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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १२] उत्तरकाण्डम् १३९

सर्गः १२] उत्तरकाण्डम् १३९

त्वत्तेजसा जगन्नाथ पालयस्व पुरं स्वकम् । तथेति राघवोक्त्वा भरतं संन्यवेशयत् ॥९५॥
ततः स दिव्यवस्त्राणि परिधाय रघूत्तमः । सीतया रथमारुह्य शब्दैर्घोषैर्जयस्वनैः ॥९६॥
वरांगनानुत्यगीतैर्ग्रयौ निजपुरीं प्रति । पौरजनैश्च सौधस्था ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥९७॥
चक्रुर्नीराजनं मार्गे नानारत्नौघपूरगम्। रामो रथादवतार्य सीतां प्रप्रेष्य वै गृहम् ॥९८॥
पुष्पकं प्राह गच्छ त्वं कुबेरं वह सर्वदा तथेति रामवचनाज्जगाम पुष्पकं तु तत् ॥९९॥
अथ रामः सभामध्ये विवेश कपिभिः सह । ददौ कपिभ्यो गेहानि वस्तुं रम्याणि सादरम्॥१००॥
अथ रामस्य राज्यार्थमभिषेकं गुरुस्तदा । चकार सुमुहूर्ते वै महामंगलपूर्वकम् १०१॥
हनुमत्प्रमुखांश्चैव चतुःसिंधुजलं शुभम् । समानाय नृपैः सर्वैर्महावाद्यपुरःसरम् । १०२॥
छत्रं च तस्य जग्राह पृष्ठस्थः स लक्ष्मणः । दधार मन्दपाश्र्वस्थश्चामरं भरतस्तदा ॥१०३॥
शत्रुघ्नो चामराभंस्थो दधार व्यजनं शुभम् । हनुमान्पादुके दिव्ये दधार पुरतः स्थितः ॥१०४॥
वायव्यादिचतुष्कोणमभितस्ते महौजसः । सुग्रीवाद्यास्तदा चत्वारश्चत्वारो राघवक्षणाः ॥१०५॥
सुग्रीवो जलपात्रं च वरादर्शं विभीषणः । दधार हस्ते तांबूलपात्रं स बालिनन्दनः ॥१०६॥
रत्नकोशं जांबवांश्च दधार वेगवत्तरः । तस्थौ सिंहासने रामः स्पृष्टांगोपवर्हणः । १०७॥
सौमित्रेर्वामपाश्र्वैऽथ संपातिः संस्थितोऽभवत् वामपार्श्वे भरतस्य गुहकः संस्थितोऽभवत् । १०८॥
शत्रुघ्नवामपाश्र्वैऽथ संस्थितो मकरध्वजः । हनुमद्वामपार्श्वे च गरुडः संस्थितोऽभवत् । १०९॥
सुग्रीवादिचतुर्णां ते वामपाश्र्वेषु संस्थिताः । भ्रांश्चित्ररथविजयसुमन्त्रतरुकास्तथा ॥११०॥
नानांगोपकरणहस्तहस्ता महौजसः । ययुर्देवासुराः सर्वे यक्षगन्धर्वकिन्नराः ॥१११॥
ओषध्यः पर्वता वृक्षाः सागराश्चाथ निम्नगाः । मालाञ्च कांचनीं वायुर्ददौ वासवचोदितः ॥११२॥

राज्यका पालन स्वयं करें। यह सुन और 'तथास्तु' कहकर रामने भरतको अपने पास बैठा लिया
॥९४॥ ९५॥ तदनन्तर राम और सीता दिव्य वस्त्र धारण करके रथपर सवार होकर जय-जयकार तथा वाद्य
गानेके साथ वारांगनाओका नाच-गान देखते हुए अपनी प्रिय अयोध्यापुरीको चले । नगरमे प्रवेश करनेपर
नगरकी नारियोंने छतों तथा बारों पर चढ़कर अनेक प्रकारके पुष्पोंकी वर्षा की ॥ ९६ । ९७। वे रत्नमय विविध
पूजाकी सामग्रीसे रामकी आरती उतारने लगीं। रामने विमानसे उतरकर सीताको महलमे भेज दिया और
पुष्पक विमानसे कहा कि तुम कुबेरके पास जाकर सदा उन्हींकी सेवा करो 'रामकः आज्ञाका स्वीकार करक
पुष्पक विमान कुबेरके पास चला गया ॥ ९८ ॥ ९९ ॥ अथ राम सब कपियोंको साथ लेकर सभाभवनमे गये ।
पश्चात् कपियोंके निवास करनेके लिए उत्तम-उत्तम मकान दिये गये ॥ १०० ॥ तदनन्तर गुरु वसिष्ठने शुभ
मुहूर्त्तमे बड़े धूमधामसे रामका राज्याभिषेक ठाना ॥ १०१ ॥ हनुमान् आदिको भेजकर चारों समुद्रोका शुभ
जल मँगवाया । देश-देशान्तरके राज-महाराजे बुलाये गये । नाना प्रकारके वाद्य बज लक्ष्मणन पीछे खड
होकर रामके ऊपर छत्र लगाय। रामकी पादुका हाथमे लेकर हनुमान् उनके सामने खड़े हो गये।
धर्मी और सुन्दर पंखा लेकर शत्रुघ्न खड़े हुए और रामकी दाहिनी ओर चमर लेकर भरत खड़े हुए गये
॥ १०२-१०४ ॥ रामके नेत्रसदृश प्रिय तथा ओजस्वी सुग्रीव आदि मित्र वायव्य आदि चार कोनामे
विराजमान हो गये ॥ १०५ ॥ सुग्रीवने जलपात्र, विभीषणने सुन्दर दर्पण, वालिनन्दन अंगदने पानदान
तथा वेगवान् जांबवान्ने अपने हाथमे श्रीरामके वस्त्रोंकी पिटारी ले ली। तब श्री राम जाकर गद्दा-तकिया
लगे हुए बहुमूल्य सिंहासनपर विराजमान हो गये । लक्ष्मणके वामभागम संपाती, भरतके वामभागमें
निषादराज, शत्रुघ्नके वामभागमें मकरध्वज तथा हनुमान्के वामभागमें गरुड खड हुए । सुग्रीव आदि चारों मित्रोके
बाये चित्ररथ, विजय सुमन्त्र तथा दारुक खडे हुए । १०६-११० । बड़े-बड़े तेजस्वी सब हाथामे अनेक
प्रकारकी भेंटें लेकर आये। सब देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व तथा किन्नरगण वहाँ आकर उपस्थित हो

