श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ११ ]
सर्गः ११ ]
मनोहरकाण्डम्
६९३
शनैः शनैरथोद्यातः पश्यंश्चैत्रवनस्थलीम् । तत्र च्छन्दो महान् जातः सिंहमातंगसङ्गवः ॥१५०॥
धावन्नग्रे तु मातंगः पृष्ठे धावंश्च केसरी। एवं तौ शृङ्गतस्तूर्ण प्रयांतौ कलहकारिणौ ॥१५१॥
मार्गरोधकरौ दृष्टौ तौ दृष्ट्वा शंभुशर्मनो। पश्य कर्कश विघ्नानि चैत्रस्नाने पदे पदे ॥१५२॥
संभवंतीति वै पुरुषाश्चैत्रस्नानं न लङ्घयेत्। कन्यां विवाहे गीतायां गयायां रामसेवने ॥१५३॥
चैत्रस्नाने महादाने विघ्नानि संभवन्ति हि। एवं वदति विप्रेंद्रे तौ दृष्टौ करिसिंहकौ ॥१५४॥
चैत्ररामश्रवात्पूर्वजन्मस्मृत्वाऽतिविस्मितौ। भूत्वा वै त्राहि त्राहीति कृत्वा दार्धे महास्मृतम् ॥१५५॥
शरणं द्विजवर्यस्य जग्मतुः शम्भुशर्मणः । सोऽपि शङ्कुश्रवाभ्यांहि पृष्टवांस्तत्कृपान्वितः॥१५६॥
कियद्यं दृष्टनातिर्हि प्रमा नूक्तप्रपञ्चं मम । इति विप्रवचः श्रुत्वा केसरी वाक्यमब्रवीत् । १५७॥
सोऽहं रामेश्वरक्षेत्रे पूर्वजन्मम्यहं द्विजः। निन्दकः सर्वधर्माणां पाखण्डव्यक्तकन्धरः ॥१५८॥
कदाचिच्चैत्रमासे तु तत्र श्रीराममण्डके। तीर्थे जनसमूहं च श्रुत्वा पौराणिकीं कथाम् । १५९॥
पौराणिकेने कथितां चैत्रमाहात्म्यसंज्ञिकाम्। कृतवान् निन्दनं चाहं वारं वारं पुनः पुनः । १६०॥
तन्मत्कृतं निंदनं च कश्चिद्देवरथस्थितः। शुश्राव सकलं दुष्टं तत शप्ताऽस्म्यहं तदा । १६१॥
करा जातिं त्वं गच्छ यदा शंभवकीर्तनम्। भविष्यति महत्पुण्यं शापशान्तिस्तदनु च । १६२॥
एवं प्रोक्तं मया सर्वं पूर्वजन्मानि यत्कृतम्। तेन शापेन जातोऽस्मि कथग भयकारकः । १६३॥
चैत्ररामश्रवाज्जाता पूर्वस्मृतिरनुत्तमा। इदानीं रक्ष मां विप्र त्वं चतन्मिहेद्द्रुतः।
इति सिंहस्य वृष तु शास्त्रवाच गत द्विजः ॥१६४॥
कस्मञ्च्च मातंग गतोऽसि दुष्टात्तौ वदष्वाय महाप्रमघात् ।
स चापि मातंगवरः समस्तं वृत्तं निजं चाकथयच्च जानन् । १६५।
नाचते लगे। वैशाखामिक चैत्रमास माहात्म्यस वनका वह सुपमा देखकर ककजाने भा चैत्रमासका सब सांगोपा ङ्गेण्ड मरा। उस पर वे दोनो उस वेषके भागके आधार लिए चल पडे ॥१४८। १४६। वे वनस्थलीकी शोभा देखते हुए चलेजा रह थ। तबतक उन्होने सिह और हाथीका महान् गजन सुना ॥१५०॥ आगे आगे हाथी भागा जा रहा था और उसे पदछम सिह खदरता जाता था। लडत हुए वे दोनो उसी मागपर आ पहुंचे, जहाँसे ये दानों ब्राह्मण जा रहे थे ॥ १५१ ॥ उन दुष्टोका रास्ता राकन देखकर शम्भुने ककशस कहा-देखा कर्कश ! चैत्रस्नान करनेवालोके पद-पदपर विघ्न आते हैं। किन्तु लोगोका चाहिए कि विघ्न-बाधात्रास डरकर पीछे न हटे। काशी-यासम, पुत्र-पुत्राक विवाहस, गयापाडय गया ध्यान करनम् वैत्रस्नानम और कुछ आरि महादानम बड़े-बड़े विघ्न आया करत है प्रत्तायक उस शब्दोका सुनकर उन दोनो दुष्टा (हाथा और सिह) को अपने पूर्वजन्मफा स्मरण हा बाया जिससे 'मेरी रक्षा करो-मेरी रक्षा करो' इस तरह बहुत दूर व चिल्लाने लग ॥