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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

८ चरकसंहिता [ अ० १
हित, अहित, सुख और दुःख यह चार प्रकार की 'आयु' है। इस आयु
का हित-अहित, पथ्यापथ्य, और इस आयु का मान-परिमाण यह सब जिस
शास्त्र में कहा हो, तथा आयु का लक्षण जिसमें हो, उसे 'आयुर्वेद'१ कहते हैं।
हित आयु, अहित आयु, सुखी आयु, दुःखी आयु, चार प्रकारकी आयु है ॥४१॥
आयु का लक्षण—
शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो, धारि जीवितम् ।
नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ ४२ ॥
(शरीर) पंच महाभूतों से बना, आत्मा का अधिष्ठान, (इन्द्रिय) भौतिक
इन्द्रियां, (सत्त्व) मन, (आत्मा) द्रष्टा, भोक्ता, जीव और ईश्वर, इनके
संयोग का नाम 'आयु' है। आयु निरन्तर चलने वाला होने से 'आयु' कहाता
है [ एति गच्छतोति आयुः । ]
आयु अर्थात् जीवन के पर्यायवाची शब्द—(धारि) शरीर को धारण
करता है, (जीवित) प्राणों को धारण करता है, (नित्यग) निरन्तर चलता
है, (अनुबन्ध) प्राणों के साथ सम्बन्धित है, और 'चेतनानुवृत्ति' इन पर्यायों
से बतलाया जाता है२ ॥ ४२ ॥
तस्याऽऽयुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः ।
वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ४३ ॥
यह आयुर्वेद सब से अधिक श्रेष्ठ पुण्यजनक है [ क्योंकि अन्य ज्ञान पार-
लौकिक हित को ही बतलाते हैं ] यह आयुर्वेद इहलोक और परलोक दोनों के
हितों को कहता है, ऐसा ज्ञानियों का मत है३ ॥ ४३ ॥
सामान्य और विशेष—
सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ।
ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ॥ ४४ ॥
सामान्यमेकत्वकरं विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् ।
तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ॥ ४५ ॥
सब पदार्थों का सब कालों में 'सामान्य'—समान [ गुण आदि ] धर्म ही
वृद्धिका कारण होता है, और 'विशेष'—अर्थात् विभेद या विपरीत होना ही
ह्रास का कारण होता है। दोनों का शरीर के साथ सम्बन्ध सब पदार्थों की
१—“आयुरस्मिन्विन्दति वेत्ति वा आयुर्वेदः ।” सुश्रुत ॥
२—तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकार्थः ॥ सु० ॥
३—अत्राऽऽयत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेयः ॥ सुश्रुत० ॥

अ० १ ] सूत्रस्थानम् ६

अ० १ ] सूत्रस्थानम् ६
वृद्धि और ह्रास का कारण है। सब कालों में शरीर के अन्दर दोनों ही धर्म रह
सकते हैं। इसलिये शरीरमें वृद्धि और क्षय शरीरका बनना (Metabolism) और
शरीर का टूटना ( Ketabolism ) दोनों क्रियायें हर समय होती रहती हैं।
एकत्व बतलाने वाला धर्म 'सामान्य' है। और 'पृथग्-भाव' बतलाने वाला
धर्म 'विशेष' है।¹ क्योंकि समान धर्म का होना यह सामान्य है, और इससे
विपरीत होना विशेष है ॥ ४४-४५ ॥
सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्त्रिदण्डवत् ।
लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ४६ ॥
स पुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् ।
वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥ ४७ ॥
(सत्त्व) मन, (आत्मा) चेतना और 'शरीर' इन तीनों से बने हुए को
"लोक"² कहते हैं। यह तीनों मिलकर तिकन्टी, या तिपाई की तरह 'लोक'
को धारण किये हुए हैं। इस संयोग से बने हुए पुरुष में जन्म-मरण आदि
१ समान गुण वाले—इसका अर्थ यह है कि द्रव्य, गुण, कर्म, इनमें
सम्पूर्ण रूप मे समान गुण वाले पदार्थ ही ग्रहण करने चाहिये।
जिस प्रकार खट्टा आंवला भी खट्टे पित्त को नहीं बढ़ाता, अपितु शीतवीर्य
होने से पित्त का शमन करता है, क्योंकि पित्त उष्ण है।
द्रव्यसमान से विपरीत प्रभाव—तैजस क्षार से श्लेष्मा का क्षय
गुण ” ” ” ”—द्रव कांजी से श्लेष्मा का लघु-रूक्ष गुण के
कारण क्षय,
कर्म ” ” ” ”—नींद से वायु का नाश, भागने से कफ का
क्षय होना,
सामान्य और विशेष का स्वरूप—तुल्यार्थता अर्थात् समानार्थक होने का
नाम सामान्य और विपर्यय का अर्थ 'विशेष' है।
"सामान्यं विशेष इति बुद्धयपेक्षम्" । वैशेषिक द० ॥
कहा भी है—
सर्वेषां सर्वदा वृद्धिः तुल्यद्रव्यगुणक्रियैः।
भावैर्भवति भावानां विपरीतेर्विपर्ययः ॥
२. "षड्धातुसमुदिता लोक इति शब्दं लभन्ते ।"
तिकन्टी—में एक बल्ली या स्तम्भ के निकाल लेने से वह खड़ी नहीं रह
सकती, इसी प्रकार इन तीनोंमें से एकके न होनेसे 'पुरुष' स्थिर नहीं रह सकता।

१० चरकसंहिता [ अ० १
सब स्थित हैं । यह सत्त्वादि समुदाय पुरुष कहलाता है, और वह चेतन द्रव्य
है, यही आयुर्वेद का अधिकरण है और इसी के लिये यह आयुर्वेद
प्रकाशित किया गया है ॥ ४६-४७ ॥
खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसंग्रहः ।
सेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं निरिन्द्रियमचेतनम् ॥ ४८ ॥
आकाश आदि (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी—ये पांच महाभूत),
आत्मा, मन, काल, और दिशा ये द्रव्यों का संग्रह है । इन्द्रियों सहित द्रव्य
चेतन हैं और इन्द्रियों से रहित द्रव्य अचेतन हैं १ ॥ ४८ ॥
अत्र कर्म्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अत्र मोदः सुखं दुःखं जीवितं मरणं स्वता ॥
पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः 'पुरुष' उच्यते । तस्मिन् क्रियाः । सोऽधिष्ठानम् ।
१. “पृथ्व्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।” वैशे०
शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।
पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥ चरक ॥
“तत्र आकाशं शब्दगुणम्, शब्दस्पर्शगुणो वायुः शब्दस्पर्शरूपगुणोऽग्निः ।
शब्दस्पर्शरूपरसगुणा आपः, शब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी ।
तेषामेकगुणः पूर्वे, गुणवृद्धिः परे परे ।
पूर्वपूर्वो गुणश्चैव क्रमश्रो गुणिषु स्मृतः ॥
आत्मा का रूप—
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।
इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत् ।
देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥
मन का लक्षण—
आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावो मनसो लिङ्गमिति कणादः
लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव च ।
सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षेण वर्त्तते ।
वैधुत्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्याच्च वर्त्तते ॥ चरक ॥