१४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

सर्वरत्नममायुक्तं
प्रजगुर्देवगन्धर्वा
मणिकांचनभूषितम् । ददौ हारं नरेन्द्राय स्वयं शक्रस्तु भक्तितः ॥११३॥
ननृतुश्चाप्सरोपङ्क्तः । देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात खात् ॥११४॥
ततोऽकञ्चं स्तुतिमहं भरतेनाभिपूजितः । ११५॥
श्रीशिव उवाच
सुग्रीवमित्रं परमं पवित्रं सीताकलत्रं नवमेघगात्रम् ।
कारुण्यपात्रं शतपत्रनेत्रं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११६॥
संसारपारं निगमप्रचारं धर्मावतारं हतभूमिभारम्
सदाऽविकारं सुखसिन्धुपारं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११७॥
लक्ष्मीविलासं जगतां निवासं लङ्काविनाशं भुवनप्रकाशम्
भूदेववासं शरदन्दुहासं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११८॥
मंदारमालं वचने ऽमलं गुणैर्विशालं हतसप्ततालम् ।
क्रव्यादाकालं सुरलोकपालं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११९॥
वेदांतगानं सकलैः समानं दृप्ताभिमानं त्रिदशप्रधानम्
गजेंद्रयानं विगतार्वमानं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ।१२०।
श्यामाभिरामं नयनाभिरामं गुणाभिरामं वचनाभिरामम् ।
विश्वप्रणामं कृतभक्तकामं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि । १२१।
लीलाशरीरं रणरङ्गधीरं विश्वैकसारं रघुकुलहारम् ।
गंभीरनादं जितसर्ववादं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि । १२२॥
खले कठोरं स्वजने विनीतं गामोपरान्तं मनसा प्रतीतम् ।

गये। औषधि, पर्वत, वृक्ष, समुद्र तथा नदियां भी आ पहुंचीं। इन्द्रके द्वारा भेजे हुए वायुने आकर रामको एक सुन्दर कंचनकी माला पहनायी ॥१११ । ११२॥ पश्चात् स्वयं इन्द्रने भी आकर सब रत्नोंसे युक्त तथा सोनार सुशोभित हार राजा रामको समर्पण किया ॥११३॥ किन्नर और गन्धर्व उनके गुण गाने लगे। सब अप्सराय और चारणगण नाचन लगे। देवताओंके नगाड़े बजने लगे और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥११४॥ बादमें भरतके द्वारा पूजित होकर मैं (शिव) रामकी स्तुति करने लगा ॥११५॥ श्रीशिवजी बोले-सुग्रीवके मित्र, परमपवन, सीताके पति, मेघके समान श्याम अंगवाले, करुणाके सिंधु और कमलके सदृश नेत्रोंवाले श्रीरामचन्द्रको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ । ११६ । इस संसारसे भक्तोंको पार करनेवाले, वेदोंका प्रचार करनेवाले, धर्मके साक्षात् अवतार, भूभारको हरण करनेवाले, अविकृत स्वरूपवाले और सुखके सर्वोत्तम सागर श्रीरामचन्द्रको मैं सदा नमस्कार करता हूँ ॥११७॥ लक्ष्मीके साथ विलास करनेवाले, जगत्के निवासस्थान, लङ्काका विनाश करनेवाले, भुवनोंको प्रकाशित करनेवाले, ब्राह्मणोंको शरण देनेवाले और शरदीय चन्द्रमाके समान शुद्ध हास्य करनेवाले श्रीरामचन्द्रको मैं सततं नमस्कार करता हूँ ॥११८॥ मन्दारकी माला धारण करनेवाले, गर्व से वचन बोलनेवाले, गुणोंमें महान् सात ताल वृक्षोंका भेदन करनेवाले, राक्षसोंके काल तथा देवलोकोंके पालक रामचन्द्रको में सदा नमस्कार करता हूँ । वेदान्तके गेय, सबके साथ समान बर्ताव करनेवाले, शत्रुके मानका मर्दन करनेवाले, गजेन्द्रकी सवारी करनेवाले तथा अन्तरहित श्रीरामचन्द्रको मैं सततं नमस्कार करता हूँ। ११६ । १२० ॥ श्यामके रूपसे मनोहर नयनोंसे मनोहर, गुणोंसे मनोहर, हृदयग्राही वचन बोलनेवाले, विश्ववन्दनीय और भक्तजनोंकी कामनाओंको पूरी करने- वाले श्रीरामचन्द्रको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ । १२१॥ लीलामात्रके लिए शरीर धारण करनेवाले, रणस्थली- में वीर, विश्वभरके एकमात्र सारभूत, रघुवंशमें श्रेष्ठ, गंभीर वाणी बोलनेवाले और समस्त वादोंको जीतने वाले श्रीरामचन्द्रको मैं प्रतिक्षण प्रणाम करता हूँ । १२२॥ दुष्टजनोंके लिए कठोर हृदयवाले, अपने भक्तोंके प्रति