मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय । ३१
कृष्णमृग, रुरुमृग और अज इनके चर्म को क्रम से तीनों वर्ण
के ब्रह्मचारी धारण करें और सन, क्षौम (अलसी) और ऊन का
वस्त्र धारण करें। मूंज की तिलड़ी और चिकनी मेखला ब्राह्मण
की बनावे, क्षत्रिय की मूर्वा नामक वेल के रेसे की गुणसी बनावे,
और वैश्य की सन के डोरे की बनाना चाहिए। यदि मूँज न मिले
तो कुश, अश्मन्तक, बल्वज तृणों से तीनों वर्णों की मेखला बनावे।
यह तीन लर की एक, तीन, वा पाँच गांठ लगाकर धारण करना
चाहिए ॥ ४१-४३ ॥
कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् ।
शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसौत्रिकम् ॥ ४४ ॥
ब्राह्मणो बैल्वपालाशौ क्षत्रियो वाटखादिरौ ।
पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ ४५ ॥
केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः ।
ललाटसंमितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ ४६ ॥
ऋजवस्ते तु सर्वे स्युरव्रणाः सौम्यदर्शनाः ।
अनुद्वेगकरा नॄणां सत्वचो नाग्निदूषिताः ॥ ४७ ॥
ब्राह्मण का यज्ञोपवीत सूत का, क्षत्रिय का सन का और वैश्य
का भेड़ की ऊन का, ऊपर को बटा हुआ (दाहिने हाथ से) तीन
लर का होना चाहिए । धर्मशास्त्र के अनुसार, ब्राह्मण बेल वा
पलाश का दण्ड, क्षत्रिय वट वा खैर की लकड़ी का, वैश्य पीलू
वा गूलर का धारण करे। ब्राह्मण का दण्ड ऊंचाई में शिखा तक,
क्षत्रिय का मस्तक तक और वैश्य का नाक तक होना चाहिए ।
ये सब दण्ड सीधे, छेदरहित, देखने में सुन्दर, दूसरे को भय
न करनेवाले, वकले के सहित और आग में न जले हुए, होने
चाहिए ॥ ४४-४७ ॥
प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम् ।
प्रदक्षिणं परीत्याग्निं चरेद्भैक्ष्यं यथाविधि ॥ ४८ ॥