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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

कबीर सागर कबीरपन्थ, विशेषकर धर्मदासी शाखा, का विशाल धार्मिक ग्रन्थ-समूह है, जो मुख्यतः कबीर साहब और उनके शिष्य धर्मदास के संवाद के रूप में है। इसमें अनेक छोटे-बड़े ग्रन्थ, जैसे ज्ञान सागर, अनुराग सागर और बोध सागर के विभिन्न बोध, ग्यारह भागों में संकलित हैं। यह कबीरपन्थ के सृष्टि-विचार, गुरु-परम्परा और साधना का मुख्य स्रोत है।

पहले भाग ज्ञान सागर के प्रकरणों से इसकी विषय-वस्तु का अनुमान होता है: मुक्ति-भेद और अमरलोक, सत्य पुरुष का वर्णन, सृष्टि की उत्पत्ति, द्वीपों का वर्णन, धर्मराय (निरञ्जन) का सत्य पुरुष की सेवा से द्वीप और मानसरोवर पाना, कामिनी को निगलना और शाप पाना, चौदह यमों के नाम और कर्म, ज्ञानी जी (कबीर) का पृथ्वी पर आना और धर्मराय से वचन लेना, जगन्नाथ की स्थापना का प्रसंग, तीन देवों और आदि माया की कथा, समुद्र-मन्थन, वेदों और चार खानियों की उत्पत्ति, और फिर बलि, सनक-सनन्दन तथा नारद के चरित्र।

यह सम्पूर्ण ग्यारह भागों का संस्करण खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस, मुम्बई ने प्रकाशित किया है। २१३६ पृष्ठों में पूरा कबीर सागर एक साथ उपलब्ध होने से यह कबीरपन्थ के अध्येताओं के लिए एक सम्पूर्ण सन्दर्भ है।

बोधसागर

( ५७ )

पातककी खान और कालके दुःख देनेका स्थान है। जन्म कुविद्या का फल, लोभका कमल और ज्ञानका आवरण है। जन्म ही जीवका बन्धन, मृत्युका कारण और अन्त जंजालोंके मूल है। जन्म ही सांचे सुखका छल, चिंताका जंगल और वासनाओंका विस्तार है। जीवकी मिथ्या दशा, कल्पनाका भण्डार और ममतारूपी डाकिनीका लीला स्थान जन्म ही है। मायाकी लीलाकी रंगभूमि, तमोगुणकी गहरी और भयानक कूप और जीवको मोक्षमार्गसे भटकानेका जड़ जन्म ही है। जीवको मिथ्या देहाभिमानमें फँसाकर सत्य पदसे अष्ट कर कालके नाना पाशोंमें फसानेवाला जन्मके सिवाय दूसरा कौन है ? यदि जन्म न हो तो शरीरकी झूठी ममतामें पड़ा हुआ यह जीव मिथ्या विषय-वासनामें लगकर अपने सत्य ज्ञानस्वरूपको भूलकर मिथ्या आशा और झूठी तृष्णामें फँसकर क्यों कालका चारा बने। यदि जीव शरीरके साथ सम्बद्ध न होता तो इसे नाना प्रकारकी विपत्ति और संकटमें पड़कर दुःख उठानेकी क्या आवश्यकता थी ? जन्म लेनेवाले शरीरका मूल विचार करनेपर इस शरीर ऐसी अपवित्र वस्तु कोई भी नहीं मिलती। रजोदर्शनवाली स्त्रीके मासिकस्त्रावके पश्चात् बचे हुए और पिताके शरीरसे निकलते हुए अपवित्र वीर्य द्वारा इस शरीरकी उत्पत्ति है। जब ऐसी अपवित्र वस्तुओंके संयोगसे यह शरीर बना है तब इसमें पवित्रताका कहाँ पता है। स्त्रीके रक्तके औटाने पर इस शरीरका लोथडा बनता है यद्यपि ऊपरसे देखनेमें अपवित्र जनोंको यह सुन्दर देख पड़ता है तथापि भीतर तो वैसेही घृणित नरकका थैला बना हुआ है, फिर यह शरीर कैसा देख पड़ता है, जैसे चमड़े भिगोनेका चमारका कुण्ड हो। चमारका कुण्ड तो

( ५८ )

जगजीवनबोध

धोनेसे शुद्ध भी हो जाता है, किन्तु इसे नित्य प्रति धोने पर भी न इसकी दुर्गन्धि जाती है न इसमें पवित्रता आती है ।

