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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २५६

आठवां अध्याय । २५६
स्वभावेनैव यद्ब्रूयुस्तद्ग्राह्यं व्यावहारिकम् ।
अतो यदन्यद्विब्रूयुर्धर्मार्थं तदपार्थकम् ॥ ७८ ॥
बालक, बूढ़े और रोगियों के झूठ बोलने का संभव रहता है,
इसलिए उनके कहने पर भरोसा न रखे और चंचल चित्त मनुष्य
को भी विश्वासी न जाने । संपूर्ण साहस के काम खून, डाका
आग लगादेना और चोरी, व्यभिचार, गाली और मारपीट में सा-
क्षियों की अधिक परीक्षा-जांच न करे। दोनों तरफ के गवाहों में
यदि एक दूसरे के विपरीत कहे तो जिसको अधिक लोग कहें
वही बात मानी जाय । और जहां दोनों विपरीत कहनेवाले
समान हों वहां जिधर के गवाह गुणवान् हों उधर की बात सही
माने और दोनों ही तरफ गुणी हों तो धर्मात्मा द्विजों की गवाही
ठीक करे । जिसने आँखों से देखा हो या, जिसने खुद कानों से
सुना हो, उसकी गवाही मानी जाती है । उसमें सच बोलने
वाला साक्षी धर्म, अर्थ से नहीं हारता । जो पुरुष आर्यसभा में
देखे सुने के विरुद्ध गवाही देता है, वह उलटे शिर नरक में पड़ता
है । स्वर्ग से रहित होजाता है । जिस मामले में गवाह न भी हों
तो भी पूंछने पर जैसा देखा, सुना हो वही बयान करे । निर्लोभ
एक भी पुरुष गवाह काफ़ी होता है, पर बहुतसी पवित्र स्त्रियां
भी गवाह नहीं होसकतीं । क्योंकि-स्त्रीकी बुद्धि स्थिर नहीं होती ।
निर्णय के समय, गवाह स्वाभाविक रीति से जो कहे, उसको
प्रमाण माने । और भय-लोभ आदि से जो विरुद्ध बात कहें,
वह बिलकुल व्यर्थ है ॥ ७१-७८ ॥
सभान्तः साक्षिणः प्राप्तानर्थिप्रत्यर्थिसन्निधौ ।
प्राड्विवाकोऽनुयुञ्जीत विधिनानेन सान्त्वयन् ॥ ७९ ॥
यद्द्वयोरनयोर्वेत्थ कार्येऽस्मिन् चेष्टितं मिथः ।
तद्ब्रूत सर्वं सत्येन युष्माकं ह्यत्र साक्षिता ॥ ८० ॥

२६० मनुस्मृति ।
सत्यं साक्ष्ये ब्रुवन् साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान् ।
इह चानुत्तमां कीर्त्तिं वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ ८१ ॥
साक्ष्येऽनृतं वदन् पाशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम् ।
विवशः शतमाजातीस्तस्मात्साक्ष्यं वदेदृृतम् ॥ ८२ ॥
सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ ८३ ॥
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः ।
मावमंस्थाः स्वमात्मानं नॄणां साक्षिणमुत्तमम् ॥८४॥
सभा में गवाह आ जाने पर न्यायकर्त्ता वादी, प्रतिवादी के
सामने इसप्रकार कार्यारम्भ करे—इस मामला में आपस में जो
कुछ हुआ है वह जो तुम जानते हो सत्य कहो क्योंकि—इस में
तुम्हारी गवाही है । गवाह गवाही में सत्य बोलकर, उत्तम गति
को पाता है और यहां कीर्त्ति पाता है, सत्यवाणी की वेद में
प्रशंसा की है । गवाही में झूठबोलने वाला सौ जन्मतक वरुण
के पाशों से बांधा जाता है । इसलिए साक्षी सत्य देनी चाहिए ।
साक्षी सत्य से पवित्र होता है । सत्य से धर्म बढ़ता है, इसकारण
सब जाति के गवाहों को सत्य बोलना चाहिए । अपना आत्माही
अपना साक्षी है, आत्माही अपने को सद्गति देता है । इस लिए
मनुष्यों के उत्तम साक्षी अपने आत्मा का झूठ साक्षी से अपमान
न करे ॥ ७६-८४ ॥
मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः ।
तांस्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ॥ ८५ ॥
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्राकार्काग्नियमानिलाः ।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम् ॥ ८६ ॥