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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तो मंत्रो वै षोडशाक्षरः । १४०॥

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३५


कीर्तनीयो मनुर्मर्त्यैः सर्वपातककृन्तनः। वीणावाद्यस्वरेणोच्चैः कलकंठेने सुस्वरः ॥१३९॥
मां पाह्यतिदीनं राघव त्वत्पदयुगलीन्मिति ।
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तो मंत्रो वै षोडशाक्षरः । १४०॥
जय जयेति वै चोक्त्वा राघवेति ततः परम् मप्ताक्षग्मनुश्चायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४१॥
जय जय राघव इति मनुः ।
जयजयेति संकीर्त्य तथा रघुवरेति च । अष्टाक्षरमनुश्चायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४२॥
जय जय रघुवर इति मनुः ।
त्वं मां पालयेत्युक्त्वा सीतारामेति वै पुनः । नवाक्षरमनुश्चामनुधायं कीर्तनीयः सदा नरैः ॥१४३॥
वीणावाद्यस्वरेणैव महापातकनाशनः । १४४॥
त्वं मां पालय सीताराम इति मनुः
सीताराम जयेत्युक्त्वा मनुः षडक्षरः स्मृतः कीर्तनीयः सदा मर्त्यैर्वीणावाद्येन सुस्वरः । १४५॥
सीताराम जय इति मनुः ।
श्रीसीतारामेति मनुर्ज्ञेयः पञ्चाक्षरः शुभः । कीर्तनीयः सदा मर्त्यैर्वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१४६॥
श्रीसीताराम इति मनुः ।
सीतारामेति मनुश्चतुर्वर्णात्मकः स्मृतः ।
सीताराम इति मनुः ।
श्रीरामेति त्र्यक्षरश्च रामेति द्व्यक्षरो मनुः ॥१४७॥
श्रीराम इति मनुः । राम इति मनुः ।
राकारो बिंदुना युक्तश्चैकवर्णात्मको मनुः । अयं सदा जपनीयः कीर्तनीयो न वै कदा ॥१४८॥
रां इति मनुः ।
रामजयेति चोक्त्वाऽऽदौ सीतारामेति वै ततः । राघवेति ततोऽप्यन्वा मंत्रस्त्वेकादशाक्षरः ॥१४९॥


फिर 'दीनं राघव' इसके बाद 'त्वत्पदयुग्मलीनम्' ऐसा कहे। यह षोडशाक्षर मन्त्र सब प्रकारके पापोंको काटनेवाला है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि बाजों और कोकिला जैसे मीठे तथा ऊँचे स्वरसे इस मन्त्रका कीर्तन करें ।। १३८ ॥ १३९ ॥ 'मां पाह्यतिदीनं राघव त्वत्पदयुग्मलीनम्' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। षोडशाक्षर मन्त्रोंमें यह दूसरा मन्त्र है । १४०।। पहले 'जय जय' ऐसा कहकर 'राघव' कहे । यह सप्ताक्षर मन्त्र है। लोगोंको इसका भी कीर्तन करते रहना चाहिए ।। १४१ ।। 'जय जय राघव' यह इस मन्त्र-का स्वरूप है। 'जय जय' कहकर 'रघुवर' कहे यह अष्टाक्षर मन्त्र है। लोगोंको इसका भी जप करते रहना चाहिए ।। १४२ ।। "जय जय रघुवर" यह इस मंत्रका स्वरूप है । "त्वं मां पालय" ऐसा कहकर "सीताराम" ऐसा कहे। यह नवाक्षर मन्त्र है। लोगोंको इस मन्त्रका भी जप तथा कीर्तन करते रहना चाहिये । क्योंकि यह बड़े बड़े पापोंका नाशक है ।। १४३ ।। १४४ ।। "त्वं मां पालय सीताराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। "सीताराम जय" यह षडक्षर राममन्त्र है। संसारके लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ इस मन्त्रका भी कीर्तन करें । "सीताराम जय' यह मन्त्रका स्वरूप है। "श्रीसीताराम" यह पञ्चाक्षर राम-मन्त्र है। यह भी महान् पातकोंका नाशक है। इसलिए लोगोंको इसका जप तथा कीर्तन करते रहना चाहिए ।। १४५ ।। १४६ ।। 'श्रीसीताराम' यह मन्त्रका स्वरूप है। "सीताराम" यह चतुर्वर्णात्मक राममन्त्र है। "श्रीराम" यह त्र्यक्षर राममन्त्र है। "राम" यह द्व्यक्षर मन्त्र कहा गया है ।। १४७ ।। 'श्रीराम' और 'राम' यह मन्त्रका स्वरूप है। राकारको बिन्दुयुक्त (रां) कर देनेसे एकाक्षर राममन्त्र हो जाता है। लोगोंको

