कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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हनुमानबोध
तामस केरे तीन गुण, भौर लेइ तहँ वास ॥
एकै डारी तीन फल, भांटा ऊख कपास ॥ ९ ॥
जीव फँसे तेहि जाल में, सूझे वार न पार ॥
त्राहि त्राहि निशि दिन करे, साहब लेहु उबार ॥ १० ॥
साहब को जाने नहीं, हाकिम चोर प्रचण्ड ॥
यह ठाकुर यम देशमें, खण्डपिण्ड ब्रह्मण्ड ॥ ११ ॥
नित उपजे नित खपे, निश्चय नष्ट सो मूल ॥
परखहु काल कला सबै, देखि जगत मत भूल ॥ १२ ॥
झिलमिल झगरा झूलते, बाकी छुटी न काहु ॥
गोरख अटके काल पुर, कौन कहावे साहु ॥ १३ ॥
विनु पारख वाणी सुने, धावे ताके साथ ॥
घायल अनेकन भावसो, तजहिँ न पीटहि माथ ॥ १४ ॥
बहु कर्महि अरुझाइ जिव, डोरी अपने हाथ ॥
नाच नचावे यम सदा, कारण कारज साथ ॥ १५ ॥
चाहहि जो निस्तारन को, इन कर्मन छुटकाय ॥
तेहि तिहुँ फाँस लै धावहीं, बंदी देहि दृढाय ॥ १६ ॥
करम कमाई सबन पर, राज दाम परमान ॥
जन्मत मरत न छोड़ई, विविधि कर्म की खान ॥ १७ ॥
बन्दी खाना जो पड़े, जेहि राजा खुशियाल ॥
लोभ गरासे जीवको, सूझे नहीं भव जाल ॥ १८ ॥
जहर जमी दे रोपिया, अमी सींचै सौबार ॥
कवीर खुलंक ना तजै, जामे जौन विचार ॥ १९ ॥
इन्ह आखिन पथरा दिये, समझ दिये भ्रम जाल ॥
क्षण क्षण जीवन जीवके, भोगे काल कराल ॥ २० ॥
१ स्वभाव, प्रकृति ।