मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दशवां अध्याय। ३६१
दशवां अध्याय। ३६१
व्यापार न करे। ब्राह्मण किसान खेती करके तिल पैदा किये हो तो
उसको यज्ञादि के लिए बेंच डाले। जो पुरुष भोजन, दान और
स्नान के सिवा, दूसरे कामों में तिलका उपयोग करता है वह कीड़ा
होकर पितरों के साथ कुत्ते की विष्ठा में डूबता है। मांस, लाख
और लोन बेंचने से ब्राह्मण तुरंत पतित होजाता है। और दूध
बेंचने से तीन दिनमें शूद्र होजाता है ॥ ८८-९३ ॥
रसा रसैर्निसातव्या न त्वेव लवणं रसैः ।
कृतान्नं चाकृतान्नेन तिला धान्येन तत्समाः ॥ ९४॥
जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः ।
न त्वेव ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित् ॥ ९५ ॥
ऊपर गिनाये पदार्थों को छोड़कर, दूसरे शास्त्र में निषिद्ध पदार्थों
को यदि ब्राह्मण इच्छा से बेंचता है, तो वह सात रात्रि के बाद,
वैश्यपने को पाता है। गुड़ आदि रसोंका घी आदि रसोंसे बदला
करे, किन्तु लोन का रसों से बदला न करे। पका अन्न, कच्चा अन्न
से और तिल दूसरे अन्न से बदल लेवे। इन विधियों से आपत्ति
में पड़ा क्षत्रिय भी वैश्यवृत्ति से जीवन निर्वाह करे। परन्तु ब्राह्मण
की जीविका से कभी जीविका न करे ॥ ९४-९५ ॥
यो लोभादधमो जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः ।
तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ ९६ ॥
वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ।
परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पतति जातितः ॥ ९७ ॥
वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शूद्रवृत्त्यापि वर्तयेत् ।
अनाचरन्नकार्याणि निवर्तेत च शक्तिमान् ॥ ९८ ॥
अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शूद्रः कर्तुं द्विजन्मनाम् ।
पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत्कारुककर्मभिः ॥ ९९ ॥
३६२ मनुस्मृति ।
यैः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः ।
तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ॥१००॥
वैश्यवृत्तिमनातिष्ठन् ब्राह्मणः स्वेपथि स्थितः ।
अवृत्तिकर्शितः सीदन्निमं धर्मं समाचरेत् ॥ १०१ ॥
सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद् ब्राह्मणस्त्वनयं गतः ।
पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ॥ १०२ ॥
नाध्यापनाद्याजनाद्वा गर्हिताद्वा प्रतिग्रहात् ।
दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमाहिते ॥ १०३ ॥
जो नीचजाति का पुरुष लोभ से, उत्तम जाति के कर्म से जी-
विका करे, उसका धन छीनकर राजा देश से निकाल दे । अपना
धर्म किसी अंश में न्यून हो तो भी अच्छा है । पर दूसरे का धर्म
सर्वांग पूर्ण भी अच्छा नहीं । क्योंकि दूसरे के धर्म से जीविका
करने वाला तत्काल जाति से भ्रष्ट होजाता है । यदि वैश्य अपनी
वृत्ति से जीविका न कर सके तो शूद्रवृत्ति से भी निर्वाह कर
सकता है । पर जूठा खाना आदि न करे और दुःख के दिन बीत
जाने पर उसको छोड़ देवे । यदि शूद्र द्विजोंकी सेवा न कर सके
औरउसके पुत्र, स्त्री भूखों मरते हों तो शिल्प कार्य से जीविका करे।
जिन कार्यों के करने से द्विजातियों की सेवा के लिए, अवकाश
मिल सके, ऐसे शिल्पकार्यों को करे । यदि ब्राह्मण धर्म मार्ग में
स्थित, जीविका की कमी से दुःखी हो तो सब से दान लेवे ।
क्योंकि पवित्र दूषित होता हो, यह धर्म से सिद्ध नहीं होता ।
आपत्तिकाल में, निंदित को वेद पढ़ाने, यज्ञ कराने और उनसे
दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं लगता । क्योंकि वे अग्नि और
जल के समान पवित्र हैं ॥ ९६-१०३ ॥
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः ।
आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ १०४.॥