मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय । २६
शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम् ।
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रैष्यसंयुतम् ॥ ३२ ॥
स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम् ।
मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥ ३३ ॥
ब्राह्मण का नाम मङ्गलवाचक शब्द, क्षत्रिय का बलवाचक,
वैश्य का धनयुक्त और शूद्र का दासयुक्त नाम होना चाहिये ।
ब्राह्मणों के नाम में शर्मा, क्षत्रियों के वर्मा, वैश्यों के भूति और शूद्रों
के दास लगाना चाहिए । जैसे शिवशर्मा, रामवर्मा आदि । स्त्रियों
के नाम सुख से उच्चारण योग्य, क्रूर न हो, वह साफ़, सुन्दर
मङ्गलवाची, अन्त में दीर्घाक्षरवाला और आशीर्वाद-शब्द से
मिला हो, जैसा सरला, विमला, यशोदा इत्यादि ॥ ३१-३३ ॥
चतुर्थे मासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् ।
षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मङ्गलं कुले ॥ ३४ ॥
चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः ।
प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्तव्यं श्रुतिचोदनात् ॥ ३५ ॥
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः ॥ ३६ ॥
बालक को चौथे महीने घर से बाहर निकाले । छठे महीने में
उसको अन्न खिलावे, या जैसी रीति अपने कुल में हो वैसा करे ।
चूडाकर्म, पहले या तीसरे वर्ष* करे, यह वेद की आज्ञा है ।
ब्राह्मण बालक का गर्भवर्ष से आठवें वर्ष यज्ञोपवीत करे, क्षत्रिय का
ग्यारहवें वर्ष और वैश्य का बारहवें वर्ष करना चाहिये † ॥३४-३६॥
- आश्वलायनगृह्यसूत्र में लिखा है-' तृतीये वर्षे चूडाकरणं यथा कुलधर्मं
वा।' प्रत्येक संस्कारों का विवरण, गृह्यसूत्रों में किया गया है । अपने अपने गृह्यसूत्रों
के अनुसार, संस्कार करना चाहिए ।
† 'अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमुपनयेद् गर्भाष्टमे वैकादशे क्षत्रियं द्वादशे वैश्यम् । '
आश्वलायनगृह्यसूत्र १ । २० ।