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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 649 में से

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पृष्ठ 119

भूमिका । ११७
' तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा '
श्रीभागवत.
ऐसी दशा में जगत् को सत्य सिद्ध करने के लिये प्राति-
भासिक ( रज्जु सर्प-शुक्ति रजत-मरीचि सलिल ) वस्तुओं की
भी सत्यता साधन के वारे में श्रीभाष्यकारों के जो प्रतिवाद
भयंकर लेख हैं वे स्पृहणीय हैं। श्रीभाष्यकारों के प्रधानमूर्ति
शेष ने तो अपने परमार्थसार में यों कहा है—
' रज्ज्वां नास्ति भुजङ्गस्त्रासं कुरुते च मृत्युपर्यंतम् ।
भ्रान्तेर्महती शक्तिर्न विवेक्तुं शक्यते नाम ॥ '
जो ब्रह्मजिवैक्य—पूर्व्वलिखित प्रमाणों से शतधा सिद्ध
है तो भी अद्वैतानुरागियों के विनोदार्थ ये वचन लिखते हैं—
' राजसूनोः स्मृतिप्राप्तौ व्याधभावो निवर्तते ।
यथैवमात्मनोऽज्ञस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यतः ॥ '
' ग्रहाविष्टो द्विजः कश्चिच्छूद्रोऽहमिति मन्यते ।
ग्रहनाशात्पुनः स्वीयं ब्राह्मएयं मन्यते यथा ॥
मायाविष्टस्तथा जीवो देहोऽहमिति मन्यते ।
मायानाशात्पुनः स्वीयं रूपं ब्रह्मास्मि मन्यते ॥ '
' आत्मा कर्त्रादिरूपश्चेन्माकाङ्क्षीस्तर्हि मुक्तताम् ।
नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः ॥ '
' यद्यात्मा मलिनोऽस्वच्छो विकारी स्यात् स्वभावतः ।
नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि ॥ '
' वस्तुस्थित्या न बन्धोऽस्ति तदभावान्न मुक्तता ।
विकल्पघटितावेतावुभावपि न किंचन ॥ '
सांख्यवृत्ति.