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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 227

अनुरागसागर

( ९९ )

धर्मराय वचन

कहे धर्म कस मोहिं दुखावहु । भन्छ हमार लोक पहुँचावहु॥
तीनों युग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा॥
हारी वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुड़ावन लीन्हा॥
और बंधु जो आवत कोई । छिनमहैं ताकहैं खाँव विलोई॥
तुमते कछु न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥
अब तुम फेर जाहु सगमाहीं । शब्द तुम्हार सुनै कोउ नाहीं॥
करम भरम मम असकै ठाटा । ताते कोई न पावै वाटा ॥
घर घर भरम भूत उपजावा । धोखा दे दे जीव नचावा ॥
भरत भूत है सब कहैं लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥
मद्य मांस खावै नर लोई । सर्व मांस प्रिय नरको होई ॥
आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांम मद्य सब मानुष त्रासा ॥
चण्डी जोगिन भूत पुजाओं । यही भ्रम है जग जहै माडाओं॥
बांधि बहुफंदहिं फन्द फन्दाओ । अंतकाल कर सुधि बिसराओ॥
तुम्हरी भक्ति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहौं बुझाई ॥

ज्ञानी वचन

धर्मरायते बड़ छल कीन्हा । छल तुम्हार सकलो हम चीन्हा॥
पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥
पुरुष मोहि जो आज्ञा देही । तो सब होय नाम सनेही ॥
ताते सहजहिं जीव चेताऊँ । अंकुरी जीव सकल मुकताऊँ॥
कोटि फन्द जो तुम रचिराखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥
प्रकट कला जो धरि जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥
जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अड़ोल अमोलै॥
जो जियरा अंकुरी शुभ होई । शब्द हमार मानि है सोई ॥
अंकुरी जीव सकल मुकताओं । फन्दा काटि लोक लैजाओं ॥
काटि भरम जो देहौं ताही । भरम तुम्हार मानि हैं नाहीं ॥