About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
९८८ * मत्स्यपुराण *
दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
देव-प्रतिमाका प्रमाण-निरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>क्रियायोगः कथं सिध्येद् गृहस्थादिषु सर्वदा।<br>ज्ञानयोगसहस्त्राद्धि कर्मयोगो विशिष्यते॥ १ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! गृहस्थादि आश्रमोंमें सभी युगोंमें क्रियायोगकी* सिद्धि किस प्रकार सम्भव है, क्योंकि क्रिया (भक्ति)-योगको हजारों ज्ञान-योगकी अपेक्षा विशिष्ट माना गया है॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>क्रियायोगं प्रवक्ष्यामि देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं यस्मान्नान्यल्लोकेषु विद्यते॥ २<br>प्रतिष्ठायां सुराणां तु देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>देवयज्ञोत्सवं चापि बन्धनाद् येन मुच्यते॥ ३<br>विष्णोस्तावत् प्रवक्ष्यामि यादग्रूपं प्रशस्यते।<br>शङ्खचक्रधरं शान्तं पद्महस्तं गदाधरम्॥ ४<br>छत्राकारं शिरस्तस्य कम्बुग्रीवं शुभेक्षणम्।<br>तुङ्गनासं शुक्तिकर्णं प्रशान्तोर्भुजक्रमम्॥ ५<br>क्वचिदष्टभुजं विद्याच्चतुर्भुजमथापरम्।<br>द्विभुजश्चापि कर्तव्यो भवनेषु पुरोधसा॥ ६<br>देवस्याष्टभुजस्यास्य यथास्थानं निबोधत।<br>खड्गो गदा शरः पद्मं देयं दक्षिणतो हरेः॥ ७<br>धनुश्च खेटकं चैव शङ्खचक्रे च वामतः।<br>चतुर्भुजस्य वक्ष्यामि यथैवायुधसंस्थितिम्॥ ८<br>दक्षिणेन गदा पद्मं वासुदेवस्य कारयेत्।<br>वामतः शङ्खचक्रे च कर्तव्ये भूतिमिच्छता॥ ९<br>कृष्णावतारे तु गदा वामहस्ते प्रशस्यते।<br>यथेच्छया शङ्खचक्रे चोपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ १० | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं देवार्चनकथनस्वरूप क्रियायोगका वर्णन कर रहा हूँ। यह भोग और मोक्ष—दोनोंको देनेवाला है तथा भूलोकके अतिरिक्त इसकी अन्य लोकोंमें सत्ता नहीं है। इन देवताओंकी प्रतिमा-प्रतिष्ठाके प्रसङ्ग-क्रममें प्रतिमा-निर्माण और उनके अङ्गभूत यज्ञकी विधि भी निर्दिष्ट है, जिसके अनुष्ठानसे प्राणी बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अब भगवान् विष्णुकी जैसी प्रतिमा श्रेष्ठ मानी जाती है उसका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाका रूप शान्त हो, हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए हो, उसका सिर छत्रके समान गोल, गला शङ्खके समान, आँखें सुन्दर, नासिका कुछ ऊँची, कान सीपी-सदृश, भुजाएँ विशाल और ऊरु प्रशान्त—चढ़ाव-उतारवाले होने चाहिये। विष्णुभगवान्की प्रतिमा कहीं तो आठ भुजाओंवाली होती है और कहीं चार भुजाओंवाली; किंतु गृहस्थको अपने भवनमें दो भुजाओंकी (विष्णु-) प्रतिमा पुरोहितद्वारा स्थापित करानी चाहिये। अष्टभुज मूर्तिमें आयुधोंके यथास्थान क्रमको सुनिये—भगवान् श्रीहरिके दाहिनी ओरके चार हाथोंमें क्रमशः (नीचेसे ऊपरकी ओर) खड्ग, गदा, बाण और कमल तथा बायें हाथमें क्रमशः (नीचेसे ऊपर) धनुष, ढाल, शङ्ख और चक्र स्थापित करना चाहिये। अब चतुर्भुजमूर्तिके हाथोंमें आयुधकी स्थिति बतला रहा हूँ। समृद्धिकी इच्छा रखनेवालेको भगवान् वासुदेवकी प्रतिमामें दाहिनी ओरके दोनों हाथोंमें क्रमशः नीचेसे ऊपर गदा और पद्म तथा बायीं ओर क्रमशः नीचेसे ऊपर शङ्ख और चक्र रखना चाहिये। कृष्णावतारकी प्रतिमामें बायें हाथमें गदा ठीक मानी गयी है। दाहिने हाथमें स्वेच्छानुसार शङ्ख और चक्रको ऊपर-नीचे रखना चाहिये॥ २—१०॥ |
* यह पाद्मीय क्रियायोग-खण्डका सारांश तथा भाग ११। २७ के क्रियायोगका कुछ विस्तृत रूप है। यहाँ क्रियायोगका तात्पर्य देवपरक भगवद्भक्ति एवं देवार्चनसे है। मन्दिर, प्रतिमा-निर्माण, प्रतिष्ठादिका यह प्रकरण भारतीय धर्म-संस्कृति एवं कला-कौशलका प्राण है। इसकी विस्तृत जानकारीके लिये 'विष्णुधर्मोत्तर' 'शिल्परत्न' 'वास्तुरजवल्लभ'—'प्रतिमा-प्रसादमण्डन' 'काश्यपशिल्प' 'अपराजित-पृच्छा' 'समराङ्गणसूत्रधार' 'प्रतिष्ठामहोदधि' आदि सहायक ग्रन्थ भी अनुसंधेय है।
| * अध्याय २५८ * | १८९ |
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| अधस्तात् पृथिवी तस्य कर्तव्या पादमध्यतः।<br>दक्षिणे प्रणतं तद्वद् गरुत्मन्तं निवेशयेत्॥ ११<br><br>वामतस्तु भवेल्लक्ष्मीः पद्महस्ता शुभानना।<br>गरुत्मानग्रतो वापि संस्थाप्यो भूतिमिच्छता॥ १२<br><br>श्रीश्च पुष्टिश्च कर्तव्ये पार्श्वयोः पद्मसंयुते।<br>तोरणं चोपरिष्टात् तु विद्याधरसमन्वितम्॥ १३<br><br>देवदुन्दुभिसंयुक्तं गन्धर्वमिथुनान्वितम्।<br>पत्रवल्लीसमोपेतं सिंहव्याघ्रसमन्वितम्॥ १४<br><br>तथा कल्पलतोपेतं स्तुवद्भिरमरेश्वरैः।<br>एवंविधो भवेद्विष्णोस्त्रिभागेनास्य पीठिका॥ १५<br><br>नवतालप्रमाणास्तु देवदानवकिंनराः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि मानोन्मानं विशेषतः॥ १६<br><br>जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजः स्फुटम्।<br>त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥ १७<br><br>तदष्टकेन लिक्ष्या तु यूका लिक्ष्याष्टकैर्मता।<br>यवो यूकाष्टकं तद्वदष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥ १८<br><br>स्वकीयाङ्गुलिमानेन मुखं स्याद् द्वादशाङ्गुलम्।<br>मुखमानेन कर्तव्या सर्वावयवकल्पना॥ १९ | विष्णुभगवान्के दोनों चरणोंके मध्यमें नीचेकी ओर पृथ्वीकी मूर्ति और दाहिनी ओर प्रणाम करते हुए गरुड़की मूर्ति रखनी चाहिये। बायीं ओर हाथमें कमल लिये हुए सुन्दर मुखवाली लक्ष्मीकी स्थापना करनी चाहिये। कल्याणकामी पुरुष गरुड़को आगे भी स्थापित कर सकता है। प्रतिमाके दोनों ओर हाथमें कमल लिये श्री और पुष्टिकी मूर्ति भी बनानी चाहिये। प्रतिमाके ऊपर विद्याधरोंसे चित्रित गोलाकार तोरणका निर्माण करना चाहिये। देवताओंके नगाड़े बजाते हुए गन्धर्व-दम्पत्तिको भी वहाँ चित्रित करना चाहिये। साथमें वहीं यह लता और पत्तोंसे युक्त कल्पलतासे समन्वित हो और व्याघ्र-सिंहोंकी भी प्रतिमासे सम्पन्न। स्तुति करते हुए बड़े-बड़े देवगण सामने खड़े हों। इस प्रकार विष्णुकी प्रतिमा हो तथा प्रतिमाकी पीठिकाका विस्तार प्रतिमामानके तृतीयांशसे निर्मित हो। देवता, दानव तथा किन्नरोंकी प्रतिमा नौ ताल¹ परिमाणकी होनी चाहिये। अब मैं कौन-सी प्रतिमा कितनी ऊँची, नीची, मोटी और लम्बी हो, यह बतलानेके लिये मापविवरण बतला रहा हूँ। जालीके भीतरसे सूर्यकी किरणोंके प्रविष्ट होनेपर जो उड़ता धूलिकण स्पष्ट दिखायी पड़ता है, उसे 'त्रसरेणु' कहते हैं। इन आठ त्रसरेणुओंके बराबर एक बालाग्र होता है। उससे आठगुने बड़े आकारके पदार्थकी लिक्ष्या और आठ लिक्ष्याकी एक यूका होती है। आठ यूकाका एक यव और आठ यवोंके मापका एक अंगुल होता है। अपनी अँगुलीके परिमाणसे बारह अंगुलका मुख होता है और मुखके परिमाणानुसार ही देवताके सभी अवयवोंकी कल्पना करनी चाहिये ॥ ११–१९॥ |
| सौवर्णी राजती वापि ताम्री रत्नमयी तथा।<br>शैली दारुमयी चापि लोहसीसमयी तथा॥ २०<br><br>रीतिकाधातुयुक्ता वा ताम्रकांस्यमयी तथा।<br>शुभदारुमयी वापि देवतार्चा प्रशस्यते॥ २१<br><br>अङ्गुष्ठपर्वादारभ्य वितस्तिर्यावदेव तु।<br>गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधैः॥ २२ | देव-प्रतिमा सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, रत्न, पत्थर, देवदारु, लोहा-सीसा, पीतल, ताँबा और काँसमिश्रित अथवा शुभ काष्ठोंकी बनी हुई प्रशस्त मानी गयी है।² गृहस्थोंके घरोंमें अँगूठेके एक पर्वसे लेकर एक बीते प्रमाणमात्र ही प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये; क्योंकि विद्वानोंने इससे बड़ीको गृहस्थके लिये प्रशस्त नहीं माना है। |
१. अंगूठेसे मध्यमा अंगुलीतक फैले करतलको ताल कहते हैं।
२. भागवतीय क्रियायोगोंमें भी कहा है—
'शैली दारुमयी लौही लेप्यालेख्या च सैकती। मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता॥ (११। २७। १२)
| ९९० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आषोडशा तु प्रासादे कर्तव्या नाधिका ततः।<br>मध्योत्तमकनिष्ठा तु कार्या वित्तानुसारतः॥ २३<br>द्वारोच्छ्रायस्य यन्मानमष्टधा तत् तु कारयेत्।<br>भागमेकं ततस्त्यक्त्वा परिशिष्टं तु यद् भवेत्॥ २४<br>भागद्वयेन प्रतिमा त्रिभागीकृत्य तत्पुनः।<br>पीठिका भागतः कार्या नातिनीचा न चोच्छ्रिता॥ २५<br>प्रतिमामुखमानेन नव भागान् प्रकल्पयेत्।<br>चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा भागेन हृदयं पुनः॥ २६<br>नाभिस्तस्मादधः कार्या भागेनैकेन शोभना।<br>निम्नत्वे विस्तरत्वे च अङ्गुलं परिकीर्तितम्॥ २७<br>नाभेरधस्तथा मेढ्रं भागेनैकेन कल्पयेत्।<br>द्विभागेनायतावरू जानुनी चतुरङ्गुले॥ २८<br>जङ्घे द्विभागे विख्याते पादौ च चतुरङ्गुलौ।<br>चतुर्दशाङ्गुलस्तद्वन्मौलिरस्य प्रकीर्त्तितः॥ २९<br>ऊर्ध्वमानमिदं प्रोक्तं पृथुत्वं च निबोधत।<br>सर्वावयवमानेषु विस्तारं शृणुत द्विजाः॥ ३० | किंतु देवमन्दिरोंमें सोलह बीतातककी प्रतिमा प्रतिष्ठित की जा सकती है, पर उससे बड़ी वहाँ भी नहीं। इन प्रतिमाओंको अपनी आर्थिक स्थितिके अनुसार उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ कोटिकी बनानी चाहिये। मन्दिरके प्रवेशद्वारकी जो ऊँचाई हो उसे आठ भागोंमें विभक्त कर दे। उसमें एक भाग छोड़कर शेष दो भागोंसे प्रतिमा बनवाये। फिर उन दो भागोंकी संख्याको तीन भागोंमें विभक्त कर दे। उसके एक भागके बराबर पीठिका बनाये। वह न बहुत ऊँची हो, न बहुत नीची। फिर प्रतिमाके मुखमानको नौ भागोंमें विभक्त करे। उसमें चार अङ्गुलमें ग्रीवा तथा एक भागके द्वारा हृदय होना चाहिये। उसके नीचेके एक भागमें सुन्दर नाभि बनानी चाहिये। वह गहराई और विस्तारमें एक अंगुलकी कही गयी है। नाभिके नीचे एक भागमें लिंग, दो भागोंमें विस्तृत ऊरु, चार अंगुलमें घुटने, दो भागसे जंघे और चार अंगुलके पैर हों। उसी प्रकार मूर्तिका सिर चौदह अंगुलका बनाना चाहिये। यह तो मूर्तिकी ऊँचाई बतायी गयी, अब उसकी मोटाई सुनिये। ब्राह्मणगण! अब क्रमशः सभी अवयवोंका विस्तार सुनिये॥ २०—३०॥ |
