कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
कबीर सागर कबीरपन्थ, विशेषकर धर्मदासी शाखा, का विशाल धार्मिक ग्रन्थ-समूह है, जो मुख्यतः कबीर साहब और उनके शिष्य धर्मदास के संवाद के रूप में है। इसमें अनेक छोटे-बड़े ग्रन्थ, जैसे ज्ञान सागर, अनुराग सागर और बोध सागर के विभिन्न बोध, ग्यारह भागों में संकलित हैं। यह कबीरपन्थ के सृष्टि-विचार, गुरु-परम्परा और साधना का मुख्य स्रोत है।
पहले भाग ज्ञान सागर के प्रकरणों से इसकी विषय-वस्तु का अनुमान होता है: मुक्ति-भेद और अमरलोक, सत्य पुरुष का वर्णन, सृष्टि की उत्पत्ति, द्वीपों का वर्णन, धर्मराय (निरञ्जन) का सत्य पुरुष की सेवा से द्वीप और मानसरोवर पाना, कामिनी को निगलना और शाप पाना, चौदह यमों के नाम और कर्म, ज्ञानी जी (कबीर) का पृथ्वी पर आना और धर्मराय से वचन लेना, जगन्नाथ की स्थापना का प्रसंग, तीन देवों और आदि माया की कथा, समुद्र-मन्थन, वेदों और चार खानियों की उत्पत्ति, और फिर बलि, सनक-सनन्दन तथा नारद के चरित्र।
यह सम्पूर्ण ग्यारह भागों का संस्करण खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस, मुम्बई ने प्रकाशित किया है। २१३६ पृष्ठों में पूरा कबीर सागर एक साथ उपलब्ध होने से यह कबीरपन्थ के अध्येताओं के लिए एक सम्पूर्ण सन्दर्भ है।
इति
श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थभोपालबोध
समाप्त
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीगुगलानन्दद्वारा संशोधित
श्री-जगजीवनबोध
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदासः,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्गः, बम्बई-४०० ००४
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
श्रीगणेशाय नमः
A faint, stylized illustration of Lord Ganesha seated on a lotus. He is depicted with four arms, holding a small object in his hands. Above him is a traditional umbrella (chhatra). The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a very faded print.
श्रीगणेशाय नमः
धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर
सत्यकबीराय नमः
सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥
अथ श्रीबोधसागरे
पंचमस्तत्रंगः
ग्रन्थ जगजीवन बोध
( गर्भ चिंतावनी )
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥
कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥
कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥
कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥
कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥
सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥
सतगुरु-वचन
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥
प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥
सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥
चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥
नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥
गर्भोत्पत्ति वर्णन
( २२ )
जगजीवनबोध
नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥
तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥
जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥
गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥
गर्भोत्पत्ति वर्णन
नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥
सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥
हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥
नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥
दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥
दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥
नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥
हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥
तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥
सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥
छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥
अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥
छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥
छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥
ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥
जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥
बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥
सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥
अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥
करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥
जगजीवनका गर्भके कष्टसे व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कौल करना
बोधसागर
( २३ )
ता दुःखकी गति कासु कहीजै । करम उनमानतहैं दुःख सहीजै॥
यदि आलोच करै मनमाही । संगी मित्र कोइ दीखत नाही ॥
पिछला जनम जब सूझा भाई । तब जिव दिलमा चिता आई ॥
स्त्री मित्र कुटुम्ब परिवारा । सुत नाती औ सैन पियारा ॥
संगी सुजन बन्धु औ भाई । गरभ कि चीन्ह परी नहिं ताई ॥
महा दुःख सो गरभ में पावे । बहुत वैराग हियामें आवे ॥
सूझी सकल बाहरकी बाती । जो जिव पिछली होती जाती ॥
जब जिव गरभमें ज्ञान विचारा । अब मैं सुमरूं सिरजन हारा ॥
सोच मोह जिव कछू न कीजै । अब सदगुरु का शरणा लीजै ॥
जिव अपने दिल माहि विचारे । तब समरथ को कीन पुकारे ॥
सुनु धर्मदास यक कथा सुनाऊँ । यक राजाको जस बने बनाऊँ ॥
राय जगजीवन ताहिकर नामा । जब वह पहुँच्यो एही ठामा ॥
करन विन्ती लागु अधीरू । सतगुरु कहैं तब कीन्ही टेरू ॥
जगजीवन वचन
साहिब संकट दूर निवारो । मैं निज खानाजाद तुम्हारो ॥
दिल मैं करूणा करै अतिभारी । अब मोहि साहब लेहु उबारी ॥
करै अस्तुति बहुते सुधिलावै । तुम वितु खाविन्द कौन छुडावै ॥
अब दुःख दूर निवारो स्वामी । कौल कहूँ प्रभु अन्तरयामी ॥
बाहर निकारो आदि सनेही । बहु दुःख पावै मेरी देही ॥
मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ । आन देव के निकट न जाऊँ ॥
सतगुरुका होय रहों चेरा । दम दम नाम उचारूँ तेरा ॥
नित उठि गुरु चरणामृत लेऊँ । तन मन धने निछावर देऊँ ॥
जो मैं तन सों कहूँ कमाई । अर्थमाल मैं गुरुहि चढाई ॥
कुबुद्धि सीख काहु नहिं मानूं । हराम माल जहर करिजानूं ॥
कुलकी त्यागूं मान बढाई । निर्मल ज्ञान एक संत सगाई ॥
( २४ )
जगजीवनबोध
रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥
दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥
परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥
दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥
स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥
तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥
सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥
और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥
ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥
तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥
यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥
जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥
एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥
कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥
यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥
देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥
अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥
पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥
अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥
मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥
बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥
ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥
साहिब वचन
तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥
अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥
साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर गर्भसे मुक्त करना
बोधसागर
( २५ )
कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥
गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥
बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥
बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥
गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥
जगजीवन वचन
बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥
दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥
दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥
मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥
सतगुरु वचन
गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥
बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥
जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥
जगजीवन वचन
अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥
मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥
नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥
सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥
बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥
सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥
नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥
घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥
पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥
पिशुन कर्म वर्णन
( २६ )
जगजीवन बोध
ताका नाम सुनो रे भाई । महा जालके फन्द फँदाई ॥
झूठे झूठ मिले संसारा । नरक कुण्ड में नाखन हारा ॥
पिसुन कर्म वर्णन
प्रथम माता
माता मनमें करै बखाना । यह भल उग्यो आजुको भाना ॥
बालक जन्मा मोरे कोखा । जन्म भरे की भागी धोखा ॥
नाइन
नाइन एक बधार्ई लायी । तीन तो एकै बात जनायी ॥
मेरा कहा करो तुम कामा । नाक छेदि कहो नाथू नामा ॥
नाल औवल पीसो गाढो । दिहली को तब बालक काढो ॥
यह तो बात मैं गुप्त सुनायी । सुवा जिवाका तो सुहि दायी ॥
पिता
पिताके मनमें ऐसी आवैं । उमगे हरष हिय नाहि समावैं ॥
बाटे पान मिठाइ बहुत । धन्य भाग्य मोर जनम्यो पूता ॥
काका
काका कहै मैं उतरूं पारा । बालक खेले घरके द्वारा ॥
कर्म जोर मोरें बड कीन्हा । क्षेत्रपाल मोहि बालक दीन्हा ॥
दादा
दादा सुनिकै दौरे आये । पोता देख बहुत सुख पाये ॥
दासी हाथे कुवैर मैगाया । हेतु प्रीति से कण्ठ लगाया ॥
दादी
दादीके मन हर्ष अपारा । लेत बलाई बारंबारा ॥
मैं करी बहुत सतियनकी सेवा । भये प्रसन्न मोर कुलदेवा ॥
नानी
नानी आवत वेगि उठाया । सुख चुम्बा है कण्ठ लगाया ॥
लून ले शिर ऊपर वारा । द्रव्य माल पुनि बहुत उतारा ॥
बोधसागर
( २७ )
नाना
अब नाना मुख देखन आया । दौहित्रा देखि अधिक मुख पाया ॥
उमँगे हरष हिये न अमायी । कंचन चूरा दिया बधायी ॥
भुआ
बहुत करै हरष भुआ बाई । दिन दिन अधिकी करै बधाई ॥
मुख चुम्बा दै कंठ लगावे । हिये हर्ष उमँग नहिं मावे ॥
मौसी
मौसी मन बहु हर्ष उठावै । धन्य बहिन को कोख तरावै ॥
मुख चूमे अरु कण्ठ लगावै । अतिशय उमँग हिये नहिं मावै ॥
अडोसी पडोसी
बुढिया एक जो बोले आयी । तिन यक बात कही समझायी ॥
बालक तैल लौन सों लीजै । लौना नाम कहे धरि दीजै ॥
दूसरी पडोसिन
दूजी कहै सुनो रे बाई । बालक डारो छीतर माई ॥
सांचो टोना यही कहावों । इनको छीतर कहि बतलावो ॥
तीसरी पडोसिन
तिया तीसरी बोले सयानी । मैं जान्यों सो काडु न जानी ॥
कोदरा बरोबर तौल के लीजै । याकर नाग कोदरसिंह कीजै ॥
चौथी पडोसिन
चमरिन गोद यहीको डारो । मोल लेइ पुनि ताहि उजारो ॥
चमरूसिंह नाम यहि केरा । बालक याते जिवै घनेरा ॥
पांचवी पडोसिन
याको धूर गुनौरे डारो । दूत पराछित या विधि मारो ॥
घूरन सिंहै अरु गेनौ नामा । दीजे ताहि सुधरे सब कामा ॥
( २८ )
जगजीवनबोध
छठी पडोसिन
यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥
जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥
कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥
ओझा और स्याने
बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥
सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥
देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥
गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥
यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥
पुरोहित
घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥
यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥
पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥
चारण और भाट
चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥
सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥
मुसलमान फकीर
दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥
बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥
योगी
जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥
कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥
दिगम्बर
यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥
व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥
पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भका कौल भूल जाना और संसारी बंधनोंमें मगन होना
बाधसागर
( २१ )
भोजपत्रमें यंत्र मढाया । सात भांतिका रेशम लाया ॥
गूगल बारि धूप लै कीन्हा । सो पहिराय गलेमें दीन्हा ॥
पण्डित लोग
ब्राह्मण सबही नगरके आये । पत्रा पोथी साथहिं लाये ॥
पीपल केरे पान मँगाया । लगन साधिके नाम सुनाया ॥
जगजीवन नाम जनमका सही । याका मरण होय ना कबही ॥
द्रव्य माल दक्षिणा दीना । जनमपत्रिका लिखाय जो लीना ॥
बहु विधि सो संस्कार कराया । मोह फाँसमें पकरि दवाया ॥
गर्भ कौल तो सब विसराना । अमर रहनका जतन बहुठाना ॥
एक सो बात गुप्त ना होई । स्याना लोग कहैं सब कोई ॥
फन्द अनेकन में फन्दई । कौल किया सब गया भुलाई ॥
झूठे झूठ मिलै सब कोई । इन्ते काज एको नहिं होई ॥
पिछली कौल सबै विसरानी । महा जालमें बँधे प्राणी ॥
यह सब झूठे पाखण्ड साजू । इनसँ सरे न एको काजू ॥
साखी-कहैं कबीर सब चेतहूँ, आगे काल कराल ।
आल जँजाल तम छाडिके, पिछले लोक सँभाल ॥
चोपाई
जौन कौल गर्भ में कीया । मूरख विसारि-सब दीया ॥
फिर भी कठिन हो गया भाई । तुम करिहौ कौन उपाई ॥
इतने सब मिलि करहिं बधाई । तामें तेरा कौन सहाई ॥
तुम अबकी चेतौ जो नाहीं । मानुष जनम भाग बड पाही ॥
साखी-ये तेरे मित्र नहीं, सब वैरी करि जान ।
उबरा चाहो कालते, गुरुहि मित्र कर मान ॥
चोपाई
एक जीव बेरी बहुताई । यूथ युत्थ बाटन सब लाई ॥
कोई जीवको का तकसीरा । सबको जडिया मोह जँजीरा ॥
( ३० )
जगजीवनबोध
ज्ञान ध्यान जिव कैसे पावैं । इतने पिशुन ताहि भरमावैं ॥
देखो दिलै करि ज्ञान विचारा । किहिविधि उतरो भवजल पारा ॥
रे कुबुद्धि दुख में मत झूले । पिछला काल बोल मति भूलै ॥
इक दिन फेरि परैगा गाढा । सुशुक बांधि यम करिहैं ठाढा ॥
तुम मति जानो अमर है काया । यह दीसै सुपनेकी माया ॥
यहि चकचौंध भुलो मति कोई । संवल फूल जैसा तन होई ॥
जैसे नींद में सुपना आवै । जागि परै तब कछू न पावै ॥
यह तन ऐसे देखो भाई । झूठे झूठ मिलैं सब आई ॥
दिनाचार चटक दिखलावै । अन्तकाल ग्रासन कूँ धावै ॥
काल जंजाल सो छूटा जाई । गुरुसे प्रीति करो रे भाई ॥
सतगुरु ऐसी युक्ति लखावै । जासे जीव परम पद पावै ॥
सुनो जीव अबूझ की बाता । जनम गवाँवै करम कमाता ॥
हर्ष मोह मैं सबहि सुनाऊँ । जेते घर में सबहि दिखाऊँ ॥
एक वर्ष लगि डोल डोलावै । पशू रूपमें जनम गँवावै ॥
उखली जीभ तोतला बोलै । मातु पिता सब हर्षित डोलै ॥
आज जंजाल बोले बहकावे । त्यों त्यों हरष हिये नहिं मावे ॥
परी करै औ ऊभा धावै । बाहर भीतर दौड़ा आवै ॥
कंचन घँघुर बेगि गढ़ाई । रेशम केरी डोर पोवाई ॥
सोना रूपा बहु पहिराया । हीरा मोती भूल भुलाया ॥
बालन सँग में खेलन जावै । नाच कूद के घरही आवै ॥
मनमें आनंद करै चँचलाई । सोच फिकर कछु व्यापे नाई ॥