७१६आनन्दरामायणे[ सर्गः १५

राम जय सीताराम राघवेति मनुः।

दशरथनदनेति रघुकुलेति वै ततः भूषणेति ततश्चोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥ १५०॥
विश्रामेति ततश्चोक्त्वा पंकजलोचनेति च रामेति द्व्यक्षरे चापि ह्यष्टाविंशाक्षरो मनुः ॥ १५१॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः प्रोक्तः पातकविध्वंसी सर्वकामप्रदायकः ॥ १५२॥
दशरथनंदन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन रामेति मनुः

सीताराम जयेत्युक्त्वा राघवेति ततः परम्। रामेति द्व्यक्षरे चापि मन्त्रस्त्वेकादशाक्षरः ॥ १५३॥
कीर्तनीयः सुस्वरेणैयं मन्त्रो वीणास्वरेण च। महापातकहन्त्रीकः सर्ववांछितदायकः ॥ १५४॥
सीताराम जय राघव रामेति मनुः।

एकादशाक्षराश्चायं मंत्रः प्रोक्तो मयाऽथ हि द्वितीयः परमो श्रेष्ठो महापातकनाशनः ॥ १५५॥
पञ्चवटीस्थितेत्युक्त्वा रामजयजयेति च दशरथानन्दनेति रामेति द्व्यक्षरे तथा ॥ १५६॥
एकविंशाक्षराश्चायं कीर्तनीयो महामनुः। कलकण्ठेन मर्त्यैश्च महापातकनाशनः ॥ १५७॥
पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनंदन रामेति मनुः।

दशरथसुतेत्युक्त्वा बालं वन्दे त्विति क्रमात् रामं घननीलमिति मत्रोऽयं षोडशाक्षरः ॥ १५८॥
द्वितीयोऽयं मया प्रोक्तः कीर्तनीयो मनोरमः वीणावाद्यस्वरेणैव वदापुण्यविवर्द्धनः ॥ १५९॥
दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलमिति मनुः।

कोदंडखंडनेत्युक्त्वा दशशिरोमर्दनेति च। कौसल्यासुतं रामेति सीतारामजन पेति वै। १६०॥
राजारामेति वै चोक्त्वा एकोनत्रिंशवर्णकः। कीर्तनीयो मनुश्चायं वीणावाद्येन सुस्वरः ॥ १६१॥
कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारामजन राजारामेति मनुः।