१५२-१५५॥ वे उस शम्भुनामक ब्राह्मणकी शरणमे गये शम्भु भी उनपर दयालु होकर उनसे पूछने लगे कि तुम लोगोको यह दुष्टयानि क्यो मिली ? यह वृत्तान्त हमें सुनाओ । इस तरह विप्रका प्रश्न सुनकर सिंहने कहा- ॥ १५६ । १५७ ॥ इसके पूर्वकाल अम्मम में रामेश्वरक्षेत्रका निवासी एक ब्राह्मण था। मैं सब धर्माका निन्दक था और पाषण्डमे भगे बाते किया करना था ॥ १५८ ॥ एक बार चैत्रके महीनेमें श्रीरामतीर्थमे एक ब्राह्मणके मुखसे चैत्रमासका माहात्म्य सुन लिया और उसकी भरपूर निन्दा को। मेरी उन निन्दाकी बातोको पास ही बैठे हुए किसी तपस्वी ब्राह्मणने सुन लिया और उसने उसी समय मुझे झाप देते हुए कहा-तूने चैत्रमासकी निन्दा की है। इसलिए तू सिह क्रूरजातिमें जाकर जन्म ले । जब कि एक बनमे तू किसी ब्राह्मणके मुखस चैत्रमासका माहात्म्य सुनेगा, उस समय तेरे शापकी शान्ति होगी । १४९-१६२ ॥ हे विप्र ! इस तरह मैने आपको अपने पूर्व-जन्मका वृत्तान्त कह सुनाया उसके श्रापसे मै महाभयदायिनी इस सिंहकी योनिमें आ पड़ा हूँ । १६३ । आज आपके मुखसे चैत्रमासमे रामनाम सुननेसे मुझे मेरे पूर्वजन्मकी बाते स्मरण आ गयीं । हे विप्र ! अब मुझे इस सिंहयानिसे बचाइए ॥ १६४ । इस प्रकार सिहकी बात
६९४ आनन्दरामायणे [सर्गः ११
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पूर्ववृत्तं मया कृतम् । रामनाथपुरे चाहं कावेर्या उत्तरे तटे ॥१६६॥
विप्रः परमदुर्वृत्तः सर्वशास्त्रपराङ्मुखः । लक्ष्मीभ्रमदाक्रान्तः पण्यस्त्रीभोगकारकः ॥१६७॥
एकदा सुहृदा चाहं भोजनार्थं निमन्त्रितः । श्राद्धार्हे मधुमासे हि शुक्ले श्रीनवमीदिने ॥१६८॥
मया भुक्तं सुहृद्गेहे नवम्यां द्विजसत्तम । तेन पापेन जातोऽस्म्य करिणीर्ना न संशयः ॥१६९॥
सर्वदा प्रतिमासेऽपि नवम्यां न हि भोजनम् । कार्यं विशेषतो रामनवम्यां त्रिदिनं च तत् ॥१७०॥
इदानीं न हि जानामि केन पुण्येन तेऽत्र वै । संगतिश्च वने जाता सर्वपापप्रणाशिनी ॥१७१॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नोऽपि विचिन्तयत् । ज्ञात्वा मातङ्गपुण्यं तु प्रोवाच करिणं द्विजः ॥१७२॥
शृणु मातङ्ग वक्ष्यामि यत्पुण्यं नु त्वया कृतम् । पूर्वजन्मनि तन्मर्त्य येन मे संगतिर्वने ॥१७३॥
जाता त्वामुद्धरिष्यामि मा चिन्तां कुरु सर्वथा । रामनाथपुरे रम्ये कावेरीतटशोभिते ॥१७४॥
रामायणकथा चैत्रे श्रुता श्रीनवमीदिने । रामतीर्थे त्वया स्नानं दृष्टो रामेश्वरः शिवः ॥१७५॥
तेन पुण्येन ते जाता संगतिर्मम कानने । इदानीं शृणु सिंह त्वं शृणोतु च करी महान् ॥१७६॥
साकेते मधुमासे हि स्नात्वाऽनेन पथा पुनः । यदा गच्छामि तां कांचीं युवामुद्धारयाम्यहम् ॥१७७॥
मा संदेहोऽत्र कर्तव्यः शपथैः प्रत्ययं कुरु । संतोपार्थं युष्माकं हि प्रोच्यन्ते शपथा मया ॥१७८॥