करै कुतूहल मनमें सोई । दिन दिन तेज सवाया होई ॥
आकुल बोलै सोच न आने । कूर कपट कर बहु सुख गाने ॥
संकटका दिन चित्त न आवै । करै अनीति जोई मन भावै ॥
चित्तमें दुर्मति रहै अति घनी । महा दुष्ट बुद्धि पापी सनी ॥
द्वादश वर्षकी भयी है देही । अनन्त उपाय करै नर केही ॥
बोधसागर
( ३१ )
प्रगट काम काया के भीतर । सोच फिकिर नहिं व्यापे अंतर॥
अन्ध करै बहुत अहंकारा । निरखै तिरिया घर घर द्वारा॥
परवश दूती आनि मिलावै । जोर करै तो पकरि मगावै ॥
नाहकको तू कान लगावै । नहिं मानै तो यमघर जावै ॥
अघ करमी होय तन डोलै । जोर बहुत गरभ सो बोलै ॥
आंखिन माहीं वर्षे लोई । ज्ञान ध्यानकी सुधि ना होई ॥
गुरु चरचाके निकट न जावै । हँसी मसखरीसों मन भावै ॥
झूठी बात करै लबराई । तासों हेतु करै मितराई ॥
साखी—यह नर गरभ भुलाइया, देखि मायाको झोल ।
कहै कबीर सब चेतहु, सुमिरि पाछलो कौल ॥
चौपाई
इन्द्री स्नेह न मानै चेता । माया गर्ब फिरै मैमंता ॥
ईगुण प्रगटा अन्तर माहीं । कामातुर होय करी विवाही ॥
पहले विवाही एक लुगाई । बहुत प्रेम सँग ताहि लिवाई ॥
विषय विवेक फिर उपजा भारी । पीछे व्याही सुन्दरि नारी ॥
अँगारस्वरूप कामिनि अधिकार्ई । कामातुरसों रहे लपटाई ॥
महा अनन्द भये मन माहीं । एक पलक सँग छाड़े नाहीं ॥
करै खवासी कहत है दासी । बन्धा मोह जाल की फांसी ॥
खिदमतगार सहेली घनी । कई नायिका कई रामजनी ॥
नव नव खण्डके महल बनाये । सेना केरे कलस चढाये ॥
करी बिछावन तहैं बडभारी । गादी तकिया बहुत अपारी ॥
बहुत मोलको अतर मँगावै । फूलन केरी सेज बिछावै ॥
कहैं लगि बरनूं यह विस्तारा । मायाविनको बार न पारा ॥
टपका स्वाद भया तर अन्धा । आवै यम तब करै बहु फंदा ॥
नित नित त्रिया नई संयोगा । खान पान और षट रस भोगा ॥
सद्गुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे बागमें ठहरना, उसका हरा हो जाना और राजाका खबर पाकर बाग देखने आना फिर कबीर साहबसे मिलना
( ३२ )
जगजीवनबोध
मता विषय रस कछू न सूझे । भैरों भूत शीतला पूजै ॥
भूलै कौल गरभकी बांधी । अब चकचौंध आई आंधी ॥
सबही जीव कौलकरि आवै । बाहर निकसि सब बिसरावै ॥
सतगुरुके आगमन
ऐसे जीव भूल रहे सारे । तब सतगुरु आइ पगु धारे ॥
जीव चितावन सतगुरु आये । अलीदास धोबी समझाये ॥
और हंस बहुत चेताये । फिरत फिरत पाटनपुर आये ॥
सतगुरुका पाटनपुरमें पहुँचना
सतगुरु आये पाटन ठाऊँ । जगजीवन राय बसै तेहि गाऊँ ॥
राय न मानै भक्ति विचारा । हँसे भक्तको बारम्बारा ॥
भक्त रूप सब शहर निहारा । कोउ न मानै कहा हमारा ॥
तब आपन मन कीन विचारा । कैसे मानै शब्द हमारा ॥
जाइ बाग में आसन कीन्हा । गुप्त रहे काहू नहिँ चीन्हा ॥
द्रादश वर्ष भये बाग सुखाने । सुलगे काछ होय पुराने ॥
चार कोस तेहि बाग लम्बाई । तीन कोसकी है चकलाई ॥
तहाँ जाय आसन हम कीन्हा । रहौं गुप्त काहू नहिँ चीन्हा ॥
तहवाँ मैं कौतुक अस कीया । सूखे बाग हरा कर दीया ॥
विकसे पुढुप जीव सब जागे । सबने हरियर देखा बागे ॥
माली जाय कै दीन बधाई । जागा भाग तुम्हारा भाई ॥
देखा बाग जाय तेहि वारा । फल फूलनका अन्त न पारा ॥
हर्षा माली बाहर आया । देखा बाग बहुत सुख पाया ॥
फूलन छाब भरी दुइ चारी । नाना विधिके फूल अपारी ॥
नाना विधिके मेवा लाया । ले माली दरबारि आया ॥
बैठा राजा सभा मैझारा । उमरावनको तहाँ न पारा ॥
माली सब ले धरी रसाला । राजा पूछ करे ततकाला ॥
बोधसागर
( ३३ )
राजा जगजीवन बचन
कौन देश तैं माली आया । फूल अन्नप कहाँसे लाया ॥
कौन बाग के फलन विशेषा । कानो सुनी न आँख न देखा ॥
माली बचन
नौ लखा बाग रहा होय आया । फल प्रसून सब नये बनाया ॥
सुनिके राजा हरषा भारी । संग उठी चली परजा सारी ॥
राजा बचन
कहु दिवान यह कौन प्रकारा । समझि बूझिके करो विचारा ॥
ज्योतिषी पण्डित सवैं बुलाये । पत्रा पोथी सबहीं लाये ॥
ज्योतिषी बचन
लगन सोधि सब ऐसी कही । कोइ पुरुष यहाँ आये सही ॥
है कोइ नर कै कोइ पखेहू । सोधो जाय बाग सब हेहू ॥
हेरे राय बागके माहीं । बैठे संत यक ध्यान लगाहीं ॥
राजा जाय धरा तब पाई । नगर भरेकी परजा आई ॥
कहे राजा धन मेरो भागा । दर्शन पाय अमर होय लागा ॥
