सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 522

(७८)

अमरसिंह बोध

बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥
स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥
पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥
अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥
एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥
एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥
काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥
जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥
संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥
ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥
ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥

साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥
साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥

चौपाई

नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥
जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥

राजा बचन

तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥
यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥

साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥
सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥
धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