श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥
सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् २२१
संपूज्य शंकरं भक्त्या चानयामास मण्डपम् । एवं सह पदान्यग्रे गत्वा समोद्य शंकरम् ॥ ६ ॥
नमस्कृत्य समानीय निवेश्य गिरिजाधवम् । हेमपात्रे भवेद्भक्त्य हेमपात्रे स्वहस्ततः ॥ ७॥
पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥
जलधारां यथायोग्यां प्रोक्षयामास जननः। रामेने गता सीता दृष्ट्वा दद्युगणस्तदा ॥ ९॥
अनिमेषाः कंजनेत्रकटाक्षाः मन्दिगतय हि। तन्मयेऽनेधमः सम्मन्न न विदुः के वयं स्थित ॥ १०॥
तुष्टुवुस्तत्र कपिने सुराः श्रीरामयं मुदा। गन्धर्वा तुष्टुवुः केचित् प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥११॥
एवं निर्जङ्गमानां मनोपस्त्वं ई शभूत्। अतोवस्य नयेद्दृष्ट्वा रूपं कोटिरविप्रभम् १२॥
अथ रामः सीतया हि शंकरं गिरिजापतिम् । स्वयं मपूज्य सकलान् देवान् सौमित्रिणा ऋषीन् ॥१३॥
पूजयित्वाद्वयंवोढाख्यं शङ्करं लोकशङ्करम् अद्य धन्योऽस्म्यहं दद दर्शनात्तत्र सीतया ॥१४॥
अद्य मे सूर्यवंशेऽस्मिन् जन्म सफलयतः शतम् इति रामस्य वचनं श्रुत्वा स शशिभूषणः ॥१५॥
विहस्य राघवं प्राह वेद्मि मायां हरे तव त्वन्तः सिक्तपले ब्रह्मा ज्ञानस्तस्मात्पुनाभवः ॥१६॥
मरीच्याद्याः मरुद्भृतुः पौत्राः सप्राहतांगजः। मरीचेः कश्यपः पुत्रः सूर्यस्तनिशंशवापकः ॥१७॥
कश्यपात्सविता जज्ञे पौत्रपौत्रम्वरं प्रभा। रवेरत्रानः सूर्यवंशस्तद्वंशे तव जन्म वै ॥१८॥
मद्दंशसम्भवः सूर्यः किं मां मोहयसि प्रभो देवानां कार्यसिद्धयर्थमवतीर्णोऽसि मायया ॥१९॥
कुरु क्रीडां यथेच्छं त्वं यात्रापञ्चारिकीर्मुखैः शिक्षां करोषि लोकानां बहुभ्यहं रोहिते तव ॥२०॥
इति श्रुत्वा शंभुवाक्यं माहागर्वी विहस्य च यज्ञकुण्डसमीपे तु तस्थतुर्गुह्यसन्निधौ ॥२१॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र समाजग्मुः सहस्रशः गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धास्तथा चाप्सरसां गणाः॥२२॥
लोकपालाश्च दिक्पालाः रमानलतिरोहिताः। नवग्रहाः षटृतवः पश्चिनस्थमगस्तथा ॥२३॥
वेश्याओक नाना प्रकारके नाच और अनेक तरह बाजे-गाजके साथ हाथीपर रहकर लक्ष्मणजी उनकी अगवानीके लिए गये ॥ ४॥ ५। व भक्तिपूर्वक शङ्करभगवान्का यज्ञमण्डपम ल आए। राजाज भा उनको आते देखा तो पाँव सात पग आगे बढकर शङ्करजीको प्रणाम किया शिव-पार्वतीका सत्कार करक सुवर्णमय सिंहासनपर बैठाया। सत्कार मद्य सदा रामने अपने हाथ स्वर्णखचित एक बडे मणक पात्रम दोनोंका पादप्रक्षालन किया। सवन न० के मस्तकपर गिरिजेश जलदान करते। सम्मुख देवतागण निमेष रहन नेत्रों से उन दोनोंकी अनुपम शोभा देखकर चित्तिलखित-से होगए उनका यह तक ज्ञान नही रहा कि वे कौन हैं। ६-१०। उस समय दवगण मुदित होकर श्रीरामचन्द्र और माता जानकीकी स्तुति करने लगे ॥ ११॥ इस प्रकार मन्त्रिगण भी जानकी कविके समान प्रभावाली अनुपम सौन्दर्य देखकर देवताओंका अभाव प्रसन्नता हुई ॥ १२॥ इसके बाद सीता और लक्ष्मणजी सहित रामजीने शिव-पार्वती तथा सब देवताओंकी पूजा का ॥ १३॥ सर्व सुख कल्याण कत्तव्य से शङ्करकी पूजा करके रामजी कहने लगे-हे भगवन् ! आज में धन्य हुआ॥ १४। आज भयंकर सूर्यवंश में जन्म लेने से मेरा जन्म धारण करना सफल हुआ। इस प्रकार रामजीक बचन सुनकर शशिशेखर श्री शङ्करजी ने कहा-हे राघव ! आपकी मायाको मैं जानता हूँ। आपके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए और उस ब्रह्मासे सम्पूर्ण मुनिगण उत्पन्न हुए हैं ॥ १६॥ उन निष्पाप मरीचि प्रभृति म० मुनि उत्पन्न भये और उन मुनिगणों से सपूर्ण सृष्टि की विस्तृत किया ॥ १७॥ उन कश्यपके पुत्र सूर्य हुए। इस प्रकार आपके पौत्रक परम्परासे सूर्यवंश बना। उस सूर्यवंशम आपका जन्म हुआ यह सब आपकी माया ही है। किस प्रकार मुझे अपनी मायाजालमें फँसाते हैं? आप अपनी मायासे देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए पूर्णरूप अवतीर्ण हुए हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ यात्रा-यज्ञादि कौतुकसे आप यथेच्छ क्रीड़ा करिये। में आपकी सब चष्टाओंको समझता हूँ। आप संसारको शिक्षित करनेके लिए ही ऐसा करते हैं। २०। इस प्रकार शिवजीके कथनको सुनकर सीता और रामजी हंसे। तदनन्तर वे यज्ञकुण्डके समीप स्थित गुह वसिष्ठक पास गये ॥ २१॥ इसी समय हजारों यक्ष, गन्धर्व, किन्नर,
| २९२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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ऋक्षाणि तिथयो योगा करणानि च राशयः । पर्वताम्भरसः सर्वे सागराश्च नदा अपि ॥२४॥
सरोवराणि नद्यश्च वाप्यः कूपह्रदास्तरे । धृत्वा जगद्रूपाणि ययुस्ते यज्ञमण्डपम् ॥२५॥
समागतश्च संपातिर्गुहो मकरध्वजः । प्रहायौ च लङ्काया राक्षसेश विभीषणः ॥२६॥
आतिना राघवेणापि सर्वं तस्थुः प्रपूजिताः । स्वनिर्दिके स्थापिताः पूर्व सर्वेश्वाभूर प्लवंगमाः ॥२७॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र समायातो मुनीश्वरः । कुम्भोदरो महातेजाः सीमाचार्यावलोकितः ॥२८॥
तं दृष्ट्वा भयभीतास्ते सर्वे प्रोचुः परस्परम् । हा कष्टं पुनरायातः सोऽय कुम्भोदरो मुनिः ॥२९॥
यात्राम्रमो राघवस्य यन्निमित्तो बभूव ह । यद्वाक्यादश्वमेधोऽपि सर्वेषां संबभूव ह ॥३०॥
महान् भ्रमांशपपुष्टे तु श्रमणो जगतीतले । अधुनाऽपि समायातः किमग्रे वै पुनर्भवेत् ॥३१॥
कुप्येत न तदृष्टो राघवस्यापि निंदकः । एवं नानाविधा वाचः सीमाचारगणोरिताः ॥३२॥
शृण्वन् कुम्भोदरस्तूष्णीं ययौ यज्ञभुवं प्रति । सदागमनपूर्वे स सीमाचारैर्निवेदितः ॥३३॥
धावद्भिर्वेपमानैश्च स्थलाद्गामिश्चरान्वितैः । राम राम महाबाहो हे लक्ष्मण शृणु प्रभो ॥३४॥