| चतुरङ्गुलं ललाटं स्यादूर्ध्वं नासा तथैव च।<br>द्व्यङ्गुलस्तु हनुर्ज्ञेय ओष्ठौ द्व्यङ्गुलसम्मितौ॥ ३१<br>अष्टाङ्गुलं ललाटं च तावन्मात्रे भ्रुवौ मते।<br>अर्धाङ्गुला भ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवानता॥ ३२<br>उन्नताग्रा भवेत् पार्श्वे श्लक्ष्णतीक्ष्णा प्रशस्यते।<br>अक्षिणी द्व्यङ्गुलायामे तदर्धं चैव विस्तरे॥ ३३<br>उन्नतोदरमध्ये तु रक्तान्ते शुभलक्षणे।<br>तारकार्धविभागेन दृष्टिः स्यात् पञ्चभागिकी॥ ३४<br>द्व्यङ्गुलं तु भ्रुवोर्मध्ये नासामूलमथाङ्गुलम्।<br>नानाग्रविस्तरं तद्वत् पुटद्वयमथानतम्॥ ३५<br>नासापुटविलं तद्वदर्धाङ्गुलमुदाहृतम्।<br>कपोले द्व्यङ्गुले तद्वत् कर्णमूलाद् विनिर्गते॥ ३६ | प्रतिमाके ललाटकी मोटाई चार अंगुल, नासिकाकी चार अंगुल, दाढ़ीकी दो अंगुल और ओठकी भी दो अंगुल जाननी चाहिये। यदि ललाटका विस्तार आठ अंगुल हो तो उतनेमें ही दोनों भौंहोंको भी बनानी चाहिये। भौंहोंकी रेखा आधे अंगुलकी हो। वह बीचमें धनुषाकार हो। दोनों छोरोंपर उसके अग्रभाग उठे हुए हों, बनावट चिकनी तथा सुन्दर होनी चाहिये। आँखोंकी लम्बाई दो अंगुल, चौड़ाई एक अंगुल, उनके मध्य भागमें ऊँची रक्ताभ एवं शुभ लक्षणोंसे युक्त पुतलियाँ होनी चाहिये। तारकाके आधे भागसे पाँचगुनी दृष्टि बनानी चाहिये। दोनों भौंहोंके मध्यमें दो अंगुलका अन्तर रखना चाहिये, नासिकाका मूलभाग एक अंगुलमें रहे। इसी प्रकार नीचेकी ओर झुकी हुई नासिकाके अग्रभाग एवं दोनों पुटोंको बनाना चाहिये। नासिकाके पुटोंके छिद्र आधे अंगुलके बताये गये हैं। कपोल दो अंगुलके हों जो कानोंके मूल भागतक विस्तृत हों। |
| * अध्याय २५८ * | ९९१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हन्वग्रमङ्गुलं तद्वद् विस्तारो द्व्यङ्गुलो भवेत्।<br>अर्धाङ्गुला भ्रुवो राजी प्रणालसदृशी समा॥ ३७<br>अर्धाङ्गुलसमस्तद्वदुत्तरोष्ठस्तु विस्तरे।<br>निष्पावसदृशं तद्वन्नासापुटदलं भवेत्॥ ३८<br>सृक्किणी ज्योतिस्तुल्ये तु कर्णमूलात् षडङ्गुले।<br>कर्णौ तु भूसमौ ज्ञेयौ ऊर्ध्वं तु चतुरङ्गुलौ॥ ३९<br>द्व्यङ्गुलौ कर्णपाश्र्वौ तु मात्रामेकां तु विस्तृतौ।<br>कर्णयोरुपरिष्टाच्च मस्तकं द्वादशाङ्गुलम्॥ ४० | ठुड्डीका अग्रभाग एक अंगुलमें तथा विस्तार दो अंगुलमें होना चाहिये। आधे अंगुलमें भौंहोंकी रेखा होनी चाहिये, जो प्रणालीके समान हो। नीचे तथा ऊपरके ओठ आधे-आधे अंगुलके हों। उसी प्रकार नासिकाके दोनों पुट निष्पाव (सेमके बीज)-के तुल्य मापके बनाये जायँ। ओठके बगलमें मुखका कोना और नेत्र ज्योति दोनों समान आकारका हों और कानके मूलसे छः अंगुल दूरपर बनावे। दोनों कानोंकी बनावट भौंहोंके समान हो और उनकी ऊँचाई चार अंगुलकी हो। कानोंके पार्श्वभाग दो अंगुलके हों और उनका विस्तार एक अंगुल मात्रका हो। दोनों कानोंके ऊपर मस्तकका विस्तार बारह अंगुलका होना चाहिये॥ ३१—४०॥ |
| ललाटात् पृष्ठतोऽर्धेन प्रोक्तमष्टादशाङ्गुलम्।<br>षट्त्रिंशदङ्गुलश्चास्य परिणाहः शिरोगतः॥ ४१<br>सकेशनिचयो यस्य द्विचत्वारिंशदङ्गुलः।<br>केशान्ताद्धनुका तद्वदङ्गुलानि तु षोडश॥ ४२<br>ग्रीवामध्यपरीणाहश्चतुर्विंशतिकाङ्गुलः।<br>अष्टाङ्गुला भवेद् ग्रीवा पृथुत्वेन प्रशस्यते॥ ४३ | ललाटके पीछेका आधा भाग अठारह अंगुलका कहा गया है और इसके मस्तकतकका विस्तार छत्तीस अंगुल होता है। केश-समूहका विस्तार बयालीस अंगुलका होता है। केशोंके अन्तर्भागसे दाढ़ीहतकका विस्तार सोलह अंगुलका होता है। दोनों कंधोंका विस्तार चौबीस अंगुलका हो। ग्रीवाकी मोटाई आठ अंगुलकी उत्तम मानी गयी है। |
| स्तनग्रीवान्तरं प्रोक्तमेकताल स्वयम्भुवा।<br>स्तनयोरन्तरं तद्वद् द्वादशाङ्गुलमिष्यते॥ ४४ | ब्रह्माने स्तन और ग्रीवाका मध्यभाग एक तालके बराबर बताया है। दोनों स्तनोंमें बारह अंगुलका अन्तर माना जाता है। |
| स्तनयोर्मण्डलं तद्वद् द्व्यङ्गुलं परिकीर्तितम्।<br>चूचुकौ मण्डलस्यान्तर्यवमात्रावुभौ स्मृतौ॥ ४५<br>द्वितालं चापि विस्ताराद् वक्षःस्थलमुदाहृतम्।<br>कक्षे षडङ्गुले प्रोक्ते बाहुमूलस्तनान्तरे॥ ४६ | स्तनोंके मण्डल दो अंगुल कहे गये हैं। दोनों चूचुक उस मण्डलके भीतर यवके बराबर बताये जाते हैं। वक्षःस्थलकी चौड़ाई दो ताल कही गयी है। दोनों कक्ष बाहु (भुजा) और स्तनके मध्यमें छः अंगुलके होने चाहिये। |
| चतुर्दशाङ्गुलौ पादावङ्गुष्ठौ तु त्रिरङ्गुलौ।<br>पञ्चाङ्गुलपरीणाहमङ्गुष्ठाग्रं तथोन्नतम्॥ ४७<br>अङ्गुष्ठकसमा तद्वदायामा स्यात् प्रदेशिनी।<br>तस्याः षोडशभागेन हीयते मध्यमाङ्गुली॥ ४८ | दोनों पैर चौदह अंगुल तथा उनके अँगूठे तीन अँगल हों। अँगूठेका अग्रभाग उन्नत होना चाहिये और उसका विस्तार पाँच अंगुलका हो। उसी प्रकार अँगूठेके समान ही प्रदेशिनी अंगुलीको भी लम्बी बनाना चाहिये। उससे सोलहवें अंशसे अधिक मध्यमा अंगुली हो, |
| अनामिकाष्टभागेन कनिष्ठा चापि हीयते।<br>पर्वत्रयेण चाङ्गुल्यौ गुल्फौ द्व्यङ्गुलकौ मतौ॥ ४९ | अनामिका मध्यमा अंगुलीकी अपेक्षा आठवाँ भाग न्यून हो और अनामिकासे आठवें भागमें न्यून कनिष्ठिका हो। इन दोनों अंगुलियोंमें तीन पर्व बनाने चाहिये। पैरोंकी गाँठ दो अंगुलकी मानी गयी है। |
| पाष्णिद्व्यङ्गुलमात्रस्तु कलयोच्चैः प्रकीर्तितः।<br>द्विपर्वाङ्गुष्ठकः प्रोक्तः परीणाहश्च द्व्यङ्गुलः॥ ५० | दोनों एड़ियाँ दो-दो अंगुलमें रहनी चाहिये, किंतु गाँठकी अपेक्षा इसमें एक कला अधिक रहे। अँगूठेमें दो पोर बनने चाहिये, उसका विस्तार दो अंगुलका हो। |
| प्रदेशिनीपरीणाहस्त्र्यङ्गुलः समुदाहृतः।<br>कनिष्ठिकाष्टभागेन हीयते क्रमशो द्विजाः॥ ५१ | प्रदेशिनीका विस्तार तीन अंगुलका बताया गया है। द्विजगण! कनिष्ठिका क्रमशः आठवें भागसे कम रहे। |
| ९९२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अङ्गुलेनोच्छ्रयः कार्यों ह्यङ्गुष्ठस्य विशेषतः।<br>तदर्धेन तु शेषाणामङ्गुलीनां तथोच्छ्रयः॥ ५२ | विशेषतया अँगूठेकी मोटाई एक अंगुलकी हो। शेष अंगुलियोंकी मोटाई उसके आधे भागके तुल्य रखनी चाहिये॥ ४१—५२॥ |
| जङ्घाग्रे परिणाहस्तु अङ्गुलानि चतुर्दश।<br>जङ्घामध्ये परीणाहस्तथैवाष्टादशाङ्गुलः॥ ५३<br>जानुमध्ये परीणाह एकविंशतिरङ्गुलः।<br>जानूच्छ्रयोऽङ्गुलः प्रोक्तो मण्डलं तु त्रिरङ्गुलम्॥ ५४<br>ऊरुमध्ये परीणाहो ह्यष्टाविंशतिकाङ्गुलः।<br>एकत्रिंशोपरिष्टाच्च वृषणौ तु त्रिरङ्गुलौ॥ ५५<br>द्व्यङ्गुलं च तथा मेढ्रं परीणाहः षडङ्गुलः।<br>मणिबन्धादधो विद्यात् केशरेखास्तथैव च॥ ५६<br>मणिकोषपरीणाहश्चतुरङ्गुल इष्यते।<br>विस्तरेण भवेत् तद्वत् कटिरष्टादशाङ्गुला॥ ५७<br>द्वाविंशति तथा स्त्रीणां स्तनौ च द्वादशाङ्गुलौ।<br>नाभिमध्यपरीणाहो द्विचत्वारिंशदङ्गुलः॥ ५८<br>पुरुषे पञ्चपञ्चाशत् कट्यां चैव तु वेष्टनम्।<br>कक्षयोरुपरिष्टात् तु स्कन्धौ प्रोक्तौ षडङ्गुलौ॥ ५९<br>अष्टाङ्गुलां तु विस्तारे ग्रीवां चैव विनिर्दिशेत्।<br>परीणाहे तथा ग्रीवां कला द्वादश निर्दिशेत्॥ ६० | जाँघके आगेके भाग चौदह अंगुल और मध्यभाग अठारह अंगुल रहे। घुटनेका मध्यभाग इक्कीस अंगुलका हो। घुटनेकी ऊँचाई एक अंगुल तथा मण्डल तीन अंगुल विस्तृत हो। ऊरुओंका मध्यभाग अट्ठाईस अंगुल हो। इसके एकतीस अंगुल ऊपर अण्डकोश तीन अंगुल और लिंग दो अंगुल हो तथा उसका विस्तार छः अंगुल हो। मणिबन्धसे नीचे केशोंकी रेखा रखनी चाहिये। मणिकोषका विस्तार चार अंगुलका हो। कटिप्रदेशका विस्तार अठारह अंगुल हो। स्त्रियोंकी मूर्तिमें कटिका विस्तार बाईस अंगुलका तथा स्तनोंका बारह अंगुल होना चाहिये। नाभिका मध्यभाग बयालीस अंगुलका होना चाहिये। पुरुषके कटिप्रदेश पचपन अंगुल तथा दोनों कक्षोंके ऊपर छः अंगुलके स्कन्धोंके बनानेकी विधि है। आठ अंगुलके विस्तारमें ग्रीवाका निर्माण कहा गया है और इसकी लम्बाई बारह कलाकी होनी चाहिये॥ ५३—६०॥ |
| आयामो भुजयोस्तद्वद् द्विचत्वारिंशदङ्गुलः।<br>कार्यं तु बाहुशिखरं प्रमाणे षोडशाङ्गुलम्॥ ६१<br>ऊर्ध्वं यद्बाहुपर्यन्तं विद्यादष्टादशाङ्गुलम्।<br>तथैकाङ्गुलहीनं तु द्वितीयं पर्व उच्यते॥ ६२<br>बाहुमध्ये परीणाहो भवेदष्टादशाङ्गुलः।<br>षोडशोक्तः प्रबाहुस्तु षट्कलोऽग्रकरो मतः॥ ६३<br>सप्ताङ्गुलं करतलं पञ्च मध्याङ्गुली मता।<br>अनामिका मध्यमायाः सप्तभागेन हीयते॥ ६४<br>तस्यास्तु पञ्चभागेन कनिष्ठा परिहीयते।<br>मध्यमायास्तु हीना वै पञ्चभागेन तर्जनी॥ ६५<br>अङ्गुष्ठस्तर्जनीमूलादधः प्रोक्तस्तु तत्समः।<br>अङ्गुष्ठपरिणाहस्तु विज्ञेयश्चतुरङ्गुलः॥ ६६<br>शेषाणामङ्गुलीनां तु भागो भागेन हीयते।<br>मध्यमापर्वमध्यं तु अङ्गुलद्वयमायतम्॥ ६७ | दोनों भुजाओंकी लम्बाई बयालीस अंगुल हो। बाहुके मूलभाग सोलह अंगुलके होने चाहिये। बाहुके ऊपरी अंशतक अठारह अंगुल होना चाहिये। दूसरा पर्व (पोर) इसकी अपेक्षा एक अंगुल कम कहा गया है। बाहुके मध्यभागका विस्तार अठारह अंगुल तथा नीचेका हाथ (करतलके पूर्वतक) सोलह अंगुलका कहा गया है। हाथके अग्रभागका मान छः कलाका माना गया है। हथेलीका विस्तार सात अंगुल हो और उसमें पाँच अंगुलियाँ बनी हों। अनामिका अंगुली मध्यमाकी अपेक्षा सप्तमांश कम रहती है। कनिष्ठा उससे भी पञ्चमांश न्यून तथा मध्यमाके पाँचवें भागसे न्यून तर्जनी होनी चाहिये। अँगूठा तर्जनीके उद्गमसे नीचा होना चाहिये, किंतु लम्बाईमें उतना ही होना चाहिये। अँगूठेका विस्तार चार अंगुलका जानना चाहिये। शेष अंगुलियोंके विस्तार क्रमशः एक-एक भागसे न्यून होते हैं। मध्यमा अंगुलीके पोरोंके |
