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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1015 of 1098

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Page 1015
* अध्याय २६२ *१००५

| अधस्तात् प्रकृतिस्तेषां नाभेरुर्ध्वं तु पौरुषी ।<br>फणाश्च मूर्ध्नि कर्तव्या द्विजिह्वा बहवः समाः ॥ ४९<br>पिशाचा राक्षसाश्चैव भूतवेतालजातयः ।<br>निर्मांसाश्चैव ते सर्वे रौद्रा विकृतरूपिणः ॥ ५०<br>क्षेत्रपालश्च कर्तव्यो जटिलो विकृताननः ।<br>दिग्वासा जटिलस्तद्वच्छ्वगोमायुनिषेवितः ॥ ५१<br>कपालं वामहस्ते तु शिरः केशसमावृतम् ।<br>दक्षिणे शक्तिकां दद्यादसुरक्षयकारिणीम् ॥ ५२<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि द्विभुजं कुसुमायुधम् ।<br>पार्श्वे चाश्वमुखं तस्य मकरध्वजसंयुतम् ॥ ५३<br>दक्षिणे पुष्पबाणं च वामे पुष्पमयं धनुः ।<br>प्रीतिः स्याद् दक्षिणे तस्य भोजनोपस्करान्विता ॥ ५४<br>रतिश्च वामपार्श्वे तु शयनं सारसान्वितम् ।<br>पटश्च पटहश्चैव खरः कामातुरस्तथा ॥ ५५<br>पार्श्वतो जलवापी च वनं नन्दनमेव च ।<br>सुशोभनश्च कर्तव्यो भगवान् कुसुमायुधः ॥ ५६<br>संस्थानमीषद्वक्त्रं स्याद् विस्मयस्मितवक्त्रकम् ।<br>एतदुद्देशतः प्रोक्तं प्रतिमालक्षणं मया ।<br>विस्तरेण न शक्नोति बृहस्पतिरपि द्विजाः ॥ ५७ | नीचेकी ओर उन नागोंका प्राकृतिक शरीर और नाभिसे ऊपर मनुष्यकी आकृति रहनी चाहिये । सिरपर बराबरीसे दिखायी पड़नेवाले दो जिह्वाओंसे युक्त बहुत-से फण बनाने चाहिये । पिशाच, राक्षस, भूत और बेताल जातियोंके लोगोंको भी बनाना चाहिये, वे सभी मांसरहित, विकृत रूपवाले और भयंकर हों। क्षेत्रपालकी प्रतिमा जटाओंसे युक्त, विकृत मुखवाली, नग्न, शृगालों और कुत्तोंसे सेवित बनानी चाहिये। उसका सिर केशोंसे आच्छादित हो। उसके बायें हाथमें कपाल और दाहिने हाथमें असुर-विनाशिनी शक्ति होनी चाहिये। अब इसके बाद मैं दो भुजाओंवाले कामदेवकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी एक ओर अश्वमुख मकरध्वजकी रचना करनी चाहिये। उसके दाहिने हाथमें पुष्प-बाण और बायें हाथमें पुष्पमय धनुष होना चाहिये। उनकी दाहिनी ओर भोजनकी सामग्रियोंसे युक्त प्रीतिकी तथा बायीं ओर रतिकी प्रतिमा शय्यासन एवं सारस पक्षीसे युक्त होनी चाहिये। उनके बगलमें वस्त्र, नगाड़ा तथा कामलोलुप गधा होना चाहिये। प्रतिमाके एक बगलमें जलसे पूर्ण बावली तथा नन्दनवन हो। इस तरह ऐश्वर्यशाली कामदेवको परम सुन्दर बनाना चाहिये। प्रतिमाकी मुद्रा कुछ वक्र, कुछ विस्मययुक्त और कुछ मुसकराती हुई हो। ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें यह प्रतिमाओंका लक्षण बतलाया है। इनका विस्तारपूर्वक वर्णन तो बृहस्पति भी नहीं कर सकते ॥ ४९–५७ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तने प्रतिमालक्षणं नामैकषष्ठ्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन-प्रसङ्गमें प्रतिमा-लक्षण नामक दो सौ एकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २६१ ॥


दो सौ बासठवाँ अध्याय

पीठिकाओंके भेद, लक्षण और फल

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो ! अब मैं आपलोगोंको
पीठिकालक्षणं वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः ।<br>पीठोच्छ्रायं यथावच्च भागान् षोडश कारयेत् ॥ १<br>भूमावेकः प्रविष्टः स्याच्चतुर्भिर्जगती मता ।<br>वृत्तो भागस्तथैकः स्याद् वृतः पटलमागतः ॥ २पीठिकाओंके लक्षणोंको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ। पीठिकाकी ऊँचाईको सोलह भागोंमें विभक्त करे। उनमें बीचका एक भाग पृथ्वीमें प्रविष्ट रहेगा। ऊपरके शेष चार भाग 'जगती' माने जाते हैं। उनसे ऊपरका एक भाग पटल भागसे घिरा हुआ 'वृत्त' कहलाता है।