कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 647, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ६७ )
तीनि लोकके ठाकुर आही । तिनके आगे कौनको शाही ॥
तीनि लोकके ठाकुर कहिये । तिनके और कौनको गहिये ॥
सोई मोहि अब देहु बतायी । मोरे मन चिंता समुहायी ॥
दूसर कौन सो देहु बतायी । हमरे मन गुमान नहिं आयी ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु गरुड यक वचन हमारा । वह साहब है सबसे न्यारा ॥
यह तो सबै ईश्वरी माया । उपजहिं विनसहिं बहुरि विलाया ॥
वह नहिं आवे नहीं जाहीं । वह तो सदा अजर घरमाहीं ॥
उनकी आज्ञा इन पर आवें । तब इन गरभ वास सो पावें ॥
तुम पर सदा कृष्ण असवारी । काहे न दाय़ा करहिं विचारी ॥
हम तो शब्द संदेशी आये । योनी संकट नहिं निरमाये ॥
तब हम उसको तत्त्व लखावा । होइ विदेह तब वचन सुनावा ॥
गरुड वचन
तबही गरुडे अस्तुति ठानी । तुम साहिब निर्गुण सहिदानी ॥
तुमहो प्रभू सगुण ते न्यारा । निर्गुण तत्त्व साहिब विस्तारा ॥
धरि अस्थूल मोहि दरश दिखावा । निर्गुण शब्द प्रभु मोहि सुनावा ॥
अब गुरु मैं बन्दों तब पायो । अब जाना प्रभु तुम्हरो भायो ॥
निज प्रतीति हमरे मन आऊ । हंसराज मोहि दरश दिखाऊ ॥
अब प्रभु मोहीं दर्शन दीजे । हंस उबार आपन करि लीजे ॥
भेद तुम्हार सकल मैं पाया । धरि स्वरूप तुम दरश दिखाया ॥
ज्ञानी वचन
देह धरी हम दरशन दीना । तब उन चरणबन्दना कीन्हा ॥
गरुड वचन
शीश नाइ चरणन लपटाये । अब साहब मोहिं लेहु बचाये ॥
सार्वी-निर्गुण प्राण अधार तुम, दरश दीन्ह प्रभु आय ।
आपन करि समझावहु, लेहु जीव मुकुताय ॥