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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

( ७६ )

मन्दोदरीका वृत्तान्त

सो०-सुनत मैंदोदरि चाव, दरशलेन अकुलानेऊ ॥
वृषली संगले आव, कनक रतनले पगु धरचो ॥५७॥
चरण टेकिके नायो शीशा। तब मुनीन्द्र पुनि दीन्ह अशीशा ॥

मन्दोदरी वचन

कहे मैंदोदरि शुभ दिन मोरी । विनती करों दोउ कर जोरी ॥
ऐसा तपसी कबहु न देखा । श्वेन अंग सब श्वेतहि भेखा ॥
जिवकारज मम हो जिहि भांती। सो मोहि कहो तजो कुलजाती ॥
हे समरथ मोहि करहु सनाथा । भव बूझत गहि राखो हाथा ॥
अब प्रतिप्रिय मोहि तुम लागे । तुम दयाल सकल भ्रम भागे ॥

मुनीन्द्रवचन मन्दोदरीप्रति

सुनहु वधू प्रिय रावण केरी । नाम प्रताप कटे यम बेरी ॥
ज्ञान दृष्टिओं परखहु भाई । खरा खोट तोहि देऊँ चिन्हाई ॥
पुरुष अमान अजरमनिसारा । सो तो तीन लोकते न्यारा ॥
तेहि साहिब कहैं सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सुनतहि शब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो शब्द शुचिमन अनुरागा ॥
हे साहिब मोहि लॉजे शरणा । मेटहु मोर जन्म अरु मरणा ॥
दीन्हों ताहि पान परवाना । पुरुष डोर सौप्यों सहिदाना ॥
गदगद भई पाय घर डोरी । मिलिंरं कहि जिमि द्रव्य करोरी ॥
रानी टेकेउ चरण हमारा । ता पाछे महलन पगु धारा ॥

विचित्र वधूका वृत्तान्त

विचित्र वधूरानी समुझावा । गही शरण जीवन मुकतावा ॥
विचित्रनारिगहि रानिसिखापन। लीन्हे सिपानत जा भ्रम आपन ॥

मुनीन्द्रका रावणके पास जाना

तब मैं रावणपहँ चलि आयो । द्वारपालसों वचन सुनायो ॥