परस्त्रीगमनात्पापं तथा मित्रवधादिकम् । युवां नोद्धृत्य गच्छामि यदि तन्मयि तिष्ठतु ॥१७९॥
ब्रह्मस्वहरणात्पापं यत्स्मृतं मातृनिन्दनात् । युवां नोद्धृत्य गच्छामि यदि तन्मयि तिष्ठतु । १८० ।
इत्युक्त्वा द्विजवर्यः स स्त्रिया भिल्लेन संयुतः । करिसिंहौ वने स्थाप्य गच्छन्मार्गे शनैः शनैः ॥१८१॥
सुनकर ब्राह्मणने हाथीसे कहा कि तुम किस कर्मसे इस दुर्योनिमें आये हो ? तब हाथीने अपने पूर्वजन्मका हाल सुनाते हुए कहा-हे विप्र ! मैं भी अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनिए । उस जन्ममें मैं कावेरी नदीके उत्तरी तटपर रामनाथपुर नामक नगरमें बड़ा दुराचारी, सब शास्त्रोंसे पराङ्मुख, धनके मदसे मतवाला और वेश्यालम्पट ब्राह्मण था । एक बार चैत्रमासकी नवमीका मेरा किसी मित्रने श्राद्धमें भोजन करनेके लिए मुझे निमन्त्रण दिया ॥१६६-१६८॥ तदनुसार हे द्विजश्रेष्ठ ! नवमीके दिन मैंने मित्रके यहाँ भोजन किया । उसी पापसे इस हाथीकी योनिमें आ पड़ा हूँ । १६९ । क्योंकि शास्त्रोंका यह विधान है कि प्रत्येक मासकी नवमीको किसीके यहाँ भोजन न करे । यदि ऐसा न हो सके तो चैत्रशुक्ल रामनवमीको तो अवश्य इस बातपर ध्यान दे ॥ १७० ॥ मैं नहीं जानता कि किस पुण्यसे इस समय सब प्रकारके कल्मषोंको हरनेवाला आपका संसर्ग प्राप्त हुआ ॥ १७१ ॥ उसका यह बात सुनकर शत्रुघ्न क्षणभर अपने मनमें ध्यान किया और उसके पुण्यको जानकर कहने लगा-हे मातंग ! सुनो, तुमने जो पुण्य किया है सो मैं तुम्हें बतलाता हूँ । उसीके प्रभावसे आज हमसे भेंट हुई है ॥ १७२ ॥ ॥ १७३ ॥ अब तुम घबराओ मत, मैं तुम्हारा हर तरहसे उद्धार करूँगा । उस जन्ममें तुमने रमणीक कावेरीके तटपर स्थित रामनाथपुरमें श्रीरामनवमीको रामकी कथा सुनी थी । उस दिन तुमने रामतीर्थमें स्नान और रामेश्वर शिवका दर्शन भी किया था ॥ १७४ । १७५ ॥ उसी पुण्यसे आज इस वनमें हमसे भेंट हुई है । अब हे मातंग और सिंह ! मेरी बात सुनो मैं इस समय चैत्रमासका स्नान करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ । स्नान करके जब मैं कांचीकी ओर लौटूंगा, तब यहाँ आकर तुम दोनोंका उद्धार करूँगा । १७६ ॥ १७७ । मेरी बातपर किसी प्रकारका संदेह मत करना । तुम्हारे विश्वासके लिए मैं शपथ खाता हूँ, सुनो १७८ । यदि मैं तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊँ तो परस्त्रीगमन करने और मित्रको मारनेसे जो पातक लगता है, मैं उस पातकका भागी बनूँ ॥ १७९ ॥ जो पाप ब्राह्मणका धन हड़पने और माताकी निन्दा करनेमें होता है, उन सब पापोंका भागी बनूँ, यदि तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊँ ॥ १८० ॥ इतना कहकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपनी स्त्री तथा उस भीलका साथ लिया और वहाँसे अयोध्याके लिए चल पड़ा । उसने हाथी तथा सिंहको उस वनमें ही छोड़ दिया । १८१ ॥