यात्रायज्ञश्च यद्वाक्यात् समायातः स वै पुनः । कुम्भोदरो मुनिश्रेष्ठो राम त्वय्यपि निष्ठुरः ॥३५॥
तद्द्तवचनं श्रुत्वा सर्वे तद्दर्शनात्सुकाः । त्यक्त्वा स्वीयानिकर्माणि चोत्सुरुस्तद्दिक्षया॥३६॥
ऋत्विजो राघवः सीता न भयं सेजिरे मुनेः । कुम्भोदरो यज्ञवाटं ययौ सर्वविलोकितः ॥३७॥
अतिखर्वः स्थूलशिराः श्याम्यरूपः महोदकः । स्थूलोदरः पिंगनेत्रः सर्पपाना जटाधरः ॥३८॥
चीरवासाः खर्वपादः खर्वहस्तो महामुनिः । पुरा किंचित् श्मश्रुयुक्तो धृतदण्डकमण्डलुः ॥३९॥
तं दृष्ट्वा सकला लोका भयं प्रापुः स्वचेतसि । पूर्वकर्म च संस्मृत्य श्रुत्य च परस्परम् ॥४०॥
एतस्मिन्नन्तरे रामः शीघ्रं प्रत्युद्जगाम तम् । मार्तण्डं प्रणम्येवाथ करं धृत्वा तु मंडपम् ॥४१॥
सिद्ध चारण एवं अप्सराओंका गण आया ॥ २२ ॥ सम्पूर्ण दिक्पाल, दिक्पाल तथा मन्दलनिवासी भी आये । नवो ग्रह, छट्टा ऋतुवें, साठो सम्वत्सर एवं तिथि नक्षत्र योग करण राश पर्वत वृक्ष समुद्र नद नदी कूप तालाब तथा अन्य सूक्ष्म प्राणी सभा अपने जङ्गम रूप धारण करके मण्डप में पधारे ॥२३-२५॥ गृध्रराज संपाति, निषादराज एवं मकरध्वज आये तदनन्तर सभा राक्षसोंके साथ लंकाके विभीषण जी आये ॥ २६ ॥ भगवान् रामने सबकी पूजा का और अपने समीप बैठाया वानर पहिलसे ही वहां टिके थे ॥ २७ ॥ इसी समय महातेजा कुम्भोदर मुनि आये। यज्ञ भूमिकी सीमा पर निवास करनेवालोंने उन्हें आते हुए देखा ॥ २८ । वे देखकर बड़े भयभीत हुए और बोले अहो ! बड़े कष्टकी बात है। यह तो फिर वह कुम्भोदर मुनि आ गये ॥ २९ ॥ जिनके कारण भगवान् रामको यात्राका कष्ट हुआ था, जिनके कारण हम सबका अश्वमेध हो गया ॥ ३० ॥ छःङ्ग के पीछे यज्ञ समाप्त हुआ से उधर उधरसे इधर घूमते हुए अत्यन्त कष्ट भये । अब यह फिर आये हैं। अब आगे क्या होगा, सा हमलोग नही जानते। यह रामचन्द्रका बड़ा निन्दक है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार सीमाचारी लोगों की वाणियोको सुनते हुए कुम्भोदर चुपचाप यज्ञभूमिमे आये ॥ ३२ ॥ उनके आनके पूर्व ही बड़े वेगसे भागत-कांपते हुए दूतोंने आकर रामसे निवेदन किया-॥ ३३ ॥ हे राम ! हे महाबाहो लक्ष्मण हे प्रभो ! आप लोग सुने, जिसके वाक्यसे बारात गया और यज्ञ हुआ है वही कुम्भोदर मुनि फिर आये हैं। हे राम आपके ऊपर उनका बड़ा कठोर भाव है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ इस तरह दूतके वाक्य सुनकर सब अपने अपने कार्योंको छोड़कर उन्हें देखनेको उठे ॥ ३६ ॥ ऋत्विक् लोग, सीता तथा रामजी मुनिस भयभीत नहीं हुए। उनके देखते-देखते वे कुम्भोदर मुनि यज्ञभूमिमे आ पहुंचे ॥ ३७॥ जो बड़े नाटे थे जिनका मस्तक बड़ा था जिनका तरुईसा उभार था, जिनके श्यामल रूप था। जो खटाई पहने हुए तथा स्थूल उदरवाले थे पीले-पीले जिनके नेत्र थे। वे कौपीन पहिने तथा जटा धारण किये थे ॥ ३८ ॥ चीर पहिने हुए व छोटे-छोटे हाथोंवाले थे। मुचा होनेसे जिनके मूंछ आ रही थी और जो दण्ड-कमण्डलु धारण किये हुए थे ॥ ३९ ॥ उनका देखकर सम्पूर्ण जनसमुदाय और पहिले के कृत्योंको सुन सुन और स्मरण कर-करके मन ही मन भयभीत हुआ ॥ ४० ॥ उसी समय राम
