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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 649 में से

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पृष्ठ 420

२८० मनुस्मृति ।
विक्रीणीते परस्य स्वं योऽस्वामी स्वाम्यसंमतः ।
न तं नयेत साक्ष्यं तु स्तेनमस्तेनमानिनम् ॥ १९७ ॥
अवहार्यो भवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम् ।
निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम्॥ १९८॥
अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एव वा ।
अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथास्थितिः ॥ १९६ ॥
दूसरे की वस्तु विना मालिक की आज्ञा जिसने बेंची हो उस
चोर व साहूकार को विना गवाह चोर की भांति दण्ड देवे । दूसरे
की वस्तु बेंचनेवाला यदि उस धन के मालिक के वंश में हो तो
छः सौ पण दण्ड देवे और सम्बन्धी या बेंचने का अधिकार न
रखता हो तो चोर के मुवाफ़िक़ दण्ड योग्य है । इस प्रकार विना
मालिक की आज्ञा, बेंचा या दियाहुआ कोई पदार्थ नाजायज़ है ।
यही धर्मशास्त्र (क़ानून) की मर्यादा है ॥ १९७–१९६ ॥
सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् ।
आगमः कारणं तत्र न सम्भोग इति स्थितिः ॥ २०० ॥
विक्रियाद्यो धनं किञ्चिद् गृह्णीयात्कुलसन्निधौ ।
क्रयेण स विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम् ॥ २०१ ॥
अथ मूलमनाहार्यं प्रकाशक्रयशोधितः ।
अदण्ड्यो मुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम् ॥ २०२ ॥
नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमहति ।
न चासारं न च न्यूनं न दूरेण तिरोहितम् ॥ २०३ ॥
जिसको कोई वस्तु भोगते देखे पर खरीदते न देखा हो तो
दूसरे का खरीद का लेख आदि प्रमाण होगा। भोग प्रमाण न
होगा। यह व्यवहार की मर्यादा है। जो ज़ाहिर तौर से विकती