सर्गः ११ ]
मनोहरकाण्डम्
६१९
ददर्शान्यपथा यान्तं श्रेष्ठं कार्पटिकोत्तमम् । वहन्तं रामलिंगार्थं श्रेष्ठं भागीरथीजलम् ॥ १८४॥
शम्भुः पप्रच्छ तं नत्वा नम्रं कार्पटिकोत्तमम् । कुतः समागतं विप्र गम्यते काधुना वद ॥१८३॥
कार्पटिक उवाच
प्रयागादागतं विद्धि मां त्वं भूसुरमत्तम । मधुमासेऽवगाहार्थमयोध्यां प्रति गम्यते ॥ १८४॥
इदानीं त्वं निजं वृत्तं वद ब्राह्मणसत्तम । कुतः समागतं काथ गम्यते क्वाधुना वद । १८५॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा शम्भुः प्रोवाच तं तदा । शिवकाञ्च्याः समायातमयोध्यां प्रति गम्यते ॥१८६॥
चैत्रमासेऽवगाहार्थं गम्यते कथितं मया । इति शम्भुवचः श्रुत्वा पुनः कार्पटिकोत्तमः । १८७॥
पप्रच्छ द्विजवर्य्याय कौतुकाविष्टमानसः । शिवकाञ्च्यां शंभुनामा कश्चिद्विप्रोऽस्ति भो द्विज ॥८८॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा पुनः शम्भुस्तमब्रवीत् । बहवः शंभुनामानो वर्तन्ते द्विज तत्र हि ॥१८९ ।
कस्त्वया पृच्छयते तस्य वद गोत्रोपनामनी । इति विप्रवचः श्रुत्वा पुनः कार्पटिकोऽब्रवीत् ॥१९०॥
भारद्वाजकुलोत्पन्नं चकेगाधूपनामकम्
महादेवसुतं सर्ववेदशास्त्रविशारदम् । तं क्षणं शंभुनामानं जानीषे त्वं न वा वद ॥१९१॥
एवं महाकार्पटिकेन सर्वं गोत्रापमाणादिकमादरेण ।
प्रोक्तं यथा तन्नम भूसूतोऽपि ज्ञात्वा निजं सर्वमथावदत्तम् ॥ १९२ ॥
भो भोकार्पटिकश्रेष्ठ किमर्थं त्वं हि पृच्छसि वददस्य सविस्तारं मा शंकां कुरु चात्र हि । १९३॥
कार्पटिक उवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यदर्थं पृच्छयते मया । यदाऽहं गतवान् गंगासागरं द्रष्टुमादरात् ॥१९४॥
सीताकुण्डसमीपे हि देशे कंकटनामके । दृष्टोऽहं मार्गमध्ये च पिशाचेनोग्ररूपिणा ॥१९५॥
मां हन्तुं निकट प्राप्तं तं दृष्ट्वाऽहं तदा द्विज । श्रीनामकीर्तनं दीर्घं कृतवान् भयकम्पितः ॥१९६॥
कीर्तनाद्रामचन्द्रस्य स पिशाचः पलायनम् । मनः कृत्वा दूरदेशे स्थित्वा शुश्राव कीर्तनम् ॥१९७।
रास्तेमें शम्भुने एक कार्पार्थी विप्रको देखा, जो रामेश्वर शिवके लिए गङ्गाका उत्तम जल लिये जा रहा था ॥ १८४॥ उसे देखकर शम्भुने पूछा -हे विप्र ! इस समय तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे ? ॥ १८३ ॥ उसने उत्तर दिया हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! इस समय मैं प्रयागसे आ रहा हूँ और चैत्रस्नान करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ ॥ १८४ ॥ अब आप अपना वृत्तान्त बतलाते हुए कहिए कि कहाँसे आये है और कहाँ जायेंगें ? ॥ १८५ ॥ ब्राह्मणका प्रश्न सुनकर शम्भुने कहा कि मैं शिवकाञ्ची से आता हूँ और अयोध्या जा रहा हूँ ॥ १८६ ॥ हम भी चैत्रस्नान करना है । इस प्रकार शम्भुकी बात सुनकर ब्राह्मणने कहा कि हे द्विज ! शिवकाञ्चीमें कोई शम्भु नामका ब्राह्मण रहता है ? । १८७ ।' १८८ ॥ ब्राह्मणकी बातके उत्तरमें शम्भुने कहा कि शिवकाञ्चीमें बहुतसे शम्भु नामक ब्राह्मण हैं ॥ १८९ ॥ आप किस शम्भुको पूछते हैं ? जिसे पूछते हों, उसका गोत्र और उपनाम बतलाइए । शम्भुकी बात सुनकर उस ब्राह्मणने कहा कि जिन्हें मैं पूछता हूँ, वे भारद्वाज कुलमे उत्पन्न हुए हैं और चक्रेगाँव उनका उपनाम है । वे महादेवके पुत्र हैं। वे सब वेदों और शास्त्रोंको जानते हैं। उन शम्भुको आप जानते हैं या नहीं, सो बतलाइए ॥ १९० ॥ १६१ ॥ इस तरह ब्राह्मणके मुखसे अपना गोत्र और उपनाम आदि सुनकर शम्भुने कहा- हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! तुम शम्भुको क्यों पूछ रहे हो, मुझे विस्तारपूर्वक बतलाओ । इसमें किसी प्रकारका सन्देह मत करो ॥ १९२ ॥ १९३ ॥ कार्पटिकने कहा- हे विप्र ! जिसलिए मैं उन्हें पूछ रहा हूँ सो बतलाता हूँ । जब कि मैं गंगासागरका दर्शन करने गया था तो सीताकुण्डके समीप कंकट देशमें मुझे एक उग्ररूपवाले पिशाचने देख लिया ॥ ९४ ॥ १९५ ॥ वह मारनेके लिये बिल्कुल मेरे पास आ पहुँचा । मैं उसे देखकर जोर-जोरसे रामनामका कीर्तन करने और भयसे काँपने लगा ॥ १९६॥ रामनामके कीर्तनसे वह भाग खड़ा हुआ और मेरे पाससे थोड़ी दूरपर रुककर कीर्तन
६९६ आनन्दरामायणे [सर्गः ११
तस्माज्जाता पूर्वजन्मस्मृतिस्तस्य शुभावहा । त्राहि त्राहीति मां प्राह मया पृष्टः स वै पुनः ॥ १९८ ॥
कस्मात्पिशाचदेहे त्वं जानंस्तद्वद मन्मथम् । इति मे वचनं श्रुत्वा पिशाचः प्राह मां पुनः ॥ १९९ ॥
काञ्चीपुर्यां द्विजश्चाहं दुण्डिनामा पुरा स्थितः । नान्नदानं मया पूर्वं कृतं स्वल्पमपि क्वचित् ॥ २०० ॥
तस्मात्पिशाचदेहत्वं प्राप्तं कार्पटिकोत्तम । इति तस्य वचः श्रुत्वा पुनः प्रोक्तः स वै मया ॥ २०१ ॥
कथं पिशाचयोन्यास्तु ते मुक्तिश्च भविष्यति । ततः पुनः स मां प्राह यदि मे तनयः सुधीः ॥ २०२ ॥
चैत्रे दर्शो ममोद्देशादन्नदानं करिष्यति । भविष्यति ममोद्धारस्तत्क्षणात्रात्र संशयः । २०३ ।
इति तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्रोक्तः स वै मया । वर्तते क्व सुतस्ते हि किंनामा वद मां प्रति । २०४ ॥
ततस्तेन यथा प्रोक्तं भारद्वाजाय निष्छलम् । तत्प्रोक्तं च मया सर्वं निकटे तव भो द्विज ॥ २०५ ॥
पिशाचं हि पुनश्चाहमुक्तवान् तद्गताशयम् । रामेश्वरार्थे भो पिशाच नीयते जाह्नवीजलम् । २०६ ।
मया कण्डमध्ये हि यदा गच्छामि दक्षिणाम् । दिशं कालेन काञ्चीं हि प्रवेक्ष्यामि यदा तदा । २०७ ।
तत्र पुत्राय वृत्तं हि कथयिष्याम्यहं तव । इति मद्द्वचनं श्रुत्वा सन्तोषं परमं गतः ॥ २०८ ॥
पिशाचः प्राह मां विप्र स्तुत्वा नत्वा पुनः पुनः । अवश्यमेव वक्तव्यं मे वृत्तं मम सूनवे २०९ ।
यथा दृष्टं त्वया पांथ यथोक्तं च मया तव । अन्यच्च कथ्यतां तस्मै मम पुत्राय सादरम् । २१० ।