सर्गः ४ ]
बालकाण्डम्
२२३
आनयामास श्रीरामो ददौ हेमासनं वरम् । कुम्भोदरो मुनिः शीघ्रं भूमौ डण्डकमण्डलू ॥४२॥
स्थापयामास वीराणि ननाम रघुनायकम् । रामः शीघ्रं कराभ्यां तं प्रत्युत्थाप्य मुनीश्वरम् । ४३ ।
गाढमालिङ्गय बाहुभ्यां ततो मुनिमभाषत । नाहं योग्यो वदनार्थं त्वया राजवघातकः ॥४४॥
इति रामवचोध्वैर्बाणैः संताडितो हृदि । कुम्भोदरस्तदोवाच यतवाटे रघूत्तमम् । ४५॥
राम राम महाबाहो न कोपः क्रियतां मयि । अपराधक्षम्यहं ते हि क्षमस्व रघुनायक । ४६॥
न मया स्वार्थमिष्टार्थं दोषारोपः कृतस्त्वयि । कृतः परोपकारार्थं तथा कीर्त्यै तवापि च ॥४७ ।
शिक्षार्थं सर्वलोकानां लल्लोभं च त्वयापि हि । यथैते मुनयः सर्वे तव मन्त्रोन्ननिर्मिते ॥४८॥
शतशो भोजनं चक्रुस्तथा भुक्तं मयाऽपि च । तदा कुतो महस्कीर्तिर्भवन्न मे रघुनन्दन ॥४९॥
इति निश्चित्य हृदये मया पूर्वं हिताय हि । लोकानां च कृतो यत्त्वन्मय्यपि दोषानुकीर्तनैः ॥५०॥
नोचेद्यात्रामप्रयुक्तः कथं राम भवेत्तव । यत्र यत्र च देशेषु तीर्थेषूपवनेषु च । ५१
आश्रमागमग्रामेषु नदीवनगिरिष्वपि । ये ये मनुजाः सर्वत्र नाना रूपेषु सत्पथाः ॥५२ ।
तव दर्शनलाभस्तु तेषां जातः सुखप्रदः । तत्राहं कारणं मन्ये चात्मानं रघुनन्दन ॥५३॥
ममान्तमुपकारंस्तु जनैः सर्वत्र कीर्त्यते । कुम्भोदरप्रसादेन नः सीतारामदर्शनम् । ५४॥
जातं विषयलुब्धानामिति मे कृतकृत्यता । जाता समन्ततः कीर्तिन्त्वयि दोषानुकीर्तनात् ॥५५॥
तवापि कीर्तिः सर्वत्र जाताऽत्र रघुनन्दन । रामेश्वरश्च सर्वत्र रामतीर्थान्यनेकशः ॥५६॥
यावद्भूभ्यां प्रमीयेत तावत्कीर्तिंस्तथापि च । अन्यच्च लोकशिक्षाऽपि जाता मद्वाक्यकारणात् ।५७।
कुम्भोदरेण मुनिना राघवस्य महात्मनः । दोषारोपः कृतः पूर्वं कथं नो न भविष्यति । ५८।
स्वदोषपरिहारार्थं राघवेण महात्मना । तीर्थयात्रा कृता पूर्वमस्माकं का कथा पुनः । ५९॥
इति स्मृत्वा भयं चित्ते सर्वत्र जगतीतले । करिष्यन्ति जना यात्रां स्वदोषक्षालनाय हि । ६०॥
बड़ा सम्मानसे लाये और कुम्भोदरका गलास प्रणाम करके हाथम हाथ मिलाते हुए यज्ञमण्डपम न लाये और उन्हें सुवर्णनिर्मित आसन बैठनेक लिए दिया ॥ ४२॥ कुम्भोदरने भी शीघ्र ही भूमपर दण्ड कमण्डलु रख कर रघुनायक रामको प्रणाम किया । ४२॥ रामने शीघ्र मुनिको हाथाम उठा लिया और बाहुओंस दृढालिङ्गन करके बोले हे भगवन् ! रावणपालक मै आपकी वन्दना करन योग्य नहीं हूँ ।॥४३॥ ४४ । इस तरह रामके वाक्यवाणसे हृदयमे विद्ध कुम्भोदर रामसे कहने लगे ॥४५॥ हे राम ! हे महाबाहो ! आपको इस तरह मेरे ऊपर क्रोध नहीं करना चाहिए । मै आपका अपराधी हूँ। मुझ क्षमा करें ॥ ४६ ॥ मैने स्वार्थसिद्धिके लिए आपके उपर दोषारोपण नहीं किया था। किन्तु संसारका उपकार करनेके लिये, आपकी कीर्तिवृद्धिके लिए और संसारको शिक्षित करनेके लिए ही मैने ऐसा किया था सो आपन जान ही लिया होगा । ४७ ॥ ॥ ४८ ॥ जैसे इन मुनियोंने आपके अन्नसत्रम सैकडो बार भोजन किया है वैसे ही मैने भी भोजन किया है। आपकी और मेरी कीर्ति कैसे हो, पहलेसे ही यह निश्चय करके संसारके हितके लिए मैने आपकी निन्दा की थी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ अन्यथा हे राम ! विभिन्न तीर्थों तथा देशोंके लिए आपकी यात्रा नहीं होती । विविध तीर्थ, नदी, बन बगीचा तथा आश्रमोंम जो मनुष्य नाना कर्मान लिप्त हो रहे है, उनका जो आपका सुखप्रद दर्शनलाभ हुआ । उसमे मैं अपनेको ही कारण मानता हूँ ॥ ५१-५३ ॥ सब मनुष्य सभी जगह मेरे इस उपकारका कीर्तन करते हैं । वे कहते हैं कि कुम्भोदरको कृपासे ही हम लोगांको सीतारामके दर्शन मिल गये ॥ ५४ ॥ आपके ऊपर दोषारोपण कर दम्प विषयो जनांका भी आपका दर्शन प्राप्त हुआ । इससे मैं कृतकृत्य हो गया और चारो तरफ आपकी कीर्ति फैल गयी ॥ ५५ ॥ जबतक भूमण्डलपर विविध रामेश्वर महादेव और रामतीर्थ रहेंगे, तबतक आपकी कीर्ति संसारमे स्थिर रहेगा ॥ ५६ ॥ और फिर मेरे दुर्व्वाक्यके कारण ही यह लोकशिक्षा भी हो गयी कि कुम्भोदर मुनिन जब रामजीको दोष लगाया तब हमलोगोको कैसे न लगेगा ॥ ५७ । ।५८॥ प्राचीन समयमें महात्मा रामचन्द्रने दोषोंको नष्ट करनेके लिए तीर्थ किया था तो फिर हमलोगोंका तो कहना
| २२४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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मयि ब्रह्मणि पूर्णे च दोषारोपः कथं भवेत् । पद्मपत्रे जलस्पर्शो न घटेत यथा तथा ॥६१॥
यस्य भ्रूभंगमात्रेण ब्रह्मांडप्रलयो भवेत् । ब्रह्मांडांतर्गतान् जीवान् हरसि त्वं यदा मुहुः ॥६२॥
तदा दावानलोत्पन्ने किं घटेत जनार्दन । सर्पाणां च कथं मृत्युर्विदधाति तवाज्ञया ॥६३॥
तत्र संख्याऽत्र का कार्या त्वया दोषाः कृतास्त्विति । यथा चित्राणि कुड्ये हि लिखितानि सहस्रशः ॥६४॥
संमार्जितानि तेनैव तत्र दोषो भवेत्कथम् । तथा त्वमपि श्रीराम त्रिधा भूत्वा त्रिभिर्गुणैः ॥६५॥
सृष्टिं करोषि रजसा सत्त्वरूपेण पालनम् । तमोरूपेण संहारं विधिर्विष्णुशिवात्मकः ॥६६॥
अस्माभिस्तव तोषार्थं तीर्थयात्रा विधीयते । तव तीर्थैस्तु किं राम तीर्थीभूतगुणस्य च ॥६७॥
सर्वतीर्थेषु मुख्या या कीर्त्यते स्वर्गधुनी भुवि । तव दक्षिणपादस्यांगुष्ठाग्रजनिता तु सा ॥६८॥
सर्वाघिरजसः स्पर्शात्पवित्रा कीर्तिता भुवि । तव पादरजोमिश्रा दृश्यतेऽद्यापि सा सिता ॥६९॥
रजांस्यद्यापि दृश्यन्ते तव भागीरथीजले । इति नानाविधैर्वाक्यैस्तोपयामास राघवम् ॥७०॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां श्रीरामस्यान्ववेक्ष्य च । स्तुत्वा रामं राघवेण पूजितः स्थितवान्मुनिः ॥७१॥
