चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ चरकसंहिता [ अ० १
पिलखन आदि, (२) जिनमें फल और पुष्प दोनों आते हैं उनको 'वानस्पत्य'
अर्थात् वृक्ष कहते हैं, जैसे आम, जामुन आदि, (३) जो फल आने पर नष्ट हो
जाते हैं, उनको 'ओषधि' कहते हैं जैसे धान, चावल, जौ, गेहूं आदि और (४)
जो लता के समान फैलने वाली हैं उनको 'वीरुध्-कहते हैं जैसे गिलोय आदि ॥७२॥
औद्भिद पदार्थों के काम में आने वाले अंग:—
मूलत्वक्सारनिर्यासनालस्वरसपल्लवाः ।
क्षाराः क्षीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः ॥ ७३ ॥
पत्राणि शुङ्गाः कन्दाश्च प्ररोहाश्चौद्भिदो गणः ।
मूल, त्वचा, (सार) अन्दर का स्थिर सार भाग, (निर्यास) गोंद, (नाड़) नाल,
(स्वरस) पीड़न करके द्रव्य से निकाला हुआ रस, ( पल्लव ) परों आम, जामुन
आदि के, क्षार, (क्षीर) दूध, थोर आदि के फल, पुष्प, भस्म, तैल भिलावे
आदि का; कांटे, पत्ते, शुंग अर्थात् छोटे २ कांटे जो वृक्ष पर होते हैं जैसे
सिम्बल के, कन्द अर्थात् फलहीन ओषधियों के मूल, (प्ररोह) अंकुर यह
'औद्भिद गण' है । वनस्पतियों के ये उपरोक्त अंश काम में आते हैं ॥ ७३ ॥
मूलिन्यः षोडशैकोनाः फलिन्यो विंशतिः स्मृताः ॥ ७४ ॥
महास्नेहाश्च चत्वारः पञ्चैव लवणानि च ।
अष्टौ मूत्राणि सङ्ख्यातान्यष्टावेव पयांसि च ॥ ७५ ॥
शोधनार्थाश्च षड् वृक्षाः पुनर्वसुनिदर्शिताः ।
य एतान् वेत्ति संयोक्तुं विकारेषु स वेदवित् ॥ ७६ ॥
जिन वनस्पतियों का मूल प्रयोग करने योग्य है वे 'मूलिन' हैं । ऐसी वन-
स्तियां सोलह हैं, और जिन वनस्पतियों का फल उपयोगी है वे 'फलिनी' हैं,
ऐसी वनस्पतियां उन्नीस हैं । चार महास्नेह हैं जैसे घी, तैल, वसा, और मज्जा;
पांच प्रकार के नमक हैं, आठ प्रकार के मूत्र और आठ ही प्रकार के दूध हैं
और संशोधन के लिये छः वृक्ष पुनर्वसु आत्रेय ने कहे हैं । जो विद्वान् वैद्य
रोगों में इन सब का प्रयोग करना जानता है वह आयुर्वेद को भली प्रकार से
जानता है ॥ ७४-७६ ॥
सोलह 'मूलिनी' ओषधियों की गणना—
हस्तिदन्ती हैमवती श्यामा त्रिवृदधोगुडा ।
सप्तला श्वेतनामा च प्रत्यक्श्रेणी गवाक्ष्यपि ॥ ७७ ॥
ज्योतिष्मती च बिम्बी च शणपुष्पी विषाणिका ।
अजगन्धा द्रवन्ती च क्षीरिणी चात्र षोडशी ॥ ७८ ॥