज पातालमें धर्मपूर्वक राज्य-शासन करने लगे । गरुड़ने युवराजनगरपर अंगदजीका अभिषेक किया ॥ १६४ ॥ किष्किन्धामे कपीश्वर सुग्रीव राज्य करने लगे । शृङ्गवेरपुरमे निषादराज आनन्दसे राज्य करने लगा ॥ १६५ ॥ वायुपुत्र हनुमान् रामको नमस्कार करके तप करनेको हिमालय चले गये । फिर भी विभीषण-सुग्रीव आदि मित्र पाँचवें अथवा सातवें दिन अयोध्यामे श्रीरामका दर्शन करनेके लिए आया करते थे और वे श्रीरामके पास पाँच-सात दिन निवास करके चले जाते थे । इस प्रकार उन लोगोंका अपने-अपने राज्यसे श्रीरामके पास आना जाना लगा रहता था । सभी लोगोंके प्रिय राम भी सम्पूर्ण राज्यका पालन करने लगे ॥ १६६-१६८ ॥ न चाहनेपर भी रामने लक्ष्मणका युवराजके पदपर अभिषेक कर दिया और वे भी रामकी सेवामे तत्पर हो गये ॥ १६९ ॥ रामने पूर्व समयमे विश्वामित्रके यज्ञके समय जिस युद्धरूपी यज्ञकी समाप्ति नहीं की थी, उस रणयज्ञको इस समय अपने राज्यपदपर स्थित हो जानेपर पूर्णाहूति की । हे पार्वती !

१४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

रणांगणं यज्ञकुण्डं तत्र वै ह्यपलायनम् । तच्च वेदविधानं हि ब्रह्मसत्वं प्रकीर्तितम् ॥१७१॥
कवचाश्च घटाटोपो ज्ञेयः सम्भरणस्ततः । संशार्त्रनं शस्त्रमुद्योज्यं राक्षसमर्पणम् ॥१७२॥
शस्त्राणां मलशोधार्थं क्रियते यद्रणांगणे । भूमौ शराणां विस्तारः परिस्तरणमुत्तमम् ॥१७३॥
परिमूहनं ज्ञेयं यत्क्रिकालानलो महान् । मुखेण बाणरूपेण मांसाहूतिममर्षणम् ॥१७४॥
ऋग्भागं वषोर्भागं हाहाकारो भयानकः । म ॐकारवषट्कारघोषो ज्ञेयो रणाध्वरे ॥१७५॥
अग्नेर्ज्वाला शस्त्रतेजोघूग्र्रः स्वेदसमुद्भवो रणे ज्वालानिचयशान्त्यर्थं पृषदाज्यस्य सेचनम् । १७६॥
यच्चात्र तु वीराणामस्त्रावंचतमुत्सनम् । ज्ञानेन सह जीवस्य वलिर्दीपबलिः स्मृतः ॥१७७॥
ये देहलोभिनो वीरा बलिदोषहराः स्मृताः रामहस्तान्मृर्तिन्यक्ता ये कुर्वन्ति पलायनम् ॥१७८।
देहबन्धान्न मुक्तास्ते बलिभक्षणदोषतः । पूर्णाहुतिः शिरोभिर्हि ज्ञेयासन्नत्र प्रदक्षिणाः ॥१७९।
उच्चाटने हि सव्येन वीराणां जयहेतवे । नैज पदप्रदानं च ज्ञेया मा दक्षिणाऽध्वरे ॥१८०॥
मूर्ध्नि पुष्पवृष्टिब्बृहत्येव विप्राभिषेचनम् जयसम्पादनं युद्धे ज्ञेयं. संपादनं हि तत् ॥१८१।
चराचराणांमानन्दो ज्ञेयः स निजगोत्रिणाम् । भूतानां तर्पणं विप्रभोजनं सम्प्रकीर्तितम् ॥१८२ ।
एवं सुबाहुना युद्धे राघवस्य रणाध्वरः । तथा गाधिजसञ्चारिडो नौ श्ये महैव हि ॥१८३।
कृत्वाऽध्वरसमाश्रिप्त विश्वामित्रेण वै पुरा त्रिमर्जितो न रामेण दृष्ट्वाऽध्वं रणाध्वरे । १८४।
कालानल मुनस्तस्य तृप्त्यर्थं राऽकरोन्मतिम् । कृत्वा भूमेर्महत्पात्रं विगधरुधिरंण हि । १८५॥
पात्रस्य प्रोक्षणं कृत्वा विश्वाहूत्यर्थमादरात् । रामः शूर्पणखायाश्च घ्राणं कणों विच्छेद यत् ॥१८६॥
प्राणाहूतिभ्वो गमेण त्रिशिराः खाद्दूषणौ । मारीचश्च कबन्धश्च पंच ते निहताः क्षणात् । १८७॥

