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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 649 में से

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पृष्ठ 7

भूमिका। ५
' धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
( ८ अ० १५ श्लो०-)
धर्मके स्थान ।
भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है—
' पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ '
पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और शिक्षा, कल्प,
व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष और ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद, अथर्ववेद ये चौदह; विद्या तथा धर्मके स्थान हैं।
वेद्आदि प्रमाणग्रन्थों का विचार ।
वेद ।
मन्त्र और ब्राह्मण यह दोनों भाग मिलकर वेद कहलाता
है। आपस्तम्ब-मुनि ने यही वेद का लक्षण किया है- 'मन्त्र-
ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।' और यही अभिप्राय अन्यान्य-
मुनियों का भी है। वही कर्मसम्बन्धी अर्थ के बोधक मन्त्र
और बाकी के ब्राह्मण कहलाते हैं, यह बात जैमिनि मुनिने
मीमांसादर्शन में कही है- ' तच्चोदकेषु मन्त्राख्या ।
(शेषे ब्राह्मणशब्दः ।' उसका आशय आचार्यों ने यह कहा
है कि वेदमें जितने भाग का मन्त्र नाम से व्यवहार होता आया
है वह मन्त्रभाग और बाकी ब्राह्मणभाग है ।
वेदके भेद ।
वेद चार प्रकार का है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और
अथर्ववेद । पहले तीन वेदों का नाम ऋक् आदि तीन प्रकार