अ० १ ] सूत्रस्थानम् ११

अ० १ ] सूत्रस्थानम् ११
गुण—
सार्था गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः ।
गुणाः प्रोक्ताः,
अर्थ ( इन्द्रिय और मन के ग्राह्य विषय ), गुरु आदि, बुद्धि, इच्छा से
लेकर प्रयत्न तक और पर आदि अभ्यास पर्यन्त गुण हैं ।
इन्द्रियों के अर्थ—शब्द, स्पर्श, रूप,रस और गन्ध—मन के अर्थ चिन्तन,
विचार, दुहना, ध्यान, संकल्प, गुरुत्व, लघुत्व, शीत, उष्ण, स्निग्ध रूक्ष, मन्द,
तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, खर, स्थूल, सूक्ष्म,
सान्द्र, द्रव, ये बीस, तथा इच्छा, द्वेष, सुख दुःख और प्रयत्न, पर, अपर युक्ति,
संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये गुण हैं ।
“रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परपरत्वे बुद्धयः
सुखदुखे इच्छा द्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः ॥” वै० द०
कर्म—
प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते ॥ ४९ ॥
प्रयत्न जन्य चेष्टा शरीर का व्यापार कर्म कहाता है ।
उत्क्षेपणमपक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि ॥ वैशे०
भ्रमणं रेचनं स्पन्दनोर्ध्वज्वलनमेव च ।
तिर्यग् गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥
प्रयत्नपूर्वक अर्थात् चेष्टापूर्वक क्रिया का नाम 'कर्म' है ।
“आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म” ॥ वै० ॥ ४६ ॥
समवाय का लक्षण—
समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीनां गुणैर्मतः ।
स नित्यो,यत्र हि द्रव्यं न तत्रानियतो गुणः ॥ ५० ॥
पृथिवी आदि द्रव्यों का ( आत्रेय भद्रकाप्यीय २६ वें अध्याय में कहे हुए )
काल का लक्षण—सूक्ष्मामपि कलां न लीयते, संकलयति वा भूतानि इति
कालः । वैशे०
दिशा का लक्षण—अस्मादिदं पूर्वेण अस्मादिदं पश्चिमेन इत्यादयः प्रत्यया
यतो भवन्ति सा दिक् । इत इदमिति यतस्तद्दिशां लिङ्गम् । वैशे०
जिससे यह व्यवहार किया जाय कि यह इससे पूर्व या पश्चिम में है,
उसका नाम 'दिशा' है ।

१२ चरकसंहिता [ अ० १
अपने गुणों से पृथक् न होना 'समवाय' १ है । अर्थात् द्रव्य गुणों के बिना नहीं
रह सकते और गुण बिना द्रव्य के नहीं रह सकते ।
यह समवाय सम्बन्ध नित्य है, (संयोग की तरह अनित्य नहीं) क्योंकि
जहां पर द्रव्य है, वहां पर गुण नहीं रहता ऐसा नहीं, अपितु निश्चित ही है।
जहां द्रव्य है वहां गुण भी है। इस लिये द्रव्य और गुण का नियत सम्बन्ध होने
से इनका सम्बन्ध भी नियत ही है ॥ ५० ॥
द्रव्य का लक्षण—
यत्राऽऽश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत् ।
तद् द्रव्यं,
जिसमें कर्म और गुण आश्रित हैं, और जो समवायि कारण है, वह 'द्रव्य' है।
गुण का लक्षण:—
समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः ॥ ५१ ॥
द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध वाला, निश्चेष्ट (निष्क्रिय) एवं कारणवान्
गुण है। गुण-निर्गुण होते हैं, गुण में गुण नहीं होता, जैसा कि लिखा है—
“गुणा गुणाश्रया नोक्ताः” ॥ ५१ ॥
कर्म्म का लक्षण -
संयोगे च वियोगे च कारणं द्रव्यमाश्रितम् ।
कर्त्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्म नान्यदपेक्षते ॥ ५२ ॥
जो कि द्रव्य का आश्रय लेकर रहता है, तथा संयोग और विभाग में कारण
है, उसका नाम 'कर्म' है । कर्म किसी अन्य कर्म की अपेक्षा नहीं करता [द्रव्य
और गुण परस्पर एक दूसरे के समवाय की अपेक्षा करके कारण बनते हैं]
तथा—कर्त्तव्य कार्य का अनुष्ठान रूप कर्म है।
“एकं द्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षं कारणमिति कर्म्मलक्षणम्” वैशे०
किये हुवे सद्वृत्त, शान्ति, मंगल—पाठ आदि अनुष्ठान भी कर्म्म हैं, ये
अध्यात्म कर्म हैं ॥ ५२ ॥
इत्युक्तं कारणं, कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते ।
धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ॥ ५३ ॥
१ समवाय का लक्षण -
अयुतसिद्धानां [जो कभी भी पृथक् नहीं होते] आधाराधारभूतानां
इहेति प्रत्ययहेतुः सम्बन्धः स समवायः । वैशे०
जैसे तन्तु और वस्त्र का या मिट्टी और घड़े का समवाय सम्बन्ध है ।

अ० १ ] सूत्रस्थानम् १३

अ० १ ] सूत्रस्थानम् १३
इस प्रकार सामान्य आदि छः कारणों का वर्णन किया गया है। अब
उनका कार्य कहा जाता है। इस शास्त्र में 'धातुओं का साम्य करना' ही
कार्य्य है [ घट-पट आदि कार्य नहीं है ]। इस शास्त्र का—प्रयोजन भी
धातुओं को समान रखना ही है।
क्षीण हुए धातु बढ़ाने चाहिये, बढ़े हुए घटाने चाहिये और समान का
रक्षण करना चाहिये। जैसा कि आगे कहेंगे—
'प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं, आतुरस्य विकारप्रशमनञ्च' ॥५३॥
धातुओं के विषम होने का कारण -
कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च ।
द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥ ५४ ॥
काल [ शीत-वर्षा ग्रीष्म रूपी संवत्सर अथवा परिणाम ], बुद्धि, और इन्द्रि-
यार्थ [ इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ] इन तीन के
अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग होने से दोनों प्रकार की शारीरिक और मान-
सिक व्याधियां उत्पन्न होती हैं ॥ ५४ ॥
शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः ।
तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः ॥ ५५ ॥
शरीर और सत्त्व ( मन ) ये दोनों ही [ पृथक् रूप से एवं सम्मिलित
रूप में ] रोगों की अधिष्ठान भूमि हैं । और जिस प्रकार ये दोनों व्याधियों का
आश्रय स्थान हैं, इसी प्रकार सुख का भी आश्रय स्थान यही हैं।
सुख का कारण - काल, बुद्धि और इन्द्रियों के विषयों का, सम [ उचित
रूप में ] योग होना ही आरोग्य का कारण है। कहा भी है—
“सुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोगः सुदुर्लभः” ॥ ५५ ॥
आत्मा का स्वरूप कहते हैं—
निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूतगुणेन्द्रियैः ।
चैतन्ये कारणं नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रियाः ॥ ५६ ॥
१. “त्रीण्यायतनानीत्यर्थानां, कर्मणः कालस्य चातियोगायोगमिथ्यायोगाः ।
असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति त्रयस्त्रिविधविकल्पा हेतवो
विकारकारणम्” ॥ “समयोगयुक्तास्तु प्रकृतिहेतवो भवन्ति” । च० ॥
२. वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः ।
केशलोमनखाग्रान्तमलद्रवगुणैर्विना ॥ चरक ॥

