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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय । ७६

तीसरा अध्याय । ७६
स संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता ।
सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः ॥ ७९ ॥
ऋषयः पितरो देवा भूतान्यतिथयः तथा ।
आशासते कुटुम्बिभ्यस्तेभ्यः कार्यं विजानता ॥ ८० ॥
स्वाध्याये नार्चयेदृषीन् होमैर्देवान्यथाविधि ।
पितॄन् श्राद्धैश्च नॄनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा ॥ ८१ ॥
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा ।
पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् ॥ ८२ ॥
एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थे पाञ्चयज्ञिके ।
न चैवात्राशयेत्किंचिद्वैशवदेवं प्रतिद्विजम् ॥ ८३ ॥
इस लोक में और परलोक में सुख चाहनेवालों को गृहस्थाश्रम
का धारण सावधानी से करना चाहिए । क्योंकि ऋषि, पितर,
देवता, प्राणी, और अतिथि सब गृहस्थों से आशा रखते हैं । वेदा-
ध्ययन से ऋषियों का, होम से देवताओंका, श्राद्ध से पितरों का,
अन्न से मनुष्यों का, और बलि से भूत-जीवों का सत्कार करे ।
गृहस्थ को, पितरों की प्रसन्नता के लिए जल, तिल, यव आदि
अन्नों से या दूध, कंद, फलों से नित्य श्राद्ध करना चाहिए। पञ्च-
महायज्ञों में, पितृयज्ञ के लिए एक ब्राह्मण को भी भोजन देना
काफ़ी है, लेकिन वैश्वदेव में सामर्थ्य न हो तो न भोजन दे, पर
एक ब्राह्मण को न खिलाना चाहिए ॥ ७९-८३ ॥
वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्येऽग्नौ विधिपूर्वकम् ।
आभ्यः कुर्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम् ॥ ८४ ॥
अग्नेः सोमस्य चैवादौ तयोश्चैव समस्तयोः ।
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो धन्वन्तरय एव च ॥ ८५ ॥

८० मनुस्मृति ।
विश्वेदेव के निमित्त गृहाग्निमें द्विजोंको नित्य होमकरना चाहिए
वह आहुति पहले अग्नि और सोम को फिर दोनों को एक वार में,
फिर विश्वेदेवको उसके बाद धन्वन्तरिको देनी चाहिए*॥८४-८५॥
कुह्वै चैवानुमत्यै च प्रजापतय एव च ।
सहद्यावापृथिव्योश्च तथा स्विष्टकृतेऽन्ततः ॥ ८६ ॥
एवं सम्यग्घविर्हुत्वा सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् ।
इन्द्रान्तकाप्यतीन्दुभ्यः सानुगेभ्यो बलिं हरेत् ॥८७॥
मरुद्भ्य इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भ्य इत्यपि ।
वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत् ॥ ८८ ॥
उच्छीर्षके श्रियै कुर्याद्भद्रकाल्यै च पादतः ।
ब्रह्मवास्तोष्पतिभ्यां तु वास्तुमध्ये बलिं हरेत् ॥ ८६ ॥
कुहू-अमावास्या, अनुमति-पूर्णिमा और प्रजापति को आहुति
दे । द्यावा और पृथिवी को साथ में दे और अन्त में स्विष्टकृत को
आहुति देना चाहिये । इस प्रकार, अच्छी विधि से होम करके सब
दिशाओं में प्रदक्षिणा करे । इन्द्र, यम, वरुण, चन्द्र और इनके
अनुचरों को बलि देय । घर के द्वार में मरुत को बलि देय, जल,
मूसल-ओखली और वनस्पति को बलि देय । वास्तु पुरुष के शिर
पर अर्थात् घर के ईशान कोण में-श्रियै नमः कह कर बलि देय ।
वास्तु के चरण में-भद्रकाल्यै नमः, मध्य में-घर के बीच में-ब्रह्म-
वास्तोष्पतीभ्यां नमः कहकर बलि देय ॥ ८६-८६ ॥
विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो बलिमाकाश उत्क्षिपेत् ।
दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नक्तं चारिभ्य एव च ॥ ६० ॥
पृष्ठवास्तुनि कुर्वीत बलिं सर्वात्मभूतये ।

  • इस प्रकार आहुति करने में यों बोलना-अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, अग्नी-
    सोमाभ्यां स्वाहा, विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा ।