कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सारविचार पचीसी
बोधसागर
( १३३ )
वीर हनुमान बोध के ले दिया पान प्रसादहो ॥
शेष शारद विष्णु नारद नाहि न पावैं आदि हो ॥
सोरठा-नाहिं न पावे आदि, शिव ब्रह्मा अरु नारद ॥
तुम्हरो वदन निहारि, धर्मदास वन्दन करे ॥
इति श्रीबोधसागरांतर्गतकबीरधर्मदाससंवादे
हनुमानबोधवर्णनो नाम सप्तमस्तत्रंगः
सारविचारपचीसी
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सारखी-ब्रह्मादि सनकादिलै, मुनिवर आदि प्रयन्त ॥
विन गुरु मोह निशा शयन, सुख अपने न लहन्त ॥ १ ॥
गुरुके गुण गावे सभी, सत्य सही विनु लक्ष ॥
मायाके उपदेश अज, हरिहर कालके भक्ष ॥ २ ॥
कर्म धर्म मति तीन ले, अज हरिहर समुदाय ॥
गावहिं ध्यावहिं ताहि कह, जेहि सब जीव नशाय ॥ ३ ॥
कहने को चूके नहीं, जेती जिसकी दौर ॥
सबै शब्द सहिदान है, परख शब्द सो ठौर ॥ ४ ॥
वही प्रमाण सबन मिलि कीन्हा, ज्यों अंधरे की हाथी ॥
आदि बाप कौ मरन जाने, पूत होत नहिं सारखी ॥ ५ ॥
अंधरे को हाथी सांच है, साचे हैं सगरे ॥
हाथन की टोई कहें, आंखिन के अंधरे ॥ ६ ॥
शब्दातीत शब्दते पाइन, बूझे विरला कोइ ॥
कहैं कवीर सतगुरु की सेना, आप मिटै तब ओइ ॥ ७ ॥
जीव दुखी चाहे छुटन, चीन्हे नाहीं काल ॥
आसा देवे निवृत्ति का, भोरे भवके जाल ॥ ८ ॥
( १३४ )
हनुमानबोध
तामस केरे तीन गुण, भौर लेइ तहँ वास ॥
एकै डारी तीन फल, भांटा ऊख कपास ॥ ९ ॥
जीव फँसे तेहि जाल में, सूझे वार न पार ॥
त्राहि त्राहि निशि दिन करे, साहब लेहु उबार ॥ १० ॥
साहब को जाने नहीं, हाकिम चोर प्रचण्ड ॥
यह ठाकुर यम देशमें, खण्डपिण्ड ब्रह्मण्ड ॥ ११ ॥
नित उपजे नित खपे, निश्चय नष्ट सो मूल ॥
परखहु काल कला सबै, देखि जगत मत भूल ॥ १२ ॥
झिलमिल झगरा झूलते, बाकी छुटी न काहु ॥
गोरख अटके काल पुर, कौन कहावे साहु ॥ १३ ॥
विनु पारख वाणी सुने, धावे ताके साथ ॥
घायल अनेकन भावसो, तजहिँ न पीटहि माथ ॥ १४ ॥
बहु कर्महि अरुझाइ जिव, डोरी अपने हाथ ॥
नाच नचावे यम सदा, कारण कारज साथ ॥ १५ ॥
चाहहि जो निस्तारन को, इन कर्मन छुटकाय ॥
तेहि तिहुँ फाँस लै धावहीं, बंदी देहि दृढाय ॥ १६ ॥
करम कमाई सबन पर, राज दाम परमान ॥
जन्मत मरत न छोड़ई, विविधि कर्म की खान ॥ १७ ॥
बन्दी खाना जो पड़े, जेहि राजा खुशियाल ॥
लोभ गरासे जीवको, सूझे नहीं भव जाल ॥ १८ ॥
जहर जमी दे रोपिया, अमी सींचै सौबार ॥
कवीर खुलंक ना तजै, जामे जौन विचार ॥ १९ ॥
इन्ह आखिन पथरा दिये, समझ दिये भ्रम जाल ॥
क्षण क्षण जीवन जीवके, भोगे काल कराल ॥ २० ॥
१ स्वभाव, प्रकृति ।
बोधसागर
( १३५ )
मूस विलाई एक सँग, कहु कैसे रहिजाय ॥
अचरज यक देखो संतो, हसती सिंहहि खाय ॥ २१ ॥
पूरण पिण्ड ब्रह्माण्डसो, त्रिगुण फांस लगाय ॥
नाशक नाशे जीवको, आपे आप कहाय ॥ २२ ॥
बन्दी छोड़ छुडावई, मेटि मेटि यम फांस ॥
धन्य धन्य सो जीव हैं, तजहिं महा भोगांस ॥ २३ ॥
प्रभु शरणागति परख दृढ, सत्य लोक परमान ॥
संसत जीव विलास है, दूटा काल गुमान ॥ २४ ॥
पारख सीढी झांकिके, उलटि बहे भवधार ॥
थाह न पावहिं बूडहीं, हो ताके निस्तार ॥ २५ ॥
इति
इति
श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थ हनुमानबोध
समाप्त
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित
श्री-लक्ष्मणबोध
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४
संस्कृत-शिक्षण-विभाग
प्रकाशक-विभाग
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संस्कृत-शिक्षण-विभाग
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सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely a deity or saint, wearing a crown and holding a staff or lotus. The figure is surrounded by a decorative border.
श्री श्री गणेशाय नमः