हड्डियोंकी ठठरी बनाकर उसमें नस और नाडियोंका बन्धन लगाया है और मेद और मांससे इसे जोडा है, जिस लोहूका नाम ही अशुद्ध है उसी रक्तसे इस शरीरकी जब बनावट है तब इसकी पवित्रताका क्या ठिकाना है ? शरीर दुर्गन्धिसे भरा है क्योंकि अन्दर बाहर मलिन वस्तुओंसे ही इसकी बनावट हुई है । समस्त शरीरमें शिर सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है, किन्तु उसमें भी नाकमें से सदा दुर्गन्धि बहा करती है और कान पकनेपर ऐसी दुर्गन्धि निकलती है कि, निकट भी खड़ा नहीं रहा जाता । आंखमेंसे कीचड़ और मुँहमेंसे थूक, लार और दुर्गन्धि निकला करती है । इस प्रकारसे समस्त शरीर अपवित्र और मलिन वस्तुओंसे बना हुआ है ।

उत्तमसे उत्तम पदार्थ भी भोजन कर लेनेपर वह कई घण्टोंही में घृणित मल बन जाता है । निर्मल शुद्ध जल पीनेसे शरीरके संयोग द्वारा वह सूत्र हो जाता है और इन्हीं पदार्थोंसे शरीरका पोषण भी होता है, राजासे प्रजातक महान भक्त, राजासे महान पापी अघकर्मोत्क सबके पेटमें ये अपवित्र पदार्थ भरे हुए हैं और इन अपवित्र पदार्थोंका शरीरसे ऐसा सम्बन्ध है कि यदि कोई इन मलोंको शरीरसे निकाल कर शरीरको शुद्ध करना चाहे तो तुरत ही प्राणी मृत्युको प्राप्त होवे । जिस समयमें यह जीव अपनी वासनाके अनुसार शरीर धारण कर माताके गर्भमें प्रवेश करता है और नव महीनेतक यह शरीर माताके उदरमें रहता है, उसमें नाक मुँह आदि नवों दर्वाजे बन्द होते हैं और जिस समय वायुका तो प्रवेश भी नहीं होता,

बोधसागर

( ५१ )

उस समय में माताके शरीर से जो अपवित्र रक्त निकलता है उसकी गर्मी द्वारा हड्डी और मांस जलता है। ऊपरसे चमड़ेकी थैली न होने के कारण बालकका मांससमय शरीर माताके तीखे चरपरे आदि पदार्थोंके सेवनसे महान कष्टित होता है। गर्भके ऊपर एक सपेद २ चमड़ा लपेटा होता है और गर्भ मलमूत्र के नरक कुण्डके निकटही होता है तथा उसकी नाभिमें एक नली लगी होती है जिसके द्वारा गर्भका पोषण होता है। वात पित्त तथा विषा आदि अनेक अपवित्र पदार्थोंसे और नाना प्रकारके पेट के कीड़ोंके नाक तथा मुहँके पास फिरनेपर बालकका मन चबराता है। इस प्रकारसे अनेक असंख्य कष्टमें नव महीना तक कैद हुये जीवको अत्यन्त कष्ट और दुःखके कारण इसे प्रभु सदगुरुका स्मरण आता है तब उस समय अत्यन्त विनीत भावसे प्रार्थना करता है कि, 'हे सदगुरु! हे परमात्मन्! यदि इस बार कृपा करके मुझे इस कष्टमें से छुटकारा दे तो मैं अपने आत्माके कल्याणके मार्गको धारण कर फिरसे ऐसे कष्टमें आने से छुटकारा कर लूँगा।' इसही प्रकार से अनेक समयतक प्रार्थना करते करते प्रभुकी कृपासे समय पूरा होनेपर माताके पेट में पीड़ा आरम्भ होती है। उस समयमें मुँह नाक और मस्तिष्क जो श्वासके मार्ग हैं। मांसके टुकड़ोंसे एकदम बन्द होजाते हैं, श्वासोच्छासका द्वार बन्द होते ही बालकको मूर्च्छा आती है और जीव अचेतनावस्थामें तड़फड़ाने लगता है। तड़फड़ानेमें यदि शरीर आड़ा टेढ़ा हुआ तब बाहरवाले लोग गर्भको काटकर निकालनेकी सम्मति देते हैं। यदि किसी युक्तिसे ठीक हुआ तो हुआ नहीं तो हाथ डालकर बालकका जोई अंग हाथआया उसीको काटना आरम्भ करते हैं और क्रमशः काटकर उसे बाहर निकालते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि, स्वयम् बालक तो मरता ही है उसके

( ६० )