मधुदर्शोऽन्नदानस्य महिमा श्रूयते दिवि । शतस्वं हि ममोद्देशादन्नदानं मधौ कुरु ॥ २११ ।
एवमुक्त्वा स पिशाचः शपथं मां चकार ह । न ब्रूषे स्मरणं कृत्वा मम पुत्राय तद् द्विज । २१२ ।
भविष्यति वृथा सर्वयात्रा तव महामते । इति मद्द्वचनं श्रुत्वा सान्त्वयित्वा च तं पुनः ॥ २१३ ।
निर्गतोऽस्मि मधौ स्नातुमयोध्यां गङ्गादरात् । कृत्वाऽयोध्यापुरीनद्ये चैत्रस्नानं महाफलम् ॥ २१४ ।
यदा गच्छामि तां काञ्चीं तदा तस्मै वदाम्यहम् । अतश्च मया प्रच्छन्नं शृङ्गीद्विजोत्तमः । २१५ ॥
सुनाने लगा ॥ १९७ । उस कीर्तनके श्रवणसे उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण आ गया और आतंकके साथ 'त्राहि त्राहि' कहकर चिल्लाने लगा । मैंने उससे पूछा कि तुम क्यों इस पिशाचशरीरको प्राप्त हुए हो, सो मुझे शीघ्र बताओ। मेरी बात सुनकर पिशाचने कहा—॥ १९८ ॥ १९९ ॥ हे विप्र ! पूर्वजन्ममें काञ्चीपुरीनिवासी मैं दुण्डिनामका ब्राह्मण था । उस जन्ममें मैंने कभी थोड़ा भी अन्नदान नहीं किया था ॥ २०० । इसी कारण इस पिशाचदेहको प्राप्त हुआ हूँ। उसकी बात सुनकर मैंने कहा—किस उपायसे तुम पिशाचयोनिसे मुक्त होओगे ? यह सुनकर उसने कहा कि यदि चैत्रकी अमावास्याको मेरा पुत्र मेरे लिए अन्नदान करे तो तत्काल मेरा उद्धार हो जाय इसमें कोई संशय नहीं है । २०२ । २०३ । २०४ । इस प्रकार उसका वचन सुनकर मैंने पूछा कि तुम्हारा वह लड़का कहाँ रहता है ? उसका नाम बतलाओ ॥ २०४ । इसके बाद उसने शुद्ध सब परिचय बतला दिया, जो क्या मैंने आपसे कहा है । २०५ ॥ फिर मैंने कहा—हे पिशाच ! मैं इस काँवरमें गङ्गाजल लिये रामेश्वर शिवपर चढ़ाने जा रहा हूँ । कुछ दिनों बाद जब मैं दक्षिण दिशाकी ओर लौटूँगा तो काञ्चीपुरी अवश्य जाऊँगा । वहाँ पहुँचकर तुम्हारे लड़केको तुम्हारा सब समाचार कह सुनाऊँगा । इस बात सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और मुझे बार-बार प्रणाम करके उसने कहा— हे विप्र ! मेरा वृत्तान्त मेरे पुत्रसे अवश्य कहिएगा ॥ २०६-२०९ । आपने मुझे जो अवश्य देखा है व कुछ मैंने आपको बतलाया है और इसके अतिरिक्त जो जो उचित समझिए, वह सब कह देने की कृपा कीजिएगा ॥ २१० ॥ सुनता हूँ कि चैत्रामावास्यामें अन्नदान करनेका बड़ा माहात्म्य है । इसीलिए तुम चैत्रमास में मेरे उद्देश्यसे अन्नदान करो । ऐसा कहकर उसने मुझे शपथ दिलायी कि यदि आप ख्याल करके मेरे सन्देशको मेरे पुत्र से नहीं कहेंगे तो हे महामते आपकी यात्रा व्यर्थ हो जायगी । उसकी बात सुनकर मैंने बार-बार उसे सान्त्वना दी और चैत्रस्नान करनेके निमित्त अयोध्या चल पड़ा । महाफलदायी चैत्रमासका स्नान करनेके अनन्तर जब मैं कांची जाऊँगा तो उसके पुत्रको पिशाचका सन्देश सुना दूँगा । इसीलिए मैंने आपसे शृङ्गीके विषयमें पूछताछ की है