| * अध्याय २५९ * | ९९३ |
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| यवो यवेन सर्वासाम् तस्यास्तस्याः प्रहीयते।<br>अङ्गुष्ठपर्वमध्यं तु तर्जन्याः सदृशं भवेत् ॥ ६८<br>यवद्वयाधिकं तद्वदग्रपर्व उदाहृतम्।<br>पर्वार्धे तु नखान् विद्यादङ्गुलीषु समन्ततः ॥ ६९<br>स्निग्धं श्लक्ष्णं प्रकुर्वीत ईषद्रक्तं तथाग्रतः।<br>निम्नपृष्ठं भवेन्मध्ये पार्श्वतः कलयोच्छ्रितम् ॥ ७०<br>तथैव केशवल्लीयं स्कन्धोपरि दशाङ्गुला।<br>स्त्रियः कार्यास्तु तन्वङ्ग्यः स्तनोरूजघनाधिकाः ॥ ७१<br>चतुर्दशाङ्गुलायाममुदरं तासु निर्दिशेत्।<br>नानाभरणसम्पन्नाः किञ्चिच्छ्लक्ष्णभुजास्ततः ॥ ७२<br>किञ्चिद् दीर्घं भवेद् वक्त्रमलकावलिरुत्तमा।<br>नासा ग्रीवा ललाटं च सार्धमात्रं त्रिरङ्गलम् ॥ ७३<br>अध्यर्धाङ्गुलविस्तारः शस्यतेऽधरपल्लवः।<br>अधिकं नेत्रयुग्मं तु चतुर्भागेन निर्दिशेत्।<br>ग्रीवाबलिश्च कर्तव्या किञ्चिदर्थाङ्गुलोच्छ्रयः ॥ ७४<br>एवं नारीषु सर्वासु देवानां प्रतिमासु च।<br>नवतालमिदं प्रोक्तं लक्षणं पापनाशनम् ॥ ७५ | मध्यभागमें दो अंगुलका अन्तर रहना चाहिये। इसी प्रकार अन्य अंगुलियोंके पोरोंमें एक-एक यवकी कमी होती जाती है। अंगूठेके पोरोंका मध्यभाग तर्जनीके समान ही रहना चाहिये। अगला पोर दो यवसे अधिक कहा गया है। अंगुलियोंके पर्वार्धमें नखोंको चिकना, सुन्दर तथा आगेकी ओर कुछ लालिमायुक्त बनाना चाहिये। मध्यभागमें पीछेकी ओर कुछ नीचा तथा बगलमें अंशमात्र ऊँचा बनावे। उसी प्रकार कंधोंके ऊपर दस अंगुलमें केशोंकी वल्लीका निर्माण करना चाहिये। स्त्री-प्रतिमाओंको कुछ पतली तथा उनके स्तन, ऊरु एवं जाँघोंको स्थूल बनाना चाहिये। उनके उदरप्रदेशकी लम्बाई चौदह अंगुल तथा वे अनेक आभूषणोंसे विभूषित हों और उनकी भुजाओंको कुछ मृदु एवं मनोहर आकृतियुक्त बनाना चाहिये। मुखाकृति अपेक्षाकृत लम्बी हो। अलकावलि उत्तम ढंगसे रचित हो। नासिका, ग्रीवा और ललाट साढ़े तीन अंगुल होने चाहिये। अधर-पल्लवोंका विस्तार आधे अंगुलका प्रशस्त माना गया है। दोनों नेत्र अधर-पल्लवोंसे चार गुने अधिक होने चाहिये। ग्रीवाकी वलि आधे अंगुलकी ऊँची बनानी चाहिये। इस प्रकार सभी देवताओंकी प्रतिमाओं एवं स्त्री-प्रतिमाओंके निर्माणमें नौ तालका परिमाण बतलाया गया है, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला कहा गया है॥ ६१—७५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवार्चानुकीर्तने प्रमाणानुकीर्तनं नामाष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवपूजा-प्रसंगमें प्रतिमा-प्रमाण-कीर्तन नामक दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५८॥
दो सौ उनसठवाँ अध्याय
प्रतिमाओंके लक्षण, मान, आकार आदिका कथन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके बाद मैं |
|---|---|
| अतः परं प्रवक्ष्यामि देवाकारान् विशेषतः।<br>दशतालः स्मृतो रामो बलिवैरोचनिस्तथा ॥ १<br>वाराहो नारसिंहश्च सप्ततालस्तु वामनः।<br>मत्स्यकूर्मों च निर्दिष्टौ यथाशोभं स्वयम्भुवा ॥ २<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि रुद्राद्याकारमुत्तमम्।<br>स पीनोरुभुजस्कन्धस्तप्तकाञ्चनसप्रभः ॥ ३ | देवताओंकी मूर्तियोंके आकारके विषयमें विशेषरूपसे बतला रहा हूँ। इस विषयमें ब्रह्माने बताया है कि राम¹, विरोचनके पुत्र बलि, वाराह और नृसिंहकी मूर्तियोंकी ऊँचाई दस ताल² होनी चाहिये। वामनकी प्रतिमा सात तालकी हो तथा मत्स्य और कूर्मकी प्रतिमाएँ जितनेमें सुन्दर दीख सकें, उसी परिमाणकी बनानी चाहिये। अब मैं शिव आदिकी मूर्तियोंके आकारका वर्णन कर रहा हूँ। |
१. राम शब्दसे यहाँ दशरथनन्दन राम, परशुराम तथा बलराम तीनों ही ग्राह्य हैं।
२. दस तालका तात्पर्य प्रायः पाँच हाथ या साढ़े सात फीटकी ऊँचाईसे है।
| ९९४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| शुक्लोऽर्करश्मिसंघातश्चन्द्राङ्कितजटो विभुः।<br>जटामुकुटधारी च द्व्यष्टवर्षाकृतिश्च सः॥ ४<br>बाहू वारणहस्ताभौ वृत्तजङ्घोरुमण्डलः।<br>ऊर्ध्वकेशश्च कर्तव्यो दीर्घायतविलोचनः॥ ५<br>व्याघ्रचर्मपरीधानः कटिसूत्रत्रयान्वितः।<br>हारकेयूरसम्पन्नो भुजङ्गाभरणस्तथा॥ ६<br>बाहवश्चापि कर्तव्या नानाभरणभूषिताः।<br>पीनोरुगण्डफलकः कुण्डलाभ्याममलङ्कृतः॥ ७<br>आजानुलम्बबाहुश्च सौम्यमूर्तिः सुशोभनः।<br>खेटकं वामहस्ते तु खड्गं चैव तु दक्षिणे॥ ८<br>शक्तिं दण्डं त्रिशूलं च दक्षिणेपु निवेशयेत्।<br>कपालं वामपार्श्वे तु नागं खट्वाङ्गमेव च॥ ९<br>एकश्च वरदो हस्तस्तथाक्षवलयोऽपरः।<br>वैशाखस्थानकं कृत्वा नृत्याभिनयसंस्थितः॥ १०<br><br>नृत्यन् दशभुजः कार्यों गजचर्मधरस्तथा।<br>तथा त्रिपुरदाहे च बाहवः षोडशैव तु॥ ११<br>शङ्खं चक्रं गदा शार्ङ्गं घण्टा तत्राधिका भवेत्।<br>तथा धनुः पिनाकश्च शरो विष्णुमयस्तथा॥ १२<br>चतुर्भुजोऽष्टबाहुर्वा ज्ञानयोगेश्वरो मतः।<br>तीक्ष्णनासाग्रदशनः करालवदनो महान्॥ १३<br>भैरवः शस्यते लोके प्रत्यायतनसंस्थितः।<br>न मूलायतने कार्यों भैरवस्तु भयंकरः॥ १४<br>नारसिंहो वराहो वा तथान्येऽपि भयङ्कराः।<br>नाधिकाङ्गा न हीनाङ्गाः कर्तव्या देवताः क्वचित्॥ १५<br>स्वामिनं घातयेन्न्यूना करालवदना तथा।<br>अधिका शिल्पिनं हन्यात् कृशा चैवार्थनाशिनी॥ १६ | रुद्रकी मूर्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति कान्तिमती तथा स्थूल ऊरुओं, भुजाओं और स्कन्धोंसे युक्त होनी चाहिये। उनका वर्ण सूर्यकी किरणोंके समान श्वेत और जटा चन्द्रमासे विभूषित हो। वे जटा-मुकुटधारी हों तथा उनकी अवस्था सोलह वर्षकी होनी चाहिये। उनकी दोनों भुजाएँ हाथीके शुण्डादण्डकी तरह तथा जंघा और ऊरुमण्डल गोलाकार हों। उनके केश ऊपरकी ओर उठे हुए तथा नेत्र दीर्घ एवं चौड़े बनाये जाने चाहिये। उनके वस्त्रके स्थानपर व्याघ्रचर्म तथा कमरमें तीन सूत्रोंकी मेखला बनायी जाय। उन्हें हार और केयूरसे सुशोभित तथा सर्पोंके आभूषणोंसे अलंकृत करना चाहिये। उनकी भुजाओंको विविध प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा उभरे हुए कपोलोंको दो कुण्डलोंसे अलंकृत करना चाहिये। उनकी भुजाएँ घुटनेतक लम्बी, मूर्ति सौम्य, परम सुन्दर, बायें हाथमें ढाल, दाहिने हाथमें तलवार, दाहिनी ओर शक्ति, दण्ड और त्रिशूल तथा बायीं ओरके हाथोंमें कपाल, नाग और खट्वाङ्गको रखना चाहिये। एक हाथ वरदमुद्रासे सुशोभित और दूसरा हाथ रुद्राक्षकी माला धारण किये हुए हो॥ १—९½॥<br><br>दस भुजाओंवाली शिवकी नटराज-मूर्तिको विशाख* स्थानयुक्त बनायी जानी चाहिये। वह नाचती हुई तथा गजचर्म धारण किये हुए हो। त्रिपुरान्तक प्रतिमामें सोलह भुजाएँ बनायी जानी चाहिये। उस समय उनके हाथमें शङ्ख, चक्र, गदा, सींग, घण्टा, पिनाक, धनुष, त्रिशूल और विष्णुमय शर—ये आठ वस्तुएँ अधिक रहेंगी। शिवकी ज्ञानयोगेश्वर प्रतिमामें चार या आठ भुजाएँ बनायी जाती हैं। भैरव-मूर्ति तीक्ष्ण दाँत तथा नुकीली नासिकासे युक्त होती है। उनका मुख महान् भयंकर होता है। ऐसी मूर्तिको प्रत्यायतन अर्थात् मुख्य मन्दिरके सामनेके मन्दिर या बरामदेमें स्थापित करना शुभदायक होता है। मुख्य मन्दिरमें भैरवकी स्थापना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ये भयकारी देवता हैं। इसी प्रकार नृसिंह, वराह तथा अन्य भयंकर देवताओंके लिये भी करना चाहिये। देव-प्रतिमाओंको कहीं भी हीन अङ्गोंवाली अथवा अधिक अङ्गोंवाली नहीं बनानी चाहिये। न्यून अङ्ग तथा भयानक मुखवाली प्रतिमा स्वामीका विनाश करती है, अधिक अङ्गोंवाली प्रतिमा शिल्पकारका हनन करती है और दुर्बल प्रतिमा धनका नाश करती है। |
* विशाखस्थान नृत्य या युद्धमें खड़े होनेकी वह मुद्रा है, जिसमें दोनों पैरोंके बीचमें एक हाथ जगह खाली रहती है।
- अध्याय २५९ * । १९५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कृशोदरी तु दुर्भिक्षं निर्मांसा धननाशिनी।<br>वक्रनासा तु दुःखाय संक्षिप्ताङ्गी भयङ्करी ॥ १७<br>चिपिटा दुःखशोकाय अनेत्रा नेत्रनाशिनी।<br>दुःखदा हीनवक्त्रा तु पाणिपादकृशा तथा ॥ १८<br>हीनाङ्गा हीनजङ्घा च भ्रमोन्मादकरी नृणाम्।<br>शुष्कवक्त्रा तु राजानं कटिहीना च या भवेत् ॥ १९<br>पाणिपादविहीना या जायते मारको महान्।<br>जङ्घाजानुविहीना च शत्रुकल्याणकारिणी ॥ २० | दुबले उदरवाली प्रतिमा दुर्भिक्षप्रदा, कंकाल-सरीखी धननाशिनी, टेढ़ी नासिकावाली दुःखदायिनी, सूक्ष्माङ्गी भय पहुँचानेवाली, चिपटी दुःख और शोक प्रदान करनेवाली, नेत्रहीना नेत्रकी विनाशिका, मुखविहीना दुःखदायिनी तथा दुर्बल हाथ-पैरवाली या अन्य किन्हीं अङ्गोंसे हीन अथवा विशेषकर जंघेसे हीन प्रतिमा मनुष्योंके लिये भ्रम और उन्माद उत्पन्न करनेवाली कही गयी है। सूखे मुखवाली तथा कटिभागसे हीन प्रतिमा राजाको कष्ट देनेवाली कही गयी है। हाथ-पाँवसे विहीन प्रतिमा महामारीका भय उत्पन्न करनेवाली तथा जंघा और घुटनेसे विहीन शत्रु का कल्याण करनेवाली कही गयी है॥ १०—२०॥ |
