सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १०] मनोहरकाण्डम् १७९

सर्गः १०] मनोहरकाण्डम् १७९

न हि चैत्रसमो मासो न कृतेन समं युगम् । न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम् ॥२६॥
न जलेन समं दानं न सुखं भार्यया समम् । न हि चैत्रसमं लोके पवित्रं कश्यपो विदुः ॥२७॥
तस्मादयं चैत्रमासः शेषशायिप्रियः सदा । अव्रतेन नयेद्यस्तु चांडालत्वं स ऋच्छति ॥२८॥
यथा गृहं सर्वगुणोपपन्नं परिच्छदैर्हीनमशोभने तथा ।
यथैव कन्या सकलैर्गुणैर्युक्ताप्यलंक्रियाहीनतया न शोभते ॥२९॥
शाकं तु षड्रसयुतेन हीनं न शोभते सर्वगुणोपपन्नम् ।
यथा ललनामेव विना सभा नैवोत्सवेन हीना ललना न शिष्ये ॥
तथाऽन्यमासेषु कृतो हि धर्मश्चैत्रेण हीनश्च वृथैव याति ॥३०॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन येन केनापि वेदिना । चैत्रमासस्य यो धर्मः कर्तव्य इति निश्चयः ॥३१॥
न नन्दनोः पृथ्व्याम् समो न रामतोऽन्यो वसुदेवसूनुः ।
अन्य श्चाप्य पुरश्चररूप चैत्रे तु कार्यं विधिवत्प्रपूजनम् ॥३२॥
अजकीर्तिमुद्दिश्य मीनमध्ये दिवाकर । प्रातः स्नात्वा जपेद्राममन्यथा नार्क व्रजेत् ॥३३॥
चैत्रमासो हि सकलः स तारादण्डैवतः । यद्यत्कर्म हि तन्मर्त्य तमुद्दिश्य चरेन्नरः ॥३४॥
जानकीकांत हे राम चैत्रे मीनगते रवौ । प्रातःस्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु राघव ॥३५॥
चैत्रस्य मीनगे भानौ प्रातःस्नानपरायणः । अर्घ्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण रघुनन्दन । ३६ ।
गङ्गायाः सलिलैः सर्वैर्निर्यान्ति जलदा नदाः । प्रतिगृह्य मया दत्तमर्घ्यं सम्यक् प्रसीदथ ॥३७॥
ब्रह्माद्या देवताः सर्वा ऋषयो ये च वैष्णवाः । ते गृह्णन्तु मया दत्तं प्रसीदन्त्वर्घ्यदानतः ॥३८॥