जगजीवनबोध

साथ २ माताका भी प्राण नाश होता है । यदि पूर्व पुण्यकी सहायतासे शरीर सीधाही बाहर निकला तब प्रथम शिर बाहर आता है, मार्ग छोटा होनेसे धाई सिरको पकड़कर बल पूर्वक बाहर खींचती है इसमें भी कभी २ ऐसा होता है कि शिर बाहर निकला और थड उसमें ही अटक जाता है । उस दशामें बालककी मृत्यु होती है और संयोगसे माता बच गयी तो बालकके शरीरको काटकर बाहर निकालते हैं । यदि पुण्यवश सकल शरीर बाहर निकल आया और बालक जीता जागता रहा तो बाहर आतेही बाहर के पवन लगनेसे बालकको इतना कष्ट होता है कि, मानो सहस्र बिछुवोंने एकसाही डंक मारा है ऐसे असह्य कष्ट के कारण कभी २ बालक अचेत हो जाता है तब उसको चेत दिलाने के लिये नाना प्रकारके उपाय किये जाते हैं । कभी बालक को च्यूंटी काटकर जगाते हैं और कभी २ शस्त्रका प्रयोग भी करना पड़ता है । और जब बालक रोता है तब सबको आनन्द आता है इस प्रकार से महान कष्ट भोगकर यह जीव जब बाहर निकल कर संसारके पदार्थोंको देखता है और नाना प्रकार के मोहमें फँसानेवाली मायाके जाल माता पितादि की प्यारी प्यारी बातों को सुनता है तब गर्भ के कष्ट और प्रार्थना तथा वचन को भूलकर मोह माया में फँसता है और जगतके नाना प्रकारके क्षणिक सुख और दुःखमें पड़ा हुआ यह, साहिब और अपने स्वरूप को भूलकर भी कभी याद नहीं करता । इस प्रकारका गर्भका दुःख सर्वे प्राणीको होता है, वही कथा इस ग्रन्थमें जगजीवन ( जीव ) के बहाने से ग्रन्थकारने लिखकर सबको उपदेश दिया है ।

इति

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-गुरुडबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

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Physique

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीगणेशाय नमः

श्रीगणेशाय नमः

सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर जीवोंको चितानेकी आज्ञा देना

श्रीसद्गुरुभ्यो नमः

अथ श्रीबोधसागरे

वच्छत्तरंगः

ग्रन्थ गुरुडबोध

सोरठा-गुण गण जेहि अशेष, बने न वर्णत सहसमुख ।
वंदौ सोइ हंसेश, सत्यकबीर जो प्रगट जग ॥

धर्मदास वचन

साखी-धरमदास बिन्ती करै, सुनहु जगत उधार ।
गुरुड बोधको भेव सो, अब कहहु यहि बार ॥

सतगुरु वचन

सत गुरु कहन तबहिँ अस लागे । गुरुड सो ज्ञान जेहि विधि पागे ॥

सत्य पुरुष वचन

आप पुरुष यक शब्द उचारा । हो सुकृत तुम जाहु संसारा ॥
नाम पान तुम लेहु हमारा । जाय छुडायहु जिव संसारा ॥
सत्य लोक ते करहु प्यानी । लेहु शब्द तुम बहुविधि बानी ॥
लेहु शब्द अजरमनि ज्ञानी । सत्य शब्द बोलहु सहिदानी ॥
आज्ञा मानि हमारी लेहु । जाय पाँव पृथ्वी तुम देहु ॥
कहो सबन सों शब्द बुझायी । भक्ति प्रताप सत्तनाम सहायी ॥

ज्ञानी वचन

तब ज्ञानी उठि मस्तक नावा ! तुव प्रताप हम हंस छुडावा ॥
जुगन जुगन में हमहिँ सिधाये । जिन माना तिनही सुकृताये ॥

नं. ५ कबीरसागर - ४

ज्ञानीजीका संसारमें आना और गरुड़से भेंट होना

( ६६ )

गरुड बोध

तब साहब मोहि दाय़ा कीन्ह़ा । बचन मानिहम शिरपर लीन्ह़ा॥
करि प्रणाम परदक्षिण कीन्ह़ा । पाछे जगहिं पयाना दीन्ह़ा ॥
यही भौंति धर्मनि जग आवा । बहुत भौंतिते जिव समझावा॥
प्रथम गरुडसे भेंट जब भयऊ । सत्य नाम कह बोल सुनयऊ॥
धर्मदास सुनु कह्यो बुझायी । जेहि विधिसे ताही समझायी ॥

गरुड वचन

शीश नाइ तिन पूछा भाये । हौ तुम कौन कहाँसे आये ॥
कौन दिशा ते तुम चलि आऊ । अपनो नाम कही समझाऊ ॥

ज्ञानी वचन

कह ज्ञानी है नाम हमारा । दीक्षा देन आयऊ संसारा ॥
सत्यलोक से हम चलि आये । जीव छुडावन जग महाँ आये ॥
सत्यपुरुष मोहि आज्ञा दीन्ह़ा । सत्य शब्द हम लेइ तब लीन्ह़ा ॥

गरुड वचन

सुनत गरुड़ अचम्भो माना । सत्य पुरुष आही को आना॥
प्रत्यक्ष देव कृष्ण कहावैं । दश औतार सो धरि धरि आवैं॥

