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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

चौथा अध्याय । १५६

चौथा अध्याय । १५६
स्नातकव्रतकल्पश्च सत्त्ववृद्धिकरः शुभः ॥ २५६ ॥
अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन् वेदशास्त्रवित् ।
व्यपेत कल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६० ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
चतुर्थोऽध्यायः ॥
महर्षि, पितर और देवताओं के ऋण से गृहस्थ को छुटकारा
लेकर और पुत्र के ऊपर घर का भार छोड़कर उदासीन वृत्ति से
जीवन बिताना चाहिए । एकान्त में अकेला बैठकर, अपना हित
चिन्तन करना। एकान्त में विचार करने से पुरुष मोक्ष पाता है।
इस प्रकार गृहस्थ ब्राह्मण की जीवननिर्वाह की रीति कही है और
स्नातक के आचरण का हाल भी कहा गया है । इस प्रकार के
आचरण को करता हुआ ब्राह्मण, निष्पाप होकर ब्रह्मलोक में पूजित
होता है ॥ २५७-२६० ॥
चौथा अध्याय पूरा हुआ।

अथ पञ्चमोऽध्यायः ।
श्रुत्वैतादृषयो धर्मान् स्नातकस्य यथोदितान् ।
इदमूचुर्महात्मानमनलप्रभवं भृगुम् ॥ १ ॥
एवं यथोक्तं विप्राणां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।
कथं मृत्युः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो ॥ २ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
श्रूयतां येन दोषेण मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ३ ॥
अनभ्यासेन वेदानांमाचारस्य च वर्जनात् ।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ४ ॥
पांचवां अध्याय ।
भक्ष्याभक्ष्य-व्यवस्था ।
इस प्रकार स्नातक ब्राह्मणों के धर्मों को सुनकर, अग्नि से
उत्पन्न * महात्मा भृगु से ऋषियों ने कहा—हे प्रभो ! इन विधियों
से धर्माचरण करनेवाले ब्राह्मणों को मृत्यु कैसे मार सकता है । यह
सुनकर, मनुपुत्र भृगु ने कहा—वेदाभ्यास न करना, सदाचार
को छोड़ना सदा आलसी रहना और अपवित्र भोजन से मृत्यु
मार लेता है ॥ १-४ ॥

  • पहले अध्याय में, दश प्रजापतियों की सृष्टि में मनु से भृगुसृष्टि कही है । यहाँ
    कल्पभेद से, अग्नि से उत्पन्न भृगु को लिखा है । मनु का अग्नि भी नाम कहीं
    लिखा मिलता है । कहीं प्रजापति नाम से भी लेख है ।