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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 406

( ११० )

विवेकसागर

ठाढो सहित सहाय तब, मदन वीर बलवान ॥
दृष्टि परचो वैराग जब, कछुक दृष्टि सकुचान ॥
वस्तु विचार बोल्यो तबै, महाबली रण गाज ॥
सो हैं करत विवेककी, कित जै हैं रिपु भाज ॥
महाकोप करि बोल्यो, तबहीं सबल अनंग ॥
मो सन्मुख एतो बकै. करौ क्षणकमें भंग ॥
कुसुम धनुष वर हाथले, करों बाण सन्धान ॥
सकल अंग पलमें हैं, मेरो बल अप्रमान ॥
छूटे शर जो समर के, भयो युद्ध भयभीत ॥
गावत युगल समाज तहैं, रणरसमत्त जु गीत ॥
तब विचार वैरागसो, बूझत मन्त्र विचार ॥
अहौ बन्धु कीजे कहा. बडो सकल यह मार ॥
तब वैराग विचार के, दीन्हो मतो अन्त ॥
अहो बन्धु शोचत कहा, शोधो शुद्ध स्वरूप ॥
जग मिथ्या रजु सर्पवत, सत्य ब्रह्म निरधार ॥
छुद्र निंद्य नहिं चित धरो, हरो अनंग विकार ॥
जब वैराग महा बली, दीन्हो मतो अभंग ॥
वस्तु विचार चल्यो तबै, धरि उर परम उमंग ॥
रे निलज्ज पापी कुटिल, दुर्बुद्धी धृक तोह ॥
कहा वस्तु विचार ने, दुष्ट पिसन जन मोह ॥
कहो मार अतिदर्प करि, मैं मन मोहो भूप ॥
शंकरको मन मोहेऊँ, धरचो मोहिनी रूप ॥
मैं पराशर दहन कियो, रावणको घर खोय ॥
श्रुद्धी ऋषि वनमें छल्यो, परे त्रिशो वश सोय ॥
जीत्यो एक कटाक्षमें विद्यामित्र सुधीर ॥

१ विश्वामित्रजी मैनकाको देखकर कामातुर हुए थे जिससे शकुंतला का जन्म हुआ ।