ज्ञानी वचन

तब हम कहा सुनहु तुम स्याना । सत्य पुरुष तुम नहिं पहिचाना॥
अवतारन का कहो विचारा । इतने साहब रहै नियारा ॥
जाकर कीन्ह सकल विस्तारा । सो साहब नहिं जग औतारा ॥
योनी संकट वह नहिं आवे । वह तो साहब अछय रहावे ॥
जहाँ लगे जो जगमें आये । तहाँ लगि सबही अंश कहाये॥

साखी-ताते साहब अछय है, तीन लोक सों न्यार ।
योनि संकट ना आवई, ना वह लेइ औतार ॥

गरुड वचन-चौपाई

तबही गरुड जो बोलहिं बानी । कौने देश बसन है ज्ञानी ॥
हम बाहन हैं कृष्ण के भाई । तिनकी गति तुमहू नहिं पाई ॥

गरुड़का श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना

बोधसागर

( ६७ )

तीनि लोकके ठाकुर आही । तिनके आगे कौनको शाही ॥
तीनि लोकके ठाकुर कहिये । तिनके और कौनको गहिये ॥
सोई मोहि अब देहु बतायी । मोरे मन चिंता समुहायी ॥
दूसर कौन सो देहु बतायी । हमरे मन गुमान नहिं आयी ॥

ज्ञानी वचन

सुनहु गरुड यक वचन हमारा । वह साहब है सबसे न्यारा ॥
यह तो सबै ईश्वरी माया । उपजहिं विनसहिं बहुरि विलाया ॥
वह नहिं आवे नहीं जाहीं । वह तो सदा अजर घरमाहीं ॥
उनकी आज्ञा इन पर आवें । तब इन गरभ वास सो पावें ॥
तुम पर सदा कृष्ण असवारी । काहे न दाय़ा करहिं विचारी ॥
हम तो शब्द संदेशी आये । योनी संकट नहिं निरमाये ॥
तब हम उसको तत्त्व लखावा । होइ विदेह तब वचन सुनावा ॥

गरुड वचन

तबही गरुडे अस्तुति ठानी । तुम साहिब निर्गुण सहिदानी ॥
तुमहो प्रभू सगुण ते न्यारा । निर्गुण तत्त्व साहिब विस्तारा ॥
धरि अस्थूल मोहि दरश दिखावा । निर्गुण शब्द प्रभु मोहि सुनावा ॥
अब गुरु मैं बन्दों तब पायो । अब जाना प्रभु तुम्हरो भायो ॥
निज प्रतीति हमरे मन आऊ । हंसराज मोहि दरश दिखाऊ ॥
अब प्रभु मोहीं दर्शन दीजे । हंस उबार आपन करि लीजे ॥
भेद तुम्हार सकल मैं पाया । धरि स्वरूप तुम दरश दिखाया ॥

ज्ञानी वचन

देह धरी हम दरशन दीना । तब उन चरणबन्दना कीन्हा ॥

गरुड वचन

शीश नाइ चरणन लपटाये । अब साहब मोहिं लेहु बचाये ॥
सार्वी-निर्गुण प्राण अधार तुम, दरश दीन्ह प्रभु आय ।
आपन करि समझावहु, लेहु जीव मुकुताय ॥

गरुड़का ज्ञानीजीके आधीन होना

( ६८ )

गरुडबोध

ज्ञानी वचन—चौपाई

अहो गरुड तुम चीन्हा भाई । दे परवान लेऊँ मुकुतार्ई ॥
बाहर भीतर सबै बताओं । तुमसों गरुड कछू न छिपाओं ॥
अब तुम जाहु कृष्णके पास । आज्ञा मानिके करहु विलासा ॥
आज्ञा मांगि कृष्णसे आओ । तब आरति विस्तार बनाओ ॥
तबही गरुड गये पुनि तहवों । श्रीकृष्ण बैठे रहे जहवों ॥
जाइ गरुड तब विन्ती लाई ।

गरुड वचन श्रीकृष्ण प्रति

तुम प्रभु सदा संत सुखदाई ॥
हम यक निर्गुण भेद जो पाया । ताका हम प्रभु विन्ती लाया ॥
ओय कबीर सत्यलोकसे आये । तिन मोहि भेद कही समझाये ॥
उन अन्तर नहिं ऐसो दिढावा । निज साहब नहिं पृथ्वी आवा ॥
नाम कबीर उन आप धराया । यह शब्द उनही भाष सुनाया ॥
निर्गुण भेद सबनते न्यारा । अस उन हमसो कीन्ह पुकारा ॥
जो मोहि आज्ञा करो गुसाई । तौ उनको गुरु करिये जाई ॥
दाया करि मोहि आज्ञा दीजै । सो हममानि अपन फिर लीजै ॥