चाहिए कि इस एकाक्षर मन्त्रका केवल जप करे, कीर्तन नहीं ॥ १४८॥ 'रां' यह एकाक्षर मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'राम जय' कहकर 'सीताराम' और इसके बाद 'राघव' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षरात्मक राममन्त्र है ॥ १४९॥ "राम जय सीताराम राघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले "दशरथनन्दन" फिर 'रघुकुल' फिर 'भूषण' फिर 'कौसल्याविश्राम' फिर 'पंकजलोचन' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह अट्ठाईस अक्षरोंका राममन्त्र है ॥ १५० ॥ १५१ । लोगोंको वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे सदा इस मन्त्रका जप और कीर्तन करना चाहिए, क्योंकि यह सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला और अभीष्ट कामनाओंका पूर्ण करनेवाला मन्त्र है। 'दशरथनन्दन रघुकुलभूषण कौसल्याविश्राम पंकजलोचन राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'सीताराम जय' ऐसा कहकर 'राघव' और इसके बाद 'राम' ऐसा कहे। यह एकादशाक्षर मन्त्र है ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ यह भी सब प्रकारका पातक नष्ट करनेवाला है। 'सीताराम जय राघव राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है इसलिए लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे इसका जप और कीर्तन करे । क्योंकि सब प्रकारकी कामनाएं इससे पूर्ण हो जाती हैं ॥ १५४ ॥ 'पञ्चवटीस्थित' ऐसा कहकर "राम जय जय" और उसके बाद 'दशरथनन्दन राम' ऐसा कहे। यह एकविंशाक्षर राममहामन्त्र है। इसका भी मीठे स्वरसे कीर्तन करना चाहिए। क्योंकि यह महामन्त्र बड़े-बड़े पापकोंको नष्ट कर देता है। १५५ ॥ १५६ ॥ 'पञ्चवटीस्थित राम जय जय दशरथनन्दन राम" यह इस एकविंशाक्षर राममन्त्रका स्वरूप है। "दशरथसुत" ऐसा कहकर "बालं वन्दे और इसके बाद "रामं घननीलम्' यह कहे। यह षोडशाक्षर राममन्त्र है । षोडशाक्षर मन्त्रोंम यह बड़े-बड़े पातकोंको नष्ट करनेवाला महामन्त्र है । इसे भी वीणा आदि बाजाके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए क्योंकि यह अतिशय पुण्यवर्धन कारी मंत्र है ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ "दशरथसुतबालं वन्दे रामं घननीलम्" यह इस मन्त्रका स्वरूप है । 'कोदण्डखण्डन' ऐसा कहकर 'दशशिरोमर्दन' इसके बाद "कौसल्यासुत राम सीतारामजन" और "राजाराम" कहे। यह मन्त्र एकानत्रिंशाक्षरात्मक है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे

सर्ग १७] मनोहरकाण्डम् ७३७


कोदण्डभंजनेत्युक्त्वा रावणमर्दनेति च । कौसल्येति तथोक्त्वा विश्रामेति ततः परम् ॥१६२॥
सीतारंजनेति ततो राजारामेति वै ततः । सप्तविंशाक्षराख्यं मनु प्रोक्तः शुभप्रदः ॥१६३॥
कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
कोदण्डखंडनेत्युक्त्वा वालीताडन चेति वै । लङ्कादहनेति ततः पाषाणतारणेति च । १६४।
रावणमर्दनेत्युक्त्वा रविकुलेति वै ततः । भूपेति तथोक्त्वा कौसल्येति ततः परम् ॥१६५॥
विश्रामेति तथोक्त्वा सीतारंजन चेति वै । राजारामेति चोक्त्वा पञ्चाशदक्षरो मनुः । १६६॥
अयं सदा कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः । मन्त्रोऽयं हि नृणांऽत्रत्यं महापातकनाशनः ॥१६७॥
कोदण्डखंडन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजारामेति मनुः ।
एवं नानाविधा मंत्राः सन्ति शिष्य सहस्रशः । सहस्रवर्षपर्यन्तं कस्तान् वक्तुं भवेत् क्षमः । १६८॥
एते सर्वे कीर्तनाया वीणावाद्येन सुस्वराः । इदं चान्यज्जानीया न ज्ञेया मान्त्रगोत्तमाः । १६९॥
मंत्रशास्त्रेषु ये प्रोक्तास्ते जपाय एव मन्त्रिणे । नैयतः कीर्तनायान्यैः कीर्तनीयास्त्विमे स्मृताः १७०॥
एतान् मन्त्रान् पुरस्कृत्य प्रबन्धा विविधाः शुभाः । रचनीया बुधैश्च कुर्वाणैर्नामानि पाथिगद्गतान् ॥१७१।
ये ये नोक्ता मया मन्त्रास्तान् पुरस्कृत्य गद्यपद्यैः । बन्धने नैव दोषोऽस्ति तेनोष्टो जायते हरिः ॥१७२॥
मन्त्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च स्तुतिभिः कीर्तनादिभिः । प्राचीनैर्वा कविनूतैः रामो गेयः सदा नरैः ॥१७३॥
येन केन प्रकारेण कार्यं राघवचिन्तनम् । पापराशिः क्षयं दृष्ट्वा श्रीरामाच्चितनेन हि ॥
अवश्यत्र न संदेहः पावकेन यथा कुटी ॥१७४।
दंभेन वातिभक्त्या वा निष्कामाद्वा सकामतः । यद्यत्र राघवो गीतस्तेन पापं हुतं भवेत् ॥१७५॥


