सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

विवेकसागर

( १०९ )

मो रति अति दुस्तरण लखि, जीतैं मोहिं जग कोन ॥
ज्ञान विवेकै आहिदे, लखत मोहिं करि गौन ॥
पग नहिं टिकत सुधर्मको, नहिं धीरज ठहराय ॥
मेरी दृष्टि परतही, वैरागो नशि जाय ॥
मैं मन हरचो विरञ्चि को, निज पुत्री वश कीन ॥
शतंमख द्विजंजाया निरखी, भयो परम अर्धान ॥
है कोतो बल अंग तुव, अरे सुभट कहु मोहि ॥
मेटों मार विलम्ब नहिं, प्रलय करत हौं तोहि ॥
पछितान्यो कांप्यो हृदय, शोचत वस्तु विचार ॥
हौं निर्बल वैराग बिन, अहै सबल अतिमार ॥
वस्तु विचार फिरे तबै, महा समर भय मान ॥
तुरते राय विवेक पहैं, बन्धन कीन्है आन ॥
मन संकोचि दृग नीच करि, कहत वचन नृपपास ॥
मेरो बल पहुँचे नहीं, निष्फल भयी सब आस ॥
तब मन्त्री सत्संग कर, औ दूजी अभ्यास ॥
उत्तम मन्त्र विचार के, कहत नृपति के पास ॥
मकरध्वज भुज बल अमित, बाक वीर समरत्थ ॥
वस्तु विचार महाबली, करे ताहि निजहत्थ ॥
दीजै ताहि सहायको, भक्ति ज्ञान वैराग ॥
विजय करे रण सहजही, वस्तु विचार बडभाग ॥
सुनि विवेक मन सुख भयो, मान्यो मन्त्र हिय जु ॥
तीनों तुरत बुलाइके, ताके संग किय जु ॥
बल पायो फूलो हृदय, चले समर समुहाय ॥
मनसा भूमि सुहावनी, रचे युद्ध तहैं जाय ॥

१ इन्द्र । २ गौतमकी स्त्री । ३ कामदेव ।