| पुत्रमित्रविनाशाय हीनवक्षःस्थला तु या।<br>सम्पूर्णावयवा या तु आयुर्लक्ष्मीप्रदा सदा ॥ २१<br>एवं लक्षणमासाद्य कर्तव्यः परमेश्वरः।<br>स्तूयमानः सुरैः सर्वैः समन्ताद् दर्शयेद् भवम् ॥ २२<br>शक्रेण नन्दिना चैव महाकालेन शंकरम्।<br>प्रणता लोकपालास्तु पार्श्वे तु गणनायकाः ॥ २३<br>नृत्यद्भृङ्गिरिटिश्चैव भूतवेतालसंवृताः।<br>सर्वे हृष्टास्तु कर्तव्याः स्तुवन्तः परमेश्वरम् ॥ २४<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मथाप्सरोगुह्यकनायकानाम् ।<br>गणैरनेकैः शतशो महेन्द्रै-<br>र्मुनिप्रवीरैरपि नम्यमानम् ॥ २५<br>धृताक्षसूत्रैः शतशः प्रवाल-<br>पुष्पोपहारप्रचयं ददद्भिः।<br>संस्तूयमानं भगवन्तमीड्यं<br>नेत्रत्रयेणामरमर्त्यपूज्यम् ॥ २६ | जो वक्षःस्थलसे विहीन होती है, वह पुत्रों और मित्रोंकी विनाशिका तथा सम्पूर्ण अङ्गोंसे परिपूर्ण प्रतिमा सर्वदा आयु और लक्ष्मी प्रदान करनेवाली कही गयी है। इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त भगवान् शंकरकी प्रतिमा निर्मित करानी चाहिये। उनकी प्रतिमाके चारों ओर सभी देवगणोंको स्तुति करते हुए प्रदर्शित करना चाहिये। शंकरकी मूर्तिको इन्द्र, नन्दीश्वर एवं महाकालसे युक्त बनाना चाहिये। उनके पार्श्वभागमें विनम्रभावसे स्थित लोकपालों और गणेश्वरोंको दिखलाना चाहिये। भृंगी और भूत-वेतालोंकी मूर्तियाँ उनके बगलमें नाचती-गाती हुई बनायी जानी चाहिये, जो सभी हर्षपूर्वक परमेश्वर शिवकी स्तुतिमें लीन रहें। रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले, प्रवाल (मूँगे) आदिकी माला तथा पुष्पादिरूप उपहारोंको समर्पित करनेवाले गन्धर्व, विद्याधर, किन्नर, अप्सरा और गुह्यकोंके अधीश्वरोंके अनेकों गणों तथा इन्द्र आदि सैकड़ों देवताओं और मुनिवरोंद्वारा नमस्कार एवं स्तुति किये जाते हुए तथा देवताओं और मनुष्योंके लिये पूजनीय त्रिनेत्रधारी स्तवनीय भगवान् शंकरकी प्रतिमा बनायी जानी चाहिये ॥ २१—२६ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रतिमालक्षणे एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिमालक्षण नामक दो सौ उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५९॥
९९६ * मत्स्यपुराण *
दो सौ साठवाँ अध्याय
विविध देवताओंकी प्रतिमाओंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| अधुना सम्प्रवक्ष्यामि अर्धनारीश्वरं परम्।<br>अर्धेन देवदेवस्य नारीरूपं सुशोभनम्॥ १<br>ईशार्धे तु जटाभागो बालेन्दुकलया युतः।<br>उमार्धे चापि दातव्यौ सीमन्ततिलकावुभौ॥ २<br>वासुकिं दक्षिणे कर्णे वामे कुण्डलमादिशेत्।<br>बालिका चोपरिष्टात् तु कपालं दक्षिणे करे।<br>त्रिशूलं वापि कर्तव्यं देवदेवस्य शूलिनः॥ ३<br>वामतो दर्पणं दद्यादुत्पलं तु विशेषतः।<br>वामबाहुश्च कर्तव्यः केयूरवलयान्वितः॥ ४<br>उपवीतं च कर्तव्यं मणिमुक्तामयं तथा॥ ५<br>स्तनभारं तथार्धे तु वामे पीतं प्रकल्पयेत्।<br>परार्धमुज्ज्वलं कुर्याच्छ्रोण्यर्धं तु तथैव च॥ ६<br>लिङ्गार्धमूर्ध्वगं कुर्याद् व्यालाजिनकृताम्बरम्।<br>वामे लम्बपरीधानं कटिसूत्रत्रयान्वितम्॥ ७<br>नानारत्नसमोपेतं दक्षिणे भुजगान्वितम्।<br>देवस्य दक्षिणं पादं पद्मोपरि सुसंस्थितम्॥ ८<br>किञ्चिदूर्ध्वं तथा वामं भूषितं नूपुरेण तु।<br>रत्नैर्विभूषितान् कुर्यादङ्गुलीष्वङ्गुलीयकन्॥ ९<br>सालक्तकं तथा पादं पार्वत्या दर्शयेत् सदा।<br>अर्धनारीश्वरस्येदं रूपमस्मिन्नुदाहृतम्॥ १० | ऋषियो! अब मैं भगवान् शिवके अर्धनारीश्वर रूपका वर्णन कर रहा हूँ। इसमें देवाधिदेव शंकरकी बायीं ओर आधे भागमें अत्यन्त सुन्दर स्त्रीका रूप होता है तथा अर्धभागमें दाहिनी ओर पुरुषरूप। पुरुषभागमें प्रतिमाको जटाजूट तथा बालचन्द्रकी कलासे युक्तकर उमाके अर्धभागमें मस्तकपर सीमन्त (माँग)-में सिन्दूर और ललाटपर तिलक निर्मित करे। दाहिने कानमें वासुकि नाग और बायें कानमें कुण्डलकी रचना की जानी चाहिये। वहीं ऊपरकी ओर केशोंके आभूषण तथा कानमें बाली बनानी चाहिये। देवदेवेश्वर शिवके दाहिने हाथमें कपाल या त्रिशूल तथा बायें हाथमें दर्पण और कमल बनाये। विशेषतया बायें बाहुको बाजूबंद और कङ्कणसे युक्त बनाना चाहिये और दाहिनी ओरके भागमें मणियों और मोतियोंका यज्ञोपवीत बनाना चाहिये। प्रतिमाके बायें भागकी ओर स्तन तथा दाहिना भाग पीले वर्णका बनाये। ऊपरका आधा भाग उज्ज्वल हो, नितम्बका आधा भाग श्वेतवर्णका होना चाहिये। लिंगसे ऊपरका भाग सिंहके चर्मसे आवृत हो। बायें भागमें नाना प्रकारके रत्नोंसे बनी हुई तीन लड़ियोंवाली करधनी और साड़ी पहनानी चाहिये। दाहिना भाग सर्पोंसे युक्त हो। शिवजीका दाहिना पैर कमलके ऊपर स्थापित हो तथा नूपुरसे विभूषित बायाँ पैर उससे कुछ ऊपरकी ओर हो। उसकी अंगुलियोंको रत्ननिर्मित अँगूठियोंसे विभूषित करे। पार्वतीके चरण सर्वदा महावरसे युक्त प्रदर्शित किये जायें। इस प्रकार इस प्रसङ्गमें मैंने अर्धनारीश्वरके रूपका वर्णन किया॥ १—१०॥ |
| उमामहेश्वरस्यापि लक्षणं शृणुत द्विजाः।<br>संस्थानं तु तयोर्वक्ष्ये लीलाललितविभ्रमम्॥ ११<br>चतुर्भुजं द्विबाहुं वा जटाभारेन्दुभूषितम्।<br>लोचनत्रयसंयुक्तमुमैकस्कन्धपाणिनम् ॥ १२<br>दक्षिणेनोत्पलं शूलं वामे कुचभरे करम्।<br>द्वीपिचर्मपरीधानं नानारत्नोपशोभितम्॥ १३ | ब्राह्मणो! अब आपलोग उमामहेश्वर-मूर्तिके लक्षण सुनिये। मैं उन दोनोंकी स्थितिका वर्णन कर रहा हूँ। उमामहेश्वरकी प्रतिमा मनोहर लीलाओंसे युक्त हो। उसे जटाओंके भार और चन्द्रमासे विभूषित दो या चार बाहुओं तथा तीन नेत्रोंसे युक्त बनाना चाहिये। उसमें भगवान् शिवका एक हाथ उमाके कंधेपर विराजमान होना चाहिये। मूर्तिके दाहिने हाथमें कमल या शूल हो, बायाँ हाथ स्तनपर न्यस्त होना चाहिये। उसे विविध प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, व्याघ्रचर्मसे युक्त, |
* अध्याय २६० * । १९७
| सुप्रतिष्ठं सुवेषं च तथार्धेन्दुकृताननम्।<br>वामे तु संस्थिता देवी तस्योरौ बाहुगूहिता॥ १४<br><br>शिरोभूषणसंयुक्तैरलकैर्ललितानना ।<br>सबालिका कर्णवती ललाटतिलकोज्ज्वला॥ १५<br><br>मणिकुण्डलसंयुक्ता कर्णिकाभरणा क्वचित्।<br>हारकेयूरबहुला हरवक्त्रावलोकिनी॥ १६<br><br>वामांसं देवदेवस्य स्पृशन्ती लीलया ततः।<br>दक्षिणं तु बहिः कृत्वा बाहुं दक्षिणतस्तथा॥ १७<br><br>स्कन्धे वा दक्षिणे कुक्षौ स्पृशन्त्यङ्गुलिजैः क्वचित्।<br>वामे तु दर्पणं दद्यादुत्पलं वा सुशोभनम्॥ १८<br><br>कटिसूत्रत्रयं चैव नितम्बे स्यात् प्रलम्बकम्।<br>जया च विजया चैव कार्तिकेयविनायकौ॥ १९<br><br>पार्श्वयोर्दर्शयेत् तत्र तोरणे गणगुह्यकान्।<br>माला विद्याधरांस्तद्वद्वीणावानप्सरोगणः॥ २०<br><br>एतद् रूपमुमेशस्य कर्तव्यं भूतिमिच्छता। | सुन्दर वेषोंसे सुसज्जित, मुखमण्डलको अर्धचन्द्रमासे विभूषित तथा उचित रूपसे प्रतिष्ठित करना चाहिये। उसके बायें भागमें देवीकी मूर्ति होगी, जिसके दोनों ऊरुभाग बाहुओंसे छिपे रहेंगे। सिरके आभूषणों तथा अलकावलियोंद्वारा मुखभाग ललित हो और बालियोंसे कान तथा तिलकसे ललाट शोभायमान हो रहा हो। कहीं-कहीं कानोंको अलंकृत करनेके लिये मणिर्निमित कुण्डल पहनाये जाते हैं। उसे हार और केयूरसे सुसज्जित कर शिवजीके मुखका अवलोकन करनेवाली बनावे। वे लीलापूर्वक देवदेव शंकरके बायें कंधेका स्पर्श कर रही हों तथा उनका दाहिना हाथ दाहिने भागसे बाहरकी ओर बना हो। या किसी-किसी प्रतिमामें दाहिने कंधे अथवा कुक्षिभागमें नखोंसे स्पर्श कर रही हों, बायें हाथमें दर्पण अथवा सुन्दर कमल रहना चाहिये। नितम्बभागपर तीन लड़ियोंवाला कटिसूत्र लटकता रहना चाहिये। पार्वतीके दोनों ओर जया, विजया, स्वामिकार्तिकेय और गणेशको तथा तोरणद्वारपर गुह्यक गणोंको प्रदर्शित करना चाहिये। उसी प्रकार वहाँ माला, विद्याधर और वीणासे सुशोभित अप्सराओंको बनाना चाहिये। समृद्धिकामीको उमापति शिवकी प्रतिमा इस प्रकारकी बनवानी चाहिये॥ ११–२०½॥ |
| शिवनारायणं वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशनम्॥ २१<br><br>वामार्धे माधवं विद्याद् दक्षिणे शूलपाणिनम्।<br>बाहुद्वयं च कृष्णस्य मणिकेयूरभूषितम्॥ २२<br><br>शङ्खचक्रधरं शान्तमारक्ताङ्गुलिविभ्रमम्।<br>चक्रस्थाने गदां वापि पाणौ दद्यादधस्तले॥ २३<br><br>शङ्खं चैवोत्तरे दद्यात् कट्यर्थं भूषणोज्ज्वलम्।<br>पीतवस्त्रपरीधानं चरणं मणिभूषणम्॥ २४<br><br>दक्षिणार्धं जटाभारमर्धेन्दुकृतभूषणम्।<br>भुजङ्गहारवलयं वरदं दक्षिणं करम्॥ २५<br><br>द्वितीयं चापि कुर्वीत त्रिशूलवरधारिणम्।<br>व्यालोपवीतसंयुक्तं कट्यर्थं कृत्तिवाससम्॥ २६<br><br>मणिरत्नैश्च संयुक्तं पादं नागविभूषितम्।<br>शिवनारायणस्यैवं कल्पयेद् रूपमुत्तमम्॥ २७ | अब मैं सभी पापोंके विनाशक शिवनारायणकी प्रतिमाकी विधि बता रहा हूँ। इस प्रतिमाकी बायीं ओर आधे भागमें भगवान् विष्णु तथा दाहिनी ओर आधे भागमें शूलपाणि शिवको बनाना चाहिये। कृष्णकी दोनों भुजाएँ मणिनिर्मित केयूरसे विभूषित होनी चाहिये। दोनों भुजाओंमें शङ्ख और चक्र धारण किये हों, शान्तरूप हों तथा मनोहर अंगुलियाँ लाल वर्णकी हों। हाथके निचले भागमें चक्रके स्थानमें गदा भी देनी चाहिये। ऊपरी भागमें शङ्ख, कटिभागमें उज्ज्वल आभूषण और पीताम्बर धारण किये हुए हों तथा चरण मणिनिर्मित नूपुरोंसे विभूषित हों। इसका दाहिना आधा भाग जटाभार तथा अर्धचन्द्रसे विभूषित होना चाहिये। दाहिने हाथको वरद-मुद्रासे युक्त तथा सर्पोंके हार और कङ्कणसे सुशोभित तथा दूसरे हाथको त्रिशूलसे विभूषित बनाना चाहिये। उसे सर्पके यज्ञोपवीतसे युक्त और उसके कटिप्रदेशको गजचर्मसे आच्छादित कर दे। चरण मणि और रत्नोंसे अलंकृत तथा नागसे विभूषित हों। इस प्रकार शिवनारायणके |
