कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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ज्ञानसागर
साखी-तासु दूत गण द्वारिका, अनिरुध अंश भुवार ॥
दोऊ उपजो मर्म अब, जस हंसनकी ज्वार ॥
चौपाई
दिवस आठ दस बीते जबही । अनिरुध कुँवर प्रगट भयो तबही ॥
बानासुर ने कोध दल साजा । अगणित बाज सम्हर कौ बाजा ॥
युद्ध करै दैत्य तहाँ जाई । अनिरुध सब कहँ मार हटाई ॥
छै प्रकार जीतो उन जबही । सातई बार भर्म भयो तबही ॥
दैत्य मार गहि समर अपारा । बाँध चपल कै कृष्ण कुँवारा ॥
कोई कहै मारो विषको मूला । शत्रु राखकै नृपकस भूला ॥
मंत्री कहई सुना भुवारा । शिव की आज्ञा मैं यह मारा ॥
नारद ऋषि तबही सुधि पाई । कृष्णहि बात जनावहु जाई ॥
चल भयो कृष्ण जो कोध अपारा । दैत्य जहाँ तहाँवा पशु धारा ॥
साखी-गरुड़ चढ़े तब कृष्ण सो, पुरही पहुँचे आय ॥
जाही नग्र अग्नि दियो, दैत्य राज तिहि ठाँयै ॥
चौपाई
आय दैत्य करै संग्रामा । हरि भेटें तेहि यम उन ग्रामा ॥
मारो हलधर अग्नित वीरा । बानासुर देख परे तेहि भीरा ॥
मोरा कृष्ण मता सुन आजू । अटल दियो महि शंकर राजू ॥
बहु विधि युद्ध दैत्य तब कीन्हा । कृष्ण चपल तेहि बाँध हिलीन्हा ॥
बाँध्यो नृप शंकर सुधि पाई । कोधित आई तब कृष्ण लराई ॥
दोनों वीर महा बल धारी । लागी होन परस्पर मारी ॥
दोनों मंत्र पुनि दीन अडाई । तारी मार मार पुन धाई ॥
दोह जुरे पुन मछ समाना । कौतुक आई निरंजन जाना ॥
दोउके समर पावक उठि जबही । आदि भवानी चलभइ तबही ॥
दोनों सुत कहँ जब बिलगावा । बादल पवनके जैसे स्वभावा ॥