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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

चौवनवाँ सर्ग

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चौवनवाँ सर्ग

सीताका पाँच वानरोंके बीच अपने भूषण और वस्त्रको गिराना, रावणका लङ्कामें पहुँचकर सीताको अन्तःपुरमें रखना तथा जनस्थानमें आठ राक्षसोंको गुप्तचरके रूपमें रहनेके लिये भेजना

रावणके द्वारा हरी जाती हुईं विदेहनन्दिनी सीताको उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्गमें उन्होंने एक पर्वतके शिखरपर पाँच श्रेष्ठ वानरोंको बैठे देखा॥ १ ॥

तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीताने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीरामको कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंगकी रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीचमें फेंक दिया॥ २-३ ॥

रावण बड़ी घबराहटमें था, इसलिये सीताके इस कार्यको वह न जान सका। वे भूरी आँखोंवाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वरसे विलाप करती हुईं विशाल-लोचना सीताकी ओर एकटक नेत्रोंसे देखने लगे॥ ४ १/२ ॥

राक्षसराज रावण पम्पासरोवरको लाँघकर रोती हुईं मैथिली सीताको साथ लिये लङ्कापुरीकी ओर चल दिया॥ ५ १/२ ॥

निशाचर रावण बड़े हर्षमें भरकर सीताके रूपमें अपनी मौतको ही हरकर लिये जा रहा था। उसने वैदेहीके रूपमें तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिनको ही अपनी गोदमें उठा रखा था॥ ६ १/२ ॥

वह धनुषसे छूटे हुए बाणकी तरह तीव्र गतिसे चलकर आकाशमार्गसे अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरोंको तुरंत लाँघ गया॥ ७ १/२ ॥

उसने तिमि नामक मत्स्यों और नाकोंके निवासस्थान एवं वरुणके अक्षय गृह समुद्रको भी, जो समस्त नदियोंका आश्रय है, पार कर लिया॥ ८ १/२ ॥

विदेहनन्दिनी जगन्माता जानकीका अपहरण होते समय वरुणालय समुद्रको बड़ी घबराहट हुई। उससे उसकी उठती हुईं लहरें शान्त हो गयीं। उसके भीतर रहनेवाली मछलियों और बड़े-बड़े सर्पोंकी गति रुक गयी॥ ९ १/२ ॥

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उस समय आकाशमें विचरनेवाले चारण यों बोले—‘अब दशग्रीव रावणका यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है’ तथा सिद्धोंने भी यही बात दुहरायी॥ १० १/२ ॥

सीता छटपटा रही थीं। रावणने अपनी साकार मृत्युकी भाँति उन्हें अङ्कमें लेकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ ११ १/२ ॥

वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरीके द्वारपर बहुत-से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरीका विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावणने अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया॥ १२ १/२ ॥

कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोहमें डूबी हुई थीं। रावणने उन्हें अन्तःपुरमें रख दिया, मानो मयासुरने मूर्तिमती आसुरी मायाको वहाँ स्थापित कर दिया हो*॥ १३ १/२ ॥

इसके बाद दशग्रीवने भयंकर आकारवाली पिशाचिनोंको बुलाकर कहा—‘(तुम सब सावधानीके साथ सीताकी रक्षा करो।) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञाके बिना सीताको देखने या इनसे मिलने न पाये॥ १४ १/२ ॥

‘उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय; इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है॥ १५ १/२ ॥

‘तुमलोगोंमेंसे जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीतासे कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समझूँगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है’॥ १६ १/२ ॥

राक्षसियोंको वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ‘अब आगे क्या करना चाहिये’ यह सोचता हुआ अन्तःपुरसे बाहर निकला और कच्चे मांसका आहार करनेवाले आठ महापराक्रमी राक्षसोंसे तत्काल मिला॥

उनसे मिलकर ब्रह्माजीके वरदानसे मोहित हुए महापराक्रमी रावणने उसके बल और वीर्यकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा—॥ १९ ॥

‘वीरो! तुमलोग नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थानको, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है॥ २० ॥

‘वहाँके सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थानमें तुमलोग अपने ही बल-पौरुषका भरोसा करके भयको दूर हटाकर रहो॥ २१ ॥

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‘मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेनाके साथ महापराक्रमी खर और दूषणको बसा रखा था, किंतु वे सब-के-सब युद्धमें रामके बाणोंसे मारे गये॥ २२ ॥

‘इससे मेरे मनमें अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्यकी सीमासे ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये रामके साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है॥ २३ ॥

‘मैं अपने महान् शत्रुसे उस वैरका बदला लेना चाहता हूँ। उस शत्रुको संग्राममें मारे बिना मैं चैनसे सो नहीं सकूँगा॥ २४ ॥

‘रामने खर और दूषणका वध किया है, अतः मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी। जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं रामका वध करके शान्ति पा सकूँगा॥ २५ ॥

‘जनस्थानमें रहकर तुमलोग रामचन्द्रका समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो॥ २६ ॥

‘तुम सभी निशाचर सावधानीके साथ वहाँ जाना और रामके वधके लिये सदा प्रयत्न करते रहना॥ २७ ॥

‘मुझे अनेक बार युद्धके मुहानेपर तुमलोगोंके बलका परिचय मिल चुका है; इसीलिये इस जनस्थानमें मैंने तुम्हीं लोगोंको रखनेका निश्चय किया है’॥ २८ ॥

रावणकी यह महान् प्रयोजनसे भरी हुईं प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्काको छोड़कर जनस्थानकी ओर प्रस्थित हो गये॥ २९ ॥

तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीताको पाकर उन्हें राक्षसियोंकी देख-रेखमें सौंपकर रावणको बड़ा हर्ष हुआ। श्रीरामके साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस मोहवश आनन्द मानने लगा॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥


* रामायणतिलक नामक व्याख्याके विद्वान् लेखकने यह बताया है कि यहाँ जो सीताकी मायासे उपमा दी गयी है, उसके द्वारा यह अभिप्राय व्यक्त किया गया है कि मायामयी सीता ही लङ्कामें आयी थीं; मुख्य सीता तो अग्निमें प्रविष्ट हो चुकी थीं। इसीलिये रावण इन्हें ला सका। मायारूपिणी होनेके कारण ही रावणको इनके स्वरूपका ज्ञान न हो सका।