१४ चरकसंहिता [ अ० १
निर्विकार१ और सूक्ष्म आत्मा, मन, शब्दादिगुण, इन्द्रियों द्वारा चैतन्य में
कारण हैं, वह नित्य है, साक्षी है, क्योंकि वह सब क्रियाओं को देखता है ।
अचेतन शरीर और मनके चैतन्य में यह आत्मा ही कारण है; और वह नित्य है !
रोग प्रकृति—
वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः ।
मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ ५७ ॥
संक्षेप रूप में शारीरिक दोषों के कारण वात, पित्त और कफ हैं । और
मानसिक दोषों के कारण रज और तम हैं२ । शारीरिक कोई भी रोग इन वात,
पित्त, कफ के बिना नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥
इनका प्रतीकार —
प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः ।
मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ५८॥
शारीरिक दोष दैव व्यपाश्रय और युक्ति-व्यपाश्रय औषधियों से शान्त हो
जाते हैं । मानसिक दोष ज्ञान ( आत्मा आदि के ), विज्ञान अर्थात् शास्त्र
ज्ञान, (धैर्य) चित्त की स्थिरता, (स्मृति) अनुभूत पदार्थ का स्मरण, (समाधि)
विषयों से मन को हटा कर आत्मा में लगाना इनसे शान्त हो जाते हैं ।
दैव-व्यपाश्रय—मणि, मन्त्र, ओषधि, बलि, उपहार, होम, नियम प्रायश्चित्त
आदि कर्म जो कि दैव को आश्रय कर किये जाते हैं ।
युक्ति-व्यपाश्रय अर्थात् योजना, युक्ति को आश्रय कर किये गये संशो-
धन, संशमन आदि कर्म ॥ ५८ ॥
वायु का लक्षण—
रूक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मश्चलोऽथ विशदः खरः ।
विपरीतगुणैर्द्रव्यैर्मारुतः संप्रशाम्यति ॥ ५६ ॥
वायु-रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल अर्थात् गतिशील, विशद अर्थात् अवि-
१. स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ॥ श्रुतिः ।
२ वायु को प्रथम लिखा है, क्योकि वात जन्य रोग ही सब से अधिक हैं,
'अशीतिर्वात-विकाराः' एवं 'वायुरेव भगवान्' वायु सबसे प्रबल है ।
सर्वेषाञ्च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलं तल्लिङ्गत्वत् दृष्टफलवादा-
गमाच्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसि न
व्यतिरिच्यते । एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वात-
पित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते ॥ सुश्रुत० ॥

अ० १ सूत्रस्थानम् १५

अ० १ सूत्रस्थानम् १५
च्छिल और खर (कठोर) है । वह इन से विपरीत गुण वाले स्निग्ध, उष्ण गुरु,
स्थूल, स्थिर, पिच्छिल और मृदु द्रव्यों से शान्त होता है ।
शीत से वायु बढ़ता है और उष्णता से कम होता है, इसलिये वायु को
वैद्यक शास्त्र में शीत-प्रकृति माना है । वैशेषिक दर्शन में इस को अनुष्णाशीत
कहा है—'अनुष्णाशीतः स्पर्शस्तु पवने मतः' ॥ वै० ॥ ५६ ॥
पित्त का लक्षण—
सस्नेहमुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु ।
विपरीतगुणैः पित्तं द्रव्यैराशु प्रशाम्यति ॥ ६० ॥
स्नेहसहित अर्थात् थोड़ा स्निग्ध, उष्ण (गरम), तीक्ष्ण [ शीघ्र कार्य करने
वाला, सूई की तरह तेज ], द्रव, अम्ल ( खट्टा ), सर ( गमनशील ), और
कटु रस है । पित्त विपरीत गुण वाले द्रव्यों से शीघ्र ही शान्त हो जाता है ॥६०॥
कफ का लक्षण—
गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिरपिच्छिलाः ।
श्लेष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीतगुणैर्गुणाः ॥ ६१ ॥
गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर, और पिच्छिल ये कफ के गुण हैं ।
इन से विपरीत गुण वाले पदार्थों से ये गुण शान्त होते हैं । [ इन गुणों के
शान्त होने से गुणी कफ भी शान्त हो जाता है ] ॥ ६१ ॥
साध्य रोगों की शान्ति—
विपरीतगुणैर्देशमात्राकालोपपादितैः ।
भेषजैर्विनिवर्त्तन्ते विकाराः साध्यसंमताः ॥ ६२ ॥
साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते ।
भूयश्चातो यथाद्रव्यं गुणकर्म प्रवक्ष्यते ॥ ६३ ॥
विपरीत गुण वाले [ हेतु-विपरीत, व्याधि-विपरीत और हेतु और व्याधि
दोनों के विपरीत और कार्य करनेवाले ] द्रव्यों की देश-मात्रा, काल के अनुसार
योजना करने पर औषध से साध्य व्याधियां शान्त हो जाती हैं, असाध्य
रोग अच्छे नहीं होते । और जो रोग औषधियों से असाध्य हैं उन के लिए
औषध का उपदेश भी नहीं किया जाता । इसके आगे फिर विस्तार से एक-एक
द्रव्य के गुण कर्म को आचार्य कहेंगे ॥ ६२-६३ ॥
रसों की उत्पत्ति—
रसनार्थो रसस्तस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा ।
निर्वृत्तौ च, विशेषे च प्रत्ययाः खादयस्त्रयः ॥ ६४ ॥

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१८ चरकसंहिता [ अ० १
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रसनेन्द्रिय से ग्राह्य गुण रस है। इस रस की उत्पत्ति में आधार कारण जल
और पृथिवी हैं। इस रस के भेद करने में आकाश, वायु और अग्नि ये तीनों
निमित्त कारण होते हैं। वास्तव में रस की उत्पत्ति स्थान जल है और पृथिवी
इसका आधार है। क्योंकि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से मिल जाता है। "विष्टं
ह्यपरं परेण" न्याय०। जल और पृथ्वा म आकाश, वायु और अग्नि का भी
अंश समाविष्ट रहता है। कहा भी है—
तेषामेकगुणं पूर्वं गुणवृद्धिः परे परे।
पूर्वः पूर्वो गुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः ॥
इसीलिए, इस एक रस के छः भेद हो जाते हैं। जैसे—पृथिवी और जल
की अधिकता से मधुर, पृथिवी और अग्नि की अधिकता से अम्ल, जल और
अग्नि की अधिकता से लवण, वायु और अग्नि की अधिकता से कटु, वायु
और आकाश की अधिकता से तिक्त और वायु और पृथिवी की अधिकता से
कषाय रस बनता है ॥ ६४ ॥
स्वादुरम्लोऽथ लवणः कटुकस्तिक्त एव च ।
कषायश्चेति षट्कोऽयं रसानां संग्रहः स्मृतः ॥ ६५ ॥
स्वादु मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय ये छः संक्षेप से रस
हैं। विस्तार से इनके परस्पर संयोग से ६३ भेद हो जाते हैं ॥ ६५ ॥
रसों के द्वारा दोषों की शान्ति--
स्वाद्वम्ललवणा वायुं, कषायस्वादुतिक्तकाः ।
जयन्ति पित्तं, श्लेष्माणं कषायकटुतिक्तकाः ॥ ६६ ॥
स्वादु, अम्ल और लवण ये रस वायु का शमन करते हैं, कषाय, मधुर और
तिक्त रस पित्त को, कषाय, कटु और तिक्त रस कफ को शान्त करते हैं। कटु,
अम्ल और लवण रस पित्त को कुपित अर्थात् उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं,
स्वादु, मधुर अम्ल और लवण रस कफ को, कटु, तिक्त और कषाय रस वायु
को बढ़ाते हैं। इन रसों में प्रत्येक रस के द्रव्य, गुण और कर्म आगे (आत्रेय
भद्रकाप्यीय नामक २६ वें अध्याय) में विस्तार से कहेंगे ॥ ६६ ॥
द्रव्य के भेद—
किञ्चिद्दोषप्रशमनं किञ्चिद्धातुप्रदूषणम् ।
स्वस्थवृत्तौ हिते किञ्चित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥ ६७ ॥
द्रव्य तीन प्रकार के हैं। (१) कुछ द्रव्य वात आदि दोषों का शोधन
एवं शमन करते हैं। जैसे—तेल वायु का, घी पित्त का और मधु कफ का