श्रीकृष्ण वचन

सुनिके कृष्ण उतर तब दीन्हा । भले गरुड तुम उनको चीन्हा ॥
भले गरुड तुम पूछा आयी । दुविधा दुर्मति कपट नशायी ॥
जो यह भेद गुप्त करि रखते । हमसों तुमसों अन्तर पढ़ते ॥
जो तुम हमसों पूछो भाई । उनकर भेद है अगम उपाई ॥
वह निर्गुण हम सर्गुण भाई । निर्गुण सर्गुण बहु बीच रहाई ॥
हम सर्गुण कई बार औतारा । वह साहिब है सबते न्यारा ॥
जाकर पठाये वह यहाँ आये । तिनही पुनि हम कहँ निर्माये ॥
उन आज्ञा जब कीन्ह उचारा । तब हम लीन जोइनि औतारा ॥
जो कबीर अहहीं अर्थाई । सोई वचन सत्य है भाई ॥

बोधसागर

( ६९ )

गरुड वचन

गरुड कहे तब काहे न भाषा । कैसे मोहि छिपाइके राखा ॥
निर्गुण भेद प्रभु मोहि छिपायी । सगुण भेद दीन्हा फैलायी ॥

श्रीकृष्ण वचन

सुनो गरुड यक शब्द निदाना । निर्गुण भेद कोइ विरले जाना ॥
देह धरी हम क्रीडा कीन्हा । यहै मानि सब काहु लीन्हा ॥
हम गीता महँ सन्धि जनाई । ताको कोइ न चीन्हे भाई ॥
निर्भय भक्ति कह्यो परमाना । ताकर भेद काहु नहि जाना ॥
पठि गीता पण्डित बौराये । अर्थ भेद को गम नहि पाये ॥
पठि गीता औरहि समुझावे । आप भरममें जन्म गमावे ॥
करै अचार छूतिकै माने । औरनको हीनहि करि जाने ॥
सर्वमयी हमहीं सब माहीं । पण्डित अँधरे समुझत नाहीं ॥
हम सबमें सब हमरे माहीं । हमते भिन्न कोइ जानत नाहीं ॥
करै सो कौन अचार बिचारा । पण्डित भूले धरि हँकारा ॥
सर्वमयी है नाम हमारा । पण्डित अर्थ न करै विचारा ॥
कहि गीता हम सब समझायी । गीता पढ़ै समुझि नहि जायी ॥
कब हम पूजा नेम बतावा । कब हम जीव घात फरमावा ॥
ब्रह्मा विष्णु और शिव कहवाये । इन तीनों मिलि बाजी लाये ॥
तेहि बाजी अटका सब कोई । निर्गुण गमि कैसे के होई ॥
बाजी लायके जग भरमाया । निर्गुणकी गति काहु न पाया ॥
जो जो कछु हम कहा उधारी । सो काहु नहि दृष्टि निहारी ॥
हम जानहि सब भेद अवगाहा । और देव नहि पावहि थाहा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव बाजी लाये । उन काहु नहि और सुहाये ॥
अपस्वारथसों बहुविधि लीन्हा । परमारथ काहु नहि चीन्हा ॥
गीता मथी कही समझायी । सो अर्जुन नहि जानी भाई ॥
चारि वेद मथि गीता कही । सो अर्जुन निज मानी सही ॥

श्रीकृष्णका गरुड़को कबीर साहबको गुरु बनानेकी आज्ञा देना

( ७० )

गङ्गबोध

श्रवण लगाय गीता उन सुनी । रहनि गहनि एको नहिं गुनी ॥
रहनि गहनि उनहुँ नहिं पायी । अर्थ सुनी सब कान उडायी ॥
सुनि सुनिसो सब जग अरुझावे । सांचा भेद न कोई पावे ॥
उनहुँ अचार विचार न छूटा । ब्रह्मा विनशे यम सो लूटा ॥
श्रवण अवाज सबहिंकी लीन्हे । रहनी गहनी कोइ न चीन्हे ॥
अहमेव कीन्हो अधिकारा । ताते जाहि गले सोहि मारा ॥
करै विचार पाखण्ड छूटे । भर्म विगुर्चन यमकी लूटे ॥
पण्डित बाँचि गीता अथावे । गीता केर अर्थ नहिं पावे ॥
फिर फिर हमहीं को ठहरावे । पंडित अँधरा भेद न पावे ॥
सुनहु गुरुड यक शब्द हमारा । होय निर्गुण जिव केर उवारा ॥
हम कबीर कै निज करिजाना । उनहीं सकल कीन मण्डाना ॥
उन्ही सब अस्थान हटाया । जहाँ ले तीर्थ तिन सबहि गढाया ॥
जहाँ जहाँ उन चरण छुआया । सोइ सोइ तीर्थ अस्थान बनाया ॥
आपु जानिके चर्ण जो दीन्हा । यहि विधि सबको थापन कीन्हा ॥
वही मानि सब काहु लीना । आप गुप्त होय काहु न चीना ॥
इन सबही मिलि बाजी लायी । आप आपकी कीन बढाई ॥
जिनकी आज्ञा सब कछु भयऊ । तिनको छिपाये तीनों दयऊ ॥