९९८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महावराहं वक्ष्यामि पद्महस्तं गदाधरम्।<br>तीक्ष्णदंष्ट्राग्रघोणास्यं मेदिनी वामकूर्परम्॥ २८<br><br>दंष्ट्राग्रेणोद्धृतां दान्तां धरणीमुत्पलान्विताम्।<br>विस्मयोत्फुल्लवदनामुपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ २९<br><br>दक्षिणं कटिसंस्थं तु करं तस्याः प्रकल्पयेत्।<br>कूर्मोपरि तथा पादमेकं नागेन्द्रमूर्धनि॥ ३०<br><br>संस्तूयमानं लोकेशैः समन्तात्परिकल्पयेत्। | उत्तम स्वरूपकी कल्पना करनी चाहिये। अब मैं महावराहका वर्णन कर रहा हूँ। उनके हाथोंमें पद्म और गदा हों, उनके दाढ़ोंके अर्धभाग तीक्ष्ण हों, थूथुनवाला मुख हो, बायीं केहुनीपर पृथ्वी हो, वह पृथ्वी दाढ़के अग्रभागपर रखी हुई कमलयुक्त और शान्त हो तथा उसका मुख विस्मयसे उत्फुल्ल हो, ऐसी मूर्तिको ऊपरकी ओर बनाना चाहिये। उस मूर्तिका दाहिना हाथ कटिप्रदेशपर हो। उनका एक पैर शेषनागके मस्तकपर और दूसरा कूर्मपर स्थित हो तथा लोकपालगण चारों ओरसे उनकी स्तुति कर रहे हों, ऐसी मूर्ति बनानी चाहिये॥ २१—३० १/२॥ |
| नारसिंहं तु कर्तव्यं भुजाष्टकसमन्वितम्॥ ३१<br><br>रौद्रं सिंहासनं तद्वद् विदारितमुखेक्षणम्।<br>स्तब्धपीनसटाकर्णं दारयन्तं दितेः सुतम्॥ ३२<br><br>विनिर्गतान्त्रजालं च दानवं परिकल्पयेत्।<br>वमन्तं रुधिरं घोरं भृकुटीवदनेक्षणम्॥ ३३<br><br>युध्यमानश्च कर्तव्यः क्वचित् करणबन्धनैः।<br>परिश्रान्तेन दैत्येन तर्ज्यमानो मुहुर्मुहुः॥ ३४<br><br>दैत्यं प्रदर्शयेत् तत्र खड्गखेटकधारिणम्।<br>स्तूयमानं तथा विष्णुं दर्शयेदमराधिपैः॥ ३५<br><br>तथा त्रिविक्रमं वक्ष्ये ब्रह्माण्डक्रमणोल्वणम्।<br>पादपार्श्वे तथा बाहुमुपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ ३६<br><br>अधस्ताद् वामनं तद्वत् कल्पयेत् सकमण्डलुम्।<br>दक्षिणे छत्रिकां दद्यान्मुखं दीनं प्रकल्पयेत्॥ ३७<br><br>भृङ्गारधारिणं तद्वद् बलिं तस्य च पार्श्वतः।<br>बन्धनं चास्य कुर्वन्तं गरुडं तस्य दर्शयेत्॥ ३८<br><br>मत्स्यरूपं तथा मत्स्यं कूर्मं कूर्माकृतिं न्यसेत्।<br>एवंरूपस्तु भगवान् कार्यो नारायणो हरिः॥ ३९ | भगवान् नृसिंहकी प्रतिमा आठ भुजाओंसे युक्त बनायी जानी चाहिये। उसी प्रकार उनका सिंहासन भी भयंकर हो, मुख और नेत्र फैले हुए हों, गर्दनके लम्बे बाल कानोंतक बिखरे हों तथा वे नखसे दितिपुत्र हिरण्यकशिपुको फाड़ रहे हों। जिसकी आँतें बाहर निकल गयी हों, मुखसे रुधिर गिर रहा हो, भृकुटी, मुख और नेत्र विकराल हों, ऐसे दानवराज हिरण्यकशिपुकी मूर्ति बनानी चाहिये। कहीं नृसिंह-प्रतिमा युद्धके उपकरणोंसे युक्त दैत्योंसे युद्ध करती हुई बनायी जाती है और कहीं थके हुए दैत्यसे बारंबार धमकायी जाती हुई बनानी चाहिये। वहाँ दैत्यको तलवार और ढाल धारण किये हुए प्रदर्शित करना चाहिये तथा देवेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए विष्णुको दिखाना चाहिये। अब मैं वामनका वर्णन कर रहा हूँ। वे ब्रह्माण्डको नापनेके लिये तत्पर दीखते हों। उनके चरणोंके समीपमें ऊपरकी ओर बाहुका निर्माण करे। उसके नीचेकी ओर बायें हाथमें कमण्डलु धारण किये हुए वामनकी रचना करे। दाहिने हाथमें एक छोटी-सी छतरी होनी चाहिये। उनका मुख दीनतासे युक्त हो। उन्हींकी बगलमें जलका गेडुआ लिये हुए बलिको निर्माण होना चाहिये। उसी स्थलपर बलिको बाँधते हुए गरुड़को भी दिखाना चाहिये। इसी प्रकार मत्स्यभगवान्की प्रतिमा मछलीके आकारकी तथा कूर्मभगवान्की प्रतिमा कछुएके समान बनानी चाहिये। इस प्रकार भगवान् विष्णु तथा उनके अवतारोंकी प्रतिमाओंका निर्माण होना चाहिये॥ ३१—३९॥ |
| ब्रह्मा कमण्डलुधरः कर्तव्यः स चतुर्मुखः।<br>हंसारूढः क्वचित् कार्यः क्वचिच्च कमलासनः॥ ४० | ब्रह्माको कमण्डलु लिये हुए चार मुखोंसे युक्त बनावे। उनकी प्रतिमा कहीं हंसपर बैठी हुई तथा कहीं कमलपर विराजमान रहती है। |
| * अध्याय २६० * | ९९९ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| वर्णतः पद्मगर्भाभश्चतुर्बाहुः शुभेक्षणः।<br>कमण्डलुं वामकरे स्रुवं हस्ते तु दक्षिणे॥ ४१<br>वामे दण्डधरं तद्वत् स्रुवञ्चापि प्रदर्शयेत्।<br>मुनिभिर्देवगन्धर्वैः स्तूयमानं समन्ततः॥ ४२<br>कुर्वाणमिव लोकांस्त्रीञ्छुक्लाम्बरधरं विभुम्।<br>मृगचर्मधरं चापि दिव्ययज्ञोपवीतिनम्॥ ४३<br>आज्यस्थालीं न्यसेत् पार्श्वे वेदांश्च चतुरः पुनः।<br>वामपार्श्वेऽस्य सावित्रीं दक्षिणे च सरस्वतीम्॥ ४४<br>अग्रे च ऋषयस्तद्वत् कार्याः पितामहे पदे। | उनकी प्रतिमा कमलके भीतरी भागके समान अरुण, चार भुजाओंसे युक्त और सुन्दर नेत्रवाली हो। उनके नीचेके बायें हाथमें कमण्डलु और दाहिने हाथमें स्रुवा हो। उनके ऊपरके बायें हाथमें दण्ड तथा दाहिने हाथमें भी स्रुवा* धारण किये हुए प्रदर्शित करना चाहिये। उनके चारों ओर देवता, गन्धर्व और मुनिगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए दिखाना चाहिये। ऐसी भूमिका भी दिखाये, मानो वे तीनों लोकोंकी रचनामें प्रवृत्त हैं। वे श्वेत वस्त्रधारी, ऐश्वर्यसम्पन्न, मृगचर्म तथा दिव्य यज्ञोपवीतसे युक्त हों। उनके बगलमें आज्यस्थाली रहे और सामने चारों वेदोंकी मूर्तियाँ हों। उनकी बायीं ओर सावित्री, दाहिनी ओर सरस्वती तथा उनके अग्रभागमें मुनियोंके समूह हों॥ ४०—४४ १/२ ॥ |
| कार्तिकेयं प्रवक्ष्यामि तरुणादित्यसप्रभम्॥ ४५<br>कमलोदरवर्णाभं कुमारं सुकुमारकम्।<br>दण्डकैश्चीरकैर्युक्तं मयूरवरवाहनम्॥ ४६<br>स्थापयेत् स्वेष्टनगरे भुजान् द्वादश कारयेत्।<br>चतुर्भुजः खर्वटे स्याद् वने ग्रामे द्विबाहुकः॥ ४७<br>शक्तिः पाशस्तथा खड्गः शरः शूलं तथैव च।<br>वरदश्चैकहस्तः स्यादथ चाभयदो भवेत्॥ ४८<br>एते दक्षिणतो ज्ञेयाः केयूरकटकोज्ज्वलाः।<br>धनुः पताका मुष्टिश्च तर्जनी तु प्रसारिता॥ ४९<br>खेटकं ताम्रचूडं च वामहस्ते तु शस्यते।<br>द्विभुजस्य करे शक्तिर्वामे स्यात् कुक्कुटोपरि॥ ५०<br>चतुर्भुजे शक्तिपाशौ वामतो दक्षिणे त्वसिः।<br>वरदोऽभयदो वापि दक्षिणः स्यात् तुरीयकः॥ ५१ | अब मैं कार्तिकेयकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाको मध्यकालीन सूर्यकी भाँति परम तेजोमय, कमलके मध्यभागके समान अरुण, मयूरपर आरूढ़, दण्डों और चीरोंसे सुशोभित, सुकुमार शरीरसे युक्त और बारह भुजाओंवाली बनाना चाहिये। उसे अपने इष्ट नगरमें स्थापित करना चाहिये। खर्वट (पर्वतके समीपके ग्राम)-में इनकी चार भुजाओंवाली और वन अथवा ग्राममें दो बाहुवाली प्रतिमा स्थापित करानी चाहिये। (बारह भुजाओंवाली प्रतिमामें) उनकी दाहिनी ओरके छः हाथोंमें शक्ति, पाश, तलवार, बाण और शूल शोभायमान हों। एक हाथमें अभयमुद्रा अथवा वरदमुद्रा बनानी चाहिये। ये सभी केयूर तथा कटकसे विभूषित उज्ज्वल वर्णके होने चाहिये। बायीं ओरके छः हाथ क्रमशः धनुष, पताका, मुष्टि, फैली हुई तर्जनी, ढाल, मुर्गा—इन वस्तुओंसे युक्त और उसी वर्णके होने चाहिये। दो भुजाओंवाली प्रतिमाके बायें हाथमें शक्ति और दाहिना हाथ कुक्कुटपर न्यस्त रहना चाहिये। चतुर्भुज प्रतिमाकी बायीं ओरके दो हाथोंमें शक्ति और पाश तथा दाहिनी ओरके तीसरे हाथमें तलवार हो और चौथा हाथ अभय अथवा वरदमुद्रासे युक्त हो॥ ४५—५१॥ |
| विनायकं प्रवक्ष्यामि गजवक्त्रं त्रिलोचनम्।<br>लम्बोदरं चतुर्बाहुं व्यालयज्ञोपवीतिनम्॥ ५२<br>ध्वस्तकर्णं बृहत्तुण्डमेकदंष्ट्रं पृथूदरम्।<br>स्वदन्तं दक्षिणकरे उत्पलं चापरे तथा॥ ५३ | अब मैं गणेशजीकी प्रतिमाका विधान बता रहा हूँ। उनकी प्रतिमामें हाथी-सा मुख, तीन नेत्र, लम्बा उदर, चार भुजाएँ, सर्पका यज्ञोपवीत, सिमटा हुआ कान, विशाल शुण्ड, एक दाँत और तोंद स्थूल हो। उनके ऊपरके दाहिने हाथमें अपना दाँत और निचले हाथमें कमल होना चाहिये। |
* कहीं-कहीं उनके ऊपरके दाहिने हाथमें वेदग्रन्थ या स्रुक् भी निर्दिष्ट है।
| १००० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मोदकं परशुं चैव वामतः परिकल्पयेत्।<br>बृहत्वात्क्षिप्तवदनं पीनस्कन्धाङ्घ्रियाणिकम्॥ ५४<br>युक्तं तु सिद्धिबुद्धिभ्यामधस्तान्मूषिकान्वितम्।<br>कात्यायन्याः प्रवक्ष्यामि रूपं दशभुजं तथा॥ ५५<br>त्रयाणामपि देवानामनुकारानुकारिणीम्।<br>जटाजूटसमायुक्तमर्धेन्दुकृतशेखरम् ॥ ५६<br>लोचनत्रयसंयुक्तां पूर्णेन्दुसदृशाननाम्।<br>अतसीपुष्पवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम्॥ ५७<br>नवयौवनसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम्।<br>सुचारुदशनां तद्वत् पीनोन्नतपयोधराम्॥ ५८<br>त्रिभङ्गस्थानसंस्थानां महिषासुरमर्दिनीम्।<br>त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात् खड्गं चक्रं क्रमादधः॥ ५९<br>तीक्ष्णवाणं तथा शक्तिं वामतोऽपि निबोधत।<br>खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुशमेव च॥ ६०<br>घण्टां वा परशुं वापि वामतः संनिवेशयेत्।<br>अधस्तान्महिषं तद्वद्विशिरस्कं प्रदर्शयेत्॥ ६१<br>शिरश्छेदोद्भवं तद्वद् दानवं खड्गपाणिनम्।<br>हृदि शूलेन निर्भिन्नं निर्यदन्त्रविभूषितम्॥ ६२<br>रक्तरक्तीकृताङ्गं च रक्तविस्फुरितेक्षणम्।<br>वेष्टितं नागपाशेन भ्रुकुटीभीषणाननम्॥ ६३<br>सपाशवामहस्तेन धृतकेशं च दुर्गया। | बायीं ओरके ऊपरके हाथमें मोदक तथा निचले हाथमें परशु हों। बृहत् होनेके कारण मुख नीचेकी ओर विस्तृत तथा स्कन्ध, पाद और हाथ मोटे होने चाहिये। वह सिद्धि-बुद्धिसे युक्त हो, उसके नीचेकी ओर मूषक बना हो। अब मैं भगवती कात्यायनीकी मूर्तिको वर्णन कर रहा हूँ। वह दस भुजाओंसे युक्त, तीनों देवताओंकी आकृतियोंका अनुकरण करनेवाली, जटा-जूटसे विभूषित, सिरपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, तीन नेत्रोंसे युक्त, पूर्णचन्द्रके समान मुखवाली, अलसी-पुष्पके समान नीलवर्णा, तेजोमय, सुन्दर नेत्रोंसे विभूषित, नवयौवनसम्पन्ना, सभी आभूषणोंसे विभूषित, अत्यन्त सुन्दर दाँतोंसे युक्त, स्थूल एवं उन्नत स्तनोंवाली, त्रिभंगी रूपसे स्थित, महिषासुरनाशिनी आदि चिह्नोंसे युक्त हो। दाहिने हाथोंमें क्रमशः ऊपरसे नीचेकी ओर त्रिशूल, खड्ग, चक्र, तीक्ष्ण बाण और शक्ति तथा बायें हाथोंमें ढाल, धनुष, पाश, अङ्कुश, घण्टा अथवा परशु धारण कराना चाहिये। प्रतिमाके नीचे सिररहित महिषासुरको प्रदर्शित करना चाहिये। वह दानव सिर कटनेपर शरीरसे निकलता हुआ दीख पड़े तथा हाथमें खड्ग, हृदय शूलसे विदीर्ण और बाहर निकलती हुई अँतड़ियोंसे विभूषित हो। वह रक्तसे लथपथ शरीरवाला, विस्फारित लाल नेत्रोंसे युक्त, नागपाशसे परिवेष्टित, टेढ़ी भृकुटीके कारण भीषण मुखाकृति और दुर्गाद्वारा पाशयुक्त बायें हाथसे पकड़ा गया केशवाला हो॥ ५२—६३ १/२॥ |