अ० १ ] २ सूत्रस्थानम् १७

अ० १ ] २ सूत्रस्थानम् १७
शमन करता है और (२) कुछ द्रव्य शरीरको धारण करनेवाले वात आदि वा रस
आदि को दूषित वा कुपित करते हैं और (३) कुछ द्रव्य स्वास्थ्य का रक्षण करते
हैं, वे स्वस्थ अवस्था के लिए हितकारी हैं। जैसे- लाल चावल, सांठी के चावल,
जौ, जीवन्ती शाक आदि। "शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति त्रिधा ॥" वाग्भटः ॥
तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं जाङ्गमौद्भिदपार्थिवम् ।
मधूनि गोरसाः पित्तं वसा मज्जासृगामिषम् ॥ ६८ ॥
विण्मूत्रं चर्म रेतोऽस्थि स्नायुः शृङ्गं खुरा नखाः ।
जङ्गमेभ्यः प्रयुज्यन्ते केशा लोमानि रोचनाः ॥ ६६ ॥
द्रव्य फिर तीन प्रकार के हैं ( १ ) (जांगम) प्राणियों से उत्पन्न होने वाले,
और ( २ ) ( औद्भिद ) भूमि को भेदन करके पृथिवी में से उत्पन्न होने वाले
वनस्पति आदि, ( ३ ) ( पार्थिव ) भूमि से उत्पन्न होने वाले, खनिज ।
जंगम द्रव्य—
मधु (शहद) १ गोरस, दूध, घी, आदि, पित्त, वसा (चर्बी), मज्जा, रक्त,
मांस, विष्ठा, मूत्र, चर्म, वीर्य, अस्थि, स्नायु, सींग, नख, खुर, (केश) शिर के
बाल, ( रोम ) शरीर के बाल, रोचना अर्थात् गोरोचना, ये जांगम-प्राणियों से
लेकर व्यवहार में लाये जाते हैं ॥ ६८-६६ ॥
भौम द्रव्य—
सुवर्णं समलाः पञ्च लोहाः ससिकताः सुधा ।
मनःशिलाले मणयो लवणं गैरिकाञ्जने ॥ ७० ॥
भौममौषधमुद्दिष्टम्, औद्भिदं तु चतुर्विधम् ।
वनस्पतिर्वीरुधश्च वानस्पत्यस्तथौषधिः ॥ ७१ ॥
स्वर्ण, और इसका मल (शिलाजीत) पांच प्रकार के लोह जैसे रांगा, सीसा
ताम्बा, चांदी और लोहा, (सिकता) बालू, (सुधा) चूना, पार्थिव विष, मनः
शिला, (आल) हरताल, (मणि) स्फटिक आदि, लवण सैन्धव आदि, [ गैरिक ]
गेरू, ( अंजन ) सुरमा, ये पार्थिव औषध कहे हैं औद्भिद द्रव्य चार प्रकार
के हैं। वनस्पति, वीरुत् , वानस्पत्य और ओषधि ॥ ७०-७१ ॥
फलैर्वनस्पतिः, पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपि ।
ओषध्यः फलपाकान्ताः, प्रतानैर्वीरुधः स्मृताः ॥ ७२ ॥
(१) जिनमें बिना पुष्प के फल आता है, वे 'वनस्पति' हैं, जैसे गूलर, वट
१. माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तिकं मधुजातयः ।

१८ चरकसंहिता [ अ० १
पिलखन आदि, (२) जिनमें फल और पुष्प दोनों आते हैं उनको 'वानस्पत्य'
अर्थात् वृक्ष कहते हैं, जैसे आम, जामुन आदि, (३) जो फल आने पर नष्ट हो
जाते हैं, उनको 'ओषधि' कहते हैं जैसे धान, चावल, जौ, गेहूं आदि और (४)
जो लता के समान फैलने वाली हैं उनको 'वीरुध्-कहते हैं जैसे गिलोय आदि ॥७२॥
औद्भिद पदार्थों के काम में आने वाले अंग:—
मूलत्वक्सारनिर्यासनालस्वरसपल्लवाः ।
क्षाराः क्षीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः ॥ ७३ ॥
पत्राणि शुङ्गाः कन्दाश्च प्ररोहाश्चौद्भिदो गणः ।
मूल, त्वचा, (सार) अन्दर का स्थिर सार भाग, (निर्यास) गोंद, (नाड़) नाल,
(स्वरस) पीड़न करके द्रव्य से निकाला हुआ रस, ( पल्लव ) परों आम, जामुन
आदि के, क्षार, (क्षीर) दूध, थोर आदि के फल, पुष्प, भस्म, तैल भिलावे
आदि का; कांटे, पत्ते, शुंग अर्थात् छोटे २ कांटे जो वृक्ष पर होते हैं जैसे
सिम्बल के, कन्द अर्थात् फलहीन ओषधियों के मूल, (प्ररोह) अंकुर यह
'औद्भिद गण' है । वनस्पतियों के ये उपरोक्त अंश काम में आते हैं ॥ ७३ ॥
मूलिन्यः षोडशैकोनाः फलिन्यो विंशतिः स्मृताः ॥ ७४ ॥
महास्नेहाश्च चत्वारः पञ्चैव लवणानि च ।
अष्टौ मूत्राणि सङ्ख्यातान्यष्टावेव पयांसि च ॥ ७५ ॥
शोधनार्थाश्च षड् वृक्षाः पुनर्वसुनिदर्शिताः ।
य एतान् वेत्ति संयोक्तुं विकारेषु स वेदवित् ॥ ७६ ॥
जिन वनस्पतियों का मूल प्रयोग करने योग्य है वे 'मूलिन' हैं । ऐसी वन-
स्तियां सोलह हैं, और जिन वनस्पतियों का फल उपयोगी है वे 'फलिनी' हैं,
ऐसी वनस्पतियां उन्नीस हैं । चार महास्नेह हैं जैसे घी, तैल, वसा, और मज्जा;
पांच प्रकार के नमक हैं, आठ प्रकार के मूत्र और आठ ही प्रकार के दूध हैं
और संशोधन के लिये छः वृक्ष पुनर्वसु आत्रेय ने कहे हैं । जो विद्वान् वैद्य
रोगों में इन सब का प्रयोग करना जानता है वह आयुर्वेद को भली प्रकार से
जानता है ॥ ७४-७६ ॥
सोलह 'मूलिनी' ओषधियों की गणना—
हस्तिदन्ती हैमवती श्यामा त्रिवृदधोगुडा ।
सप्तला श्वेतनामा च प्रत्यक्श्रेणी गवाक्ष्यपि ॥ ७७ ॥
ज्योतिष्मती च बिम्बी च शणपुष्पी विषाणिका ।
अजगन्धा द्रवन्ती च क्षीरिणी चात्र षोडशी ॥ ७८ ॥