उसे दण्डरूप रूप देकर बदलता अपने स्थानपर चले जाते हैं । अतएव हे शिष्य ! इस समय अवश्य स्नान
करना चाहिए । २५ ॥ चैत्रके समान कोई मास नहीं है, सत्ययुगके समान कोई युग नहीं है, वेदके समान कोई
शास्त्र नहीं है, गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं है, जलदानके समान कोई दान नहीं है, भार्याके समान कोई
सुख नहीं है, उसी तरह चैत्रके समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसलिए यह चैत्रमास
सदा विष्णुरूप भगवान्‌का प्रिय रहा है । जो मनुष्य बिना व्रत किए ही यह मास बिता देता है, वह चांडाल होता है
॥ २८ ॥ जिस तरह कि सर्वसम्पत्तिमय होकर भी बिना छत्रके घर नहीं अच्छा लगता, जिस तरह कि
कोई कन्या सब सुलक्षणोंसे युक्त होती हुई वा औपनयिका न हो तो वह नहीं अच्छी मालूम होती, जिस
तरह कि नमकके बिना शाक अच्छा नहीं लगता, जिस तरह बिना उत्सवके सभा नहीं अच्छी लगती,
बिना वस्त्रविहीन नारी नहीं शोभन होती, उसी तरह और-और मासोमें शुभकार्य करनेका भी कोई लाभ
नहीं हुआ अर्थात् वह व्यर्थ ही जाता है ॥ २९ ॥ ३० ॥ अतएव कोई भी मनुष्य हो, उसे चैत्रमासके धर्मका
पालन करना ही चाहिए ॥ ३१ ॥ श्रीकृष्णसे पृथक् अगम नहीं है और न श्रीरामसे पृथक् श्रीकृष्ण
ही है। इसलिए यह उचित है कि चैत्रमासमें श्रद्धाभक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका विधिवत् पूजन करे
॥ ३२ ॥ जबकि सूर्यदेव मीन राशिपर चले गये हों, उस समय प्रातःस्नान करके रामनामका जप करना
चाहिए । जो ऐसा नहीं करता, वह नरकगामी होता है ॥ ३३ ॥ सारे चैत्रमासके देवता राम और सीता ही
हैं । अतएव उस समय जो कुछ भी कार्य करे, वह सब उन्हींके उद्देश्यसे करे ॥ ३४ ॥ स्नानके पहिले इस तरह
प्रार्थना करनी चाहिए कि हे जानकीकान्त ! हे राम ! सूर्यके मीन राशिपर जानेके अनन्तर मैं चैत्रमासमें प्रातः-
स्नान करूँगा । कृपया मेरे इस पुनीत स्नानकार्यको निर्विघ्न समाप्त होने दीजिए ॥ ३५ ॥ आज सूर्य-
देवके मीन राशिपर चले जानेके अनन्तर मैं प्रातःस्नान करके आपको अर्घ्य दूँगा । हे रघुनन्दन ! उसे आप
स्वीकार कीजिए । गंगा आदिके सब नदें, सारे तीर्थ, मेघ तथा नद आदिका जल लेकर मैं आपको अर्घ्य
प्रदान कर रहा हूँ, इससे आप प्रसन्न हों ॥ ३६ । ३७ ॥ ब्रह्मा आदि देवता, समस्त नदियाँ और सब वैष्णव

६७६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १०


ऋषभः पापिनां शास्ता त्वं नृपं समदर्शनः । गृहाणार्थ्यं मया दत्तं यथोक्तफलदो भव ॥३९॥
इति चार्घ्यं समर्प्याथ पश्चात्स्नानं समाचरेत् । वाससी परिधायाथ कुर्यात् कर्माणि सर्वशः ॥४०॥
जानकीकांतमभ्यर्च्य प्रसूनैर्मधुसंभवैः । श्रुत्वा रामकथां दिव्यामेतन्मासप्रशंसिनीम् ॥४१॥
कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुक्तो मोक्षमवाप्नुयात् । चैत्रे यः कांस्यभोजी हि तथा चाश्रुतसत्कथः ॥४२॥
न स्नानञ्चाप्यदत्ता च नारकानेव विंदति । यथा माघः प्रयागे हि स्नानतः पुण्यमिच्छताम्॥४३॥
कार्तिकोऽपि यथा काश्यां पञ्चगङ्गाजले स्मृतः । द्वारकायां यथा प्रोक्तो वैशाखो माधवप्रियः । ४४॥
अयोध्यायां रामतीर्थे तथा चैत्रे प्रकीर्तितः । प्रयागे मासमात्रेण यत्फलं प्राप्यते नरैः ॥४५॥
अयोध्यायां रामतीर्थे सकृत्स्नानेन तत्फलम् । वैशाखद्वादशभवं पुण्यं यद्गोमतीजले ॥४६॥
तत्पुण्यं सरयूतोयेऽयोध्यायां प्राप्यते नरैः । चैत्रे मयि त्रिभिः स्नानै रामतीर्थे न संशयः ॥४७॥
कार्तिके पंचगङ्गायां यैः स्नां द्वादशाब्दकम् । अयोध्यायां रामतीर्थे चैत्रे पक्षेण तत्फलम् ॥४८॥
अयोध्या दुर्लभा लोके नराणां पापकारिणाम् । तावद्गर्जन्ति पापानि यावद्दृष्टा न सा पुरी ॥४९॥
अयोध्याया यदाऽभावस्तदा रामकृतानि च । जगन्त्यां यानि तीर्थानि तत्र स्नानं विधीयताम्५०॥
यत्रापोध्यापुरी नास्ति स्नानार्थे सरयूर्न च । रामतीर्थं न यत्रास्ति तदा तीर्थेषु कारयेत् ॥५१॥
तैलाभ्यंगं दिवास्वापस्तथा वै कांस्यभोजनम् । खट्वानिद्रा गृहे स्नानं निषिद्धस्य च भक्षणम् ॥५२॥
चैत्रे तु वर्जयेदेतौ द्विरुक्तं नक्तभोजनम् । चैत्रे माघे तु मध्याह्ने श्रान्तानां च द्विजन्मनाम् ॥५३॥
पादावनेजनं कुर्यात्सुव्रतं तु व्रतोत्तमम् । मार्गेऽध्वगानां यो मर्त्यः प्रपादानं च चैत्रके ॥५४।