| वमद्रुधिरवक्त्रं च देव्याः सिंहं प्रदर्शयेत्॥ ६४<br>देव्यास्तु दक्षिणं पादं समं सिंहोपरि स्थितम्।<br>किंचिदूर्ध्वं तथा वाममङ्गुष्ठं महिषोपरि॥ ६५<br>स्तूयमानं च तद्रूपममरैः संनिवेशयेत्। | देवीके सिंहको मुखसे रक्त उगलते हुए प्रदर्शित करना चाहिये। देवीका दाहिना पैर सिंहके ऊपर समानरूपसे स्थित हो तथा बायाँ कुछ ऊपरकी ओर उठा हो, उसका अंगूठा महिषासुरपर लगा हुआ हो। उनकी प्रतिमाको देवगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए दिखाना चाहिये। |
| इदानीं सुरराजस्य रूपं वक्ष्ये विशेषतः॥ ६६<br>सहस्रनयनं देवं मत्तवारणसंस्थितम्।<br>पृथूरुवक्षोवदनं सिंहस्कन्धं महाभुजम्॥ ६७ | (यहाँसे अष्टदिक्पाल या लोकपालोंकी प्रतिमाका वर्णन है) अब मैं देवराज इन्द्रके रूपको विशेष रूपसे कह रहा हूँ। हजार नेत्रोंवाले देवेन्द्रको मत्त गयन्दपर विराजमान बनाना चाहिये। उनके ऊरु, वक्षःस्थल और मुख विशाल हों, |
* अध्याय २६१ * । १००१
| किरीटकुण्डलधरं पीवरोरुभुजेक्षणम्।<br>वज्रोत्पलधरं तद्वन्नानाभरणभूषितम्॥ ६८<br>पूजितं देवगन्धर्वैरप्सरोगणसेवितम्।<br>छत्रचामरधारिण्यः स्त्रियः पार्श्वे प्रदर्शयेत्॥ ६९<br>सिंहासनगतं चापि गन्धर्वगणसंयुतम्।<br>इन्द्राणीं वामतश्चास्य कुर्यादुत्पलधारिणीम्॥ ७० | कंधे सिंहके समान हों, उनकी भुजाएँ विशाल हों, वे किरीट और कुण्डल धारण किये हों, उनके जघनस्थल, भुजाएँ तथा आँखें स्थूल हों, वे वज्र और कमल धारण किये हों तथा विविध आभूषणोंसे विभूषित हों, देवता और गन्धर्वोंद्वारा पूजित और अप्सराओंद्वारा सेवित हों। उनके पार्श्वमें छत्र और चामर धारण करनेवाली स्त्रियोंको प्रदर्शित करना चाहिये। वे सिंहासनपर विराजमान हों, उनकी बायीं ओर कमल धारण किये हुए इन्द्राणी स्थित हों, वे गन्धर्वोंसे घिरे हों॥ ६४-७०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रतिमालक्षणे षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिमा-लक्षण नामक दो सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६०॥
दो सौ एकसठवाँ अध्याय
सूर्यादि विभिन्न देवताओंकी प्रतिमाके स्वरूप, प्रतिष्ठा और पूजा आदिकी विधि
| सूत उवाच<br>प्रभाकरस्य प्रतिमामिदानीं शृणुत द्विजाः।<br>रथस्थं कारयेद् देवं पद्महस्तं सुलोचनम्॥ १<br>सप्ताश्वं चैकचक्रं च रथं तस्य प्रकल्पयेत्।<br>मुकुटेन विचित्रेण पद्मगर्भसमप्रभम्॥ २<br>नानाभरणभूषाभ्यां भुजाभ्यां धृतपुष्करम्।<br>स्कन्धस्थे पुष्करे ते तु लीलयैव धृते सदा॥ ३<br>चोलकच्छन्नवपुषं क्वचिच्चित्रेषु दर्शयेत्।<br>वस्त्रयुग्मसमोपेतं चरणौ तेजसावृतौ॥ ४<br>प्रतीहारौ च कर्तव्यौ पार्श्वयोर्दण्डिपिङ्गलौ।<br>कर्तव्यौ खड्गहस्तौ तौ पार्श्वयोः पुरुषावुभौ॥ ५<br>लेखनीकृतहस्तं च पार्श्वे धातारमव्ययम्।<br>नानादेवगणैर्युक्तमेवं कुर्याद् दिवाकरम्॥ ६ | सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणगण! अब आपलोग भगवान् सूर्यकी* प्रतिमाके निर्माणकी विधि सुनिये। भगवान् सूर्यदेवको रथपर स्थित, सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित और दोनों हाथोंमें कमल धारण किये हुए बनाना चाहिये। उनके रथमें सात घोड़े और एक पहिया होनी चाहिये। उन्हें विचित्र मुकुटसे युक्त तथा कमलके मध्यवर्ती भागके समान लालवर्णका बनाना चाहिये। वे विविध आभूषणोंसे विभूषित दोनों भुजाओंमें कमल धारण किये हों, वे कमल सदा लीलापूर्वक ऊपर कंधोंतक उठे हुए हों। उनका स्वरूप विशेषकर पैर दो वस्त्रोंसे आवृत हो। प्रायः चित्रोंमें भी उनकी प्रतिमा दो वस्त्रोंसे ढकी हुई प्रदर्शित की जानी चाहिये। उनके दोनों चरण तेजसे आवृत हों। मूर्तिके दोनों ओर दण्डी और पिङ्गल नामक दो प्रतीहारोंको रखना चाहिये। उन दोनों पार्श्ववर्ती पुरुषोंके हाथोंमें तलवार बनायी जानी चाहिये। उनके पार्श्वमें एक हाथमें लेखनी लिये हुए अविनाशी धाताकी मूर्ति हो। भगवान् भास्कर अनेकों देवगणोंसे युक्त हों। इस प्रकार भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका निर्माण करना चाहिये। |
* सूर्यप्रतिमाकी विधि अग्निपुराण, अध्याय ५१, भविष्य, नारद, साम्बादिपुराणों, सुप्रभेदागम, शिल्परत्न, शारदा, विष्णुधर्म तथा टी० गोपीनाथ राव, स्टीलाकमरिश, बनर्जी आदिके ग्रंथोंमें सानुसंधान विस्तारपूर्वक निर्दिष्ट है। तुलनात्मक अध्ययन तथा जिज्ञासाशान्त्यर्थ ये सभी तथा पुराणागमोंके ध्यान-प्रकरण भी द्रष्टव्य हैं। मतान्तरसे सूर्य भी पूर्व दिशाके स्वामी हैं।
| १००२ | * मत्स्यपुराण * |
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| अरुणः सारथिश्चास्य पद्मिनीपत्रसंनिभः।<br>अश्वौ सुवलयग्रीवावन्तस्थौ तस्य पार्श्वयोः॥ ७<br>भुजङ्गरज्जुभिर्बद्धाः सप्ताश्वा रश्मिसंयुताः।<br>पद्मस्थं वाहनस्थं वा पद्महस्तं प्रकल्पयेत्॥ ८<br><br>वह्नेस्तु लक्षणं वक्ष्ये सर्वकामफलप्रदम्।<br>दीप्तं सुवर्णवपुषमर्धचन्द्रासने स्थितम्॥ ९<br>बालार्कसदृशं तस्य वदनं चापि दर्शयेत्।<br>यज्ञोपवीतिनं देवं लम्बकूर्चधरं तथा॥ १०<br>कमण्डलुं वामकरे दक्षिणे त्वक्षसूत्रकम्।<br>ज्वालावितानसंयुक्तमजवाहनमुज्ज्वलम् ॥ ११<br>कुण्डस्थं वापि कुर्वीत मूर्ध्नि सप्तशिखान्वितम्।<br>तथा यमं प्रवक्ष्यामि दण्डपाशधरं विभुम्॥ १२<br>महामहिषमारूढं कृष्णाञ्जनचयोपमम्।<br>सिंहासनगतं चापि दीप्ताग्निसमलोचनम्॥ १३<br>महिषश्चित्रगुप्तश्च करालाः किंकरास्तथा।<br>समन्ताद् दर्शयेत् तस्य सौम्यान्सौम्यान् सुरासुरान्॥ १४<br>राक्षसेन्द्रं तथा वक्ष्ये लोकपालं च नैर्ऋतम्।<br>नरारूढं महाकायं रक्षोभिर्बहुभिर्वृतम्॥ १५<br>खड्गहस्तं महानीलं कज्जलाचलसंनिभम्।<br>नरयुक्तविमानस्थं पीताभरणभूषितम्॥ १६<br>वरुणं च प्रवक्ष्यामि पाशहस्तं महाबलम्।<br>शङ्खस्फटिकवर्णाभं सितहाराम्बरावृतम्॥ १७<br>झषासनगतं शान्तं किरीटाङ्गदधारिणम्।<br>वायुरूपं प्रवक्ष्यामि धूम्रं तु मृगवाहनम्॥ १८<br>चित्राम्बरधरं शान्तं युवानं कुञ्चितभ्रुवम्।<br>मृगाधिरूढं वरदं पताकाध्वजसंयुतम्॥ १९ | सूर्यदेवके सारथि अरुण हैं जो कमलदलके सदृश लाल वर्णके हैं। उनके दोनों बगलमें चलते हुए लंबी गरदनवाले अश्व हों। उन सातों अश्वोंको सर्पकी रस्सीसे बाँधकर लगामयुक्त रखना चाहिये। सूर्य-मूर्तिको हाथोंमें कमल लिये हुए कमलपर या वाहनपर स्थित रखना चाहिये॥ १—८॥<br>अब मैं सभी प्रकारके अभीष्ट फलोंको देनेवाले अग्निकी प्रतिमाका स्वरूप बतला रहा हूँ। अग्निकी प्रतिमा कनकके समान उदीप्त कान्तिवाली बनानी चाहिये। वह अर्धचन्द्राकार आसनपर स्थित हो। उनका मुख उदयकालीन सूर्यकी भाँति दिखाना चाहिये। अग्निदेवको यज्ञोपवीत तथा लम्बी दाढ़ीसे युक्त बनाना चाहिये। उनके बायें हाथमें कमण्डलु और दाहिने हाथमें रुद्राक्षकी माला हो। उनका वाहन बकरा ज्वालामण्डलसे विभूषित और उज्ज्वल होना चाहिये। मस्तकपर (या मुखमें) सात जिह्वारूपिणी ज्वालाओंसे युक्त इस प्रतिमाको देवमन्दिर अथवा अग्निकुण्डके मध्यमें स्थापित करना चाहिये।<br>अब मैं यमराजकी प्रतिमाके निर्माणकी विधि बतला रहा हूँ। उनके शरीरका रंग काले अंजनके समान हो। वे दण्ड और पाश धारण करनेवाले, ऐश्वर्ययुक्त और विशाल महिषपर आरूढ़ हों अथवा सिंहासनासीन हों। उनके नेत्र प्रदीप्त अग्निके समान हों। उनके चारों ओर महिष, चित्रगुप्त, विकराल अनुचरवर्ग, मनोहर आकृतिवाले देवताओं तथा विकृत असुरोंकी प्रतिमाओंको भी प्रदर्शित करना चाहिये।<br>अब मैं लोकपाल राक्षसेन्द्र निर्ऋतिकी प्रतिमाकी निर्माण-विधि बतला रहा हूँ। वे मनुष्यपर आरूढ़, विशालकाय, राक्षससमूहोंसे घिरे हुए और हाथमें तलवार लिये हुए हों। उनका वर्ण अत्यन्त नील और कज्जलगिरिके समान दिखायी पड़ता हो। उन्हें पालकीपर सवार और पीले आभूषणोंसे विभूषित बनाना चाहिये।<br>अब मैं महाबली वरुणकी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ। वे हाथमें पाश धारण किये हुए स्फटिकमणि और शङ्खके समान श्वेत कान्तिसे युक्त, उज्ज्वल हार और वस्त्रसे विभूषित, झष* (बड़ी मछली)—पर आसीन, शान्त मुद्रासे सम्पन्न तथा बाजूबन्द और किरीटसे सुशोभित हों।<br>अब मैं वायुदेवकी प्रतिमाका स्वरूप बतला रहा हूँ। उन्हें धूम्र वर्णसे युक्त, मृगपर आसीन, चित्र-विचित्र वस्त्रधारी, शान्त, युवावस्थासे सम्पन्न, तिरछी भौंहोंसे युक्त, वरदमुद्रा और ध्वज-पताकासे विभूषित बनाना चाहिये॥ ९—१९॥ |
* शतपथ १।८।४ आदिके अनुसार बड़ी मछली ही झष है।
* अध्याय २६१ * । १००३
