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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 649 में से

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पृष्ठ 400

२६० मनुस्मृति ।
सत्यं साक्ष्ये ब्रुवन् साक्षी लोकानाप्नोति पुष्कलान् ।
इह चानुत्तमां कीर्त्तिं वागेषा ब्रह्मपूजिता ॥ ८१ ॥
साक्ष्येऽनृतं वदन् पाशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम् ।
विवशः शतमाजातीस्तस्मात्साक्ष्यं वदेदृृतम् ॥ ८२ ॥
सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥ ८३ ॥
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी गतिरात्मा तथात्मनः ।
मावमंस्थाः स्वमात्मानं नॄणां साक्षिणमुत्तमम् ॥८४॥
सभा में गवाह आ जाने पर न्यायकर्त्ता वादी, प्रतिवादी के
सामने इसप्रकार कार्यारम्भ करे—इस मामला में आपस में जो
कुछ हुआ है वह जो तुम जानते हो सत्य कहो क्योंकि—इस में
तुम्हारी गवाही है । गवाह गवाही में सत्य बोलकर, उत्तम गति
को पाता है और यहां कीर्त्ति पाता है, सत्यवाणी की वेद में
प्रशंसा की है । गवाही में झूठबोलने वाला सौ जन्मतक वरुण
के पाशों से बांधा जाता है । इसलिए साक्षी सत्य देनी चाहिए ।
साक्षी सत्य से पवित्र होता है । सत्य से धर्म बढ़ता है, इसकारण
सब जाति के गवाहों को सत्य बोलना चाहिए । अपना आत्माही
अपना साक्षी है, आत्माही अपने को सद्गति देता है । इस लिए
मनुष्यों के उत्तम साक्षी अपने आत्मा का झूठ साक्षी से अपमान
न करे ॥ ७६-८४ ॥
मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः ।
तांस्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपूरुषः ॥ ८५ ॥
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्राकार्काग्नियमानिलाः ।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम् ॥ ८६ ॥