मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४ मनुस्मृति ।
मनुपुत्र-धर्मात्मा भृगुने ऋषियों से कहा, इस सम्पूर्ण कर्मयोग के
निर्णय को सुनो:-मन, वाणी और शरीर से होनेवाला कर्म शुभ,
अशुभ फल देता है और उसी कर्म के अनुसार मनुष्यों का उ-
त्तम-मध्यम और अधम योनि में जन्म होता है। उस देही के
उत्तम-मध्यम-अधम और मन-वाणी-शरीर के आश्रित फल देने
वाले तीन प्रकार के दश लक्षणयुक्त धर्म का मनप्रवर्तक-चलाने
वाला है। अन्याय से परधन हरने का विचार, दूसरे का अनभल
चाहना और परलोक में अश्रद्धा ये तीन प्रकार के मानस पाप-
कर्म हैं। कठोर वचन कहना, झूठ बोलना, सब भांति की चुगली
और व्यर्थ बकवाद करना ये चार वाणी के पापकर्म हैं । बिना
दी हुई वस्तु लेना, शास्त्रविरुद्ध हिंसा और परस्त्री-गमन ये तीन
शरीर के पापकर्म हैं ॥ १-७ ॥
मानसं मनसैवायमुपभुङ्क्ते शुभाशुभम् ।
वाचावाचाकृतं कर्म कायेनैव च कायिकम् ॥ ८ ॥
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ।
वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥ ६ ॥
वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च ।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ॥ १० ॥
त्रिदण्डमेतान्निक्षिप्य सर्वभूतेषु मानवः ।
कामक्रोधौ तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ११ ॥
योऽस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते ।
यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ॥ १२ ॥
जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम् ।
येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ १३ ॥