अ० १ ] सूत्रस्थानम् १६

अ० १ ] सूत्रस्थानम् १६
१ हस्तीदन्ती ( चका ), २ हैमवती ( श्वेत बच ), ३ श्यामा (त्रिवृत),
४ त्रिवृत् ( लाल जड़ वाली निशोथ ), ५ अधोगुडा ( विधारा ), ६ सप्तला
( शिका काई ), ७ श्वेतनाम ( श्वेत कोयल ), ८ प्रत्यक् श्रेणी ( दन्ती जमाल-
गोटा ), ९ गवाक्षी ( इन्द्रायण ), १० ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), ११ बिम्बी
(कन्दूरी ), १२ शणपुष्पी (झन झनियां), १३ विषाणिका ( उत्तरण ), १४
अजगन्धा ( डूंकू ), १५ द्रवन्ती ( जंगली एरण्ड ), १६ क्षीरिणी ( दिखौ )
ये सोलह हैं ॥ ७७-७८ ॥
इनके कर्म—
शणपुष्पी च बिम्बी च छर्दने हैमवत्यपि ।
श्वेता ज्योतिष्मती चैव योज्या शीर्षविरेचने ॥ ७६ ॥
एकादशावशिष्टा याः प्रयोक्तव्यास्ता विरेचने ।
इत्युक्ता नामकर्मभ्यां मूलिन्यः, फलिनीः शृणु ॥ ८० ॥
ऊपर कही हुई सोलह मूलिनी औषधियों में, शणपुष्पी, बिम्बी, और हैम-
वती ( श्वेतवचा ) ये तीन वमन कार्य में प्रयोग करनी चाहिये, श्वेत अपराजि-
ता, ज्योतिष्मती ये दोनों शिरोविरेचन में, और शेष ग्यारह वनस्पतियां विरेचन
कार्य में प्रयोग करना चाहिये । सब कामों में इनके मूल ही काम में लाने चाहिये।
इस प्रकार से ये सोलह 'मूलवाली, वनस्पतियां नाम और कर्म सहित कह दी
गयी हैं । 'फलिनी' वनस्पतियों का नाम सुनो ॥ ७६-८० ॥
शङ्खिन्यथ विडङ्गानि त्रपुषं मदनानि च ।
आनूपं स्थलजं चैव क्लीतकं द्विविधं स्मृतम् ॥ ८१ ॥
धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् ।
प्रकीर्या चोदकीर्या च प्रत्यक्पुष्पा तथाऽभया ।
अन्तः कोटरपुष्पी च हस्तिपर्ण्याश्च शारदम् ॥ ८२ ॥
कम्पिल्लकारग्वधयोः फलं यत्कुटजस्य च ।
धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् ॥ ८३ ॥
शंखिनी, विडङ्ग ( बायविडंग ), त्रपुष ( खीरा, ककड़ी ) मदन ( मैन-
फल ), आनूप क्लीतक ( जल में पैदा होने वाली मुलहैटी ), स्थलज क्लीतक
( शुष्क भूमि में पैदा होने वाली मुलहैटी ), धामार्गव ( बड़ी तुरई ) इक्ष्वाकु
( कड़वी तुरई ), जीमूत ( वन्दाल ), कृतवेधन ( तुरई ), कडुवी प्रकीर्या
और उदकीर्या ( दो प्रकार के करंज ), प्रत्यक् पुष्पा ( अपामार्ग ), अभया
( हरड़ ), अन्तःकोटरपुष्पी ( घाव पत्ता ), शारदा हस्तिपर्णी । ( हस्तिपर्णी के

२० चरकसंहिता [ अ० १
शरद् ऋतु में उत्पन्न फल ), कम्पिल्लक (कमीला), आरग्वध (अमलतास), कुटज
( कूड़े का फल, इन्द्र जौ ), ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां हैं ॥ ८१-८३ ॥
इनके कर्म—
मदनं कुटजं चैव त्रपुषं हस्तिपर्णिनी ।
एतानि वमने चैव योज्यान्यास्थापनेषु च ॥ ८४ ॥
नस्तः प्रच्छर्दने चैव प्रत्यक्पुष्पा विधीयते ।
दश यान्यवशिष्टानि तान्युक्तानि विरेचने ॥ ८५ ॥
धामार्गव, इक्ष्वाकु, जीमूत, अमलतास, मैनफल, कूड़े का फल, खीरा, और
हस्तिपर्णी के शरद् ऋतु में उत्पन्न फल ये आठ वनस्पतियां वमन, आस्थापन
और निरूह बस्ति कर्म में प्रयोग करना चाहिये ।
अपामार्ग (चिरचिटे) का फल नस्य कर्म में प्रयोग करना चाहिये । और
शेष दस वनस्पतियों का प्रयोग विरेचन कार्य में करना चाहिये । इस प्रकार
से ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां नाम और कर्मों द्वारा कह दी हैं ॥ ८४-८५ ॥
चार प्रकार के स्नेह—
नामकर्मभिरुक्तानि फलान्येकान्नविंशतिः ।
सर्पिस्तैलं वसा मज्जा स्नेहो दृष्टश्चतुर्विधः ॥ ८६ ॥
सर्पि ( घी ), तैल, वसा ( चर्बी ) और मज्जा ( अस्थि वा गुठलियों के
भीतरी भाग का स्नेह, चिकनाई ) ये चार कहे हैं ॥ ८६ ॥
इनके कर्म कहते हैं:—
पानाभ्यञ्जनबस्त्यर्थं नस्यार्थं चैव यौगिकः ।
स्नेहना जीवना बल्या वर्णोपचयवर्धनाः ॥ ८७ ॥
स्नेहा होते च विहिता वातपित्तकफापहाः ।
ये चारों स्नेह (पान) शरीर में मुख मार्ग से देने, शरीर पर मालिश
करने, (बस्ती) गुदा या उपस्थमार्ग से देने, और (नस्य) नाक से देने में
प्रयुक्त होते हैं। ये स्नेह शरीर का स्नेहन करते हैं, शरीर को जीवन देते हैं,
शरीर का तर्पण करते हैं, बल और शक्ति को बढ़ाते हैं । ये स्नेह वात, पित्त
और कफ को नष्ट करते हैं ॥ ८७ ॥
लवण—
सौवर्चलं सैन्धवं च बिडमौद्भिदमेव च ॥ ८८ ॥
सामुद्रेण सहैतानि पञ्च स्युर्लवणानि च ।
पांच प्रकार के नमक हैं। (१) सैन्धव (सेन्धा नमक) सब नमकों में श्रेष्ठ