स्वरसे कीर्तन करना चाहिए ॥ १६० । १६० ॥ 'कोदण्डखण्डन दशशिरोमर्दन कौसल्यासुत राम सीतारंजन राजाराम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है 'कोदण्डभंजन कहकर 'रावणमर्दन' इसके बाद 'कौसल्याविश्राम' और 'सीतारंजन राजाराम' कहे । यह सताईसअक्षरात्मक शुभ राममन्त्र है ॥ १६१ । १६२ ॥ "कोदण्डभंजन रावणमर्दन कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। 'कोदण्डखण्डन' कहकर "वालीताडन" और इसके बाद क्रमशः लङ्कादहन पाषाणतारण "रावणमर्दन" "रविकुलभूषण" "कौसल्याविश्राम" और 'सीतारंजन राजाराम' ऐसा कह । यह पञ्चाशदक्षरात्मक राममन्त्र है, इसे भी वीणा आदि बाजोंके साथ मीठे स्वरसे गाना चाहिए । यह मन्त्र सब राममन्त्रोंमें श्रेष्ठ है और बडे बडे पातक नष्ट कर देता है ॥ १६३-१६६॥ 'कोदण्डखण्डन वालीताडन लङ्कादहन पाषाणतारण रावणमर्दन रविकुलभूषण कौसल्याविश्राम सीतारंजन राजाराम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। हे शिष्य ! इस प्रकार हजारों राममन्त्र हैं। जिन्हें कोई हजारों वर्ष तक कहता जाय, फिर भी पूरी तौरसे नहीं कह सकता । १६७॥ ऊपर बतलाये सब मन्त्रोंको वीणा आदि वाद्यके साथ मीठे स्वरसे गान चाहिए। श्रेष्ठ मनुष्योंको यह भी जान लेना चाहिए कि ये सब मन्त्र जपके लिए नहीं बल्कि गान करनेके लिए हैं। इसके अतिरिक्त मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जपनेके लिए हैं, गान करनेके लिए नहीं। बुद्धिमान् कवियोंको चाहिए कि इन्हीं मन्त्रोंके आधारपर विविध भाषाओंमें विविध प्रकारके प्रबन्धोंकी रचना करें ॥ १६८-१७० ॥ मैंने जिन जिन मन्त्रोंको नहीं बतलाया है उन्हें भी बुद्धिमान् लोग गद्य वा पद्यके रूपमें ला सकते हैं। उस ग्रन्थोंकी रचना करनेमें कोई दोष नहीं होता, बल्कि ऐसा करनेसे भगवान् प्रसन्न होते हैं । १७१॥ मन्त्र, प्रबन्ध, काव्य, स्तुति, कीर्तन ये सब प्राचीन हों या अपना ग्रीष्म नये बनाये गए हों, उनका कीर्तन करना चाहिए। किसी भी प्रकारसे रामका स्मरण करना जरूरी है। क्योंकि रामका ध्यान करनेपर सारी पापराशि उसी तरह क्षणभरमें जल जाती है। जैसे फूसकी कुटीमें आग लगते ही क्षणभरमें उसे जलाकर भस्म कर देता है । १७२-१७४ ॥ दम्भसे, भक्तिसे, निष्काम या सकाम जिस किसी तरह भी रामनामका कीर्तन करनेपर पाप जल जाता है ।१७५॥

