कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीरसाहबका जीवोंको उपदेश करना
( ७४ )
अनुरागसागर
त्रेता युग जबही पगु धारा । मृत्युलोक कीन्हों पैसारा ॥
जीव अनेकन पूछा जाई । यमसे को तुहिं लेहिं छुड़ाई ॥
कहे भर्म वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥
विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमते मोहिं छुड़ावन हारा ॥
कोइ महेशकी आश लगावैं । कोइ चण्डी देवी गावैं ॥
कहा कहों जिव भयो विगाना । तजेउ खसमकहैंजारबिकाना ॥
कर्म कोठरी सब दिन डारा । फंदा दे सत जीवन मारा ॥
सत्य पुरुषकी आयसु पाऊँ । कालहि मेटि छोर जिवलाऊँ ॥
जोर करों तो वचन नसाई । सहजहिं जीवन लेउँ चित्ताई ॥
जो आसे जिव सेवैं ताहीं । अनचीन्है यमके सुख जाहीं ॥
विचित्र भाटकी कथा लंकामें
चहुँ दिश फिरि अयेउँ गढ़लंका । भाट विचित्र मिल्योनिःशंका ॥
तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥
सुनि विचित्र तबहिं भ्रम भागा । अति अधीनहैं चरणन लागा ॥
कहे शरण मुहिं दर्जै स्वामी । तुम सब पुरुषसमुखधामी ॥
कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजै काजू ॥
कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥
आनेहु भाव सहित सब साजा । आरति कीन्हशब्दधुनिगाजा ॥
तृण तोरा वीरा तिहि दीन्हा । ताके ग्रहमें काहु न चीन्हा ॥
सुमिरण ध्यान ताहि सो भाखा । पूरण डोरि गोय नहिं राखा ॥
छन्द
विचित्र वनिता गयी नृप दिग, जाय रानी सो कही ॥
इकयोगी सुन्दर है महामुनि, तासुमहिमा काकही ॥
इवैतकला अपार उत्तम, और नहिं अस देखेउँ ॥
पतिहमारे शरण गहितिहि, जन्मशुभ करिलेखेऊँ ५४
अनुरागसागर
( ७६ )
मन्दोदरीका वृत्तान्त
सो०-सुनत मैंदोदरि चाव, दरशलेन अकुलानेऊ ॥
वृषली संगले आव, कनक रतनले पगु धरचो ॥५७॥
चरण टेकिके नायो शीशा। तब मुनीन्द्र पुनि दीन्ह अशीशा ॥
मन्दोदरी वचन
कहे मैंदोदरि शुभ दिन मोरी । विनती करों दोउ कर जोरी ॥
ऐसा तपसी कबहु न देखा । श्वेन अंग सब श्वेतहि भेखा ॥
जिवकारज मम हो जिहि भांती। सो मोहि कहो तजो कुलजाती ॥
हे समरथ मोहि करहु सनाथा । भव बूझत गहि राखो हाथा ॥
अब प्रतिप्रिय मोहि तुम लागे । तुम दयाल सकल भ्रम भागे ॥
मुनीन्द्रवचन मन्दोदरीप्रति
सुनहु वधू प्रिय रावण केरी । नाम प्रताप कटे यम बेरी ॥
ज्ञान दृष्टिओं परखहु भाई । खरा खोट तोहि देऊँ चिन्हाई ॥
पुरुष अमान अजरमनिसारा । सो तो तीन लोकते न्यारा ॥
तेहि साहिब कहैं सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुनतहि शब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो शब्द शुचिमन अनुरागा ॥
हे साहिब मोहि लॉजे शरणा । मेटहु मोर जन्म अरु मरणा ॥
दीन्हों ताहि पान परवाना । पुरुष डोर सौप्यों सहिदाना ॥
गदगद भई पाय घर डोरी । मिलिंरं कहि जिमि द्रव्य करोरी ॥
रानी टेकेउ चरण हमारा । ता पाछे महलन पगु धारा ॥
विचित्र वधूका वृत्तान्त
विचित्र वधूरानी समुझावा । गही शरण जीवन मुकतावा ॥
विचित्रनारिगहि रानिसिखापन। लीन्हे सिपानत जा भ्रम आपन ॥
मुनीन्द्रका रावणके पास जाना
तब मैं रावणपहँ चलि आयो । द्वारपालसों वचन सुनायो ॥
( ७६ )
अनुरागसागर
मुनीन्द्रवचन द्वारपालप्रति
तासों एक बात समुझाई । राजा कहैं तुम आव लिवाई॥
द्वारपाल वचन
तब पौरिया विनय यह लाई । महा प्रचंड है रावण राई ॥
शिवबल हृदय शंकर नहीं आने। काहूकेर वचन नहीं माने ॥
महागर्व अरु कोध अपारा । कहों जाय मोहि पलमें मारा ॥
मुनीन्द्रवचन द्वारपालप्रति
मानहु वचन जाव यहि बारा । रोम बंक नहीं होय तुम्हारा ॥
सत्य वचन तुम हमरो मानो । रावण जाय तुरत तुम आनो ॥
प्रतिहारवचन
ततक्षण गा प्रतिहार जनायी । द्वै कर जोरे ठाढ़ रहाई ॥
सिद्ध एक तो हम पहुँ आयी । ते कह राजहि लाव बलाई ॥
रावणका क्रोध प्रतिहारप्रति
सुनु नृप कोध कीन्ह तेहि बारा । तै मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥
यह मति ज्ञान हरो किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दौरा ॥
दर्श मोर शिवसुत नहीं पावत । मोकहैं भिक्षुक कहा बुलावत ॥
हे प्रतिहार सुनहु मम बानी । सिद्धरूप कहो मोहि बखानी ॥
वर्णन है कौन कौन तेहि भेषा । मो सन दृष्टि जस यहि देखा ॥
प्रतिहारवचन
अहो रावण तेहि श्वेतरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनूपा ॥
शशि समान है रूप त्रिराजा । श्वेत वसन सब श्वेतहि साजा ॥
मन्दोदरीवचन
कहे मँदोदरी रावण राजा । ऐसो रूप पुरुषको छाजा ॥
वेगे जाय गहो तुम पाई । तो तुव राज अटल होय जाई ॥
छोड़हु राजा मान बढ़ाई । चरण टेकि जो शीश नवाई ॥