सारखी-कहैं कृष्ण कबीरसों, गुरु तुम करो कबीर ।

हंस लै जइहैं लोक के, खेइ लंगैहैं तीर ॥

चौपाई

चरण टेकिके गुरुड रिगायी । कीन्हो भेंट द्वारका जायी ॥
वृन्दावन होय आज्ञा लीन्हा । दर्शन जाइ द्वारका कीन्हा ॥
चरण टेकि प्रदक्षिण दीन्हा । मस्तक नाइ बन्दगी कीन्हा ॥
समरथ कहो मोहि समझायी । आरति साज मैं लेउँ मैगायी ॥
तब हम उनपै पूछे लीन्हा । कहो कृष्ण आज्ञा कस कीन्हा ॥

गरुड़का आरतीका साज इकट्ठा करना

बाधसागर

( ७१ )

गरुड वचन

तबही गरुड कह्यो अर्थाई । अस्तुति कीन्ह बहुत लौ लाई॥
एको बात गोंय नहीं राखी । कृष्ण बहुत कै अस्तुति भाखी॥
निर्गुण के हम गम्य न जाना । बहुत भाँति उन गम्य बखाना॥
उनतो निर्गुण गम्य बतावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा॥
औ हम उन कहँदल जो दीन्ह। उन आवे की आज्ञा कीन्ह। ॥

सत्गुरु वचन

तब हम उनको भेद बतावा । एकोत्तर से नरियर फरमावा ॥
बहुत जतन कै मंडप छावा । बहु अतुरागी साज सजावा ॥
जेतके साधु द्वारका आया । सबको गरुड कानि बुलवाया ॥
जेतिक साधू तहाँ रहाये । गरुड सबहिंको दल पहुँचाये ॥
जहाँ ले सुनि हैं सहस अठासी । नाग लोकके नाग जो वासी ॥
वासुकि देव जो आपु रहाये । औरो नाग बहुत चलि आये ॥
आय विष्णु ब्रह्मा दोउ भाई । शीव आय बहु तेज जनाई ॥
सब पर तेज महादेव कीन्ह। तुम सब मिलिके गरुडहि चीन्ह। ॥
तबहि गरुड पूछा सहिदानी । जोई कृष्ण कहा मोहि बानी ॥

गरुड वचन

सुनहु ब्रह्मा विष्णु मदेशा । यह मुहि कृष्ण कहा उपदेशा ॥
एति समय बीति जब जायी । तब हम तुमसों कहब बुझायी ॥
जोइ कृष्ण सब कहा विवेकी । सो तुम्हरी मति आँखिन देखी ॥

महादेव वचन

यह सुनि महादेव रिसियाने । हमरी गति तुम काहु न जाने ॥
हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमहीं छोड़ि अवर चित लाई ॥
तुम हैं पंछी मतिके हीना । हमहिंछोड़ि औरहिं चित दीना ॥

महादेवका बोध करना और गरुड़का उन्हें समझाना

( ७२ )

गरुडबोध

गरुड वचन

तबही गरुड कहे समझायी । मति हमारि कोइ विरले पायी॥
अजर अमर घर पहुँचे सोई । मती हमार लखै जो कोई ॥
अवसर वीति जबै यह जायी । तब महादेव हम कहब बुझायी॥
सब साधुन की करिये सेवा । यह निज आहि भक्तिको भेवा॥
सबको गरुड जो भोजन दीन्हा । बहुत यतनकै भक्ति सो कीन्हा॥
करि प्रसाद जब माँड मैडायी । हमसे पूछी विन्ती लायी ॥
तबहि गरुड विन्ती अनुसारी । चलिये समरथ चौक विस्तारी॥
धर्मदास सुनि चौका कीन्हा । लोक समान पयाना दीन्हा ॥
संत समाज सब गावहिं गाजी । ऐसी भक्ति भक्त भल साजी ॥
बजो शंख वीन स्वर सोई । झांझन केरी बाजन होई ॥
ताल मृदंग गगन सो बाजै । ऐसी भक्ति भक्त भल छाजै ॥
शब्द स्वरूप तबै हम भयऊ । तुरत जाइ सत्यलोकहि गयऊ॥
सकलो साज वहां ते आना । बहुत भाँतिकी भक्ति जो ठाना ॥
सत्यलोक ते उतरे अंशा । अधम कालका भया विध्वंशा॥
सब समेत साज जो आये । जग मग ज्योति बरनिनहिं जाये
निर्गुण भक्त हो सुरति संजोई । कौतुक देखि रहे सब कोई ॥
नाग लोक को कीना मोही । ऐसी भक्ति न देखी कोही ॥
शेषनाग भये आपु मोहाने । औरकी बातें काहि बखाने ॥
मोहे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद मोहे शुकदेव शेशा ॥
गण गंधर्व मोहे सब झारी । निर्गुण भक्ति न परे विचारी ॥
मोहे कृष्ण द्वारका वासी । मोहे सकल सिद्ध चौरासी ॥
यह समाज सो कैसो आई । ताहि देखि सब रहैं झँवाई ॥
ताते रंग उठे ततकारी । मोहि रहे सब सभा विचारी ॥
मोहे विष्णु वैकुण्ठके वासी । मोहे इन्द्र रुद्र लोक कैलासी ॥