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २१
है (२) सौवर्चल ( संचल ), (३) (विड) काला नमक, (४) ( औद्भिद ) काच
नमक और (५) सामुद्र, समुद्र के पानी से तैयार किया हुआ, ये पांच प्रकार
के लवण या नमक हैं॥ ८८ ॥
लवणों के कर्म -
स्निग्धान्युष्णानि तीक्ष्णानि दीपनीयतमानि च ॥ ८९ ॥
आलेपनार्थे युज्यन्ते स्नेहस्वेदविधिषु तथा ।
अधोभागोर्ध्वभागेषु निरूहेष्वनुवासने ॥ ९० ॥
अभ्यञ्जने भोजनार्थे शिरसश्च विरेचने ।
शस्त्रकर्मणि वस्त्यर्थमञ्जनोत्सादनेषु च ॥ ९१ ॥
अजीर्णानाहवार्तेषु गुल्मे शूले तथोदरे ।
उक्तानि लवणानि, ऊर्ध्वं मूत्राण्यष्टौ निबोध मे ॥ ९२ ॥
ये नमक स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण और दीपनीय अर्थात् विशेष रूप से अग्नि
बढ़ानेवाले हैं। ये नमक आलेपन में, स्नेहन में, और स्वेदन कार्य में, अधोभाग-
विरेचन और ऊर्ध्व-विरेचन द्वारा दोषों को बाहर निकालने में, निरूहण में, अनु-
वासन में, अभ्यङ्ग में, भोजन में, और शिर के विरेचन में, शस्त्र कर्म में, वर्त्ति
अर्थात् फल वर्त्ति आदि में, अञ्जन में, उबटन में, अजीर्ण में, अफारे में,
वायु रोग में, गुल्म में, शूल रोग में, और उदर रोगों में प्रयोग किये जाते हैं।
ये पांचों प्रकार के नमक कह दिये ॥ ८९-९२ ॥
आठ मूत्र—
मुख्यानि यानि ह्यष्टानि सर्याण्यात्रेयशासने ।
अविमूत्रमजामूत्रं गोमूत्रं माहिषं तथा ॥ ९३ ॥
हस्तिमूत्रमथोष्ट्रस्य हयस्य च खरस्य च ।
अब जो मुख्य आठ मूत्र आत्रेय ऋषि ने कहे हैं वे सुनिये—
(१) भेड़ का मूत्र, (२) बकरी का मूत्र, (३) गाय का मूत्र, (४) भैंस का
मूत्र, (५) हाथी का मूत्र, (६) ऊँट का मूत्र, (७) घोड़े का मूत्र और (८)
गधे का मूत्र ये आठ प्रकार के मूत्र हैं१ ॥ ९३ ॥
मूत्रों के सामान्य गुण—
उष्णं तीक्ष्णमथो रूक्षं कटुकं लवणान्वितम् ॥ ९४ ॥
मूत्रमुत्सादने युक्तं युक्तमालेपनेषु च ।
१. गोऽजाविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते ।
खरोष्ट्रेभनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम्॥” भावप्रकाश ।

२२ चरकसंहिता [ अ० १
युक्तमास्थापने मूत्रं युक्तं चापि विरेचने ॥ ९५ ॥
स्वेदेष्वपि च तद्युक्तमानाहेष्वगदेषु च ।
उदरेष्वथ चार्शःसु गुल्मकुष्ठकिलासिपु ॥ ९६ ॥
तद्युक्तमुपनाहेषु परिषेके तथैव च ।
दीपनीयं विषघ्नं च क्रिमिघ्नं चोपद्दिश्यते ॥ ९७ ॥
पाण्डुरोगोपसृष्टानामुत्तमं सर्वथोच्यते ।
श्लेष्माणं शमयेत्पीतं मारुतं चानुलोमयेत् ॥ ९८ ॥
कर्षेत्पित्तमधोभागमित्यस्मिन् गुणसंग्रहः ।
सामान्येन मयोक्तस्तु, पृथक्त्वेन प्रवक्ष्यते ॥ ९९ ॥
ये आठों प्रकार के मूत्र गरम, तीक्ष्ण, रूखे, कटु रस, और लवण रस से
युक्त हैं। आठों प्रकार के मूत्र उत्सादन में, आलेपन में, प्रलेपन में, आस्थापन
में निरूह में, विरेचन में, स्वेदन में, नाडीस्वेद में, आनाह अर्थात् अफारे में,
अगद अर्थात् विषनाशक औषधियों में प्रयुक्त होते हैं।
उदर रोगों में, अर्श रोग में, गुल्म, कुष्ठ (कोढ़) और किलास (कुष्ठ का
भेद), उपनाह, पुल्टीस आदि में, परिषेक अर्थात् सेचन कार्य में, प्रयुक्त होते
हैं। ये मूत्र (दीपन) अग्निदीपक, (विषघ्न) विषनाशक, और (क्रिमिघ्न) कृमि-
नाशक कहे जाते हैं। ये पाण्डु रोगियों के लिये पान, आहार और भेषज आदि
कल्पना में उत्तम, हितकारी हैं। पिया हुआ मूत्र श्लेष्मा (कफ) को शमन करता
है, वायुको अनुलोमन करता है, और पित्त को अधोमार्ग में खींचता है, पित्त
का विरेचन करता है। ये आठों मूत्रोंके सामान्य से गुण कह दिये हैं ॥९५-९९॥
आठों मूत्रोंमें से एक एक के जो पृथक् २ गुण हैं वह आगे कहे जाते हैं—
अविमूत्रं सतिक्तं स्यात्स्निग्धं पित्ताविरोधि च ।
आजं कषायमधुरं पथ्यं दोषांस्त्रिहन्ति च ॥ १०० ॥
गव्यं समधुरं किंचिद्दोषघ्नं क्रिमिकुष्ठनुत् ।
कण्डूलं शमयेत्पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम् ॥ १०१ ॥
अर्शःशोफोदरघ्नं तु सक्षारं माहिषं सरम् !
हास्तिकं लवणं मूत्रं हितं तु क्रिमिकुष्ठिनाम् ॥ १०२ ॥
प्रशस्तं बद्धविण्मूत्रविषश्लेष्मामयार्शसाम् ।
सतिक्तं श्वासकासघ्नमर्शोघ्नं चौष्ट्रमुच्यते ॥ १०३ ॥
वाजिनां तिक्तकटुकं कुष्ठव्रणविषापहम् ।
खरमूत्रमपस्मारोन्मादग्रहविनाशनम् ॥ १०४ ॥

