कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(८१)
दान देत लखि भांजी मारै । योग्यअयोग्य जो नाहि उचारे ॥
पर तप मँह कर विघ्न अनेका । नहिं हिय मँह जो करत विवेका ॥
आप छूँछ औरन ब्रत टारै । वेद शास्त्र जिन नाहि उचारे ॥
हरि यश सुनत दहैं मन माहीं । दूसर सुनै तो चित विचलाहीं ॥
तिनकर देह सो कूकर भखहीं । पुनि असिपत्रमांझ दुख भरहीं ॥
एकहु अक्षर गुरुसों सीखै । ताहि न मानै मन कर तीखै ॥
ते परहीं नर रौरव माहीं । बहुविध दुख भुगतहिं सो ताहीं ॥
जे नर हरत दीनके प्रानन । मित्रहि मारत दाहत कानन ॥
तिनहि अँगारन मांझ सुतावैं । यमगण दारुन त्रास दिखावैं ॥
जे गुरुधन हारक संसारा । किम कूप मँह परत निहारा ॥
जौन गुरु व्यभिचारी होई । प्रजहिं दुःख देई नर जोई ॥
शिष्य शंक जो नाहिं मिटावत । प्रजहिं न्याय जो नाहिं चुकावत ॥
युक्त अयुक्त न जानत जोई । करत सपक्ष न्याय शठ कोई ॥
ते नर अंध तामिस्त्र मँझारे । गिरत लखे पावत दुख भारे ॥
विन देखे पर दोष गिनावैं । यम गण तिनके नैन टँकावैं ॥
अप्रिय वचन औरहीं कहहीं । कारण छेददुख ते शठ लहहीं ॥
देव साधु ब्राह्मण धन हरई । तृष्णावश लोभहिं मन धरई ॥
सूचीमुख नरकहिं कर नाऊँ । ते तहैं जाइ वसावैं गाऊँ ॥
जे परतिय अभिलाषत प्रानी । निन्दत सुर गुरु भूसुर जानीं ॥
धर्मशास्त्र तीरथ हरिजन कर । निन्दा करत सुनहु दुख तिनकर ॥
पहिले शूलन पर बैठावैं । मुद्गर शूलनसे करि घावैं ॥
पाछे काक श्वान तेहि खाहीं । छेदहिं दुख सुख हेरत नाहीं ॥
भोगी बहुत काल प्रिय नारी । त्यागत ताहि अधम अविचारी ॥
विनु वैराग ताहिको त्यागे । ताहि त्यागि औरिन मँह पागे ॥
सो शठ नरकमाँहिं दुख पावै । कहँ लग कहौं कहत नहिं आवै ॥
कर पद बाँधि यम सासत देहीं । जो जस किये सो तस फल लेहीं ॥