उस रणरूपी यज्ञका मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १३०॥ उस रणस्थलमें युद्ध कुण्ड था। समरसे न भागना ही वेदविहित ब्रह्मसत्त्व था ॥ १७१॥ शस्त्राकी भनकार ही कंपंकी सामग्रो थी। रणांगणमें शत्रूोंका मैल छुड़ानेके लिये उनपर जो पत्थर घिसे जाते थे, वही मृत्तिकाका माँजना था। भूमिमें बाणोंका फैला-फैलाकर रखना ही उत्तम कुश आदिका आस्तरण था और बाण ही उनका परिसमूहन (बटोरना) था। महान् कालरूपी अग्नि ही यजकुण्डकी आग थी। उसमें बाणरूपा मुखसे मांसकी आहुतियों समर्पण की जाती थी ॥ १७२-१७४। ऋग्वेदकी ऋचा ही वषट्कार थी। भयानक हाहाकार ही ओंकार तथा वषट्कारका नाद था ॥ १७५। शस्त्रोंकी चमक ही आगकी लपट थी। पसीनेका बहना ही घृतौ था। वीर पुरुषोंका उत्तम शस्त्रमोचन ही अग्निके ज्वालाकी शान्तिका पृषदाज्य सींचनेरूपी उपाय था । ज्ञानपूर्वक जीवोंका शरीर-त्याग ही दीपदान था ॥ १७६ व १७७। जो शरीरमें ममता रखनेवाले थे, वे ही पूजाकी सामग्री तथा दानवों से भागनेवाले माने जाते थे। जो रामके हाथसे न मरकर बहूँत भाग जाते थे वे बलिभक्षण करनेके दोषसे देहरूपी बन्धनमें ही पड़ जाते थे-मुक्त नहीं होते थे। उस युद्धरूपी यज्ञमें सिरोंका कट कटकर गिरना ही नारियलके द्वारा दी जानेवाली पूर्णाहुति थी। विघ्नध्वंसके लिये अपनी दाहिनी ओरसे वीरोंको दूर करना ही प्रदक्षिणा थी। उस यज्ञमें मूल पुरुषकेण विजयपद (ब्रह्मपदका प्राप्ति) हो दक्षिणा थी ॥१७८-१८०॥ देवता-ओंके द्वारा जो पुष्पवृष्टि की जाती थी, वह ब्राह्मणोंका अभिषेचन था युद्धमें विजय प्राप्त करना ही यज्ञका फल था ॥ १८१॥ चर अचरका आनन्दलाभ ही अपने गात्रवालोंका आनन्द समझा जाता था। पशु-पक्षी आदि जीवोंकी तृप्ति ही विप्रभोजन कहा जाता था ॥ १८२। इस प्रकार रामका जो सुबाहुसे युद्धरूपी यज्ञ राक्ष-सोंके साथ आरम्भ हुआ, वह और गाधिपुत्र विश्वामित्रका यज्ञ दोनों साथ ही प्रारम्भ हुए । १८३॥ उनमेंसे विश्वामित्रजीने तो अपना यज्ञ समाप्त कर लिया था परन्तु रामने अपने दशमें कालानलको अतृप्त देखकर अपना युद्धयज्ञ समाप्त नहीं किया था। अतएव उसको तृप्त करनेका इच्छा करके रामने विराधके रुधिर से पृथ्वीरूपी पात्रका प्रोक्षण (शुद्धि करके शूर्पणखाके नाक-कान काटकर प्रेमसे भिन्न-विभिन्न आहुतिये दीं ॥ १८४-१८६॥ रामने त्रिशिरा, खर, दूषण, मारीच तथा कबन्धको क्षणभरमें मारकर पंचप्राणा-