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २३

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २३
१. भेड़ का मूत्र थोड़ा तिक्त, स्निग्ध एवं पित्त का अविरोधी है, वह न तो
पित्त को बढ़ाता है, और न पित्त को शमन करता है ।
२. बकरी का मूत्र कषाय और मधुर रस, शोथों के लिये हितकारी है, और
त्रिदोषनाशक है ।
३. गाय का मूत्र कुछ मधुर, दोषनाशक, कृमि, और कुष्ठ का नाशक है ।
इसके पीने से खाज शमन होती है, एवं वात आदि से उत्पन्न पेट के रोगों में
हितकर है ।
४. भैंस का मूत्र बवासीर, शोथ, और उदर रोगों को नाश करने वाला,
थोड़ा खारा और मलभेदक है ।
५. हाथी का मूत्र नमकीन, कृमि और कुष्ठ रोग वाले पुरुषों के लिये
हितकारी है । अवरुद्ध मल और मूत्र रोग अलसक रोग, विष रोग, श्लेष्म जन्य
रोगों और बवासीर में श्रेष्ठ है ।
६. ऊँट का मूत्र थोड़ा तिक्त, श्वास, कास और अर्श रोग का नाशक है ।
७. घोड़ों का मूत्र तिक्त और कटु, कुष्ठ, विष और व्रण का नाशक है ।
८. गधे का मूत्र अपस्मार, (मृगी, हिस्टीरिया) उन्माद आदि (पागल-
पन ) का नाशक है ॥ १००-१०४ ॥
आठ प्रकार के दूध—
इतीहोक्तानि मूत्राणि यथासामर्थ्ययोगतः ।
अतः क्षीराणि वक्ष्यन्ते कर्म चैषां गुणाश्च ये ॥ १०५ ॥
अविशीरमजाक्षीरं गोक्षीरं माहिषं च यत् ।
उष्ट्रीणामथ नागीनां वडवायाः स्त्रियास्तथा ॥ १०६ ॥
इस प्रकार से इस शास्त्र में सामान्य और विशेष दोनों प्रकार से यथा-
सामर्थ्य अर्थात् मूत्रों की जैसी जैसी शक्ति है, वैसे गुण कह दिये हैं ।
अब आठ प्रकार के दूध, इन के कर्म और गुण भी कहे जाते हैं:—
१. भेड़ का, २. बकरी का, ३. गाय का, ४. भैंस का, ५. ऊँटनी का,
६. हथिनो का, ७. घोड़ी का और ८. स्त्रियों का दूध ॥१०५-१०६॥
सब दूधों के सामान्य गुण—
प्रायशो मधुरं स्निग्धं शीतं स्तन्यं पयः स्मृतम् ।
प्रीणनं बृंहणं वृष्यं मेध्यं बल्यं मनस्करम् ॥ १०७ ॥
जीवनीयं श्रमहरं श्वासकासनिबर्हणम् ।
हन्ति शोणितपित्तं च संधानं विहतस्य च ॥ १०८ ॥
सर्वप्राणभृतां सात्म्यं शमनं शोधनं तथा ।

तृष्णाघ्नं दीपनीयं च श्रेष्ठं क्षीणक्षतेषु च ॥ १०६ ॥
पाण्डुरोगेऽम्लपित्ते च शोषे गुल्मे तथोदरे ।
अतीसारे ज्वरे दाहे श्वयथौ च विधीयते ॥ ११० ॥
योनिशुक्रप्रदोषेषु मूत्रेषु प्रदरेषु च ।
पुरीषे ग्रथिते पथ्यं वातपित्तविकारिणाम् ॥ १११ ॥
सब दूध प्रायः १ मधुर रस, स्निग्ध, शीत, (स्तन्य) दूध बढ़ाने वाले,
(प्रीणन) पुष्टि देने वाले, (बृंहण) शरीर को बढ़ाने वाले; (वृष्य) वीर्य-
वर्धक, (मेध्य) बुद्धि के लिये हितकारी, (बल्य) शरीर को बल देने वाले,
(मनस्कर) मन को प्रसन्न करने वाले, (जीवनीय) जीवन के लिये हितकारी,
(श्रमहर) थकावट को मिटाने वाले, श्वास और कास (कफ, कास को छोड़-
कर शेष समस्त कासों को) मिटाने वाले हैं। दूध रक्त पित्त को नाश करता
और टूटे हुए को जोड़ने वाला है, सब प्राणियों के लिये सात्म्य दोषों को शमन
अर्थात् स्वस्थान में स्थित दोषों को शान्त करने वाला है, प्यास को नाश
करने वाला, अग्नि वर्धक, क्षीण और क्षत रोगियों के लिये हितकारी, पाण्डु
रोग वातपित्त, शोष, गुल्म, उदर अतीसार ज्वर (जीर्ण ज्वर), दाह, (श्वयथु)
शोथ रोग में विशेष करके पथ्य है। योनि रोगों में, शुक्र दोषों में, मूत्रकृच्छ्र
रोग में, मलावरोध में; पथ्य और हितकारी है। वह वात-पित्त रोगियों के
लिये भी पथ्य है ॥ १०७-१११॥
दूध के कर्म कहते हैं:—
नस्यालेपावगाहेषु वमनास्थापनेषु च ।
विरेचने स्नेहने च पयः सर्वत्र युज्यते ॥ ११२ ॥
यथाक्रमं क्षीरगुणानेकैकस्य पृथक्पृथक् ।
अन्नपानादिकेऽध्याये भूयो वक्ष्याम्यशेषतः ॥ ११३ ॥
यह दूध नस्य कर्म में, अवगाहन क्रिया में, आलेपन में, वमन में, आस्था-
पन में, बस्ति में, विरेचन में, स्नेह कर्म में, सब स्थानों पर रसायन अर्थात्
वाजीकरण आदि में भी प्रयुक्त होता है। यहां पर आठों प्रकार के दूधों के
गुण-कर्म सामान्य रूप में कह दिये हैं। आगे 'अन्न पान विधि' नामक अध्याय
(सूत्रस्थान अ० २७) में क्रमानुसार प्रत्येक दूध के गुण-कर्म पृथक् पृथक्
सम्पूर्ण रूप से कहेंगे ॥११२-११३॥
अथापरे त्रयो वृक्षाः पृथग्ये फलमूलिभिः ।
१ प्रायः शब्द से ऊँटनी के दूध का निषेध है। ऊँटनी का दूध नमकीन है।

