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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 225

अनुरागसागर

( १७ )

युधिष्ठिरवचन

चकित भै तब पाण्डव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥

कृष्ण वचन

सुपच सुदर्शनको ले आवो । आदरमान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

कृष्ण आज्ञा जब अस पयऊ । पाण्डव तब ताके ढिग गयऊ॥
सुपच सुदर्शनको ले आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाये ॥
भूपभवन भोजन कर जबहीं । बजा आकाशमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भक्त जब त्रास उठावा । बाजो घण्ट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नाश यम हाट विकानी ॥
भक्त जीव कहैं काल सताये । भक्त अभक्त सबन कहैं खाये ॥
कृष्ण बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बंधु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहिं यज्ञ करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजि हिमालय तिन्हैं लगावा ॥
चार बंधु सह द्रौपदि गहेऊ । उबरे सत्य युधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरि चन्द्र करण बड़ दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आशा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जान जिव आशा लावै । आशा बांधि कालमुख जावै ॥
सब कहैं काल नचावै नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं बाचा ॥
जो रक्षक तेहि खोजे नाहीं । अनचीन्हे यमके सुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समुझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