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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 54

( ४४ )

ज्ञानसागर

जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारे ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फांस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्तनाम नहि पावै ॥

साखी-नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ॥

होय अटल जो निश्चय, जमराजा रहे हार बार ॥

चोपाई

सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊं । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊं ॥

कृष्णचरित्र

राम रूप त्रेता अवतारा । गयो वियोग सकल संसारा ॥
करै भेख बहुत विधि कैसा । लेखा मूल ब्याज है जैसा ॥
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्र गोपि निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करै नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरिके गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्यासुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव वैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बलपौरुरज जिहिकै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आंखी ॥
चलयो दैत्य आयो हरि पाहीं । सखा संग जहैं बाल कन्हाहीं ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही । चपट कै मारचो है हरि ताही ॥