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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 202

( ७४ )

अनुरागसागर

त्रेता युग जबही पगु धारा । मृत्युलोक कीन्हों पैसारा ॥
जीव अनेकन पूछा जाई । यमसे को तुहिं लेहिं छुड़ाई ॥
कहे भर्म वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥
विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमते मोहिं छुड़ावन हारा ॥
कोइ महेशकी आश लगावैं । कोइ चण्डी देवी गावैं ॥
कहा कहों जिव भयो विगाना । तजेउ खसमकहैंजारबिकाना ॥
कर्म कोठरी सब दिन डारा । फंदा दे सत जीवन मारा ॥
सत्य पुरुषकी आयसु पाऊँ । कालहि मेटि छोर जिवलाऊँ ॥
जोर करों तो वचन नसाई । सहजहिं जीवन लेउँ चित्ताई ॥
जो आसे जिव सेवैं ताहीं । अनचीन्है यमके सुख जाहीं ॥

विचित्र भाटकी कथा लंकामें

चहुँ दिश फिरि अयेउँ गढ़लंका । भाट विचित्र मिल्योनिःशंका ॥
तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥
सुनि विचित्र तबहिं भ्रम भागा । अति अधीनहैं चरणन लागा ॥
कहे शरण मुहिं दर्जै स्वामी । तुम सब पुरुषसमुखधामी ॥
कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजै काजू ॥
कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥
आनेहु भाव सहित सब साजा । आरति कीन्हशब्दधुनिगाजा ॥
तृण तोरा वीरा तिहि दीन्हा । ताके ग्रहमें काहु न चीन्हा ॥
सुमिरण ध्यान ताहि सो भाखा । पूरण डोरि गोय नहिं राखा ॥

छन्द

विचित्र वनिता गयी नृप दिग, जाय रानी सो कही ॥
इकयोगी सुन्दर है महामुनि, तासुमहिमा काकही ॥
इवैतकला अपार उत्तम, और नहिं अस देखेउँ ॥
पतिहमारे शरण गहितिहि, जन्मशुभ करिलेखेऊँ ५४