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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कलियुगमें कबीरसाहबके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत

( ९६ )

अनुरागसागर

शब्द ध्यान तेहि दीन्ह हढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई॥
सतगुरु भक्ति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई॥
तात मात तेहि हर्ष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा॥
धर्मनि यह संसार अँधेरा । विनु परिचय जिव यमको चेरा॥
भक्ति देखि हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाईं ॥
प्रगट देखि चीन्हे नहिं मूढ़ा । परे कालके फन्द अगूढ़ा ॥
जैसे श्वान अपावन रांचेउतिमिजगअमीछोड़िविषखांचेउ
नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिन पुनि कीन्ह यज्ञको साजा ॥
बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते यज्ञरचनके चित दीन्हा ॥
कृष्ण केर जब आज्ञा पाई । तब पांडव सब साज मँगाईं ॥
यज्ञकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हँकारी ॥
पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिंकाला ॥
घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञको फल तब पूरन पावे ॥
संन्यासी वैरागी झारी । आवे ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहिं जेवाईं ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घण्ट न बाजा राय लजावा ॥
जबहि घण्ट न बाज अकाशा । चकित भयोराय बुधिनाशा ॥
भोजन कीन सकल ऋषिराया । बजा न घण्ट भूप भ्रम आया ॥
पांडव तबहिं कृष्णपह गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥

युधिष्ठिर वचन

करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घण्ट नहिं बाजा ॥

कृष्ण उत्तर

कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोइ न भोजन पाया ॥

१ “शब्द ध्यान” के बदले किसी प्रतियोगी “ सुरति ध्यान ” लिखा है ।

अनुरागसागर

( १७ )

युधिष्ठिरवचन

चकित भै तब पाण्डव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥

कृष्ण वचन

सुपच सुदर्शनको ले आवो । आदरमान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

कृष्ण आज्ञा जब अस पयऊ । पाण्डव तब ताके ढिग गयऊ॥
सुपच सुदर्शनको ले आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाये ॥
भूपभवन भोजन कर जबहीं । बजा आकाशमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भक्त जब त्रास उठावा । बाजो घण्ट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नाश यम हाट विकानी ॥
भक्त जीव कहैं काल सताये । भक्त अभक्त सबन कहैं खाये ॥
कृष्ण बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बंधु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहिं यज्ञ करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजि हिमालय तिन्हैं लगावा ॥
चार बंधु सह द्रौपदि गहेऊ । उबरे सत्य युधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरि चन्द्र करण बड़ दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आशा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जान जिव आशा लावै । आशा बांधि कालमुख जावै ॥
सब कहैं काल नचावै नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं बाचा ॥
जो रक्षक तेहि खोजे नाहीं । अनचीन्हे यमके सुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समुझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥

( ९८ )

अनुरागसागर

अस यम बुद्धि हरी सब केरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य शब्द कोइ परखे नाहीं । यम दिशि होय लरै हम पाहीं ॥
जबलगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जन्म मरण नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जाई । कुत्रिम नामते यम धरिखाई ॥
पुरुष नाम परवाना पाये । कालहि जीत अमर घर जावे ॥

चन्द्र

सत नाम प्रताप धर्मनि, हंस लोक सिधार्वई ॥
जन्ममरणको कष्ट भेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥
पुरुषकी छबि हंस निरखहि, लहे अति आनंद घना ॥
अंश हंस मिलिकरै कुतूहल, चन्द्र कुमुदिनि सँग बना ६६
सो०—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हर्षई ॥
तैसह हंस सुख पाव, पुरुष दर्शके पावते ॥ ७० ॥
नहिं मलीन सुखभाव, एक प्रभाव सदा उदित ॥
हंस सदा सुख पाव, शोक मोह दुख क्षण कनहि ॥ ७१ ॥
जबै सुदर्शन देका पूरा । ले सत लोक पठायो सूरा ॥
मिले रूप शोभा अधिकारा । हंसन संग कुतूहल सारा ॥
षोडश भानु रूप तब पावा । पुरुष दर्श सो हंस जुड़ावा ॥

धर्मराय वचन

हे साहिब इक बिनती मोरा । खसम कबीर कहु बंदी छोरा ॥
भक्त सुदरशन लोक पठायी । पीछे साहिब कहाँ सिधायी ॥
सो सतगुरु कहो सुदि संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥

कबीर वचन

अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसों कहौं अलग व्यवहारा ॥
द्रापर गत कलियुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥
धर्मराय कहैं देख्यो आई । मोहि देखि यम गयो मुझाई ॥

अनुरागसागर

( ९९ )

धर्मराय वचन

कहे धर्म कस मोहिं दुखावहु । भन्छ हमार लोक पहुँचावहु॥
तीनों युग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा॥
हारी वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुड़ावन लीन्हा॥
और बंधु जो आवत कोई । छिनमहैं ताकहैं खाँव विलोई॥
तुमते कछु न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥
अब तुम फेर जाहु सगमाहीं । शब्द तुम्हार सुनै कोउ नाहीं॥
करम भरम मम असकै ठाटा । ताते कोई न पावै वाटा ॥
घर घर भरम भूत उपजावा । धोखा दे दे जीव नचावा ॥
भरत भूत है सब कहैं लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥
मद्य मांस खावै नर लोई । सर्व मांस प्रिय नरको होई ॥
आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांम मद्य सब मानुष त्रासा ॥
चण्डी जोगिन भूत पुजाओं । यही भ्रम है जग जहै माडाओं॥
बांधि बहुफंदहिं फन्द फन्दाओ । अंतकाल कर सुधि बिसराओ॥
तुम्हरी भक्ति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहौं बुझाई ॥

ज्ञानी वचन

धर्मरायते बड़ छल कीन्हा । छल तुम्हार सकलो हम चीन्हा॥
पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥
पुरुष मोहि जो आज्ञा देही । तो सब होय नाम सनेही ॥
ताते सहजहिं जीव चेताऊँ । अंकुरी जीव सकल मुकताऊँ॥
कोटि फन्द जो तुम रचिराखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥
प्रकट कला जो धरि जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥
जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अड़ोल अमोलै॥
जो जियरा अंकुरी शुभ होई । शब्द हमार मानि है सोई ॥
अंकुरी जीव सकल मुकताओं । फन्दा काटि लोक लैजाओं ॥
काटि भरम जो देहौं ताही । भरम तुम्हार मानि हैं नाहीं ॥