आलसी घर गंगा आयी । मिटि गई गर्मी भयी शितलायी ॥
सतगुरु बचन
तब राजासों कही पुकारी । सुन राजा एक बात हमारी ॥
हम जनि भार चढाओ भाई । काहे को तुम देहु बड़ाई ॥
अच्छा बाग विमल हम चीन्हा । तासो आये आसन कीन्हा ॥
ऐसा तुमहीं बाग बनाया । नाना विध के रख लगाया ॥
आसन किया देखि हम ठारी । बहुत फूल फलकी अधिकारी ॥
राजा बचन
फिर कै राजा शीस नवाया । द्वादश वर्ष भये बाग सुखाया ॥
सूखा बाग भये बहु बारा । नहिं कोइ लोक आहे संसारा ॥
नं. ५ कबीरसागर - ३
सद्गुरुका राजाको गर्भका कौल याद दिलाना
( ३४ )
जगजीवनबोध
छाडी फल फूलनकी आसा । कोइ न आवै बागके पास । ॥
तुम समर्थ पग धारे आई । हरा हुआ बाग सब ठाई ॥
राजा कहै दया अब कीजै । मोकूँ मुक्तिदान फल दीजै ॥
मेरे मस्तक धरहू हाथा । मैं रहूँ सतगुरु तुम्हारे साथ । ॥
सतगुरु वचन
तुमको कौल भुलाना भाई । किया सो कौल गया बिसराई ॥
संकट गरभ में बाचा दीन्ह । बाहरनिकसि करमबहु कीन्ह ॥
किया कौल जब गये भुलाई । तब हम आइके चरित दिखाई ॥
बहु विधि बात कही चेताई । बाहर निकसि बुद्धि पलटाई ॥
तुमको तो कछु सूझत नाही । फन्दा मोहजाल के माहीं ॥
आवै यम दश द्वार मून्दी । तबहीं बांधि करेगा कून्दी ॥
सोच बूझ देख मन माहीं । इतने में तेरा कौन सहाहीं ॥
पिसुन मिलै सब वार न पारा । नरक बास में नाखन हारा ॥
बहु विधि तुमसों शब्द पुकारा । किया कौन नर भूल गवौरा ॥
घर घर हम सब कही पुकारी । कोइ न मानै कही हमारी ॥
हे राजा जब तू मातृगर्भमें था तब तू वचनवद्ध हुआ था कि भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेगे । उस दुःखमें तो तू पुकारता था तथा हाय हाय करता था, कि मुझको इस दुःखसे निकालो । जब तू गर्भके बाहर आया तब तू अपनी प्रतिज्ञा भूल गया और शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तूने कौन कौनसे कुकर्म न किये ? सत्यगुरुकी दयाको तू एकबारगी भूल गया, भोगविलासमें फँसकर अन्धा हो गया और मायाने तेरे ज्ञानको बिलकुल ही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेगे और तेरी मुश्कें बांधकर नरक में लेजावेंगे तब तेरा कौन मित्र सहायता करेगा ? और तुझको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तू सोच तथा समझ कि, वे लोग जिन्हें तू अपना
राजाका सद्गुरुसे उद्धारकी विनती करना
बोधसागर
( ३५ )
मित्र समझता है उनमें से कौन तेरा उस समय सहायक होगा ?
कौन तुझको नरकसे बचावेगा ? गर्भमें मैंने तुझको बहुत सम-
झाया था सो हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया मैंने
सबसे घर घर पुकार कर कहा मेरा कहना किसी मूर्खने न
माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला ।
राजा बचन-चौपाई
अब तो गुरु होहु सहाई । मोकों यमसे लेहु छुड़ाई ॥
सबही करम बरुसकै दीजे । हूबत मोहि उबारके लीजे ॥
सैन करी पालकी मँगाई । लै सद्गुरु को माहिं बिठाई ॥
पाँव उधार काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥
सद्गुरु पग धर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥
समरथ दर्शन दीन्हा आनी । धनधन भाग्य तुम्हारो रानी ॥
सद्गुरु को पलँगा बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥
राजा भाखे शीश नवाई । मोकों राखो गुरु शरनाई ॥
करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥
अब हम शरना लेब तुम्हारी । दया करो तन दुखत हमारी ॥
सतगुरु बचन
तब कहे सतगुरु लेहु सँभारी । राजा सुनहु बात हमारी ॥
कस चले राजा लोक हमारे । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारे ॥
कोटिन ज्ञान कथे असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥
जो कोई बूझे भक्ति हमारी । ताको चहिये लगन सँचारी ॥
जैसे लगन चकोरकी होई । चन्द्र सनेह अँगार चुगोई ॥
ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पग धर सोई ॥
तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥
कैसे छोड़िहौ मान बड़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥
कैसे छोड़िहौ हाथी असवारा । कैसे छोड़िहौ अंथ भँडारा ॥