ऋषि मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करते हुए प्रसन्न हों । ३८ । हे पाषियोंपर शासन करनेवाले यमदेवता ! आप समदर्शी हैं । मेरे इस अर्घ्यदानको ग्रहण करिए और यथोचित फल दीजिए । ३९ । इस तरह अर्घ्य समर्पण करनेके अनन्तर स्नान करे । तदनन्तर कपडे बदलकर और कोई काम करना चाहिए । ४० ॥ इसके बाद वसन्त ऋतुमें उत्पन्न फूलोंसे जानकीकान्तका पूजन करे और चैत्रमासकी प्रशंसा करनेवाली कथाएं सुने । ४१ ॥ ऐसा करनेसे करोड़ों जन्मके एकत्रित पातक नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य चैत्रमासमें काँसेके पात्रमें भोजन करता है और मन्दो अञ्छा कथाने नहीं सुनता, न किसी पवित्र तीर्थमें स्नान करता है और न दान ही देता है, उसे नरकके सिवाय और किसी गतिकी प्राप्ति नहीं होती । जिस तरह कि पुण्यप्राप्तिके लिए लोग माघमासमें प्रयागस्नान करते हैं ; ४२ ॥ ४३ ॥ जैसे कात्तिकमासमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करते हैं, वैसे वैशाखमासमें द्वारकाजीमें स्नान करते हैं, उसी तरह रामभक्तोंको चाहिए कि चैत्रमासमें अयोध्या-स्नान अवश्य करें । एक महीना प्रयागमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है. वही फल अयोध्याके रामतीर्थमें केवल एक बारके स्नानसे मिल जाता है। बारह बार वैशाखमासमें द्वारकाकी गोमती नदीमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वही फल अयोध्याके सरयूजलमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है। किन्तु यह फल तब मिलता है, जब चैत्र मासमें तीन बार रामतीर्थम स्नान किया जाय ॥ ४४-४७ ॥ बारह बरस तक कात्तिकमें काशीकी पञ्चगङ्गामें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल केवल एक पखतक अयोध्या-की सरयूजीमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है । ४८ ॥ पापियोंके लिए अयोध्या दुर्लभ तीर्थ है; पापगण तभी तक गर्जन करते हैं, जबतक प्राणी अयोध्यापुरीका दर्शन नहीं कर लेता । ४९ । यदि किसी शावक फलकी अयोध्या प्राप्त न हो सके तो रामचन्द्रज ने जिन तीर्थोंका निर्माण किया हो वहाँपर स्नान करे ॥ ५० ॥ जहाँ कि न अयोध्या है, न सरयूजी हैं और न कोई रामतीर्थ ही है। वहाँ जो कोई भी तीर्थ हो, उसीमें स्नान कर ले ॥ ५१ ॥ तेल लगाना, दिनमें सोना, कांस्यपात्रमें भोजन करना, चारपाईपर सोना, घरमें स्नान करना, किसी प्रकारका निषिद्ध भोजन, रात्रिके समय भोजन तथा दिनमें दो बार भोजन इन आठ बातोंको चैत्रमासमें छोड़ देना चाहिए । चैत्रमासमें जो प्राणी दोपहरके समय थके हुए ब्राह्मणोंके पैर धोता है, वह मानो सर्वोत्तम व्रत करता है। जो प्राणी चैत्रमासमें राह चलनेवालोंको जल पिलाता है और रास्तेमें