गरुड़की आरतीमें सब देवोंका आना और गरुड़का परवाना लेना

बोधसागर

( ७३ )

मोहे इन्द्र और उरवशी । नौ लख तारा सूरज शशी ॥
यहि विधि कीन्ह भक्ति मनलायी । तनमन सुधि सकलौ बिसरायी ॥

साखी-तेतीस कोटि देवता, गण गन्धर्व सब झार ।
सुर असुर सबही थके, लीला नाम अपार ॥

चौपाई

धन्य धन्य सब करहिं पुकारा । धन्य गुरुडजी ध्यान तुम्हारा ॥
धन्य कबीर जिन भक्त उधारा । भक्ति ज्ञान का कीन पसारा ॥
धन्य गुरुड सबही अस कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदय चित दीन्हा ॥
भक्ति मंडान पहर दोय भयऊ । तहैं हम उठिके आरति कियऊ ॥
आरति भइ पुनि बहुते भांती । बरणि न जाय शोभाकी कांती ॥
एकोतर नरियर मालुम कीन्हो । बाँटि प्रसाद सबनको दीन्हो ॥
सत्य सत्य सबन मिलि कीन्हा । धन्य गुरुड तुम यह मति लीन्हा ॥

गुरुड वचन

विन्ती करै गुरुड चित लायी । सबसे करब हम चर्चा जायी ॥
दया करहु हम पैं गुरु देवा । तीनों देव सो कहिहो भेवा ॥
हम तो चरचा करब गुसाई । हमको दो लखाइ सब ठाई ॥

ज्ञानी वचन

अहो गुरुड तुम हौ बड ज्ञानी । विद्या देहु सब घरके जानी ॥
घर आयेसे राड न कीजै । क्षमावंत हो बिदा सब कीजै ॥
बिदा देहु सबही सावधाना । तिनके घर तुम करिहो ज्ञाना ॥
अस्तुति ठानि चले सब देवा । धन्य कबीर देवनके देवा ॥

साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि आज्ञा लीन ।

अपने अपने लोक को, सबही प्याना कीन ॥

चौपाई

सबको बिदा जबहि करि दीन्हा । तबहिं गुरुड अस कहबे लीन्हा ॥

गरुड़का त्रिदेवसे चर्चा करने जाना

( ७४ )

गरुडबोध

गरुड वचन

हमको हुक्म तुम देहु गुसाईं । तुव प्रताप करौं बडाईं ॥
तुमरी कृपा काल हम जीता । सबही भांति छुटी मन चीता ॥
तुमरी दया आश सब झूटी । भया निराश तब फन्द़ा टूटी॥
अब मनमें मोहीं यक आवै । चरचा करनकौ मनमें भावै ॥
जो आज्ञा हम तुम तुमरी पावै । फिरि सर्बहिं सो चर्चा लावै॥
त्री देवन सों कहूँ बुझायी । तिन कर फँद सब देहुँ तुडायी ॥

ज्ञानी वचन

तब हम तिनको बहु समझावा । निर्गुण सगुण सब भेद बतावा॥
पाईं भेद गरुड मनसाने । त्रिदेव सो चरचा मन आने ॥
तब हम आज्ञा तेही दीना । हमहू बिदा तहाँ से लीना ॥
साखी-दया लेइ गरुड चले, हृदये धरि गुरु ज्ञान ।
ब्रह्मपुरी ठाढे भये, चर्चा कर मन ठान ॥

चौपाई

हुते द्वारका ज्ञान मडाना । गरुड वहाँते कीन्ह पयाना ॥
जाइ सुमेरु पर बैठे जायी । कीन्हो भेंट ब्रह्म सों आयी ॥
गरुड ब्रह्म लोकहि जब आये । ब्रह्मा आदर कीन्ह बनाये ॥
आदर भाव ब्रह्मा तब कीन्हा । डारि सिंहासन बैठक दीन्हा ॥
जल करजोरि ब्रह्म लइ आये । गरुड के चरण पखारन आये॥

ब्रह्मा वचन

धन्य गरुड यहाँ पगु धारी । अब पूरी सब आश हमारी ॥
तुमतो बाहन कृष्ण के भाई । आज कृष्ण पग धारे आई ॥
जो तुम हमपर दया कीन्हा । कृष्ण बदल हम तुमकर चीन्हा॥
आयसुमौंगिप्रसाद जो भयञ्ज । करि प्रसाद वैकुण्ठमें गयञ्ज ॥
पान फूल जो अगर मैगायञ्ज । इच्छा भोजन तहँवा पायञ्ज ॥