रामोऽपि गुरुसान्निध्ये तस्थौ सीतासमन्वितः । निजासनेषु सर्वत्र तस्थुस्ते सकला जनाः ॥७२॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे यानकाण्डे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
( रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र )
विष्णुदास उवाच
गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद सविस्तरम् । कुम्भोदरेण मुनिना यत्स्तोत्रं समुदीरितम् ॥ १ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य शुभप्रदम् । श्रवणे तस्य मे प्रीतिर्जाताऽस्ति कथयस्व तत् ॥ २ ॥
हो गया है ॥ ५९ ॥ इस तरह पृथ्वीतलपर मनुष्यमात्र अपने चित्तम भयका अनुभव करके स्वदाहपरिहारार्थ तीर्थयात्रा करेंगे ॥ ६० ॥ जैसे कमलके पत्तेपर जलका स्पर्श नहीं हो सकता, वैसे ही आप पूर्ण ब्रह्ममें दोषारोप नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥ जिसके भ्रूभङ्गमात्रसे ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है वहा आप ब्रह्माण्डान्तर्गत सब जीवों- को आनन्द विलीन करते हैं ॥ ६२ ॥ तब हे जनार्दन आपपर दावानल कैसे हो सकता है ? अब आप ही की आज्ञासे मृत्यु सबका क्षय करती है ॥ ६३ ॥ तब आपने कितने दोष किये हैं ? इसकी गणना कौन कर सकता है। ६४ ॥ जैसे किसीने भित्तिपर चित्र लिखा और फिर उमान अपने हाथसे मिटा दिया। तब उसमें क्या दोष हो सकता है। उसी तरह आप भी तीनों गुणोंसे तीन तरहके अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपमें परिणत होकर रजोगुणसे सृष्टि, सत्त्वसे पालन और तमोगुणसे संहार करते हैं ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ हम लोग आपकी प्रसन्नताके लिए ही तीर्थयात्रा करते हैं। स्वतः तीर्थस्वरूप आपका तीर्थोसे क्या प्रयोजन है ॥ ६७ ॥ जिस गङ्गाकी लोग सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ मानते हैं, वह गङ्गा आपके दक्षिण पैरके अंगूठेस उत्पन्न हुई है ॥ ६८ ॥ वह आपके चरण रजस्पर्शसे ही पवित्र माना गया है इसी हाथन यह आज तक श्वेत दिखाई पड़ती है ॥ ६९ ॥ आज भी गङ्गाजीमे आपकी चरण-रज देख रहीं है। इस प्रकारके वाक्योंसे कुम्भोदरमुनि भगवान् रामको प्रसन्न किया ॥ ७० ॥ इसके बाद रामाष्टोत्तरशतनामसे रामकी स्तुति करके और रामके द्वारा पूजित होकर वे यथास्थान बैठ गये ॥ ७१ ॥ रामजी भी गुरुके समीप सीताके साथ जा बैठे। अन्यान्य लोग भी अपने-अपने आसनोंपर विराजमान हो गये ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
श्रीविष्णुदास बोले - हे गुरु ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। जो प्रश्न मैं पूछना चाहता हूँ, उसका आप विस्तृत उत्तर दीजिए ॥ १ ॥ कुम्भोदर मुनिने रामके जो अष्टोत्तरशत नामोंका शुभप्रद स्तोत्र कहा