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २५

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २५
स्नुह्यर्काश्मन्तकास्तेषामिदं कर्म पृथक्पृथक् ॥ ११४ ॥
वमनेऽश्मन्तकं विद्यात्स्नुहीक्षीरं विरेचने ।
क्षीरमर्कस्य विज्ञेयं वमने सविरेचने ॥ ११५ ॥
अब शोधन के लिये कहे हुए छः वृक्षों में तीन का दूध और तीन की
त्वचा ग्रहण की जाती है । इनमें प्रथम दूधवाले तीन वृक्ष फलिनी और
मूलिनी वनस्पतियों से पृथक् हैं, उन के नाम १. स्नुही (थोर); २. अर्क
(आक) और ३. अश्मन्तक हैं । अश्मन्तक का दूध वमन के लिये; स्नुही
का दूध विरेचन के लिये और आक का दूध वमन और विरेचन दोनों कार्यों
के लिये जानना चाहिये * ॥ ११४-११५ ॥
इमांस्त्रीनपरान् वृक्षानाहुर्येषां हितास्त्वचः ।
पूतीकः कृष्णगन्धा च तिल्वकश्च तथा तरुः ॥ ११६ ॥
विरेचने प्रयोक्तव्यः पूतीकस्तिल्वकस्तथा ।
कृष्णगन्धा परिसर्पे शोथेऽर्शःसु चोच्यते ॥ ११७ ॥
दद्रुविद्रधिगण्डेषु कुष्ठेष्वप्यलजीषु च ।
षड्वृक्षाञ्छोधनानेतानपि विद्याद्विचक्षणः ॥ ११८ ॥
दूसरे-शेष तीन वृक्ष हैं-जिनकी त्वचा हितकारी है । उन वृक्षों के नाम—
पूतीक (करंज), कृष्णगन्धा और तिल्वक (लोध्र) हैं। इन में करंज और
लोध्र वृक्ष की छाल विरेचन कार्य में प्रयुक्त होती है, और कृष्णगन्धा की छाल
परिसर्प (वीसर्प, एक्ज़ीमा, त्वग् रोग में), शोथ, अर्श रोग, दद्रु (दाद),
विद्रधि, गण्डमाला, कुष्ठ और अलजी नामक नाना रोगों में प्रयुक्त होती है ।
शिरोविरेचन में इसका प्रयोग रोग-भिषग्जितीय अध्याय (विमानस्थान
अ० ८) में कहेंगे ॥ ११६-११८ ॥
इन ऊपर कहे हुए छः वृक्षों को शोधनकारक जाने ।
उपसंहार—
इत्युक्ताः फलमूलिन्यः स्नेहाश्च लवणानि च ।
मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड्ये दृष्टाः पयस्त्वचः ॥ ११९ ॥
फलिनी १६, मूलिनी १६, स्नेह ४, लवण ५, मूत्र ८, दूध ८, और शोधन
वृक्ष ६, जिनके दूध और त्वचा काम में आते हैं वे कह दिये हैं ॥११९ ॥

  • अश्मन्तक के समान कार्य करने वाला वृक्ष अष्टा है जो महाराष्ट्रों में
    होता है, इसका दूध वामक है ।

२६ चरकसंहिता [ अ० १
ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने ।
अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥ १२० ॥
बकरियां चराने वाले, भेंड़े चराने वाले, गौवें चराने वाले और अन्य
तपस्वी या भील आदि जो कि जंगल में रहते हैं ये लोग ओषधियों को नाम रूप
और आकृति से पहिचानते हैं ॥ १२० ॥
न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः ।
ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति ॥ १२१ ॥
योगवित्त्वामरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते ।
किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ॥ १२२ ॥
योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम् ।
पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य स विज्ञेयो भिषक्तमः ॥ १२३ ॥
ओषधियों के नाम जान लेने मात्र से, अथवा रूप से पहिचान लेने से
भी कोई ओषधि के सम्यक् प्रयोग को नहीं जान सकता । इसीलिये शास्त्र में
इनका वर्णन किया जाता है ।
जो वैद्य ओषधियों को नाम, रूप, और उनके योग और प्रयोगों सहित
जानता है, वह तो तत्त्ववित् है ही, जो वैद्य ओषधियों को सभी प्रकार से
समझता है; उसके लिये कहना ही क्या ? और जो व्यक्ति प्रत्येक पुरुष के बल,
शरीर, आहार, सार, सात्म्य, सत्त्व प्रकृति और वयस का विचार करके देश, काल,
मात्रा के अनुसार ओषधि को जानता है वह वैद्यों में श्रेष्ठ है ॥१२१-१२३॥
न जानी हुई औषधियों से हानियाँ-
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा ।
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा ॥ १२४ ॥
औषधं ह्यनभिज्ञातं नामरूपगुणैस्त्रिभिः ।
विज्ञातमपि दुर्युक्तमनर्थायोपपद्यते ॥ १२५ ॥
जिस प्रकार न जाना हुआ ( मूढ़ आदमी से प्रयुक्त किया हुआ ) विष,
जिस प्रकार शस्त्र, जिस प्रकार अग्नि और जिस प्रकार अशनि ( वज्र ) या
( बिजली ) मृत्यु के कारण बनते हैं, उसी प्रकार नाम रूप गुण से
न जानी हुई औषधि भी मृत्यु का कारण हो सकता है और नामरूप और
गुण से जानी हुई औषधि अमृत के समान है । नाम, रूप एवं गुण से न

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २७

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २७
जानी हुई औषध या जाना हुई भी देश काल आ.दे का विचार न करके देने
से अनिष्ट के लिए होती है, वह भारी अनर्थ-उत्पन्न करती है ॥ १२४-१२५ ॥
योगादपि विषं तीक्ष्णमुत्तमं भेषजं भवेत् ।
भेषजं चापि दुर्युक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ॥ १२६ ॥
तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम् ।
धीमता किञ्चिदादेयं जीबितारोग्यकाङ्क्षिणा ॥ १२७ ॥
तीक्ष्ण प्राणनाशक विष भी सम्यक् प्रकार से प्रयोग करने पर उत्तम औषध
का कार्य करता है। औषध भी अनुचित प्रकार से प्रयोग करने पर तीक्ष्ण-प्राण
नाशक विष-सा काम करती है।
इसलिये अनुचित रूप में प्रयोग की जाने वाली ओषधि के विष के समान
होने के कारण आयु एवं आरोग्य को चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये
कि, देश काल-मात्रा आदि का विचार न करके देने वाले मूढ वैद्य से दी हुई
औषध को कभी ग्रहण न करे ॥ १२६-१२७ ॥
कुर्यान्निपतितो मूर्ध्नि सशेषं वासवाशनिः ।
सशेषमातुरं कुर्यान्न त्वज्ञमतमौषधम् ॥ १२८॥
इन्द्र के हाथ से छूटा हुआ वज्र यदि मनुष्य के सिर पर गिर पड़े तो
उससे बचना सम्भव हो सकता है, परन्तु मूर्ख वैद्य से दी हुई औषधि रोगी को
समाप्त ही कर डालती है, उससे बचना असम्भव है ॥ १२८ ॥
दुःखिताय शयानाय श्रद्दधानाय रोगिणे ।
यो भेषजमविज्ञाय प्राज्ञमानी प्रयच्छति ॥ १२९ ।
त्यक्तधर्मस्य पापस्य मृत्युभूतस्य दुर्मतेः ।
नरो नरकपाती स्यात्तस्य संभापणादपि ॥ १३० ॥
जो प्राज्ञमानी-अपने को बुद्धिमान् गिनने वाला वैद्य, औषध को न जान-
कर दुःखी, अचेत पड़े, वैद्य में श्रद्धा करने वाले रोगी को औषध देता है,
ऐसे धर्म को छोड़ देने वाले विश्वासघाती, मृत्यु के समान साक्षात् यम और
दुर्मति, अज्ञ, मूढ़ वैद्य के साथ बोलने से भी मनुष्य नरकगामी होता है, फिर
स्पर्श आदि से क्यों नहीं होगा ॥ १२६-१३० ॥
वरमाशीविषविषं कथितं ताम्रमेव वा ।
पीतमत्यग्निसंतप्ता भक्षिता वाऽप्ययोगुडाः ॥ १३१ ॥
न तु श्रुतवतां वेषं बिभ्रता शरणागतात् ।
गृहीतमन्नं पानं वा वित्तं वा रोगपीडितात् ॥ १३२ ॥