मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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विविध-प्रायश्चित्त ।
दैववश अथवा पूर्वजन्म के पाप से द्विज प्रायश्चित्त योग्य
होकर बिना उसको किये सज्जनों के साथ संसर्ग न करे । कोई
यहां के कोई पूर्वजन्म के दुराचार से दुष्टात्मा मनुष्य, विविधरूप-
विकारों को पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥
सुवर्णचौरः कौर्नख्यं सुरापः श्यावदन्तताम् ।
ब्रह्महा क्षयरोगित्वं दौश्चर्म्यं गुरुतल्पगः ॥ ४६ ॥
पिशुनः पौतिनासिक्यं सूचकः पूतिवक्रताम् ।
धान्यचौरोऽङ्गहीनत्वमातिरेक्यं तु मिश्रकः ॥ ५० ॥
अन्नहर्त्तामयावित्वं मौक्यं वागपहारकः ।
वस्त्रपहारकः श्वैत्र्यं पङ्गुतामश्वहारकः ॥ ५१ ॥
दीपहर्त्ता भवेदन्धः काणो निर्वापको भवेत् ।
हिंसया व्याधिभूयस्त्वमरोगित्वमहिंसया ॥ ५२ ॥
एवं कर्मविशेषेण जायन्ते सद्भिर्गर्हिताः ।
जडमूकन्धवधिरा विकृताकृतयस्तथा ॥ ५३ ॥
सोना का चोर बुरे नखोंवाला, शराबी काले दांतोंवाला, ब्रह्म-
हत्यारा, क्षयरोगी और गुरु स्त्री-गामी चर्मरोगी होता है । चुगल
की नाक सड़ती है, झूठे निंदक का मुख दुर्गन्धयुक्त होता है ।
अन्नचोर अङ्गहीन और अन्न में मिलावट करनेवाला अधिकाङ्ग
होता है । पक्वान्न चोर को मन्दाग्नि, विद्याचोर गूंगा, वस्त्रचोर
श्वेतकुष्ठी और घोड़े का चोर लूला होता है । दीप चुरानेवाला
अंधा, दीप बुझानेवाला काना, हिंसा से अधिक रोगी और
अहिंसा से नीरोग होता है । इस प्रकार अनेक पापकर्मों से मनुष्य
जड़बुद्धि, गूँगे, अंधे, बहिरे और कुरूप होजाते हैं ॥ ४६-५३ ॥
चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुंद्धये ।