मत्स्य महापुराण

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१००४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दंष्ट्राकरालवदनां कुर्याच्चैव कृशोदरीम्।<br>कपालमालिनीं देवीं मुण्डमालाविभूषिताम्॥ ३४<br>कपालं वामहस्ते तु मांसशोणितपूरितम्।<br>मस्तिष्काक्तं च बिभ्राणां शक्तिकां दक्षिणे करे॥ ३५<br>गृध्रस्था वायसस्था वा निर्मांसा विनतोदरी।<br>करालवदना तद्वत् कर्तव्या सा त्रिलोचना॥ ३६<br>चामुण्डा बद्धघण्टा वा द्वीपिचर्मधरा शुभा।<br>दिग्वासाः कालिका तद्वद् रासभस्था कपालिनी॥ ३७<br>सुरक्तपुष्पाभरणा वर्धनीध्वजसंयुता।<br>विनायकं च कुर्वीत मातृणामन्तिके सदा॥ ३८<br>वीरेश्वरश्च भगवान् वृषारूढो जटाधरः।<br>वीणाहस्तस्त्रिशूली च मातृणामग्रतो भवेत्॥ ३९ | उन्हें विकराल दाढ़ोंसे युक्त मुखवाली, दुर्बल उदरसे युक्त, कपालोंकी माला धारण किये और मुण्ड-मालाओंसे विभूषित बनाना चाहिये। उनके बायें हाथमें खोपड़ीसे युक्त एवं रक्त और मांससे पूर्ण खप्पर और दाहिने हाथमें शक्ति हो। वे गृध्र या काकपर बैठी हों। उनका शरीर मांसरहित, उदर भीतर घुसा और मुख अत्यन्त भीषण हो। उन्हें तीन नेत्रोंसे सम्पन्न घण्टा लिये हुए व्याघ्र-चर्मसे सुशोभित या निर्वस्त्र बनाना चाहिये। उसी प्रकार कालिकाको कपाल धारण किये हुए गधेपर सवार बनाना चाहिये। वे लाल पुष्पोंके आभरणोंसे विभूषित तथा झाडूकी ध्वजासे युक्त हों। इन मातृकाओंके समीप सर्वदा गणेशकी प्रतिमा भी रखनी चाहिये तथा मातृकाओंके आगे जटाधारी, हाथोंमें वीणा और त्रिशूल लिये हुए वृषभारूढ़ भगवान् वीरेश्वरको स्थापित करना चाहिये॥ ३३—३९॥ |
| श्रियं देवीं प्रवक्ष्यामि नवे वयसि संस्थिताम्।<br>सुयौवनां पीनगण्डां रक्तौष्ठीं कुञ्चितभ्रुवम्॥ ४०<br>पीनोन्नतस्तनतटां मणिकुण्डलधारिणीम्।<br>सुमण्डलं मुखं तस्याः शिरः सीमन्तभूषणम्॥ ४१<br>पद्मस्वस्तिकशङ्खैर्वा भूषितां कुन्तलालकैः।<br>कञ्चुकाबद्धगात्री च हारभूषौ पयोधरौ॥ ४२<br>नागहस्तोपमौ बाहू केयूरकटकोज्ज्वलौ।<br>पद्मं हस्ते प्रदातव्यं श्रीफलं दक्षिणे भुजे॥ ४३<br>मेखलाभरणां तद्वत् तप्तकाञ्चनसप्रभाम्।<br>नानाभरणसम्पन्नां शोभनाम्बरधारिणीम्॥ ४४<br>पार्श्वे तस्याः स्त्रियः कार्याश्चामरव्यग्रपाणयः।<br>पद्मासनोपविष्टा तु पद्मसिंहासनस्थिता॥ ४५<br>करिभ्यां स्नाप्यमानासौ भृङ्गाराभ्यामनेकशः।<br>प्रक्षालयन्तौ करिणौ भृङ्गाराभ्यां तथापरौ॥ ४६<br>स्तूयमाना च लोकेशैस्तथा गन्धर्वगुह्यकैः। | अब मैं लक्ष्मीकी प्रतिमाका प्रकार बतला रहा हूँ। वे नवीन अवस्थामें स्थित, नवयौवनसम्पन्न, उन्नत कपोलसे युक्त, लाल ओष्ठोंवाली, तिरछी भौंहोंसे युक्त तथा मणिनिर्मित कुण्डलोंसे विभूषित हों। उनका मुखमण्डल सुन्दर और सिर सिंदूरभरे माँगसे विभूषित हो। वे पद्म, स्वस्तिक और शङ्खसे तथा घुँघराले बालोंसे सुशोभित हों। उनके शरीरमें चोली बँधी हो और दोनों भुजाएँ हाथीके शुण्डादण्डकी भाँति स्थूल तथा केयूर और कङ्कणसे विभूषित हों। उनके बायें हाथमें कमल और दाहिने हाथमें श्रीफल होना चाहिये। उनकी शरीरकान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान गौर वर्णकी हो। वे करधनीसे विभूषित, विविध आभूषणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर साड़ीसे सुसज्जित हों। उनके पार्श्वमें चँवर धारण करनेवाली स्त्रियोंकी प्रतिमाएँ निर्मित करनी चाहिये। वे पद्मसिंहासनपर पद्मासनसे स्थित हों। उन्हें दो हाथी शुण्डमें गडुए लिये हुए लगातार स्नान करा रहे हों तथा दो अन्य हाथी भी उनपर घटद्वारा जल छोड़ रहे हों। उस समय लोकेश्वरों, गन्धर्वों और यक्षोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही हो॥ ४०—४६ १/२॥ |
| तथैव यक्षिणी कार्या सिद्धासुरनिषेविता॥ ४७<br>पार्श्वयोः कलशौ तस्यास्तोरणे देवदानवाः।<br>नागाश्चैव तु कर्तव्याः खड्गखेटकधारिणः॥ ४८ | इसी प्रकार यक्षिणीकी प्रतिमा सिद्धों तथा असुरोंद्वारा सेवित बनानी चाहिये। उसके दोनों ओर दो कलश और तोरणमें देवताओं, दानवों और नागोंकी प्रतिमा रखनी चाहिये, जो खड्ग और ढाल धारण किये हुए हों। |