| कुबेरं च प्रवक्ष्यामि कुण्डलाभ्यामलङ्कृतम्।<br>महोदरं महाकायं निध्यष्टकसमन्वितम्॥ २०<br><br>गुह्यकैर्बहुभिर्युक्तं धनव्ययकरैस्तथा।<br>हारकेयूररचितं सिताम्बरधरं सदा॥ २१<br><br>गदाधरं च कर्तव्यं वरदं मुकुटान्वितम्।<br>नरयुक्तविमानस्थमेवं रीत्या च कारयेत्॥ २२<br><br>तथैवेशं प्रवक्ष्यामि धवलं धवलेक्षणम्।<br>त्रिशूलपाणिनं देवं त्र्यक्षं वृषगतं प्रभुम्॥ २३<br><br>मातृणां लक्षणं वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः।<br>ब्रह्माणी ब्रह्मसदृशी चतुर्वक्त्रा चतुर्भुजा॥ २४<br><br>हंसाधिरूढा कर्तव्या साक्षसूत्रकमण्डलुः।<br>महेश्वरस्य रूपेण तथा माहेश्वरी मता॥ २५<br><br>जटामुकुटसंयुक्ता वृषस्था चन्द्रशेखरा।<br>कपालशूलखट्वाङ्गवरदाढ्या चतुर्भुजा॥ २६<br><br>कुमाररूपा कौमारी मयूरवरवाहना।<br>रक्तवस्त्रधरा तद्वच्छूलशक्तिधरा मता॥ २७<br><br>हारकेयूरसम्पन्ना कृकवाकुधरा तथा।<br>वैष्णवी विष्णुसदृशी गरुडे समुपस्थिता॥ २८<br><br>चतुर्बाहुश्च वरदा शङ्खचक्रगदाधरा।<br>सिंहासनगता वापि बालकेन समन्विता॥ २९<br><br>वाराहीं च प्रवक्ष्यामि महिषोपरि संस्थिताम्।<br>वराहसदृशी देवी शिरश्चामरधारिणी॥ ३०<br><br>गदाचक्रधरा तद्वद् दानवेन्द्रविनाशिनी।<br>इन्द्राणीमिन्द्रसदृशीं वज्रशूलगदाधराम्॥ ३१<br><br>गजासनगतां देवीं लोचनैर्बहुभिर्वृताम्।<br>तप्तकाञ्चनवर्णाभां दिव्याभरणभूषिताम्॥ ३२<br><br>तीक्ष्णखड्गधरां तद्वद् वक्ष्ये योगेश्वरीमिमाम्।<br>दीर्घजिह्वामूर्ध्वकेशीमस्थिखण्डैश्च मण्डिताम्॥ ३३ | अब मैं कुबेरकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। वे दो कुण्डलोंसे अलंकृत, तोंदयुक्त, विशालकाय, आठ निधियोंसे संयुक्त, बहुतेरे गुह्यकोंसे घिरे हुए, धन व्यय करनेके लिये उद्यत करोंसे युक्त, केयूर और हारसे विभूषित, श्वेत वस्त्रधारी, वरदमुद्रा, गदा और मुकुटसे विभूषित तथा पालकीपर सवार हों। इस प्रकार उनकी प्रतिमा निर्मित करानी चाहिये। अब मैं सामर्थ्यशाली ईशानदेवकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनके शरीरकी कान्ति तथा नेत्र श्वेत हों। वे सामर्थ्यशाली देव तीन नेत्रोंसे युक्त तथा हाथमें त्रिशूल लिये हुए वृषभपर आरूढ़ हों। अब मैं मातृकाओंकी प्रतिमाओंका लक्षण आनुपूर्वी यथार्थरूपसे बता रहा हूँ। ब्रह्माणीकी प्रतिमाको ब्रह्माजीके समान चार मुख, चार भुजाएँ, अक्षसूत्र और कमण्डलुसे विभूषित तथा हंसपर आसीन बनानी चाहिये। इसी प्रकार भगवान् महेश्वरके अनुरूप माहेश्वरीकी प्रतिमा मानी गयी है। वे जटा-मुकुटसे अलंकृत, वृषभासीन, मस्तकपर चन्द्रमासे विभूषित, क्रमशः कपाल, शूल, खट्वाङ्ग* और वरमुद्रासे सुशोभित चार भुजाओंसे सम्पन्न हों। कौमारीकी प्रतिमा स्वामिकार्तिकेयके समान निर्मित करानी चाहिये। वे श्रेष्ठ मयूरपर सवार, लाल वस्त्रसे सुशोभित, शूल और शक्ति धारण करनेवाली, हार और केयूरसे विभूषित तथा मुर्गा लिये हुए हों। वैष्णवीकी मूर्ति विष्णुभगवान्के समान हो। वे गरुड़पर आसीन हों, उनके चार भुजाएँ हों, जिनमें क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और वरद-मुद्रा हो। अथवा वे एक बालकसे युक्त सिंहासनपर बैठी हुई हों। अब मैं वाराहीकी प्रतिमाका प्रकार बतलाता हूँ। वे देवी महिषपर बैठी हुई वराहके समान रहती हैं। उनके सिरपर चामर झलता रहना चाहिये। वे हाथोंमें गदा और चक्र लिये हुए बड़े-बड़े दानवोंके विनाशके लिये संनद्ध रहती हैं। इन्द्राणीको इन्द्रके समान वज्र, शूल, गदा धारण किये हुए हाथीपर विराजमान बनाना चाहिये। वे देवी बहुत-से नेत्रोंसे युक्त, तप्त सुवर्णके समान कान्तिमती और दिव्य आभरणोंसे भूषित रहती हैं॥ २०—३२॥<br><br>अब मैं भगवती योगेश्वरी चामुण्डाकी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ। वे तीखी तलवार, लम्बी जिह्वा, ऊपर उठे केश तथा हड्डियोंके टुकड़ोंसे विभूषित रहती हैं। |
* खट्वाङ्गका तात्पर्य उस गदासे है, जिसकी आकृति कुछ चारपाईके पायेसे मिलती-जुलती है। इसके सिरपर हड्डी जुड़ी रहती है। यह शिव-शक्तिके आयुधोंमें वर्णित है। (द्र०—वैशम्पायननीतिप्रकाशिका, विश्वामित्रधनुर्वेद आदि)
१००४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दंष्ट्राकरालवदनां कुर्याच्चैव कृशोदरीम्।<br>कपालमालिनीं देवीं मुण्डमालाविभूषिताम्॥ ३४<br>कपालं वामहस्ते तु मांसशोणितपूरितम्।<br>मस्तिष्काक्तं च बिभ्राणां शक्तिकां दक्षिणे करे॥ ३५<br>गृध्रस्था वायसस्था वा निर्मांसा विनतोदरी।<br>करालवदना तद्वत् कर्तव्या सा त्रिलोचना॥ ३६<br>चामुण्डा बद्धघण्टा वा द्वीपिचर्मधरा शुभा।<br>दिग्वासाः कालिका तद्वद् रासभस्था कपालिनी॥ ३७<br>सुरक्तपुष्पाभरणा वर्धनीध्वजसंयुता।<br>विनायकं च कुर्वीत मातृणामन्तिके सदा॥ ३८<br>वीरेश्वरश्च भगवान् वृषारूढो जटाधरः।<br>वीणाहस्तस्त्रिशूली च मातृणामग्रतो भवेत्॥ ३९ | उन्हें विकराल दाढ़ोंसे युक्त मुखवाली, दुर्बल उदरसे युक्त, कपालोंकी माला धारण किये और मुण्ड-मालाओंसे विभूषित बनाना चाहिये। उनके बायें हाथमें खोपड़ीसे युक्त एवं रक्त और मांससे पूर्ण खप्पर और दाहिने हाथमें शक्ति हो। वे गृध्र या काकपर बैठी हों। उनका शरीर मांसरहित, उदर भीतर घुसा और मुख अत्यन्त भीषण हो। उन्हें तीन नेत्रोंसे सम्पन्न घण्टा लिये हुए व्याघ्र-चर्मसे सुशोभित या निर्वस्त्र बनाना चाहिये। उसी प्रकार कालिकाको कपाल धारण किये हुए गधेपर सवार बनाना चाहिये। वे लाल पुष्पोंके आभरणोंसे विभूषित तथा झाडूकी ध्वजासे युक्त हों। इन मातृकाओंके समीप सर्वदा गणेशकी प्रतिमा भी रखनी चाहिये तथा मातृकाओंके आगे जटाधारी, हाथोंमें वीणा और त्रिशूल लिये हुए वृषभारूढ़ भगवान् वीरेश्वरको स्थापित करना चाहिये॥ ३३—३९॥ |
| श्रियं देवीं प्रवक्ष्यामि नवे वयसि संस्थिताम्।<br>सुयौवनां पीनगण्डां रक्तौष्ठीं कुञ्चितभ्रुवम्॥ ४०<br>पीनोन्नतस्तनतटां मणिकुण्डलधारिणीम्।<br>सुमण्डलं मुखं तस्याः शिरः सीमन्तभूषणम्॥ ४१<br>पद्मस्वस्तिकशङ्खैर्वा भूषितां कुन्तलालकैः।<br>कञ्चुकाबद्धगात्री च हारभूषौ पयोधरौ॥ ४२<br>नागहस्तोपमौ बाहू केयूरकटकोज्ज्वलौ।<br>पद्मं हस्ते प्रदातव्यं श्रीफलं दक्षिणे भुजे॥ ४३<br>मेखलाभरणां तद्वत् तप्तकाञ्चनसप्रभाम्।<br>नानाभरणसम्पन्नां शोभनाम्बरधारिणीम्॥ ४४<br>पार्श्वे तस्याः स्त्रियः कार्याश्चामरव्यग्रपाणयः।<br>पद्मासनोपविष्टा तु पद्मसिंहासनस्थिता॥ ४५<br>करिभ्यां स्नाप्यमानासौ भृङ्गाराभ्यामनेकशः।<br>प्रक्षालयन्तौ करिणौ भृङ्गाराभ्यां तथापरौ॥ ४६<br>स्तूयमाना च लोकेशैस्तथा गन्धर्वगुह्यकैः। | अब मैं लक्ष्मीकी प्रतिमाका प्रकार बतला रहा हूँ। वे नवीन अवस्थामें स्थित, नवयौवनसम्पन्न, उन्नत कपोलसे युक्त, लाल ओष्ठोंवाली, तिरछी भौंहोंसे युक्त तथा मणिनिर्मित कुण्डलोंसे विभूषित हों। उनका मुखमण्डल सुन्दर और सिर सिंदूरभरे माँगसे विभूषित हो। वे पद्म, स्वस्तिक और शङ्खसे तथा घुँघराले बालोंसे सुशोभित हों। उनके शरीरमें चोली बँधी हो और दोनों भुजाएँ हाथीके शुण्डादण्डकी भाँति स्थूल तथा केयूर और कङ्कणसे विभूषित हों। उनके बायें हाथमें कमल और दाहिने हाथमें श्रीफल होना चाहिये। उनकी शरीरकान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान गौर वर्णकी हो। वे करधनीसे विभूषित, विविध आभूषणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर साड़ीसे सुसज्जित हों। उनके पार्श्वमें चँवर धारण करनेवाली स्त्रियोंकी प्रतिमाएँ निर्मित करनी चाहिये। वे पद्मसिंहासनपर पद्मासनसे स्थित हों। उन्हें दो हाथी शुण्डमें गडुए लिये हुए लगातार स्नान करा रहे हों तथा दो अन्य हाथी भी उनपर घटद्वारा जल छोड़ रहे हों। उस समय लोकेश्वरों, गन्धर्वों और यक्षोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही हो॥ ४०—४६ १/२॥ |
| तथैव यक्षिणी कार्या सिद्धासुरनिषेविता॥ ४७<br>पार्श्वयोः कलशौ तस्यास्तोरणे देवदानवाः।<br>नागाश्चैव तु कर्तव्याः खड्गखेटकधारिणः॥ ४८ | इसी प्रकार यक्षिणीकी प्रतिमा सिद्धों तथा असुरोंद्वारा सेवित बनानी चाहिये। उसके दोनों ओर दो कलश और तोरणमें देवताओं, दानवों और नागोंकी प्रतिमा रखनी चाहिये, जो खड्ग और ढाल धारण किये हुए हों। |
| * अध्याय २६२ * | १००५ |
|---|
| अधस्तात् प्रकृतिस्तेषां नाभेरुर्ध्वं तु पौरुषी ।<br>फणाश्च मूर्ध्नि कर्तव्या द्विजिह्वा बहवः समाः ॥ ४९<br>पिशाचा राक्षसाश्चैव भूतवेतालजातयः ।<br>निर्मांसाश्चैव ते सर्वे रौद्रा विकृतरूपिणः ॥ ५०<br>क्षेत्रपालश्च कर्तव्यो जटिलो विकृताननः ।<br>दिग्वासा जटिलस्तद्वच्छ्वगोमायुनिषेवितः ॥ ५१<br>कपालं वामहस्ते तु शिरः केशसमावृतम् ।<br>दक्षिणे शक्तिकां दद्यादसुरक्षयकारिणीम् ॥ ५२<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि द्विभुजं कुसुमायुधम् ।<br>पार्श्वे चाश्वमुखं तस्य मकरध्वजसंयुतम् ॥ ५३<br>दक्षिणे पुष्पबाणं च वामे पुष्पमयं धनुः ।<br>प्रीतिः स्याद् दक्षिणे तस्य भोजनोपस्करान्विता ॥ ५४<br>रतिश्च वामपार्श्वे तु शयनं सारसान्वितम् ।<br>पटश्च पटहश्चैव खरः कामातुरस्तथा ॥ ५५<br>पार्श्वतो जलवापी च वनं नन्दनमेव च ।<br>सुशोभनश्च कर्तव्यो भगवान् कुसुमायुधः ॥ ५६<br>संस्थानमीषद्वक्त्रं स्याद् विस्मयस्मितवक्त्रकम् ।<br>एतदुद्देशतः प्रोक्तं प्रतिमालक्षणं मया ।<br>विस्तरेण न शक्नोति बृहस्पतिरपि द्विजाः ॥ ५७ | नीचेकी ओर उन नागोंका प्राकृतिक शरीर और नाभिसे ऊपर मनुष्यकी आकृति रहनी चाहिये । सिरपर बराबरीसे दिखायी पड़नेवाले दो जिह्वाओंसे युक्त बहुत-से फण बनाने चाहिये । पिशाच, राक्षस, भूत और बेताल जातियोंके लोगोंको भी बनाना चाहिये, वे सभी मांसरहित, विकृत रूपवाले और भयंकर हों। क्षेत्रपालकी प्रतिमा जटाओंसे युक्त, विकृत मुखवाली, नग्न, शृगालों और कुत्तोंसे सेवित बनानी चाहिये। उसका सिर केशोंसे आच्छादित हो। उसके बायें हाथमें कपाल और दाहिने हाथमें असुर-विनाशिनी शक्ति होनी चाहिये। अब इसके बाद मैं दो भुजाओंवाले कामदेवकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी एक ओर अश्वमुख मकरध्वजकी रचना करनी चाहिये। उसके दाहिने हाथमें पुष्प-बाण और बायें हाथमें पुष्पमय धनुष होना चाहिये। उनकी दाहिनी ओर भोजनकी सामग्रियोंसे युक्त प्रीतिकी तथा बायीं ओर रतिकी प्रतिमा शय्यासन एवं सारस पक्षीसे युक्त होनी चाहिये। उनके बगलमें वस्त्र, नगाड़ा तथा कामलोलुप गधा होना चाहिये। प्रतिमाके एक बगलमें जलसे पूर्ण बावली तथा नन्दनवन हो। इस तरह ऐश्वर्यशाली कामदेवको परम सुन्दर बनाना चाहिये। प्रतिमाकी मुद्रा कुछ वक्र, कुछ विस्मययुक्त और कुछ मुसकराती हुई हो। ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें यह प्रतिमाओंका लक्षण बतलाया है। इनका विस्तारपूर्वक वर्णन तो बृहस्पति भी नहीं कर सकते ॥ ४९–५७ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तने प्रतिमालक्षणं नामैकषष्ठ्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन-प्रसङ्गमें प्रतिमा-लक्षण नामक दो सौ एकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २६१ ॥
दो सौ बासठवाँ अध्याय
पीठिकाओंके भेद, लक्षण और फल
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो ! अब मैं आपलोगोंको |
|---|---|
| पीठिकालक्षणं वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः ।<br>पीठोच्छ्रायं यथावच्च भागान् षोडश कारयेत् ॥ १<br>भूमावेकः प्रविष्टः स्याच्चतुर्भिर्जगती मता ।<br>वृत्तो भागस्तथैकः स्याद् वृतः पटलमागतः ॥ २ | पीठिकाओंके लक्षणोंको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ। पीठिकाकी ऊँचाईको सोलह भागोंमें विभक्त करे। उनमें बीचका एक भाग पृथ्वीमें प्रविष्ट रहेगा। ऊपरके शेष चार भाग 'जगती' माने जाते हैं। उनसे ऊपरका एक भाग पटल भागसे घिरा हुआ 'वृत्त' कहलाता है। |
| १००६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भागैस्त्रिभिस्तथा कण्ठः कण्ठपट्टस्तु भागतः।<br>भागाभ्यामूर्ध्वपट्टश्च शेषभागेन पट्टिका॥ ३<br>प्रविष्टं भागमेकैकं जगतीं यावदेव तु।<br>निर्गमस्तु पुनस्तस्य यावद् वै शेषपट्टिका॥ ४<br>वारिनिर्गमनार्थं तु तत्र कार्यः प्रणालकः।<br>पीठिकानां तु सर्वासामेतत्सामान्यलक्षणम्॥ ५<br>विशेषान् देवताभेदाच्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः।<br>स्थण्डिला वाथ वापी वा यक्षी वेदी च मण्डला॥ ६<br>पूर्णचन्द्रा च वज्रा च पद्मा वार्धशशी तथा।<br>त्रिकोणा दशमी तासां संस्थानं वा निबोधत॥ ७<br>स्थण्डिला चतुरस्त्रा तु वर्जिता मेखलादिभिः।<br>वापी द्विमेखला ज्ञेया यक्षी चैव त्रिमेखला॥ ८<br>चतुरस्रायता वेदी न तां लिङ्गेषु योजयेत्।<br>मण्डला वर्तुला या तु मेखलाभिर्गणप्रिया॥ ९<br>रक्ता द्विमेखला मध्ये पूर्णचन्द्रा तु सा भवेत्।<br>मेखलात्रयसंयुक्ता षडस्रा वज्रिका भवेत्॥ १० | उसके ऊपर तीन भागोंसे कण्ठ, एक भागसे कण्ठपट्ट, दो भागोंसे ऊर्ध्वपट्ट तथा शेष भागोंसे पट्टिका बनायी जाती है। एक-एक भाग जगतीपर्यन्त एक-दूसरेमें प्रविष्ट रहते हैं। फिर शेषपट्टिका-पर्यन्त सबका निर्गम होता है। पट्टिकामें जल निकलनेके लिये (सोमसूत्रसे मिली) नाली बनानी चाहिये। यह सभी पीठिकाओंका सामान्य लक्षण है। ऋषिगण! अब देवताओंके भेदसे पीठिकाओंके विशेष लक्षण सुनिये। स्थण्डिला, वापी, यक्षी, वेदी, मण्डला, पूर्णचन्द्रा, वज्रा, पद्मा, अर्धशशी तथा दसवीं त्रिकोणा—ये पीठिकाओंके भेद हैं। अब इनकी स्थिति सुनिये। स्थण्डिला-पीठिका चौकोर होती है, इसमें मेखला आदि कुछ नहीं होती। वापीको दो मेखलाओंसे तथा यक्षीको तीन मेखलाओंसे युक्त जानना चाहिये। चार पहलवाली आयताकार पीठिका वेदी कही जाती है, उसे लिङ्गकी स्थापनामें प्रयुक्त नहीं करना चाहिये।<br>मण्डला मेखलाओंसे युक्त गोलाकार होती है, वह प्रमथगणोंको प्रिय होती है। जो पीठिका लाल वर्णवाली तथा मध्यमें दो मेखलाओंसे युक्त होती है, उसे पूर्णचन्द्रा कहते हैं। तीन मेखलाओंसे युक्त छः कोनेवाली पीठिकाको वज्रा कहते हैं॥ १—१०॥ |
| षोडशास्रा भवेत् पद्मा किंचिद्ध्रस्वा तु मूलतः।<br>तथैव धनुषाकारा सार्धचन्द्रा प्रशस्यते॥ ११<br>त्रिशूलसदृशी तद्वत् त्रिकोणा ह्यूर्ध्वतो मता।<br>प्रागुदक्प्रवणा तद्वत् प्रशस्ता लक्षणान्विता॥ १२<br>परिवेषं त्रिभागेन निर्गमं तत्र कारयेत्।<br>विस्तारं तत्प्रमाणं च मूले चाग्रे तथोर्ध्वतः॥ १३<br>जलमार्गश्च कर्तव्यस्त्रिभागेन सुशोभनः।<br>लिङ्गस्यार्धविभागेन स्थौल्येन समधिष्ठिता॥ १४<br>मेखला तत्रिभागेन खातं चैव प्रमाणतः।<br>अथवा पादहीनं तु शोभनं कारयेत् सदा॥ १५<br>उत्तरस्थं प्रणालं च प्रमाणादधिकं भवेत्।<br>स्थण्डिलायामथारोग्यं धनं धान्यं च पुष्कलम्॥ १६<br>गोप्रदा च भवेद् यक्षी वेदी सम्पत्प्रदा भवेत्।<br>मण्डलायां भवेत् कीर्तिवरदा पूर्णचन्द्रिका॥ १७ | मूल भागमें कुछ छोटी (पद्मपत्र-सी) सोलह पहलोंवाली पीठिका पद्मा कही जाती है। उसी प्रकार धनुषके आकारवाली पीठिकाको अर्धचन्द्रा कहते हैं। ऊपरसे त्रिशूलके समान दिखायी पड़नेवाली, पूर्व तथा उत्तरकी ओर कुछ ढालू एवं श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त पीठिकाको त्रिकोणा कहते हैं। पीठिकाके तीन भाग परिधिके बाहर रहें और मूल, अग्रभाग तथा ऊपर—इन तीनों भागोंके विस्तार अधिक हों। त्रिभागमें जल निकलनेकी सुन्दर नाली (सोमसूत्र) होनी चाहिये। पीठिका लिङ्गके आधे भागकी मोटाईके परिमाणसे बनानी चाहिये। लिङ्गके तीन भागके बराबर मेखलाका खात बनाना चाहिये। अथवा वह चौथाई भागसे कम रहे, किंतु सर्वदा सुन्दर बनाना चाहिये। उत्तरकी ओर स्थित नाली प्रमाणसे कुछ अधिक ही बनानी चाहिये। स्थण्डिला-पीठिकाके स्थापित करनेसे आरोग्य तथा विपुल धन-धान्यादिकी प्राप्ति होती है। यक्षी गौ देनेवाली तथा वेदी सम्पत्तिदायिनी कही गयी है। मण्डलामें कीर्ति प्राप्त होती है और पूर्णचन्द्रिका वरदान देनेवाली कही गयी है। |
| * अध्याय २६३ * | १००७ |
|---|
| आयुष्प्रदा भवेद् वज्रा पद्मा सौभाग्यदा भवेत्।<br>पुत्रप्रदार्थचन्द्रा स्यात् त्रिकोणा शत्रुनाशिनी ॥ १८<br>देवस्य यजनार्थं तु पीठिका दश कीर्तिताः।<br>शैले शैलमयीं दद्यात् पार्थिवे पार्थिवीं तथा ॥ १९<br>दारुजे दारुजां कुर्यान्मिश्रे मिश्रां तथैव च।<br>नान्ययोनिस्तु कर्तव्या सदा शुभफलेप्सुभिः ॥ २०<br>अर्चायामासमं दैर्घ्यं लिङ्गायामसमं तथा।<br>यस्य देवस्य या पत्नी तां पीठे परिकल्पयेत्।<br>एतत् सर्वं समाख्यातं समासात् पीठलक्षणम् ॥ २१ | वज्रा दीर्घायु प्रदान करनेवाली तथा पद्मा सौभाग्यदायिनी कही गयी है। अर्धचन्द्रा पुत्र प्रदान करनेवाली तथा त्रिकोणा शत्रुनाशिनी होती है। इस प्रकार देवताकी पूजाके लिये ये दस पीठिकाएँ कही गयी हैं। पत्थरकी प्रतिमामें पत्थरकी तथा मिट्टीकी मूर्तिमें मिट्टीकी पीठिका देनी चाहिये। इसी प्रकार काष्ठकी मूर्तिमें काष्ठकी तथा मिश्रित धातुओंकी प्रतिमामें धातुमिश्रितकी पीठिका रखनी चाहिये। शुभ फलकी कामना करनेवालोंको दूसरे प्रकारकी पीठिका कभी नहीं देनी चाहिये। पीठिकाकी लम्बाई मूर्तिमें तथा लिङ्गमें बराबर नहीं रखी जाती। जिस देवताकी जो पत्नी हो, उसे उसी पीठपर स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार यह मैंने आपलोगोंको संक्षेपमें पीठिकाका लक्षण बतलाया है॥ ११—२१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तने पीठिकानुकीर्तनं नाम द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन-प्रसङ्गमें पीठिका-वर्णन नामक दो सौ बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६२॥
दो सौ तिरसठवाँ अध्याय
शिवलिङ्गके निर्माणकी विधि
| सूत उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लिङ्गलक्षणमुत्तमम्।<br>सुस्निग्धं च सुवर्णं च लिङ्गं कुर्याद् विचक्षणः॥ १<br>प्रासादस्य प्रमाणेन लिङ्गमानं विधीयते।<br>लिङ्गमानेन वा विद्यात् प्रासादं शुभलक्षणम् ॥ २<br>चतुरस्रे समे गर्ते ब्रह्मसूत्रं निपातयेत्।<br>वामेन ब्रह्मसूत्रस्य अर्चा वा लिङ्गमेव च॥ ३<br>प्रागुत्तरेण लीनं तु दक्षिणापरमाश्रितम्।<br>पुरस्यापरदिग्भागे पूर्वद्वारं प्रकल्पयेत्॥ ४<br>पूर्वेण चापरं द्वारं माहेन्द्रं दक्षिणोत्तरम्।<br>द्वारं विभज्य पूर्वं तु एकविंशतिभागिकम्॥ ५<br>ततो मध्यगतं ज्ञात्वा ब्रह्मसूत्रं प्रकल्पयेत्।<br>तस्यार्धं तु त्रिधा कृत्वा भागं चोत्तरतस्त्यजेत्॥ ६<br>एवं दक्षिणतस्त्यक्त्वा ब्रह्मस्थानं प्रकल्पयेत्।<br>भागार्धेन तु यल्लिङ्गं कार्यं तदिह शस्यते॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं लिङ्गके उत्तम लक्षणका वर्णन कर रहा हूँ। चतुर पुरुष अत्यन्त चिकने एवं श्रेष्ठ (श्वेत) रंगके शिवलिङ्गका निर्माण करे। मन्दिरके प्रमाणके अनुसार ही शिवलिङ्गका प्रमाण बतलाया गया है। अथवा शिवलिङ्गके प्रमाणानुसार शिव-मन्दिरका निर्माण शुभ जानना चाहिये। सर्वप्रथम चौकोर एवं समतल गर्तमें ब्रह्मसूत्र गिराना चाहिये। ब्रह्मसूत्रकी बायीं ओर अर्चा या लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। वहाँ पूर्वोत्तर या दक्षिणपूर्वकी ओर पूर्वद्वार बनाना चाहिये। वह द्वार कुछ दक्षिणाश्रित या ईशानमें लीन रहना चाहिये। पूर्वका यह द्वार माहेन्द्रद्वार कहलाता है। प्रथमतः पूर्वद्वारको इक्कीस भागोंमें विभक्तकर मध्य भागमें ब्रह्मसूत्रकी कल्पना करनी चाहिये। इसके अर्धभागको तीन भागोंमें विभक्तकर उत्तरकी ओर तथा दक्षिणकी ओर एक-एक भाग छोड़कर ब्रह्मस्थानकी कल्पना करनी चाहिये। उस अर्धभागमें लिङ्गकी स्थापना प्रशस्त मानी गयी है। |