७३८आनन्दरामायणे[ सर्गः १६

यथा वह्निस्तूलराशिं स्पर्शित्वाः कापनां विना । कामेन वा दहेत्येव क्षणात्तद्वन्न संशयः ॥१७६॥
मंत्रैः प्रबन्धैः काव्यैश्च नानाचारित्रवर्णनैः
अत्यशुद्धैः स्तुतो रामः कल्पितैरपि स्वेच्छया । तैश्च तुष्टो भवत्यत्र श्रीरामो नात्र संशयः ॥१७७।
विनाश्रयेण रामस्य यत्कृतं स्तवनादिकम् । तेनापि तुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः ॥१७८॥
आश्रयेणापि या निन्दा कृता श्रीराघवस्य च । सा भवेन्नरकायैव नात्र कार्या विचारणा ॥१७९।
किं शास्त्रैश्च पुराणैश्च पठितैः पाठितैरपि । यदि रामे रतिर्नास्ति तैर्भवेन्मानवस्य किम् ॥१८०॥
रामप्रीतिद्युतस्यात्र मूर्खस्यापि नरस्य च । तद्भाषाकृतस्तुत्याद्यैः प्रसन्नो जायते हरिः ॥१८१।
रामचन्द्रस्य प्राप्त्यर्थं यत्कृतं मानवैर्भुवि । तेनातितुष्टः श्रीरामो भवत्येव न संशयः । १८२।
रामो गेयश्चिन्तनीयोऽत्र रामः स्तव्यो रामः सेवानीयोऽत्र रामः ।
ध्येयो रामो वंदनीयोऽत्र रामो दृश्यो रामः सर्वभूतान्तरेषु ॥१८३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतं श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
लक्ष्मणादीनां कवचादिनिरूपणं नाम पञ्चदशः सर्गः । १५ ।


षोडशः सर्गः

( हनुमत्पताकारोपण व्रत )

श्रीरामदास उवाच
एवं यद्यत्त्वया पृष्टं तन्मया परिवर्णितम् । किमन्यच्छ्रोतुकामस्त्वं तद्वदस्व वदामि ते ॥ १ ॥

विष्णुदास उवाच
रामायणं नरः श्रुत्वा किं विधानं समाचरेत् । तच्च वद महाभाग यद्यस्ति तत्सविस्तरम् ॥ २ ॥

श्रीरामदास उवाच
रामायणे श्रुते दद्याद्रथं हेममयं सुधीः । चतुर्भिर्वाजिभिर्युक्तं तथा क्षौमपताकया ॥ ३ ॥


जिस तरह बड़ीसे बड़ी रूईकी राशिको अग्नि जला डालती है, उसी तरह किसी कामनासे या बिना कामना होके रामका कीर्तन तत्क्षण पापराशिको भस्म कर देता है । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १७६ ॥ मन्त्र प्रबन्ध तथा विविध प्रकारके चरित्रोंसे पूर्ण काव्योंसे या अपने बनाये अतिअशुद्ध पदोंसे ही रामका कीर्तन क्या जाता है तो भी भगवान् प्रसन्न होते हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १७७ । बिना किसी आधारके भ बने काव्योंसे रामकी स्तुति करनेसे रामचन्द्रजी प्रसन्न होते हैं । यदि रामका आधार लेकर काव्य बनाया जाय और उसमें भगवान्‌की निन्दा की जाय तो वह नरकका ही साधन होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है । १७८ ॥ १७९ । यदि राममें प्रीति नहीं है तो बहुतेरे शास्त्रों और पुराणोंके पठन-पाठनसे कुछ भी लाभ नहीं होता ॥ १८० ॥ राममें प्रीति रखनेवाला मनुष्य चाहे मूर्ख ही हो किन्तु वह यदि अपनी टूटी-फूटी भाषामें भगवान्का गुण गाता है तो उससे भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १८१ ॥ इनके अतिरिक्त रामचन्द्रजीकी प्राप्तिके लिए जो कुछ भी उपाय किये जाते हैं, उनसे भगवान् अतिशय प्रसन्न होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १८२ ॥ इसलिए लोगोंको चाहिए कि सदा रामका गुण गायें, उनका स्मरण करें, सेवा करें, ध्यान करें, और संसारके प्रत्येक प्राणीमें भगवान्की अलौकिक ज्योतिका दर्शन करें ॥ १८३ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे पञ्चदशः सर्गः। १५ ॥

श्रीरामदास बोले— हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, सो मैने कह सुनाया । अब क्या सुनना चाहते हो, सो कहूँ ॥ १ ॥ विष्णुदासने कहा— आनन्दरामायण सुननेके अनन्तर लोगोंको क्या-क्या विधान करना चाहिए, सो आप विस्तारपूर्वक हमें बतलाइए ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा—इस रामायणको सुननेके अनन्तर