बोधसागर

( ७५ )

बैठे जाय पुनि गरुड समाजा । उठि तब चर्चा निर्गुण साजा॥
ब्रह्मा कह तुम कैसे आये । सो मोहि वचन कहो समुझाये॥
कौन काज यहाँ पगु धारा । कहे ब्रह्मा तुम कृष्णके प्यारा॥

गरुड वचन

तबही गरुड कहे समझायी । तुमहिं चितावन आयउँ भाई ॥
तुमहिं चितावन हौं पगुधारा । आदि पुरुष वह रहै नियारा ॥

साखी-विनु देखे को जाय यह, नहिं पावे कोइ ठाम ।

जन्म अनेक भरमत फिरे, मरे विनु गुरुके नाम ॥

आदि पुरुष आगम है, जाको सकल प्रकाश ।

निर्गुण भेद अपार है, तुम कहैं बांधी आश ॥

चौपाई

कोटिन ब्रह्मा गये सिरायी । अविगतकी गति काहु न पायी॥

कोटिन ब्रह्मा पृथ्वी विलाने । अविगतकी गति काहु न जाने॥

कोटिन विष्णू गये सिरायी । फिरि फिरिकै पृथ्वीहु विलायी॥

कोटिन रुद्र देह धरि लीना । अस्थिर होय जगत्सो कीन्हा॥

कोटिन इन्द्र अवतार जोलीन्हा । अविगति पुरुष काहु नहिं चीन्हा॥

गण गंधर्व नर कौन चलावै । सनक सनन्दन पार न पावै ॥

शेष नाग बहु भांति भुलाने । आदिपुरुषकी खबरि न जाने॥

सब परिवार जो भूले भाई । अवगति की गति काहु न पाई॥

भुला देखि जिव दथा न आई । जीव अनेक घात किहु भाई ॥

सब भूले कोइ लागु न तीरा । महा अधम सो आहि शरीरा॥

देह धरी सब भरमें आई । आपन आप सब करै बडाई ॥

अहमेव कैसे खोजेहु जाई । मांताको कहा न कीनेहु भाई ॥

१ जिन २ पुस्तकों में सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका वर्णन आया है, उन सबोंमें आद्याकी आत्माको न मान कर हठ करके ब्रह्माका निरंजन के खोजमें जानेका वर्णन आया है वहासे जानना चाहिये और यथार्थ भेद गुस्ते ।

( ७६ )

गुरुवोध

कीन्होखोज तुम आपुगुमाना । नहिं पाये तब रहे लजाना ॥
खोजकीन्हो जब अन्त न पावा । तब तुम आप आप ठहरावा ॥
आपु दृढाय थापना कीन्हा । सोई अहम् निर्गुण नहिं चीन्हा ॥
तुमरे भूले जगत भुलाना । आदिपुरुषको मर्म न जाना ॥
यहि विधि जग सब रहत भुलायी । टीका मूल काहु नहिं पायी ॥
तेतीस कोटी देव भुलाये । यहि भूले कोह गम्य न पाये ॥
सारखी-भूले गम्य न पाइया, भूले मूठ गँवार ।
टीका भूल न जानई, अरुझि रहा संसार ॥

चौपाई

तुम बाजीगर बाजी लाये । तुमतो सब दुनियाँ भरमाये ॥

ब्रह्मा वचन

सुनि ब्रह्मा तबहीं रिसियाने । हमते दूजा केहि को जाने ॥

गुरु वचन

सुनु ब्रह्मा यक वचन हमारा । तुम अस ब्रह्मा कोटि हजार ॥
कोटिन ब्रह्मा ठाढ़े द्वारा । कोटिन वेद सो करहिं उचारा ॥
खोज करन ब्रह्मा तुम गयऊ । कहूँ पिता के अन्त न पयऊ ॥
झूठ कहे मातासों जायी । ताते ब्रह्म शाप तुम पायी ॥
माता ते तुम भये लबारा । आय जीवमें सकल संसारा ॥
सबकी प्रतिमा थीर न आयी । आपु समेत सकलो भरमायी ॥
जो कोह कहै भूलकी वानी । कोटिन जन्म नरककी खानी ॥
यह संसार रहट की घरिया । कइक बार राजा अवतरिया ॥
कइक बार नरक में परई । कइक बार ब्राह्मण औतरई ॥
यहि विधि जीव आवे जायी । भरमि भरमि चौरासी पायी ॥
कोटिन बार अस्थावर जानी । कोटिन बार पिंडज उत्पानी ॥
कोटिन जन्म अंडज अवतारा । यहि विधि भरमहिं जीव विचारा ॥
यहि विधि भरमें जीव विचारा । विनु सतगुरु नहिं होय उबारा ॥